"तत्त्वार्थसूत्रम्" इत्यस्य संस्करणे भेदः

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सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्गः।।
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*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/प्रथमोऽध्यायः|प्रथमोऽध्यायः]]
तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्।।
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/द्वितीयोऽध्यायः|द्वितीयोऽध्यायः]]
 
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/तृतीयोऽध्यायः|तृतीयोऽध्यायः]]
तन्निसर्गादधिगमाद्वा।।
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/चतुर्थोऽध्यायः|चतुर्थोऽध्यायः]]
 
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/पञ्चमोऽध्यायः|पञ्चमोऽध्यायः]]
जीवजीवास्रव बन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्।।
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/षष्ठोऽध्यायः|षष्ठोऽध्यायः]]
 
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/सप्तमोऽध्यायः|सप्तमोऽध्यायः]]
नामस्थापना द्रव्य भावतस्तन्न्यासः।।
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/अष्टमोऽध्यायः|अष्टमोऽध्यायः]]
 
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/नवमोऽध्यायः|नवमोऽध्यायः]]
प्रमाणनयैरधिगमः।।
*[[तत्त्वार्थसूत्रम्/दशमोऽध्यायः|दशमोऽध्यायः]]
 
निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरण स्थितिविधानतः।।
 
सत्संख्याक्षेत्र स्पर्शनकालान्तर भावाल्पबहुत्त्वैश्च।।
 
मतिश्रुतावधिमनः पर्यय केवलानि ज्ञानम्।।
 
तत्प्रमाणे।।
 
आद्ये परोक्षम्।।
 
प्रत्यक्षमन्यत्।।
 
मतिःस्मृतिः संज्ञाचिन्ताभिनिबोध इत्यानर्थान्तरम्।।
 
तदिन्द्रयानिन्द्रियनिमित्तम्।।
 
अवग्रहेहावाय धारणाः।।
 
बहुबहुविधक्षिप्रानिः सृतानुक्त ध्रुवाणां सेतराणाम्।।
 
अर्थस्य।।
 
व्यञ्जनस्यावग्रहः।।
 
न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम्।।
 
श्रुतं मतिपूर्वं ह्यनेकद्वादशभेदम्।।
 
भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्।।
 
क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम्।।
 
ऋजुविपुलमती मनः पर्ययः।।
 
विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः।।
 
विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयोऽवधिमनः पर्यययोः।।
 
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वस्रवपार्यायेषु।।
 
रूपिष्ववधेः।।
 
तदनन्तभागे मनः पर्यस्य।।
 
सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य।।
 
एकादीनि भाज्यानियुगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः।।
 
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च।।
 
सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत्।।
 
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जु सूत्रशब्द समभिरूढैवंभूता नयाः।।
 
इति प्रथमोऽध्यायः।।
 
 
औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीलस्य स्वतत्त्वमौदयिक पारिणामिको च।।
 
द्विनवाष्टादशैकविंशातित्रिभेदा यथाक्रमम्।।
 
सम्यक्त्व चारित्रे।।
 
ज्ञानदर्शन दानलाभभोगोप भोगवीर्याणि च।।
 
ज्ञानाज्ञान दर्शन लब्ध्यश्चतुस्त्रि त्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्व चारित्र संयमासंयमाश्च।।
 
गतिकषायलिङ्ग मिथ्यादर्शना ज्ञानासंयता सिद्ध लेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकैकषड्भेदाः।।
 
जीवभव्याभव्यत्वानि च।।
 
उपयोगो लक्षणम्।।
 
स द्विविधोऽष्टचतुर्भेद।।
 
संसारिणो मुक्ताश्च।।
 
समनस्कामनस्काः।।
 
संसारिणस्त्रसस्थावराः।।
 
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः।।
 
द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः।।
 
पंचेद्रियाणि।।
 
द्विविधानि।।
 
निर्वृत्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम्।।
 
लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम्।।
 
स्पर्शनरसन घ्राणचक्षुःश्रोत्राणि।।
 
स्पर्शनरसन्गन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः।।
 
श्रुतमनिन्द्रियस्य।।
 
वनस्पत्यन्तानामेकम्।।
 
कृमिपिपीलिका भ्रमर मनुष्यादीनामेकैक वृद्धानि।।
 
संज्ञिनः समनस्काः।।
 
विग्रहगतौ कर्मयोगः।।
 
अनुश्रेणि गतिः।।
 
अविग्रहा जीवस्य।।
 
विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्भ्यः।।
 
एक समयाविग्रहा।।
 
एकं द्वौ त्रीन्वानाहारकः।।
 
संमूच्छंनगर्भौपरादा जन्म।।
 
सचित्तशीतसंवृताःसेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः।।
 
जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः।।
 
देवनारकाणामुपपादः।।
 
शेषाणां संमबर्च्छनम्।।
 
औदारिकवैक्रियिका हारकदैजसकार्मणानि शरीराणि।।
 
परं परं सूक्ष्मम्।।
 
प्रदेशतोऽसंख्येयगुणंप्राक् तैजसात्।।
 
अनन्तगुणे परे।।
 
अप्रतीघाते।।
 
अनादिसंबन्धे च।।
 
सर्वस्य।।
 
तदादीनि भाज्यानियुगपदेकस्मिन्ना चतुर्भ्यः।।
 
निरूपभोगमन्त्यम्।।
 
गर्भसमबर्च्छनजमाद्यम्।।
 
औपपादिकं वैग्रियिकम्।।
 
लब्धिप्रत्ययं च।।
 
तैजसमपि।।
 
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव।।
 
वानकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि।।
 
न देवाः।।
 
शेषस्त्रवेदाः।।
 
औपपादिक चरमोत्तमदेहाऽसंख्येय वर्षायुषोनवर्त्यायुषः।।
 
इति द्वितीयोऽध्यायः।।
 
रत्नशर्कराबालुकापंक धूमतमोमहातमः प्रभा भूमयो घनाम्बुवाताकाश प्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः।।
 
तासु त्रिंशत्पंचविंशति पंचदशदशत्रिपंचोनैकनरकशतसहस्राणि पंच चैव यथाक्रमम्।।
 
नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणाम देहवेदनाविक्रियाः।।
 
परस्परोदीरितदुःखाः।।
 
संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः।।
 
तेष्वेकत्रि सप्त दशसप्तदशत्दवा विंशति त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमासत्त्वानां परा स्थितः।।
 
जम्बूद्वीप लवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्रा।।
 
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः।।
 
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविषकम्भो जम्बूद्वीपः।।
 
भरतहेमवतहरिविदेह रम्यक हैरण्ेयवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि।।
 
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मि शिखरिणो वर्णधरपर्वताः।।
 
हेमार्जुनतपनीय वैडूर्यरजत रेममयाः।।
 
मणिविचिक्षपर्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः।।
 
पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरि महापुण्डरीकपुण्जरीकाहृदास्तेषामुपरि।।
 
प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्धविषकम्भो ह्रदः।।
 
दशयोजनावगाहः।।
 
तन्मध्ये योजनं पुष्करम्।।
 
तद्द्विगुणद्विगुणाह्रदः पुष्कराणि च।।
 
तन्निवासिन्यो देव्यः श्री ह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिक परिषत्काः।।
 
गंगासिन्धु रोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तै सीतासीतोदानारीनरकान्ता सुवर्ण रूप्यकूला रक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः।।
 
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः।।
 
शेषास्त्वपरगाः।।
 
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गंगासिन्ध्वादयो नद्यः।।
 
भरतः षड्विंशतिपंचयोजनशतविस्तारः षट्चैकोनविंशतिभागायोजनस्य।।
 
तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः।।
 
उत्तर दक्षिणतुल्याः।।
 
तथोत्तरः।।
 
विदेहेषु संख्येयकालाः।।
 
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः।।
 
द्विर्धातकीखण्डे।।
 
पुष्कारर्धे च।।
 
प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः।।
 
आर्या म्लेच्छाश्च।।
 
भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः।।
 
नृस्थितीपरावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्त।।
 
तिर्यग्योनिजानां च।।
 
इति तृतीयोऽध्यायः।।
 
 
देवाश्चतुर्णिकायाः।।
 
आदितस्त्रिषु पीतानत्लेश्याः।।
 
दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः।।
 
इन्द्रसामानिक त्रायस्त्रिशपारिषदात्मरक्ष लोकपालीनाक प्रकीर्ण काभियोग्य किल्बिषि काश्चैकशः।।
 
त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः।।
 
पूर्वयोर्द्वीन्द्रा।।
 
कायप्रवीचाराः।।
 
शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनः प्रवचाराः।।
 
परेऽप्रवचीराः।।
 
भवनवासिनोऽसुरनाविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोद धिद्वीपदिक्कुमाराः।।
 
व्यन्तराः किन्नरकिंपुरुष महोरग गन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः।।
 
ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च।।
 
मेरुप्रदिक्षिणा नित्यगतयो नृलोके।।
 
तत्कृतः कालविभागः।।
 
बहिरवस्थिताः।।
 
वैमानिकाः।।
 
कल्पोपपन्नाः कल्पाताताश्च।।
 
उपर्युपरि।।
 
सौधर्मैशानसानत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्मब्रह्मोत्तर लान्तवकापिष्ठ शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानतप्राणयोरारणाच्युतयोर्नवसुग्रैवेयकेषु विजय वैजयन्त ययन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च।।
 
स्थिति प्रभावसुखद्युतलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः।।
 
गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः।।
 
पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु।।
 
प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः।।
 
ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः।।
 
सारस्वतादित्य व ह्रयरुणगर्दतोयुषिताव्यावाधारिष्टाश्च।।
 
विजयादिषु द्विचरमाः।।
 
औपपादिक मनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः।।
 
स्थितिसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्ध हीनमिताः।।
 
सौधर्मेशालयोः सागरोपमेऽधिके।।
 
सानत्कुमार माहेन्द्रयो सप्त।।
 
त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदश पञ्चदशभिरधिकानि तु।।
 
आरणाच्युततादूर्ध्वमेकैकेननवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च।।
 
अपरापल्योपममधिकम्।।
 
परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा।।
 
नारकाणां च द्वितीयादिषु।।
 
दशवर्षज्ञसहस्राणि प्रथमायाम्।।
 
भवनेषु च।।
 
व्यन्तराणां च।।
 
परापल्योपममधिकम्।।
 
ज्योतिष्कणां च।।
 
तदष्टभागोऽपरा।।
 
लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम्।।
 
इति चतुर्थोऽध्यायः।।
 
 
अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः।।
 
द्रव्याणि।।
 
जीवाश्च।।
 
नित्यावस्थितान्यरूपाणि।।
 
रूपिणः पुद्गलाः।।
 
आकाशादेकद्रव्याणि।।
 
निष्क्रियाणि च।।
 
असंख्योयाः प्रदेशा धर्माधर्मेकजीवानाम्।।
 
आकाशस्यानन्ताः।।
 
संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम्।।
 
नाणोः।।
 
लोकाकाशेऽवगाहः।।
 
धर्माधर्मयोः कृस्ने।।
 
एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम्।।
 
असंख्येयभागादिषु जीवानाम्।।
 
प्रदेशसंहार विसर्पाभ्या प्रदीपवत्।।
 
गतिस्थ्त्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः।।
 
आकाशस्यावगाहः।।
 
शरीरवाङ्मनः प्राणापानाः पुद्गलनानाम्।।
 
सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च।।
 
परस्परोपग्रहो जीवानाम्।।
 
वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य।।
 
स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः।।
 
शब्दसौक्ष्म्यस्थौल्य संस्थान भेदतश्छायातपोद्योतवन्तश्च।।
 
अणवः स्कन्धाश्च।।
 
भेदसंघातेभ्य उत्पद्यन्ते।।
 
भेदादुणुः।।
 
भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः।।
 
सद्द्रव्यलक्षणम्।।
 
उत्पादव्ययध्रौव्युक्तं सत्।।
 
तदभावाव्ययं नित्यम्।।
 
अर्पितानर्पितसिद्धेः।।
 
स्निग्धरुक्षत्वाद् बन्धः।।
 
न जघन्यगुणानाम्।।
 
गुणसाम्ये सदृशानाम्।।
 
द्वयाधिकादिगुणानां तु।।
 
बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च।।
 
गुणपर्ययवत् द्रव्यम्।।
 
कालश्च।।
 
सोऽनन्तसमयः।।
 
द्रव्यश्रया निर्गुणा गुणाः।।
 
तद्भावः परिणामः।।
 
इति पञ्चमोऽध्यायः।।
 
 
कायवाङ्मनः कर्म योगः।।
स आस्रवः।।
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य।।
सकषायाकषाययोः सांपरायिकेर्यापथयोः।।
इन्द्रियकषायाव्रत क्रियाः पञ्चचतुः पञ्चपञ्चपबिंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः।।
तीव्रमन्दज्ञाताज्ञात भावाधिकरण वर्यिविशेषेभ्यस्तद्विशेषः।।
अधिकरणं जीवाजीवाः।।
आद्यं संरम्भ समारम्भारम्भ योग कृतकारितानुमत कषायविशेषेस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः।।
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोग निसर्गा द्विजतुर्द्वि्वत्रिभेदाः परम्।।
तत्प्रदोष निह्रवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः।।
दुःख शोकतापा क्रन्दन वधपरिदेवनान्यित्मपरोभयस्थान्यसद्वेघस्य।। भूतव्रत्यनुकम्पादानसराग संयमादियोगः क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य।।
केवलिश्रुतसंघ धर्म देवावर्णवादो दर्शनमोहस्य।।
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य।।
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकसयायुषः।।
मायातिर्यग्योनस्य।।
अलपारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य।।
स्वभावमार्दवं चं।।
निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम्।।
सरागसंयम संयमासंयमा काम निर्जराबालतपांसि दैवस्य।।
सम्यक्त्वं च।।
योगवक्रता विसंवादनंचाशुभस्य नाम्नः।।
तद्विपरीतं शुभस्य।।
दर्शनविशुद्धिर्निनय सम्पन्नता शीलवव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्ति तस्त्यागतपसी साधु समाधिर्वैयावृत्त्यकरण मर्हदाचार्य बहुश्रुत प्रवचन भक्ति रावश्य का परिहाणिर्मार्गं प्रभवनाप्रवचन वत्सलत्व मितितीर्थकरत्वस्य।।
परात्मनिन्दा प्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गौत्रस्य।।
तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सकौ चोत्तरस्य।।
विघ्नकरणमन्तरायस्य।।
इति षष्ठोऽध्यायः।।
 
हिंसाव-तस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यौ विरतिर्व्रतम।।
 
देशसर्वतोऽणुमहती।।
 
तत्स्थैर्याथा भावनाः पाञ्च पञ्च।।
 
वाङ्गमनोगुप्तीर्यादान निक्षेपण समित्यालोकितपान भोजनानि पंच।।
 
क्रोधलोभ भीरुत्व हास्य प्रत्याख्यानान्युवी चिभाषणं च पंच।।
 
शून्यागार विमोचिता वासपरोधा करण भैक्षशुद्धिसमधर्माविसंवादाः पंच।।
 
स्त्रीराग कथा श्रवणतन्मनोहरांग निरीक्षणपूर्व रतानुसम् रण वृष्येष्ट सरस्वशरीर संस्कार त्यागाः पंच।।
 
मनोज्ञामनोत्रज्ञन्द्रिय विषय रागद्वेष वर्जनानि पंच।।
 
हिंसादिष्वहामुत्रा पायावद्यदर्शनम्।।
 
दुःखमेव वा।।
 
मैत्रीप्रमोद कारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिक क्लिश्यमानाविनयेषु।।
 
जगत्कायस्व भावौ वा संवेग वैराग्यर्थम्।।
 
प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा।।
 
असदभिधानमनृतम्।।
 
अदत्तादानं स्तेयम्।।
 
मैथुनमब्रह्म।।
 
मूर्च्छा परिग्रहः।।
 
निःशल्यो व्रती।।
 
अगार्यनगारश्च।।
 
अणुव्रतोऽगारी।।
 
दिग्देशानर्थदण्ड विरतिसामायिक प्रोष धोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रतसंपन्नश्च।।
 
मारणान्तिकीं सल्लेखना जोषिता।।
 
शंकाकाङक्षाविचिकत्सान्यदृष्टि प्रशंसा संस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतीचाराः।।
 
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम्।।
 
बन्धवधच्छेदातिभारोपणान्नपाननिरोधाः।।
 
मिथ्योपदेश रहोभ्याख्यानकूटलेखक्रिया न्यासापहार साकारमन्त्र भेदाः।।
 
स्तेन प्रयोगतदाह्वतादान विरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिक मनोन्मान प्रतिरुपक व्यवहाराः।।
 
परविवाहक रणेत्वरिका परिगृहीता गमनानाङ्गक्रीडा कामतीव्राभिनिवेशाः।।
 
क्षेत्रवास्तुहिरण्य सुवर्णधन धान्य दासीदास कुप्य प्रमाणतिक्रमाः।।
 
ऊर्ध्वाधस्तिर्य ग्व्यतिक्रमःक्षेत्र वृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि।।
 
आनयन प्रेष्य प्रयोग शव्दरुपानुपात पुद्गलक्षेपाः।।
 
कन्दर्पकौत्कुच्य मौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग परिभोगानर्थक्यानि।।
 
योगदुष्प्रणिधानानाद रस्मृत्यनुपस्थानानि।।
 
अप्रत्यवेक्षिता प्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणा नादर स्मृत्यनुपस्थानानि।।
 
सचित्त सम्बन्धसंमिश्राभिषवदुः पक्वाहाराः।।
 
सचित्तनिक्षेपा पिधानपरव्य पदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः।।
 
जीवितमरणासंसमित्रानुराग सुखानुबन्ध निदानानि।।
 
अनुग्रहार्थ स्यस्यातिसर्गो दानम्।।
 
विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः।।
 
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः।।
 
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणोयोग्यान् पुद्गनानादत्ते स बन्धः।।
 
प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधयः।।
 
आद्यो ज्ञान दर्शनावरणवेदनीय मोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः।।
 
पञ्चनवद्व्यष्टाविंशति चतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्च भेदा यथाक्रमम्।।
 
मतिश्रुतावधिमनः पर्ययकेवलानाम्।।
 
चक्षुरचक्षुर वधिकेवलानां निद्रा निद्रा निद्रापचला प्रचलास्त्यनगृद्धयश्च।।
 
सदसद्वेद्ये।।
 
दर्शनचारित्रमोहनीया कषाय कषाय बेदनीयाख्या स्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्व मिथ्यात्वतदुभयान्य कषायकषायौ हास्य रत्यरतिशोक भय जुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसक बेदा अनन्तानुबन्ध्य प्रत्याख्यान प्रत्याख्यान संज्वलन विकल्पाश्चैकशः क्रोधमान माया लोभाः।।
 
नारकतैर्यग्योनमानुदैवानि।।
 
गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माण बन्धसंघात संस्थानसंहनन स्पर्श रस गन्ध वर्णनुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छवास निहायोगतयः प्रत्येकशरोत्रस सुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति स्थिरादेय यशः कीर्तिसेतराणितीर्थकरत्वं च।।
 
उच्चैनींचैश्च।।
 
दानलाभोगोपभोगवीर्याणाम्।।
 
आदितस्तिसृणामन्रायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटी कोटयः परा स्थितः।।
 
सप्ततिरमोहनीयस्य।।
 
विंशतिर्नामगोत्रयोः।।
 
त्रयस्त्रिशत्सागरोपमाण्यायुषः।।
 
अपरा द्वादश मुहूर्त्ता वेदनीयस्य।।
 
नामगौत्रयोरष्टौ।।
 
शेषाणामन्तर्मुहर्ताः।।
 
विपाकोऽनुभवः।।
 
स यथानाम।।
 
ततश्च निर्जरा।।
 
नामप्रत्ययाः सर्वतो योग विशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाह स्थिताः सर्वात्म प्रदेशोष्वनन्तान्त प्रदेशाः।।
 
सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम्।।
 
अतोऽन्यत्पापम्।।
 
इत्यष्टमोऽध्यायः।।
 
आस्रवनिरोधः संवरः।।
 
स गुप्ति समिति धर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः।।
 
तपसा निर्जरा च।।
 
सम्यग्योग निग्रहो गुप्तिः।।
 
ईर्याभाषैषणा दान निक्षेपोत्सर्गा समितयः।।
 
उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्य शौचसंयम तपस्त्यागा किञ्चन्य ब्रह्मचर्याणि धर्मः।।
 
अनित्याशरण संसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवर निर्जरा लोकबोधि दुर्लभ धर्मस्वाख्यातत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः।।
 
मार्गाच्यवननिर्जरार्थ परिषोढव्याः परीषहाः।।
 
क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्री चर्यानिषद्याशय्या क्रोध वधयाचनालाभ रोग तृणस्पर्श मल सत्कार पुरस्कार प्रज्ञानां दर्शनानि।।
 
सूक्ष्मसांपरायछद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश।
 
एकादश जिने।।
 
बादरसांपराये सर्वे।।
 
ज्ञानवरणे प्रज्ञाज्ञाने।।
 
दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ।।
 
चारित्रमोह नाग्यानरतिस्त्रि निषद्याक्रोशयाननासत्कार पुरस्काराः।।
 
वेदनीये शेषाः।।
 
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नै कोनविंशतेः।।
 
सामायिकच्छेदोपस्थापना परिहार विशुद्धिसूक्ष्म सांपराय यथाख्यातमितिचारित्रम्।।
 
अनशानावमोदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तसय्यासनकायक्लेशा बाह्य तपः।।
 
प्रायश्चिविनय वैया वृत्त्यस्वाध्याय व्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम्।।
 
नवचतुर्दश पञ्चद्विभेदा यथाक्रमं प्रागध्यानात्।।
 
आलोचनप्रतिक्रमणतदुभय विवेक व्युतसर्गत पश्छेदपरिहारोपस्थापनाः।।
 
ज्ञानदर्शन चारित्रोपचाराः।।
 
आचार्योपाध्याय तपस्विशैक्ष ग्लानगण कुल संघ साधु मनोज्ञानाम्।।
 
वाचनापृच्छानानुप्रेक्षाऽऽम्नायधर्मोपदेशाः।।
 
बाह्याभ्यन्तरोपध्योः।।
 
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात्।।
 
आर्तरौद्रधर्म्यशुक्लानि।
 
परे मोक्षहेतू।।
 
आर्तममनोज्ञस्य साप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः।।
 
विपरीतं मनोज्ञस्य।।
 
वेदनायाश्च।।
 
निदानं च।।
 
तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम्।।
 
हिंसानृतस्तेय विषय संरक्षणेभ्यो रोद्रमविरतदेशविरतयोः।।
 
आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम्।।
 
शुक्ले चाद्ये पूर्वविदः।।
 
परे केवलिनः।।
 
पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्म क्रियाप्रतिपा दिव्युपरत क्रियानिवर्तीनि।।
 
त्र्येक योग काययोगा योगानाम्।।
 
एकाश्रयेसवितर्कवीचारे पूर्वे।।
 
अवीचार द्वितीयम्।।
 
वितर्कः श्रुतम्।।
 
वीचारोऽर्थव्यञ्जन योग संक्रान्तिः।।
 
सम्यग्दृष्टि श्रावक विरतानन्त वियोजक दर्शन मोहक्षप कोपशमकोपशान्तमोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसंख्येय गुणनिर्जराः।।
 
पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकाः निर्गन्थाः।।
 
संयम श्रुतप्रतिसेवना तीर्थलिंगलेश्योपपादस्थान विकल्पतः साध्याः।।
 
इति नवमोऽध्यायः।।
 
 
मोहक्षयाज्ज्ञान दर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम्।।
 
बन्धहेत्व भावनिर्जराभ्यां कृत्स्न कर्मविप्रमोक्षो मोक्षः।।
 
औपशमिकादिभव्यत्वानां च।
 
अन्यत्र केवल सम्यक्त्वज्ञान दर्शन सिद्धत्वेभ्यः।।
 
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्यालोगन्तात्।।
 
पूर्व प्रयोगादसंगत्वाद्बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च।।
 
आविद्धकुलाल चक्रबद्व्यपगतलेपालांबुवदेरण्डबीजादग्निशिखाबच्च।।
 
धर्मास्तिकाया भावात्।।
 
क्षेत्र कालगतिंलिग तीर्थ चारित्र प्रत्येकबुद्धबोधित ज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहुत्वतः साध्याः।।
 
इति दशमोऽध्यायः।।
 
[[वर्गः:न्यायदर्शनम्]]
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