"लघुसिद्धान्तकौमुदी/अजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम्" इत्यस्य संस्करणे भेदः

(लघु)
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(अजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम्)
 
(लघु) (लघुसिद्धान्तकौमुदी using AWB)
{{लघुसिद्धान्तकौमुदी}}
 
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अथाजन्तनपुंसकलिङ्गाः<BR>
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<B>'''अतो ऽम्॥ लसक_२३५ = पा_७,१.२४॥</B>'''<BR>
अतो ऽङ्गात् क्लीबात्स्वमोरम्। अमि पूर्वः। <B>'''ज्ञानम्</B>'''। एङ्ह्रस्वादिति हल्लोपः। हे ज्ञान//<BR>
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<B>'''नपुंसकाच्च॥ लसक_२३६ = पा_७,१.१९॥</B>'''<BR>
क्लीबादौङः शी स्यात्। भसंज्ञायाम्॥<BR>
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<B>'''यस्येति च॥ लसक_२३७ = पा_६,४.१४८॥</B>'''<BR>
कडारे तद्धिते च परे भस्येवर्णावर्णयोर्लोपः। इत्यल्लोपे प्राप्ते (<i>''औङः श्यां प्रतिषेधो वाच्य</i>''ः)। ज्ञाने॥<BR>
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<B>'''जश्शसोः शिः॥ लसक_२३८ = पा_७,१.२०॥</B>'''<BR>
क्लीबादनयोः शिः स्यात्॥<BR>
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<B>'''शि सर्वनामस्थानम्॥ लसक_२३९ = पा_१,१.४२॥</B>'''<BR>
शि इत्येतदुक्तसंज्ञं स्यात्॥<BR>
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<B>'''नपुंसकस्य झलचः॥ लसक_२४० = पा_७,१.७२॥</B>'''<BR>
झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीबस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने॥<BR>
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<B>'''मिदचो ऽन्त्यात्परः॥ लसक_२४१ = पा_१,१.४७॥</B>'''<BR>
अचां मध्ये यो ऽन्त्यस्तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित्स्यात्। उपधादीर्घः। ज्ञानानि। पुनस्तद्वत्। शेषं पुंवत्॥ एवं धन वन फलादयः॥<BR>
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<B>'''अद्ड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः॥ लसक_२४२ = पा_७,१.२५॥</B>'''<BR>
एभ्यः क्लीबेभ्यः स्वमोः अद्डादेशः स्यात्॥<BR>
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<B>'''टेः॥ लसक_२४३ = पा_६,४.१४३॥</B>'''<BR>
डिति भस्य टेर्लोपः। <B>'''कतरत्</B>''', कतरद्। कतरे। कतराणि। हे कतरत्। शेषं पुंवत्॥ एवं कतमत्। इतरत्। अन्यत्। अन्यतरत्। अन्यतमस्य त्वन्यतममित्येव। (<i>''एकतरात्प्रतिषेधो वक्तव्यः</i>'')/ एकतरम्॥<BR>
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<B>'''ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य॥ लसक_२४४ = पा_१,३.४७॥</B>'''<BR>
अजन्तस्येत्येव। श्रीपं ज्ञानवत्॥<BR>
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<B>'''स्वमोर्नपुंसकात्॥ लसक_२४५ = पा_७,१.२३॥</B>'''<BR>
लुक् स्यात्। वारि॥<BR>
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<B>'''इको ऽचि विभक्तौ॥ लसक_२४६ = पा_७,१.७३॥</B>'''<BR>
इगन्तस्य क्लीबस्य नुमचि विभक्तौ। वारिणी। वारीणि। न लुमतेत्यस्यानित्यत्वात्पक्षे संबुद्धिनिमित्तो गुणः। हे वारे, हे वारि। घेर्ङितीति गुणे प्राप्ते (<i>''वृद्ध्यौत्त्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन</i>'')। वारिणे। वारिणः। वारिणोः। नुमचिरेति नुट्। वारीणाम्। वारिणि। हलादौ हरिवत्॥<BR>
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<B>'''अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङुदात्तः॥ लसक_२४७ = पा_७,१.७५॥</B>'''<BR>
एषामनङ् स्याट्टादावचि॥<BR>
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<B>'''अल्लोपो ऽनः॥ लसक_२४८ = पा_६,४.१३४॥</B>'''<BR>
अङ्गावयवो ऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो यो ऽन् तस्याकारस्य लोपः। दध्ना। दध्ने। दध्नः। दध्नः। दध्नोः। दध्नोः॥<BR>
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<B>'''विभाषा ङिश्योः॥ लसक_२४९ = पा_६,४.१३६॥</B>'''<BR>
अङ्गावयवो ऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो यो ऽन् तस्याकारस्य लोपो वा स्याङत् ङिश्योः परयोः। दध्नि, दधनि। शेषं वारिवत्॥ एवमस्थिसक्थ्यक्षि॥ <B>'''सुधि</B>'''। सुधिनी। सुधीनि। हे सुधे, हे सुधि॥<BR>
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<B>'''तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य॥ लसक_२५० = पा_७,१.७४॥</B>'''<BR>
प्रवृत्तिनिमित्तैक्ये भाषितपुंस्कमिगन्तं क्लीबं पुंवद्वा टादावचि। सुधिया, सुधिनेत्यादि॥ <B>'''मधु</B>'''। मधुनी। मधूनि। हे मधो, हे मधु॥ <B>'''सुलु</B>'''। सुलुनी। सुलूनि। सुलुनेत्यादि॥ <B>'''धातृ</B>'''। धातृणी। धातॄणि। हे धातः, हे धातृ। धातॄणाम्॥ एवं ज्ञात्रादयः॥<BR>
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<B>'''एच इग्घ्रस्वादेशे॥ लसक_२५१ = पा_१,१.४८॥</B>'''<BR>
आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु एच इगेव स्यात्। <B>'''प्रद्यु</B>'''। प्रद्युनी। प्रद्यूनि। प्रद्युनेत्यादि॥ <B>'''प्ररि</B>'''। प्ररिणी। प्ररीणि। प्ररिणा। एकदेशविकृतमनन्यवत्। प्रराभ्याम्। प्ररीणाम्॥ <B>'''सुनु</B>'''। सुनुनी। सुनूनि। सुनुनेत्यादि॥<BR>
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इत्यजन्तनपुंसकलिङ्गाः।<BR>
 
[[वर्गः:लघुसिद्धान्तकौमुदी]]
८,०७१

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