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वेदव्यासः
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द्वारकां गच्छतः श्रीकृष्णस्य युधिष्ठरादिभिः सारत्यादिकरणम्।। 1।।
अर्धयोजनपर्यन्तं गतानां कृष्णपाण्डवानां परस्परानुज्ञया स्वस्वपुरगमनम्।।2।।

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वैशम्पायन उवाच। 2-2-1x
उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः।
पार्थैः प्रीतिसमायुक्तैः पूजनार्होऽभिपूजितः।।
2-2-1a
2-2-1b
गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालसः।
धर्मराजमथामन्त्र्य पृथां च पृथुलोचनः।।
2-2-2a
2-2-2b
ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः।
स तया मूर्ध्न्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः।।
2-2-3a
2-2-3b
ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशाः।
तामुपेत्य हृषीकेशः प्रीत्या बाष्पसमन्वितः।।
2-2-4a
2-2-4b
अर्थ्यं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तरम्।
उवाच भगवान्भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम्।।
2-2-5a
2-2-5b
तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः।
सम्पूजितश्चाप्यसकृच्छिरसा चाभिवादितः।।
2-2-6a
2-2-6b
तामनुज्ञाय वार्ष्णेयः प्रतिनन्द्य च भामिनीम्।
ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दनः।।
2-2-7a
2-2-7b
ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तमः।
द्रौपदीं सान्त्वयित्वा च सुभद्रां परिदाय च।।
2-2-8a
2-2-8b
भ्रातृनभ्यगमद्विद्वान्पार्थेन सहितो बली।
भ्रातृभिः पञ्चभिः कृष्णो वृतः शक्र इवामरैः।।
2-2-9a
2-2-9b
यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडध्वजः।
कर्तुकामः शुचिर्भूत्वा स्नातवान्समलङ्कृतः।।
2-2-10a
2-2-10b
अर्चयामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः।
माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि।।
2-2-11a
2-2-11b
स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुपां वरः।
उपेत्य स यदुश्रेष्ठो बाह्यकक्षाद्विनिर्गतः।।
2-2-12a
2-2-12b
स्वस्ति वाच्यार्हतो विप्रान्दधिपात्रफलाक्षतैः।
वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत्।।
2-2-13a
2-2-13b
काञ्चनं रथमास्थाय तार्क्ष्यकेतनमाशुगम्।
गदाचक्रासिशार्ङ्गाद्यैरायुधैरावृतं शुभम्।।
2-2-14a
2-2-14b
सुतिथावथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते।
प्रययौ पुण्डरीकाक्षः शैब्यसुग्रीववाहनः।।
2-2-15a
2-2-15b
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः।
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम्।।
2-2-16a
2-2-16b
अभीषून्सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा।
उपारुह्यार्जुनश्चाऽपि चामरव्यजनं सितम्।।
2-2-17a
2-2-17b
रुक्मदण्डं बृहद्बाहुर्विदुधाव प्रदक्षिणम्।
तथैव भीमसेनोऽपि रथमारुह्य वीर्यवान्।।
2-2-18a
2-2-18b
`छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्।
वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम्।
2-2-19a
2-2-19b
दधार तरसा भीमः मुच्छत्रं शार्ङ्गधन्वने।
भीमसेनार्जुनौ चापि यमावरिनिषूदनौ'।।
2-2-20a
2-2-20b
पृष्ठतोऽनुययुः कृष्णमृत्विक्पौरजनैर्वृता।
स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा।।
2-2-21a
2-2-21b
अन्वीयमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रियैः।
`अभिमन्युं च सौभद्रं वृद्धैः परिवृतस्तथा।।
2-2-22a
2-2-22b
रथमारोप्य निर्यातो धौम्यो ब्राह्मणपुङ्गवः।
इन्द्रप्रस्थमतिक्रम्य क्रोशमात्रं महाद्युतिः'।
पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य सुपीडितम् ।।
2-2-23a
2-2-23b
2-2-32c
युधिष्ठरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा।
परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादितः।।
2-2-24a
2-2-24b
योजनार्धमथो गत्वा कृष्णः परपुरञ्जयः।
युधिष्ठिरं समामन्त्र्य निवर्तस्वेति भारत।।
2-2-25a
2-2-25b
ततोऽभिवाद्य गोविन्दः पादौ जग्राह धर्मवित्।
उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्ध्न्युपाघ्राय केशवम्।।
2-2-26a
2-2-26b
पाण्डवो यादवश्रेष्ठं कृष्णं कमललोचनम्।
गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः।।
2-2-27a
2-2-27b
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः।
निवर्त्य च तथा कृच्छ्रात्पाण्डवान्सपदानुगान्।।
2-2-28a
2-2-28b
स्वां पुरीं प्रययौ हृष्टो यथा शक्रोऽमरावतीम्।।
लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात्तदा।।
2-2-29a
2-2-29b
मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात्।
अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने।।
2-2-30a
2-2-30b
क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रियदर्शनः।
अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगमानसाः।।
2-2-31a
2-2-31b
निवृत्योपययुस्तूर्णं स्वं पुरं पुरुषर्षभाः।
स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात्।।
2-2-32a
2-2-32b
सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा।
दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः।
स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मानिव वेगवान्।।
2-2-33a
2-2-33b
2-2-33c
वैशम्पायन उवाच। 2-2-34x
निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः।
सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम्।।
2-2-34a
2-2-34b
विसृज्य सुहृदः सर्वान्भ्रातॄन्पुत्रांश्च धर्मराट्।
मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप।।
2-2-35a
2-2-35b
केशवोपि मुदा युक्तः प्रविवेश पुरोत्तमम्।
पूज्यमानो यदुश्रेष्ठैरुग्रसेनमुखैस्तथा।।
2-2-36a
2-2-36b
आहुकं पितरं वृद्धं मातरं च यशस्विनीम्।
अभिवाद्य बलं चैव स्थितः कमललोचनः।।
2-2-37a
2-2-37b
प्रद्युम्नसाम्बनिशठांश्चरुदेष्णं गदं तथा।
अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दनः।।
2-2-38a
2-2-38b
स वृद्धैरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवनं ययौ।
`स तत्र भवने दिव्ये प्रमुमोद सुखी सुखम्।।
2-2-39a
2-2-39b
एतस्मिन्नन्तरे राजन्मयो दैत्याधिपस्तदा।
विधिवत्कल्पयामास सभां धर्मसुताय वै।।
2-2-40a
2-2-40b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
मन्त्रपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः।। 2।।
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