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धम्मपद (पाली-संस्कृतम्-हिन्दी)
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१९३३

में "" Aztecsल B५७ हुसांछंत्यायने = 22222222222222222222222222 | त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन कृत पुस्तकें बुद्धत्रयी ( हिन्दी ) | अभिधर्मकोश ( संस्कृत ) - ) ( चीनभाषासे संस्कृतमे )( चप रही है ) ? बुद्धधर्म वया है ? (हिन्दी) ६ मौढका अनान्मत्रः (, ) - J ॥ & - महानोपि:पुस्तक-मंदार, ऋषिपतन, १ सारनाथ, ( बनारस ) wrap महाबोषियन्थमात्रा-१ ब्द धम्मपदं [मूल पाली, संस्कृतन्घया और हिन्दी अनुवाद सहित ] अनुवादक १ “भट्टपण्डित" ‘त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन 32 प्रयाग १९३३ ई० अपम सुकरण मूल्य / ३००० प्रतियाँ प्रकाशक नकारी देवप्रिय, बी० ए० अथानमभ महाबोधि-सभा, ऋषिपतन सारनाथ ( बनारस ) मेनाथ पाण्डेय Prax द रॉ "नेक म तैकाद्वीपमें पियालंकार महाविद्यालयके अधिपति त्रिपिटकवागीश्वराचार्य स्नेहमूर्ति शुरुदेव लु श्रीधर्मानन्दनायक-महा स्थविरपावके करकमलोंमें सादर समर्पित ( = ) व्यवस्थापकीय वक्तव्य रक-मळ भाषाविचार सभी दृष्टियोंसे हिन्दीभाषाभाषी भग घान सुद्धकै उच्चराधिकारी हैं। इन्हीं के पूर्वजोंने उनकै अस्पृतमय उपदेशोंको सर्व प्रथम अपनाया । इन्होने ही दुनिया में भारतकी धार्मिक और सांस्कृतिक विबभुङभी यमाई । पूर्वंजोंकी इस अद्भुत और अमर सिँका स्मरण करते, किसका छिर ऊँचा न श्रृंहगा । किच, यह कितने शोककी बात है, कि मातृ-भाषा हिन्दीमें भगवान के विषय संदेश भट्टके यराबर हैं। इसी कवी को दूर करनेके लिये हिन्दीमें महाबोधि-अथ-आला निकालने के कम हुआ है । धम्मपद साळका अभास पुष्प है। आगे निकलनेवाली पुखकोंके सस्तेपक और सुंदर छपाईका अनुमान इसी पुस्तकसै आप कर सकते हैं । मालाकी दूसरी पुस्तक होगी-बिशमनिकाय । इस आशा करते हैं, कि हिन्दी प्रेमी कनान इस ओसमें इसरा हाथ बँटायेंगे और आठ आना भेज कर आछाके स्थायी आइक थन जायेंगे। ( भट्टचारी ) देवप्रिय प्रधानसँन, शहाबोधि सभा, पिपतन, चारना ( यरस ) |तिपिटक (=त्रिपिटक ) अधिकांशतः भगवान् बुद्धकै उपदेशो संग्रह है। त्रिपिटका अथै है, तीन पिटारी । यह तीन पिटक हैं सुत्त (=पुत्र ), विनय और अभिधम्म (=अभिधर्छ )। १. सुत्तपिटक निम्नलिखित पाँच निकायोंमें विभक है १. दोघ-निकाय ३७ सुत (=पुरू या सुरु ) २ मज्झिस-नि. १५२ खुल ५६ संयुक्त ४ अंगुल-नि. १३ निपात ३. संयुष-नेि ५, खुष्क-नि, १५ अर्थ खुद्दकनिकायके १५ ग्रंथ यह हैं (१) खुद्दकपाठ ( ९ ) येरीगाथा ( २) धम्मपद (१०) बातक (५५० कथायें ) (३) उदान ( ११ ) निख ( - महा-) (७) इतिखुलक ( ३२ ) पटिसमयमा (५ ) सुत्तनिपात ( १३ ) अपन ( ६ ) विमानवत्थु ( १४ ) क्षुबवंस ( = ) ( | ) - ( ७ ) पैत- ( :५ ) चरियापिटक ( ४ ) घेराथा २. विनयपिटक निनि भागोंमें विभक्त है --युतविभंग

(१) भिक्खु-विभंग "{ ( १ ) पाराजिक

( २ ) भिषङ-विभंश ( २) पाचितिय २-खघक- ( १ ) महावग्ग (३) च्छवम्मा ३-परिवार ३. अभिधम्मपिटकमें निम्नलिखित सात अंथ हैं- ५, कथावश्च १. धम्मसंगणी २. विभंग ६. यस • पट्टा ३. धातुकथा , मुगछपष्वति धम्मपद (=धर्मप) त्रिपिटककैखुद्दकनिकाय विभागवै पैन्नडमैयों मॅसे एक है । इसमें भगवान गौतम युद्धकै सुखसै समय समयपर बिक्री २३ उपदेशगाथाका संग्रह है। चीन तिब्वती आदि भाषाओंके पुराने अनुवादं के अतिरिक्त, वर्द्धमान कालकी दुनिथाकी सभी सभ्य भाषाओंमें इसके अनुवाद मिलते हैं, अंग्रेजीमें न आयः एक घडैन हैं । भारतको अन्य भाषाकी तरह इसारी हिन्दी भर इसमें किसीचे पीछे सही है । जहाँ तक मुझे मालूम है, हिन्दीमें धम्मपदके अभीतक पाँच छत्रु वाद हो चुके हैं, जिनके लेखक हैं १. श्री सूर्यकुमारवर्मा” हिन्दी { १९०४ ई० ) २. अचुन्याचन्द्रमणिसह्स्थविर हिन्दी और पाीवोन (१९०५ ई०) ( ॥, ) ३। . स्वामी सरययैव परिव्राजक हिन्दी (खुद्धगीता ) ४, श्री विष्णुनारायण हिन्दी ( स० १९८५ ) ५ ॐ० भागा आदि उपाध्याय पाली-न्दी ( १९३२ ई० ) पाँच अनुबावोके होते हॅफी या आवश्यक्ता १--इसका उतर आप १डित यनारसीदास चतुषं और महायोधिसभाकं संनी ब्रह्मचारी दैवप्रियसे पूठ्यैि । मैंने यहुत ननुगच किया किन्तु उन्होंने एक नहीं सुनी। ९ फरवरीसे ८ मार्च तक से सुल्तानगंज ( भागलपुर )में "गंगा"के पुरातत्त्वांकके सम्पादनके लिये श्री धूपनाथ सिंहका अतिथि था। स्थानका काम ही म न था, वसपरसे वहाँ रहते वो लेख भी लिखने पढे । उसी समय इस अनुवाद में भी इस छगा दिया । जो अंश थाली रह गया था, उसे किताब को भेसमें बेनेझी याद समाप्त किया । इस तरह"ध्रुवचर्या"फी ऑति "धम्मपद"में भी जब्दीसे काम लिया गया है। इससे पुस्तकमें हैं। की गलियं महीं रद्दगई, यकि जीमें क्रिये अनुवादकी पुनराश्रुति न करनेसे अनुचाऽकी आपको और सरल नहीं यनया पा सका, इन त्रुटियों मैं स्वयं दोषी हैं। प्रथमैं पहिले यारीक टाइपमैं याई और उस स्थानको नास बिया है, जहाँ पर डक गाथा छुचुके मुखले निकली वाहिनी ओर उस व्यक्तिका नाम है, जिसके प्रति या विषयमें डक गाथा की गईं । धम्मपदी अट्टकथा(=ीका में हर एक गाथाका इतिहास भी दिया हुआ है; सक्षिप्त फरी उसे दोनेका विचार तो खखा, छेकिन सभयाभाव और मंथविस्तारते भयसे वैसा नहीं किया जा सका। सुतपिटक्कै आय १०० सूत्र, और विनयके कुछ आश्नको मैंने अपनी बुद्धचर्याम सुनुवादित किया है । भारतीय भाषाओंमें पाली प्रयोंका सबसे अधिक अनुवाद थगछमें हुआ है। जातकों ( = ) धगळ ध्वव हुई जिल्दोमें है । श्रीयुत 'चारुचन्में वसुने धम्मपदका पीके साथ संस्कृत और टैंगळामें अनुवाद किया है ( इस ग्रंथसे शुझे अपने में बड़ी सहायता मिली है, और इसके लिए मैं चारू थालुका आभारी हैं)। बैराशाके था दूसरा नम्बर मराठी का है, जिसमें आचार्य धर्मानन् काम्यके ग्रंथके अतिरिक सारे दीघनिकायका भी अनुवाद मिलता है । इस क्षेत्रमें हिन्दीका तीसरा नस्थर होना बाकी बात है । मैंने अगले तीन चतुर्मासमें मजिभम निकायमहावग्ग, और चुल्लवग-इन तीन अंयोंको हिन्दी में अनुवाद करनेका निश्चय किया है । यदि विस्रबाधा न हुई, जो आधा है, इस वर्षके अन्तर्मे पाठक बिभम निकायको हिन्दी रूप मैं देख देंगे। शुक्रस्य भवन्त चन्द्रमणि भइस्थविरले ही सर्व प्रथम धम्मपचुका मूरूपा सहित हिन्दी अनुवाद किया था। उन्डोनें अनुवावकी एक इति भेल की थी और साझाकी भाँति इस काममें भी उनसे बहुत प्रोत्साहन सिं; तदर्थं पूज्य साहाय्यविका मैं कृतज्ञ हैं। अया रहुख सांकृत्यायन ७-७-१९३३ ( = ) वर्ग-सूची " ८ १--यसकवर्ग १ १४-शुद्धवगो २अप्पमाखवण ११ १५--सुबवग्ग ११ १६-–पियवशो ४--पुष्फवग्गो २१ १७–कोधवशो 4-लवणो ४-भलपण ३--पडितचगो ३५ १९-धम्मटुवगो ७--अर्हन्तचगो ४२ २०" –अगम्नग्गो ==सदसवण्णो ७७ २१ –पकिण्णकचसो । ५४ २२--निरयवग्गो १०-ऐडवगो ६० २-नागवग्गो ११जरावमगो ४७ २४--वहावग्ग १२ -“आचबग ७२ २५--भिक्खुवर्गो १३-–लोकवर्ग ७७ २६: –आखणवर्गो गाथा-सूची शब्द-सूची नमो वस भगवते अरदौसम्मासम्युक्स धम्मपदं १--यमकवग्गो स्थान-आवस्ती व्यति--यद्यपाळ (येर) १-मनोएब्बझमा धम्या भनोसेट्टा मनोमया । मनसा चे पठ्ठेन भासति वा करोति वा । ततो 'नं दुक्खमन्वेति चक्कं 'व वह पढे ॥ १॥ ( सनपूर्वङ्गमा धर्मा सनश्रेष्ठा मनोमया मनसा चेत्मदृष्टेन भाषते च करोति वा । तत एनं दुभ्खभन्वेति चक्रमिव घइतः एवम् ॥१॥ अनुवाद--इमी धर्मों (कायिक, वाचिक, मानसिक फस, था मुख दु:ख आदोि अनुभवो) का अन अप्रगामी है, संन (उनका) प्रधान • है, (फर्म ) मनोमय हैं । जय ( कोई ) सदोष मनसै यात ) है, ) करता , तो ( थोलता या (कास है २ ] धम्मपदं [ १३ वाहन ( यैछ घोड़े ) के पैरोओं जैसे ( रथका) पहिया अनुगमन करता है (बैसेही) उसकाकुत्र अनुगमन करता है। आवन्ती २-मनो पुब्बझमा धम्मा मनोसेना मनोमया । मनसा चै पसन्नेन भातीति वा 'करोति वा । ततो 'नं सुखमन्वेति वाया' व अनपायिनी ॥२॥ (मनपूर्वङ्गमा धर्मा मनश्श्रेष्ठ मनोमयाः । मनसा चेत् प्रसन्नेन भाषते वा करोति वा । तत एनं सुखमन्वेति छायेवानपयिनी ॥॥ अनुवाद—सभी धर्मो मन अग्रगामी है, सन प्रधान है (कर्म) अनसय हैं। यदि (कोई ) स्वच्छ अनसै बोलता था करता है, तो ( कभी ) न (साथ ) छोडनेवाली छायाकी तरह सुख उखका अनुगमन करता है । | आवर्ती ( बेतघन ) सुखलिस् (धेर ) ३-पैच्छेि में अबधि मं अजिनि में आहासि मे। ये च तं उपनय्हन्ति वैरं तेनं न सम्मति ॥३॥ ( अक्रोशीव मां अबधीत मां अजैषीद म आश्चर्य मे। ये च तत् उपनह्यन्ति तेष वैरं न शाम्यति यश। ) अनुवाद--मुझे गा दिया', 'खुले मा', 'झुसे हरा दिया', 'धु कटक्रिया' ( पुंखा ) जो ( सन} ) बाँधते हैं, जबका वैर कभी शान्त नहीं होता। १६ ॥ यमकवर्ग [ ३ ४-अकोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अर्हसि मे । ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति ॥ ४॥ (अक्रोशोव म अवधीत् मां अजैषीव मां अहार्षीव मे। ये तन् नोपनह्यन्ति वैरं तेऽपशाम्यति श्वा ) अनुवाद-'सुने गाली ड़िया’० ( पुंसा ) जो ( सनमें ) नहीं रखते उनका पैर शान्त हो जाता है । आवस्सी ( जतवन ) काली ( यत्रिखनी ) ५-न हि वैरेन वैरानि सम्मन्तीध कुदाचन । अवेरेन च सम्मन्ति एस घभ्म्मो सनन्तनो ॥३॥ (न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीइ कदाचन । अवैरैण व शाम्यन्ति, एप धर्मः सनातनः ॥ ५॥ अनुवाद-- यहाँ ( सखारमें ) वैसे वैर कभी शान्त नहीं होता, अवैर से ही शान्त होता है, यही सनातन धर्म (=नियस) है। आवस्तौ ( जैतवन ) कोसम्बक सिद्धं ६–परे च न विजानन्ति मयमेत्य यममसे । ये च तस्य विजानन्ति ततो सम्मन्ति मेघगा ॥६॥ ( परे च न विजानन्ति वयमत्र यंस्यामः । ये च तत्र विजानन्ति ततः शाम्यन्ति मेधाः ॥ ६ ॥ अनुवाद—अन्य ( अझ छग ) नहीं जानते, कि हम इव ( संखार ) से जानेवाले हैं। जो इसे जानते हैं, फिर ( उनके ) सनक ( सभी विकार ) शान्त हो जाते हैं। ४ ॥ धम्मपदं [ १८ जुछकाळमकालु ७–मुमानुषस्सिं विहन्तं इन्द्रियेषु असंवृतं । भोजनम्हि अभत्तच्छं कुसीतं हीनवीथिं । तं वे पसहति मारो वातो रुख 'व डुब्बलं ॥॥ (शुभमनुपश्यन्तं विहरन्तं इन्द्रियेषु अखंवृतम् । भोजनेऽमात्रछ' कुसीदं नवीर्यम् । तं वै प्रसहति मारो वातो वृक्षमिव दुर्गुलम् ॥ ७॥ अनुवाद--( जो ) शुभ ही शुभ देखते विहरता है, इन्द्रियोंमें संयम न करनेवाला होता है, भोजनमें मात्राको नहीं जानता आछली और डयोगहीन होता है, उसे सार (ऋकमी दुष्प्रभृतिष) ( जैसे ही ) पीठित करना , जैसे दुर्बल बृक्षको हुवा । 5-असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेषु सुसंवृतं । मोजनम्हि च मत्तम् सर्ड आरबोरियं । तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं ‘व पवते ॥८॥ (अनुभमनुपश्यन्तं विहन्तं इन्द्रियेषु सुसंवृतम् । भजने व मात्र' भन्दै आख्धवीर्यम् । तं वै न प्रसाइते भारो धाता शैलमिव पर्वतम् ॥८॥ अनुवाद-शो अशुभ देखते विहरता, इन्द्रियोंको सुगम करता, ओोजनी मात्राको ज्ञानता, अड्वान तथा उद्योगी है, उसे शिलासस पर्वतको जैसे वायु नहीं हिला सकता, ( वैसेही) सार नहीं ( हिला सकता )। ' ११ ॥ [५ आवस्ती (जैतवन ) देवदत ६–अनिकसावो कासावं यो वयं परिवहेस्सति । अपेतो दमसच्वेन न स कासावमरहति ॥६॥ (अनिष्कषायः काषायं यो वस्त्रं परिधास्यति । अपेतो वमसत्याभ्यां न स काषायमर्हति ॥ ९ ॥ ) अनुवाद-कॅलो (पुरूष ) ( रागद्वेष आदि ) कषायों (=मछ ) को बिना छ काषाय वखको धारण करेगा, वह संयम- सस्यसे परे हटा हुआ (है), और (वह) काषाय (धारण) करनेका अधिकारी नहीं है । १०–यो च ऊतकोसाक्स्स सीलेसु सुसमाहितो । उपेतो दमसच्चेन स वे कासावभरहति ॥१०॥ (यश्व घान्तकषायः स्यात् शीलेषु सुसमाहितः । उपेतो दृम-सत्याम्यं स वै कषायमर्हति ॥ १० ॥ अनुवाद–जिसने कयापोंको वसन कर दिया है, जो आचार (याक) से सुसम्प, तथा संयमन्यसे युक्त है, वही काषाय ( वस्त्र )का अधिकारी है । राजगृह (वेणुबन ) संजय ११-असारे सारमतिन सारे चासारदस्सिनो । ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छसङ्कप्पगोचरा ॥११॥ ( असारे सामतयः सारे चचारदर्शिनः। ते सारं नाधिगच्छन्ति मिथ्याङ्कगोचरा ॥ ११ ॥) धम्मपदं { ११ १३ अनुवाद—जो असारको सार समझते , और सारफ अखा; वह शठे संकल्पोंमें सळस (पुरुप) सारो महीं प्राप्त करते हैं। १२-तारश्च च सारतो बवा असारश्च असारतो । ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कष्पगोचरा ॥१२॥ ( चारं च सारतो शत्वा, असारं च असारतः । ते सारं अधिगच्छन्ति सम्यसङ्गरूपगोचराः ॥ १२ ॥ अनुवाद-ऋजो सारको सारि जानते हैं, और अखार को अला; वह सबै कधपमें संछन ( पुरुष ) सारको प्राप्त करते हैं। आबस्ती ( लेवन ) नन्द (घेर) १३-पयागारं दुच्छन्नं त्रुटी समतिविन्क्षति । एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविनतति ॥१३॥ (यथागारं दुश्छन्नं वृष्टिः समतिविष्यति । एवं अभाधितं चित्तं रागः समतिविष्यति ॥१ ) अनुवाद--जैसे ठीकसे न छायै धरनें वृष्टि उख जाती है । वैसे ही अभावित (= १ सयम किये ) चित्रमें राग खुल जाता है । १४–यथागारं सुच्छन्नं वुट्ठी न समतिविन्तति । एवं मुमावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति ॥ १५ (यथागारं प्रच्छन्नं वृष्टिर्न समतिविष्यति। एवं सुभावितं चिरं रागो न समतिविध्यति ॥ १४॥ ) अनुवाद--कैसे ठीकसे शयै घरमें वृद्धि नहीं पाती, धंसे ही प्रभावित चित्रमें राग नहीं घुसता । १३ ६ ॥ यसकन्नगो रथगृह (वेणुबन ) चुन्द्र ( करेिक ) १५-३ सोचति पैच सोचति पापकारी उभयत्य सोचति । सो सोचति । सो विहघ्लति द्विस्वा कम्मकिलिमत्तनो ॥ १५॥ (इह शोचति प्रेस्य शोचति पापकारी उभयत्रचति। स शोचति स विहन्यते दृष्ट्वा कर्म क्लिष्टमात्मनः ॥१५) अनुवाद-पर्ल (इख छौमें ) शौक करता है, मरनेके धावू शक करता है, पाप करनेवाला दोनों ( छोक ) में शोक करता है। वह अपने मलित ऑको देखकर शोक करता है, पीड़ित होता है । आस्ती ( बेतवन ) थम्भिक ( उपासक ) १६-इंध मोति पेच्च मोदति कतमुक्तं उभयत्य मोदति । सो मोदति । सो पमोदति दिवा कम्मविशुद्धिम्तनो ॥ १६॥ (इह मोदते प्रेक्ष्य मोदते कृतपुण्य उभयत्र मोदते । स मोदते स प्रमोदते दृष्ट्वा कर्मविशुद्धिमात्मनः ॥१६) अनुवाद-- यहाँ अयुषित होता है, मरनेके वाड् अनुदित होता है, बिखने पुण्य क्रिया है, यह दोनों ही जगह अनुदित होता, है। वह अपने कमकी शुद्धताको देखकर ध्रुवित होता है, अनुवित होता है। धम्मपदं | १८ आबस्ती ( जेतवन) देवदत १७-६ध तण्पति पेच्च तम्पति पापकारी उमयत्य तपति । पापं मे तन्ति तपति भीय्यो ण्पति दुगतिव्रतो ॥ १७॥ ( इह तप्यति प्रेस्य तप्यति पापकारीखभयत्र तप्यति । पापं मे कृतमिति तप्यति, भूयस्तष्यति दुर्गतिंगतः ॥१) अनुवाद-—यह खतप्त होता है, अरक्कर सन्तप्त होता है, पापकारी दोनों जगह सन्तप्त होता है । "मैने पाप किया है"-यह ( सोच ) सन्तप्त होता है , दुर्गतिन प्राप्त हो और भी सन्तप्त होता है । सुमना देवी अबस्ती ( जैतवन ) १८- नन्दति पेच्च नन्नति कतपुब्लो उभयय नन्दति । पुघ्नं मे कतन्ति नन्दति , भीय्यो नन्दति सुगतिंगतः ॥ १८ ( इह नन्दत प्रेत्य नन्दति कृतपुण्य उभयत्रनन्दति । पुष्य' मे कृतमितिनन्दति, भूयो नन्दति सुगतिंगतः १८) अनुवाद-ऐं आनन्द्रित होता है, मरकर आनन्दित होता है। सिने पुण्य किया है, पर दोनों जगर आनन्दित होता है। "मैने पुष्प प्रिया –यह ( सोच ) आनन्द्रित होता १; मुगरियो प्राप्त हो और भी आनन्द्रित होता है। २० ॥ यसको [९ आवस्ती (जैतवन) दो मित्र भिश्च १६-बीडुपि चे संहितं भासमानो , न तकरो होति नरो पमत्तो । गोपो व गावो । गण्यं परोसे , न मागवा सामञ्जस्स होति ॥ १६॥ (वीमपि संहितां भाषमाण, न तत्करो भवति नरः प्रमतः। गौप इव गा गणयन् परेषां, न भागघान् आमण्यस्य भवति ॥१९॥ अनुवाद चाहे कितनी ही संहिताओं (=धर्मग्रंथो ) का उचरण करे, किन्तु प्रभावी बन, ( बो ) गर उसकै ( अनुसार ) ( आचरण ) करनेवाला नहीं होता ; ( यह ) दूसरेकी गायोफो गिननेवाले ग्वालैकी भॉति असणपन (अंन्यासी पन ) का भागी नहीं होता । २०–अष्पम्पि चे संहितं भासमानो , धम्मस्स होति । अनुधम्मचारी । रागश्च वोसञ्च पहाय मोहं , सम्मप्पजानो मुक्खित्तचितं । अतुपादियानो इव वा हुरं घा , स भागच सामञ्जस्स होति ॥२०॥ १ संडित । १० ] धम्मपदं [ १R० (अल्पामपि संहितां भाषमाणो धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी । रागं च दैवं च प्रहाय मोही सस्यशलानन् विमुकचितः अनुपादान इइ वSत्र वा; स भागवान् आसण्यस्य भवति ।२०) अनुवाद--चाहे अवषमात्र ही हिताका भाषण करे, किंतु यदि यह धमॅके अनुसार आचरण करनेवाळा हो, राग, वेप, और आइको त्यागकर, अच्छी प्रकार सचेत और अच्छी प्रकार सुक्कचित्त हो, यहाँ और बहाँ (दोनों जगह ) बटोरनैवाळा ग थे; (तो ) वह प्रमणपनका भागी होता है । १-यमकवर्ग समाप्त २–अप्पमादवग्गो फौशाम्ब ( पोषिताराम ) सामावती ( रानी ) २१-भ्रष्पमादो अमतपदं पमादो मच्चुनो पढे । अष्पमत्ता न मीयन्ति ये पमत्ता यथा मता ॥१॥ (अप्रमादोऽश्रुतपदं ममाद्य मृत्योः पदम् । अममता न म्रियन्ते ये भमरा यथा स्मृताः ॥१ ) २२-एतं विसेसतो मत्वा अप्पमादम्हि पण्डिता । अप्यमादे पमोदन्ति अरियानं गोचरे रता ॥२॥ (एवं विशेषतो ज्ञात्वाऽप्रमादैपण्डिताः । अप्रमादे प्रमोदन्त आर्याणां गोचरे रताः ॥ण ) २३-ते कायिनो साततिका निच्वं दण्डपञ्जमा । फुसन्ति धीरा निब्वाणं योगखेमं अनुत्तरं ॥३॥ ( ते ध्यायिनः साततिका नियं दृढपराक्रमाः । स्पृशन्ति धीरा निवणं योगक्षेमं अनुत्तरम् ।। ) [ ११ १२ ] धम्मपदं [ २५ अनुवाद-प्रसाद (=आठस्य ) न करना सूतपद है, और प्रसाद (फरदा ) सूव्युपद। अप्रसावी ( वैसे ) नहीं करते, जैसे कि प्रमादी भरते हैं। पंडित लोग अप्रमादके विषयमें इस प्रकार विशेपतः जान, आयकि आचरणमैं रत हो, अभ्रमाढमें प्रमुदित होते हैं । ( जो ) वह निरन्तर ब्यानरत निरय इदं पराक्रमी हैं, वह और अनुपम योग-क्षेम (आनन्द मंगळ ) वाले निर्वाणको प्राप्त करते हैं। राजगृह ( वेणुवन ) २8-उद्यानवतो मतिमतो क्षु विचकम्मस्स निसम्मकारिणो सनतस्स च धम्मजीविन ध्रप्प मुत्तस्स यसोऽभिवदति ॥॥ ( उत्थानवतः स्मृतिमतः शुचिकर्मणो निशम्यकारिणः। संयतस्य च धर्मजीविनोऽप्रमतस्य यशोभिवर्द्धते ॥४॥) अनुवाद--( जो ) उद्योगी, सचेत, शुचि कर्क्सवाछ, तथा खोचकर काम करनेवाला है, और संयत, धर्मानुसार जीविकावाला पुव अप्रभावी है, ( उसका ) अषा थड़ता है । राजगृद ( घेणुबन ) जुछपन्थः ( पैर ) २५-उठानेनप्पमादेन सञ्चमेन दमेन च । हीपे कयिराय मैधावी ये ओघो नाभिकीरति ॥४॥ उत्थानेनाऽप्रमादेन संयमेन दमेन च । डीपं कुर्यात् मेधावी ये ओघो नाभिकिरति ॥५) २८ ॥ अष्पमाद्रवम् [ १३ अनुवाद--मेधावी (पुरूष ) उथौण, अप्रमाद्, संयम, औौर दस द्वारा ( अपने लिये पैसा ) द्वीप बना, जिसे बाड़ नहीं इवा सके। जैतवनं बाळगक्खतखङ ( शेयौ ) २६–पमादमद्युब्जन्ति बाला दुम्मेधिनो जना । । अण्पमाच मेधावी धन सेठं 'व रक्खति ॥६॥ (प्रमादमसुर्यजन्ति बाला दुर्मेधसो जनाः। अप्रमादं च मेधावी धनं श्रेष्ठमिव क्षति ।। ) अनुवाद-पूर्व हुनैं जन ममार्गे लगते , मेधावी श्रेष्ठ धनकी ऑति अप्रभाकी रक्षा करता है । २७-मा पमादम्युब्नेय मा कामरतिसन्यवं । अष्पमलो हि यन्तो पप्पोति विपुलं सुखं ॥७॥ (मा प्रमामनुरंजीठ मा कामरतिसंस्तवम् । अश्मलो हि ध्यायन् आनोति विपुळे सुखम् ।। ) अनुवाद-अत प्रसाद्में हँसो, सत कामोंमें रत होओ, सत काम रतिमें लिसा हो । अमादरहित (पुरुष) ध्यान करते सहन मुखको प्राप्त होता है । जैतवन मह्यकसप (थेर) २८–पमाद् अप्पमादेन यदा नुदति पण्डितो । पञ्यापासादमारुय्ह असोको सोकिनिं पनं । एक्यतो 'भूमठे धीरो वाते श्रवेक्खति ॥८॥ १६ ] धम्मपदं [ श७० (प्रमामप्रमादेन यदा शुदति पण्डितः । अप्रासादमारुह्य अशोकः शोकिन प्रजाम् । पर्वतस्य इव भूमिस्थान धीरोबाळानअवेक्षते ॥८॥ अनुवाद—पंडित जव अप्रसाद प्रसादको इटता है, तो निःशोक हो शोकाकुछ प्रजाको, प्रशारूपी प्रासादपर चढ़कर बैसे पर्वतपर खरा (पंप ) भूमिपर स्थित ( वत ) को बेचता है–( जैसे ही) धीर ( पुरुप) अज्ञानियोको ( देखता है )। दो मित्र भिश्च २६–अप्पमतो पमत्तेसु सुतेषु बहुजागरो । अवलम्बी ‘व सीधस्सो हित्वा याति सुमेघसो ॥८॥ (अप्रमत्तः प्रमत्तेषु सुप्तेषु सृजागरः । अबळाश्वमिव शीघ्राश्वो हित्वा याति सुमेधाः ॥९॥ अनुवाद--प्रसाद्वियोंके बीचमैं अप्रभावी, सोतोंके थीचमैं यहुत जागनेवाल, अच्छी डुबिवाछा (पुर्व)=जैसे विउँछ घोलेको ( पीछे ) छोड शीघ्रगामी घोड़ा (आगे) चछा जाता है ( वैसे ही जाता है )। वैशली ( भूटागार) ३०-अष्पमादेन मघवा देवानं सेठतं गतो । अष्पमाई पसंसन्ति पमादो गरहिते सदा ॥१०॥ (अप्रमादेन मघवा देवानां श्रेष्ठतां गतः । अप्रमोदं प्रशंसन्ति प्रमादो गर्हितः सदा ॥१०॥ २१२ ] अष्पमाद्रवर्गो [ १५ अनुवाद---अप्रमाद (=आलस्य रहित होने के कारण इन्द्र मैच ताओंसें श्रेष्ठ बना । अप्रमादुकी प्रशंसा करते हैं, और प्रभावकी सदा निन्दा होती है। कोई भिश्च ३१-भ्रष्पमादतो भिक्खु पमाटै भयसि वा । सब्बजनं अणु शूलं दृहं अग्गीव गच्चति ॥ ११॥ ( अप्रमादरतो भिक्षुः प्रमादे भय था । संयोजनं अणु स्थूलं दइन् अलिघि गच्छति ॥१ ) अनुवाद---( जो ) भिक्षु अप्रमादमें रत्न है, या अमावसे भय खानै बाळा ( ), ( बह ), आगकी ऑति छोटे मोटे वधनको जळतै हुये जाता है । लेबन ( निगम-वासी ) तिरुप्त ( पैर ) ३९–अष्पमादरतो भिक्खु यमादे मयवस्सि वा । अभवो परिहणाय निव्वाणस्सेव सन्तिके ॥ १२॥ ( अप्रमादरतो भिक्षुः श्रमो भयदर्शी था। अध्यः परिहाणाय निर्वाणस्यैष अन्तिके ॥१२ ) अनुशद्-( ) भिक्षु अप्रमानें रत है, या प्रसादसै भय आनै वाछा है, उसका पतन होना सम्भव नहीं, ( वह ) निर्माण के समीप है। २-अप्रमादवर्ग समाप्त /३–चित्तवगो चाखिय पर्वत भेभिय (घेर) ३३-फन्दनं चपलं चित्तं दूरक्खं दुनिवारयं । उनु करोति मेधावी उसुकारीच तेजी ॥१॥ (स्पंदने चपळे चित्तं दृश्यं दुर्निवार्यम्। की करोति मेधावी इषुकार इव तेजसम् ॥ १॥ अनुवाद-(इस) बच, चषक, , दुनिवार्यं चित्तको मेघावी (पुरुप, उसी प्रकार ) सीधा करता है, जैसे वाण थनानै वाला वाणको। १8वारिजव थते वित्तो शोकमोकत उम्मतो । परिन्दतिंढं चित्त मारवैय्यं पहातवे ॥२॥ (वारि' इव स्थले क्षिप्त' उदकौकत उद्भूतम् । परिस्पन्दत इवं विलं भारधेयं अदातुम् ॥२॥ अनुवाद -जैसे बाशयले निकालकर स्थलपर फेंक दी गई अडी (=वारिज ) सड़फड़ाती है, ( वैसे ही ) सार (e=ाग, १६ ] ३५] चितवन [ ७ बेप, मोह )के फन्दैसे निकलनेके लिए यह चित्त ( तडफडता है । आवस्ती कोई ३५-दुस्रिग्गहस्स लहुनो यत्य कामनिपातिनो । चित्तम्स द्वमयो साधु चित' दन्तं सुखावहं ॥। ३॥ (दुर्निग्रहस्य लशुनो यत्र-कामनिपातिनः। चित्तस्य दमनं साधु, वितं दान्त सुखावहम् ॥ ३ ॥ अनुबाद--( जो ) कठिनाईसे निग्रह थोग्य, शीघणामी, बह चाहता है यहाँ चछा खानेवाछा है, ( ऐसे ) चित्रका द्वासन करना उत्तम है, बसन किया गया चित्र सुखप्रल् होता है । कोई उत्कण्ठित भिक्षु ३६-सदुद्दसं सुनिपुणं यत्थ कामनिपातिनं । वित्त क्षेय्य मेघावी, वित्त गुती मुखावहं ॥४॥ ( सुदुशं सुनिपुणं यत्रकामनिपाति । चितं रक्षेत् मेधावी, चित्रों की सुखावहम् ॥ ४॥ अनुवाद-कठिनाइंसे जानने , अत्यन्त चालाक, जहाँ चाहे यहाँ के लानेवाळे चित्ती, बुद्धिमान् रक्षा करे, सु क्षित चित्त सुखप्रद होता है । सषराषिखत (थेर ) ३७-दूरङ्गमं एकचरं असरीरं हासयं । ये चित्त सब्बमेस्सन्ति मोक्खन्ति मारवन्धना ॥१॥ स्र १८] धनपढ [ ३७ (पुरंगमं एकबरं ’ अशरीरं युइशयम्। ये चित्तं संयंस्यन्ति मुच्यन्ते मारबन्धनात् ॥५॥ अनुवाद-दूरगामी, अछा विचरनेवालेनिराफ़र , 'शुदायी ( इख ) चित्सक, जो संयम करेंगे, वही मारके यन्घनसे । शुरू होगे । आवली चिराइत्थ (गैर) ३८-श्रनवठितचित्तस्स सङ्गम्यं अविजानतो । पद्विषसादस्स पल्ला न परिपूरति ॥६॥ (अनवस्थितचितस्य सद्धर्मे अविजानतः। पश्विमदस्य प्रशा न परिपूर्यते ॥ ६ ॥ अनुवाद-जिसका चित्रा अवस्थित नहीं, जो खबै धर्मको नहीं जानता जिसका (बिल) प्रखताहीन है, ठ प्रश (=परम ज्ञान ) गहीं मिछ सकता। ३६-अनवस्सुतचित्तस्स अनन्वाहतचेतसो । पुब्लपापपहीणस्स नयि जागरतो भयं ॥७॥ (अनधनृतचित्तस्य अनन्वाहतचेतसः। पुण्यपापप्रहीणस्य नास्ति जाग्रतो भयम् ॥७॥ अनुवाद-कॅलिसका विल मछहित है, जिसका मन आक्रम्य है, जो पापघुष्यमबिहीन है, उस खतरा रहनेवाळे (पुरुष) कैछिये ! अय नहीं। ३९ ॥ चितवन [ १९ आवली पाँच सौ विपश्यक भिg -झुडूपमं कायमिमं विदित्वा नगढ़पमं चित्तमिठं ठपेत्वा । योघेथ मारं पब्लायुधेन जितं च रक्खे अनिवेसनो सिया ॥८॥ (कुम्भोपमं कायमिमं विदित्वा नगरोपमं चितमिदं स्थापयित्वा । युध्येत मारं प्रायुधेन जितं च रक्षेद आनिवेशनः स्यात् ॥८॥) अनुवाद–स शरीरको घबैकै सुन ( भंगुर ) बानइस्र चितक गढ़ (अगर), समान कायम कर, अज्ञारूपी हथियारले सारसे युद्ध करे । जीतनेके वाद् ( अपनी ) रक्षा करे, ( तथा ) आसकिरहित होवे । पूतिगत तिलस (येर) ४-अचिरं वतीयं कायो पठवीि अधिसेस्सति । क्रुद्धो अपेतविकलाणो निरस्यं 'व कलिङ्गरं ॥६॥ (अचिरं चतायै कायः पृथिवीं आधिशेष्यते । हृद्रोऽपैतविशानो निरर्थ इव कलिङ्गरम ॥ ९॥ अनुवाद –अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चैत्रनाहित हो निरर्थक ठी ाँति मिलीपर पड रहेगा । २० ॥ धम्मपद् [ ३७१ कोसल देश नन्द ( गौष) ४२-दिसो दिसं यन्तं कयिरा वैरी वा पन बेरिनं । मिच्छपणिहितं चित्त' पापियो'ने ततो ॥१०॥ (द्विद् द्विषं यत् कुर्यात् वैरो वा पुनः वैरिणम् । मिथ्याप्रणिहितं चित्तं पापयांचे पतंवता यत्॥१०) अनुवाद-जितनी ( हानि ) शत्रु पटुकी, और बैरी बैरीकी करता , इ ( भागेपर ) लगा चित उससे अधिक बुराई करता है। सुछ देश सेरस्य ( थेर) ४३-न तं माता पिता कपिरा अब्ले चापि च आतका । सम्मापणिहितं चित्तं सेय्यसोमं ततो करे ॥११॥ (त तत् मातापितरौ कुर्यातप्यन्ये वापि च शातिकाः । सम्यमणेङ्गितं चितं श्रेयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥१श अनुषाद--जितनी ( भयाई ) न मातापिता कर सकते हैं, न दूसरे आईन्वन्छ उससे ( अधिक ) भाई ठीक ( मार्गापर ) कगा चित्ल करता है। ३-चित्तवर्ग समाप्त ४–पुप्फवग्गो पाँच सौ निश्च 8-को इमं पठविं विजेम्सति यमलोकश्च इमं सदेवके । को धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव प्यचेस्सति ॥१॥ ( क इमां पृथिवीं विजेष्यते यमलोकं व इनं सदेवकम् । को धर्मोपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥२॥ अनुवाद–देवताओं सहित उस यमछाक और इस पृथिवीशो केन विजय करेणा सुन्दर प्रकारले उपविष्ट धर्मके पदोंको कौन चतुर ( पुरुष ) पुष्पकी ऑति चयन करेगा ? ४५-फेखो पठवैि विनेस्सति यमलोकच इदं सदेवकं । सेखो धम्मपदं मुदेसितं कुसलो पुष्कमिव पचेस्सति ॥२॥ (शैक्षः पृथिवीं विजेष्यते यमलोकं च इमं सदेवकम् । रौप्तो धर्मपदं बुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥श) [ २१ २३] धम्मपदं [ ® आपती अनुवाद–शैक्ष' देवताओं सहित इस यमलोक और पृथिवीको विजय करेगा । चतुर औक्ष सुन्दर प्रकार उपदिष्ट धर्म पड़ोसी शुष्पकी भाँति चयन करेगा। मरीचि (कममङ्गानि वैर ) ४६-फणूषमं कायमिमं विदित्वा भरीविधम्मं अभिसम्वुधानो ; ( बेत्वान मारस्य । पपुप्फकानि अद्स्नं मच्चुरालस्स गच्छे ॥३॥ (नोपमं कायमिमं विदित्वा मरीचिधर्मे अभिखस्रधानः। छिपा मारस्य प्रपुष्पकाणि अर्शनं मृत्युराजस्य गच्छेत् ॥ ३ ॥ अनुवाद-इल काथाको फेनके समान जान, या (मल) अरीचिका के समान मान, फन्दे तोडकर, यमराजको फिर से वैखनेवाले यनौ । विदुइभ ४७-पुष्कानि हैव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरम् । सुत्तं गामं महोघो'व मच्चू आदाय गच्छति ॥४॥ २ निवणले मात्रैपर जो इस प्रकार आद हो गये हैं, कि फिर उनका उखडे पतन नहीं हो सकता, ऐसे पुरुषको झेझ काते हैं। उनके तीन भेद हैं स्रोतआपन, सशुदागामी, अनागामी। १६ ] पुङ्गवगो [ २३ (पुष्पाणि चैव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्। सुप्त' श्रमं महोध इव स्युरादाय गच्छति ॥ ४ ॥ अनुवद–( राग आदि ) फुछोको सुननैवाळे आसज्यिक कुख्य को मृत्यु ( वैसे ही ) पकड ले जाती है, जैसे सोये गाँवको बी याद । आवन्तौ पतिपुजिका ४८-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यात्तमनसं नरं । अतित' येच कामेषु अन्को कुरुते यसै ॥५॥ (पुष्पाणि शेष अचिन्वन्तं व्याखकमनसं नरम् अतृ' एव कामेषु अन्तकः कुरुते वशम् ॥ ५॥) अनुवाद-( राग आदि ) मूछोंको सुनते आसक्षियुक पुरुपको, (जब कि अभी उघनै ) मोर्चे तुहि अहं प्राप्त की ( सभी ) यस ( अपने ) वशमैं कर छेता है । ( क ) कोलिय सेठ ४६–ययापि भमरो पुप्फं बण्णगन्धं अहठयं । पलेति रसमादाय एवं गामे सुनी चरे ॥६॥ (यथापि भ्रमरः पुष्पं वर्णगन्धं अनन् । पलायते रसमादाय पत्रं आमे सुनिश्चरेत ॥ ६ ॥ अनुवाद-जिस प्रकार असर फुलके वर्ण और गंधको बिना हानि पहुँचायै, रसको छेकर चल देता है, वैसे ही गाँव। सुनि विचरण करे। २७] धम्मपदं [ ४९ पाठिक ( आजीवक साधु ) १०न परे विलोमानि न परेसं ताकतं । अत्तनोव अवेक्ष्य कतानि अकतानि च ॥७॥ (न परेषां बिछोमानि न परेषां कृताकृतम् । आत्मन एव अवेक्षेत कृतानि अकृतानि च ॥ ७॥) अनुवाद- दूसरोके विरोधी (काम) फरे, म दूसरोंके कृत-अकृत ” के नोपसे रहे, ( आदमीको चाहिये कि वह ) अपने ही कृत (=फियै ) और अकूत (=न किये ) की ( बोध करे ) । अवस्ती छतपाणि ( उपासक ) ११-पथापि रुचिरं पुष्कं । वएण्वन्तं अगन्धकं । एवं सुभासिता वाचा अफळ होति अकुन्वतो ॥८॥ (यथापि रुचिरं पुण्यं वर्णवद् अगन्धकम्। एवं सुभाषिता वाक् कफला भवति अकुर्वतः ॥ ८॥ अनुवाद—जैसे रुचिर और वर्णयुक्तं (किन्तु ) गंधरहित झुक है,

  • बैसै क्षी ( कथनानुसार ) " आचरण न करनेवालैफी सुभाषित

याणी भी निष्फल है। ५२ध्ययापि रुचिरं पुष्कं वएण्वन्तं सगन्धकं। एवं सुभाविता वाचा सफला होति कुन्वतो ॥६॥ (ययापि रविरं पुष्पं वर्णयत् सगन्धकम् । पत्रं सुभाषिता चाकू सफल भयति कुर्वंतः ॥९॥ २१ ॥ पुप्फवगो [ २५ अनुवाद--जैसे रुचिर वर्णयुक और गन्धसहित कुछ होता है, ॐ वैसे ही (वथनके अनुसार काम ) करनेवाछेकी सुभाषित वाणी सफल होती है। आवरती पूराम विशाखा ( उपासिका ) ५३-ययापि पुप्फरासिम्हा कयिश मातागुणे बहू । एवं तेन भवेन कतमं कुसतं बहू ॥१०॥ (यथापि पुष्पराशेः कुर्यां मालागुणान् बहून् । एवं जातेन मर्चेन कर्तव्यं कुशलै हु ॥ १० ।) अनुवाद–जिस प्रकार पुष्पशशिसे वृहुती माळाथै , उसी अकार उत्पन्न हुयै शणीको चाहिये कि वह बहुतसै भळे (कमको ) करे । आवस्ती आनन्द (थेर) १४–न पुष्पान्धो पटिबातमेति न चन्दनं नगरमद्धिका वा । सतञ्च गन्धो परूिवातमेति सन्वा विसा सप्पुरिसो पवाति ॥११॥ ( न पुष्पगन्धः प्रतिज्ञातमेति न चन्द्नं तगमलिके था। सतां च गन्धः प्रतिघातमेति सर्वा दिशः सत्पुरुषः प्रवाति ॥११) २६ ] धम्मपदं [ २४ अनुवाद-घ्छी सुगंध इवासे उलटी ओर वहीं जाती, न चन्वुन, तगर या चमेली ( की गंध ही वैसा करती है); किन्नु सजनी सुगध इवाळे उलटी ओर जाती है समुज्य सभी दिशाओं सुगंघ ) चहाते हैं। ५५-वदनं तगरं वापि उप्पलं अथ वस्सिी । एते गन्धनातानं सीलगन्धो अनुत्तरो ॥१२॥ (चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्षिकी । एतेषु गन्धजाणान शीलमन्थोऽनुत्तरः ॥१२ ) अनुवाद-“चन्द्ल था तगर, कमल था ही, इन सभी (की) सुष सै सदाचारकी सुगध उत्सस है। राबजूई ( वेणुवन ) १६-शष्पमत्तो अयं गन्धो या'थं तगरचन्दनी । यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेशु उत्तमो ॥१३॥ (अल्पमात्रोऽयं शन्धो योऽयं तगरस्चन्दनी। यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उद्यमः ॥१३ ॥ ) अनुवाद–सगर र थन्ड्रनकी जो यह गंध फैलती है, वह अप मात्र है, और जो यह सदाचारियोी गंध , (वह) उत्चम (गंज ) देवताओंमें फैछती है । राजगृह ( वेणुवन ) १७-तेसं सम्पन्नमीलनं अष्पमाविहारिनं । सम्मद्ब्लाविमुत्तानं मारो मग्गं न विन्दति ॥१४॥ मशकस्सप गोषिक (वर) ७१६ ] [ २७ (तेषां सम्यकशीळानां अभमादविहारिणम् । सम्यग्ज्ञानविमुक्कानां मारो मार्ग” न विन्दति ॥१ ) अनुवाद:-( ख ) वै सदाचारी निरारूस हो विहरतैवाळेययार्थं ज्ञान द्वारा मुक ( हो गये हैं ), ( उनके ) मार्गको मार महीं पकड सकता । गरझदित्र १८–यथा संकारधानस्मेिं उज्झितस्मिं महापथे । डुमं तस्य जायेथ । सुचिगन्धं मनोरमं ॥ ११॥ (यथा संकारधान उज्झिते महापथे । पश्च तत्र जायेत युचिगन्धं मनोरमम् ॥१० ) १६-एवं संकारभूतेषु अन्वभूते पृथुब्जने । अतिरोचति पर्याय सम्मासम्बुद्धसावको ॥ १६॥ । (एवं संकारभूते अन्धभूतं पृथग्जने । अतिरोचते आशया सम्यक्संबुद्धआवकः ॥१२ ) अनुवाद, बैसे महापथपर पॅसेि बेके ढेरपर अनरम, सूचिगंध, शुकाव ( =qश ) उटपत्र , बोवे, इसी प्रकार छुवे समान अन्वे अक्षरों (-धूदूर्व) में सम्यऽद (=ययार्थं शली ) का अनुगामी ( अपनी ) प्रहासे प्रकाशन होता है। ५-पुष्पवर्ग समाप्त ५–बालवगो आवस्ती (जेतवन) दरिद्ध सेवक ६०-दीघा जागरतो रत्ति दीर्घ सन्तस्स योजनं । दीघो बालानं संसारो सद्धम्मं अविजानतं ॥ १॥ (वीषु जामो रात्रि दीर्घ शान्तस्यू योजनम् । दोघं बालान संसारः सद्धर्म" अविजानताम् ॥श) अनुवाद—जगतेको रात कवी होती है, थलैके लिये योजन म्या होता है, सचे धर्मो न जाननेवाले मुके लिये संसार (=आवागमन ) छम्या है । राजगृह सादंविचारी (=शिष्य ) ६१-चव्वे नाधिगच्चेय्य सैय्यं सविसमतनो । एकवरियं ददहं कथिरा नत्थि बाले सहायता ॥२॥ (चरन् चेतू नाधिगच्छेद श्रेयांसं सदृशं आत्मनः । पकचर्या ढं कुर्यात् नास्ति बाळे सहायता ॥२) २८ ॥ que ] बाछत्रगो [ २९ अनुवाद-यदि विचरण करते अपने गुरूप भीममुपको न पाये तो इताके साथ अकेला ही विचरे, सूखासै भिन्नता नहीं निभ सकती । आवस्ती आनन्द ( सैठ ) ६y¥Qता प्र' त्थि धनम्मोस्थि इति बालो विह्वलति । अत्ता हि अत्तनो नल्यि कुतो पुतो कुतो धनं ॥३॥ (पुजा मे सन्ति धनं मे ऽस्ति इति बाल विहन्यते । आत्मा हि आत्मनो नास्ति कुतः पुत्रः कुतो धनम् ॥श ) अनुवाद-पुत्र मैरा है, "धन मैरा है” पैसा (फरी ) कुछ ( नर ) बतपीटित होता t है, जब आमा ( = शरीर ) ही अपना वहीं, तो कहाँले पुत्र और धन (अपना होगा ) । D 9 गिरइकट चोर १ ३-यो चालो भब्लती आल्यं पण्डितो चापि तेन सो । बालो च पण्डितमानी, स वे बालति ब्रुवति ॥४॥ ( यो बालो मन्यते थाल्यं पण्डितश्चापि तेन स । बालश्च पंडितमानी स , वै बाळ इत्युच्यते ॥श्व ) अनुवाद—जो ( कि वह ) आज्ञ होकर ( अपनी ) अशतको जानता हैइख (अं) से वह चंडित (= जानकार ) है । वस्तुतः अश होकर भी ओ पंडित होनेका इस भरता है, वही अछ (=क ) कहा जाता है । ३० ॥ धम्मपर्व [५७ आवस्ती ( जेतवन ) उदायी ( थेर) ६8ध्यावनीवम्षि चे बालो पण्डितं पयिरुपासति । न सो धम्मं विजानाति दवी सूपसं यथा ॥१॥ (यावज्जीवमपि चेद् बालः पंडितं पर्युपास्ते । न स धर्म विजानाति दर्वी सुपरसं यथा ॥५) अनुवाद--चाहे याल ( == जब ; अज्ञ ) जीवन भर पंडितकी सेवामें " रहे ( तो भी ) वह धर्मफो ( वैसे ही ) नहीं जान सकता, जैसे कि कशी (= डुब्बी = यी ) युष (= डुछ आदि ) के रसको । आवस्ती ( बेसवन) भद्रबगीय ( भिक्षुकंग) ६५-भृङ्कतमपि चे विलू परिडतं पयिरूमासति । खिप्यं धम्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ (मुहूर्तमपि चेद् विश पंडितं पर्युपास्ते । क्षिप्रं धर्मं विजानाति जिह्वा सुपरसं यथा ॥३) अनुवाद-चाहे विशदा (पुरुष) एक मुहूर्व ही पविती सेवामें

  • रहे, (तो भी वह शीघ्र ही घर्मको जान सकता है, जैसे

ङ्गि जिल्ला सूपकै रसको । रामगृह ( वेणुबन ) सुप्पबुद्ध (4ी ) ११-चरित वाला दुम्मेधा अमितेनेव अत्तना । कन्सो पापकं कम्मं यं होति कटुकम्फलं ॥७॥ (चिरन्ति घाला दुर्मेधसोऽमित्रेणैवात्मना । कुर्वन्तः पापकं कर्म यद् भयति कटुफफळम् ) ५१०] याचबर [ ३१ - अनुवाद-पाप कर्मको-जो कि कटु फल देनेवाला होता है--करते दुष्ट बुद्धि अछ ( जन ) अपने ही अपने शत्रु पनते हैं। चतवन की कक्षप ६७-न तं कम्मं तं साधु यं कहवा अकृतपति । यस अस्सुमुखो रोदं विपाकं पव्विसेवति ॥८॥ ( न तत् कर्म कृतं साधु यत् कृत्वाऽनुतप्यते । यस्याश्रुमुखो रुदन् विपाकं प्रतिसेवते ॥८५) अनुवाद—इस काम करना ठीक नहीं, किसै करके ( पोछे ) अनुताप झरना पके, और लिखकै फरक अधूरुख रोते भौगना पड़े। ( बेशुवन) सुमन ( मा ) ३८-1झ कम्मं कर्तुं साधु यं करुचा नाचुतष्पति । यस पतीतो सुमनो विपाकं पथिसेवति ॥६॥ ( तत् कर्म कृतं साधु यत् कृत्वा नानुतप्यते । यस्य प्रतीत मला विपाकं अतिसेवते ॥९) अनुवाद--उखी कामका करना ठीक है, जिसे करके अनुताप झरना (= पछतावा ) न पड़े, और जिसके फछको अखक सनसे भोग करे। जैतवन उपलवर्षण ( पेरी ) ६e-मधू’व मज्जति चालो याव पापं न पचति । यदा च पचती पापं अय दुक्खं निगच्छति ॥१० ३३२ ] धम्मपदं [५१२ (मष्विव मन्यते बाळ यावत् पापं न पश्यते । यदा च पच्यते पापं अथ दुश्खं निगच्छति ॥१०॥ अनुवाद –अझ ( जन ) जब तक पापका परिपाक नहीं होता, तय तक उसे मधुके समान जानता है। जय पापका परिपाक होता है, तो डूबी होता है। रावणंड (वेणुवन ) जम्मूक ( आजीवक साश्च ) ७०-मासे मासे कुसग्गेन वालो सुब्नेय भोजनं । न सो संतधम्मानं कर्ते अग्घति सोलसि ॥११॥ (मासे मासे कुशानेण बालको सुंजीत भोजनम् । न स संख्यातधर्माणं कलामति षोडशीम् ॥११) अनुवाद—यदि अश ( पुरुष ) कुली नौकसे महीने महीनेपर खाना , तो भी धर्मके जानकारीके सोलहवें भागके भी धराधर ( वह कुछ ) नहीं हो खकता। राजगृह ( वेणुवन ) अर्पित ७१–न हि पापं कतं कम्मं सन्तु ख 'व मुच्यति । डहन्तं बालमन्वेति भस्माच्चनो ‘व पावको ॥१२॥ (नहि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति । दइल् बालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥१श) अनुवाद--वै दृषकी भाँति क्रिया पाप कर्म( तुरन्त ) विकार गहीं आता, वह भस्मने ॐकी आगी भाँति दग्ध करता अञ्जनका पीछा करता है। ५॥१५॥ यावग्ग [ ३३ राजगृह (वेणुवन ) सद्भिट ( पैन ) ७२-यावदेव अनत्याय बत्ती बालस्स जायति । हन्ति बालस्स सुक्छे सुद्धमस्स विपातयं ॥ १३॥ (याघवेव अनर्थाय शप्त' बालरय जायते। हन्ति शालस्य शुक्लांशं मूर्धानमस्य विपातयन् ॥१३) अनुवाद--बुद्ध (=ाल ) का जितना भी ज्ञान है, ( वह उसके ) अनर्थके लिये होता है। वह उसकी सूखी (=शिर-प्रश ) को गिराकर उसकै शुद्ध (=घवछ=शुद्ध) अंशका विनाश करता है। जतवन सुधम्म (थेर) ७३-प्रसतं भावनमिच्छेय्य युक्खारव भिक्खुषु । आवासेषु च इस्सरियं पूना पङलेसु च ॥१६॥ (असद् भावनमिच्छेतु पुरस्कारं च भिषु । आवासेषु चैश्वर्यं पूज़ एकुलेषु च ॥१e॥ ) ७४–भमेव कतमज्मन्तु गिही पध्वजिता उभो । ममैवातिवसा अस्सू किवाकिन्येषु किस्मिचि । इति वालस्स वह्ष्यो इच्छ मानो च वदति ॥११ (ममैव कृतं मन्येतां द्वि-प्रव्रजितावुभौ। ममैवातिवशाः स्यातां कृत्याकृत्येषु केषु चित् । इति थालस्य संकल्प इच्छा मानक बढं ते ॥१५ ) अनुवाद--अप्रस्तुत वस्तुको चाह करता है, सिसुझमें था यमना ३७ ॥ धम्मपदं [५१६ (चाहता है ), अठो ( और निवासो ) में स्वामीपन (=ऍड्वर्षे ) और दूसरे कुछमें ला ( चाहता है )। शूद्दल और संन्यासी वोन मेरे ही क्रियेको सा, किसी भी कृप्य अकृस्यमे मेरे ही वशवर्ती हो--पैसा सूखका सकवष होता , ( जिससे उसकी ) इच्छा और अभिमान बढ़ते हैं । आरती ( जैतवन) ( वनवासी ) तिस्स ( धेर) ७१-अब्बा हि लाभूपनिस अब्बा निब्बानशामिनी । एवमेतं अभिनय भिक्खु बुद्धस्स सावको ॥ सकारं नाभिनन्द्य वैिकमन्ये ॥ १६॥ (अन्या हि लाभोपनिषद् कन्या निर्वाणगामिनी । एवमेतद् अभिशाय भिक्षुर्युद्धस्य भाषकः । सत्कारं नाभिनन्देत् विवेकमनुब्रूहयेत् ॥१२) अनुवाद-शभका रास्ता दूसरा है, और निर्माणको छैजानेवा दूसरा=बूस प्रकार इसे नकार हुङका अनुगासी मिश्च सकारका अभिनन्दन .व करे, और विवेक (=एकान्तचर्चा) को बढ़ावे । ५–बालबर्ग समाप्त ६–पण्डितवग्गो कैतवन राध (थेर ) ७६निधीनं पवत्तारं यं पस्से वज्ज-स्पिनं । निग्गय्इवादैि मेधाविं तादिसं पण्डितं मजे । ताबिसं भजमानस्स सेथ्यो होति न पापियो ॥ १ ॥ (निधीनामिव प्रवक्तारं यं पश्येत् बज्यैर्शिनम् । निगृह्वादिनं, मेधाविनं तादृशं पैडितं भजेत् । तादृशं भजमानस्य श्रेयो भवति न पापीयः ॥ १॥) { अनुवाद-( सिमें शुड ) निधियोंके धतकार्नेवार्केकी तरह, ड्राईको दिखानेवाळे पैसे संयसवाड़ी, मेधावी पीडितकी सेवा करे। ऐसे सेवन करनेवालैका कल्याण होता है, अभंगळ नहीं ( होता )। जैतवन अस्सशी पुनब्बल ७७-ओवदेय्यानूसासेय्य असब्भा च निवारये । सतं हि स पियो होत असतं होति अप्पियो ॥ २ ॥ [ ३५ ३६ ] धम्मपदं | ge (अनुवदेवशिष्याद् असम्याच निवारयेत् । सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः ॥ २ ॥ अनुवाद-(जो ) बहुपदेचा वैता है, अनुशासन करता है, नीच कर्म से निवारण करता है, वह सर्पको प्रिय होता है, और असत्पुरुषोंको अप्रिय। बेतुबन छत्र (थेर) ७८-न भने पापके मित्ते न भले पुरिसाधमै । भगेय मिते क्ल्याणे भजेथ पुरिमुत्तमे ॥ ३ ॥ (ल भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुषाधमान्। भजेत् मिश्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषावुचमा ॥॥ अनुवाद--मित्रो सेवन से झरे, ग अधस पुरुषोंका सेवन करे। अष्ठे मित्रोंका सेवन करे, उत्तम पुरुषोका सेवन फरे । बेहद महाकपिथन ( धेर) ७३-धम्मपीती मुख सेति विन्पपन्नेन चेतसा । अधिष्पवेदिते धम्मे सत्र रमति । पण्डितो ॥ ४ ॥ (धर्मेणैताः सुखं शेते विप्रसन्नेन चेतसा । आर्यप्रवेदिते धर्मे सदा रमते पंडितः ॥४॥ अनुवाद-धर्म-स )का पान करनेवाछा प्रखञ्च-चिखो मुखपूर्वक सोता है; पंडित (जन) आपके जतलायै घर्ममें सदा रमण करते हैं। १७ ॥ पण्डितवचो [ ३७ जैतपन पण्डित सामोर । ८०-उदकं हि नयन्ति नेतिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं । वृहं नमयन्ति । तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता ॥५॥ (उदकं हि नयन्ति नैतृका इझुकाय नमयन्ति तेनम् । दाय नमयन्ति,तक्षका आत्मानं दमयन्ति पण्डिताः ॥था ) अनुवाद--"हवाळे पानीको वैजाते हैं, बाण धनानैवाळे खाणको ठीक करते हैं, वहई रुकीको ठीक करते हैं, और पंडित (जल ) अपना दुमत करते हैं । अयि (थर) ८१-सेवो यया एकधनो वातेन न समीरति । एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता ॥६॥ (औलो यथैकघनो वातेन न समीर्यते । एवं निन्दाप्रशंसाङ न, समीर्यते पण्डिताः ॥धा ) अनुवाद जैसे ठोe पहाड़ हवासे कंपायसान नहीं होता; पैसे ही ॐ पंडित निन्दा और प्रषससे विचलित नहीं होते। जैतवन ६२–यथापि रहदो गम्भीरो विप्पसन्नो अनाविलो । एवं धम्मानि सुवान विष्पसीदन्ति पण्डिता ॥७॥ ३८] धम्मपद्म [ ३१ (यथापि इवो गम्भीरो विप्रसोऽनाविलाः । एवं धर्मात् श्रुत्वा विप्रसीदन्ति पण्डिताः ) अनुवाद-धमको सुनकर पणित ( बन ) अथार्ह, स्वच्छ निगंठ सरोवस्की भाँति स्त्रच्छ ( सन्तुष्ट ) होते हैं । पाँच सौ भिक्षु ८३-सम्बत्य वे सम्युरिसा वनन्ति न कामकामा लपयन्ति सन्तो । सुखेन भृशा अपना दुखेन न उच्चावचं पण्डिता दस्सयन्ति । ( सर्वत्र वै सत्पुरुषा व्रजन्ति न कामकामा छपन्ति सन्तः । सुखेन स्पृष्टाअथवा दुःखेन नोच्चावचंपण्डितादर्शयन्ति॥८॥ अनुवाद-पुरुष सामी बगह जाते हैं, ( वह ) भोगोके लिए यात नहीं खाते; सुक्ष मिले था दुःख, षडित ( जन ) विकार महीं प्रदर्शन करते । चतवन भन्मिक (थर) ८४-न अत्तहेतू न परस्स हेतु न पुत्तमिच्छे न धनं न रखें। न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो सीला पब्च धम्मिको सिया ॥३॥ ११११ ॥ [ ३९ ( महेतोः स परस्य हेतोः स पुत्रमिच्छेत् न धनं न राष्ट्रम् । नेच्छेद् अधर्मेण समृद्धिमात्मनः स शीलवान प्रज्ञावान धार्मिकः स्यात् ।) अनुवाद--को अपने लिए या दूसरेके लिये पुन्न, धन, और राज्य नहीं चाहते, न अधर्मसै अपनी उत्पति चाहते हैं, वही सदाचारी (शीळचान ) प्रज्ञावान और धार्मिक हैं। जैतवन मेश्रवण ८५-अप्पका ते मनुस्सेषु ये जना पारगामिनो । अयायं इतरा पण तीरमेवानुधावति ॥१०॥ (अल्पकास्ते मनुष्येषु ये जनाः पारगामिनः। अथेमा इतराः प्रजाः तीरमेवानुधावति ॥।१०n ) ८६यै च खो सम्भदखाते धम्मे धम्मानुवन्तिनो । ते जना पारमेस्सन्ति मच्चुषेय्यं सुदुत्तरं ॥११॥ (ये च खलु सम्यगाख्यते धर्मे धर्मानुवर्तिनः । ते जनाः पारमेष्यन्ति भुयुधेयं सुदुस्तरम् ॥१२॥ अनुवाद मनुष्योंमें पार जानेवाले जन विरहे ही , यह दूसरे लोग तो तीरे हो तीरे दौड़नेवाले हैं। जो मुष्याच्यात धर्म का आगमन करते हैं, वह मृत्युहीत अधुिर्खर ( संसा सागर ) को पार करेंगे। धम्मपदं [ 108 जैवन पाँच सौ नवागत भिक्षु ८७–कापहं धम्मं विप्पहाय एक ' भावेय पण्डितो । ओोका अनोकं अगम्म पॅिवेंके थय दूरमं ॥१२॥ (कुफ् धर्म" विभहाय शुक्लं भावयेत् पण्डितः । ओका अनोकं आगम्य विवेके यत्र दूरमम् ॥१२) ८८-तत्राभिरतिमिच्छेय्य हिवा कामे अकिञ्चन । परियोदपैय्य अत्तानं चित्तक्लेसेहि पण्डितो ॥ १३॥ (ताभिरतिमिच्छैव् हित्वा कामान् अकिंचनः । पर्यंवदापयेत् आरमोर्ने चित्रभुलेशैः पण्डितः ॥१३) अनुवाद-काले धर्म (=य )को छोड़कर, पण्डित (जन ) शुङ (-धर्म ) का आचरण करें । घरसे बेघर से दूर जा विवेक (=एकान्त ) का सेवन करें। भोगोको छौ, सधैस्त्वया हो वहीं रत रहनेकी इच्छा करें । पण्वित ( धन ) चित्त कै मकसे अयनैको परिशुद्ध करें। ॐई-वैसे सन्योचिषमु सन्मा बितं सुभासितं । आदान-पटिनिस्सगे अनुपादाय ये रता । वीणासमा जुतीमन्तो ते लोके परिनिब्बुता ॥ १४॥ (ये सम्वोध्येंगेषु सम्यङ् चित्तं सुभाषितम् । आदानप्रतिनिसर्गे अदुपादाय ये रताः । क्षीणास्रधा ज्योतिष्मन्तस्ते छौके परिनिभृता ॥१७) अनुवाद-शयोधि(=परम शान )के अगों(=संयोधयंगो )मैं जिनका चित्र भी प्रकार परिभावित (=स्कृत, ) हो गया है स७३ ॥ पण्डितवंग [ ४१ जो गर्मिहके परित्यागपूर्वक अपप्रिझमें रत हैं । ऐते, विसकै मकोंसे निर्मुक (=}णलव ), द्युतिमान् ( ऽरूप ) कमें निर्वाण प्राप्त हो गये हैं। ई-पण्डितवर्ग समाप्त ७–अर्हन्तवग्गो राणगृह ( जीवकका आश्रयन ) बीबक ३०-गतद्धिनो विमोक्स्स विम्पसुत्तस्स सब्वचि । सम्बगन्यम्पईणस्य परिलाहो न विन्दति ॥१॥ (गताध्यमो विशोकस्य विप्रयुक्तस्य सर्वथा । सर्बप्रथप्रदोणस्य परिद्वाहो न विद्यते । अनुवाद--जिसका मार्गे(-क्षन ) समाप्त हो चुका है, जो शोक- रहित सया सर्वथा मुक्क है, जिसकी क्षमो अंषिर्या क्षण हो। गई हैं , उसकें छिपे सन्ताप नहीं है । राजगृह ( वेणुवन ) बाह्यसप ६१-उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो न निकेते रमन्ति ते । ईसा 'व पङतं हित्वा शोकमोकं महन्ति ते ॥२॥ (डटजते स्ऋतिमन्तो न निकेते रमन्ते । इंसा च पल्यलं हित्वा ओकमोकं जयति ते ॥२) १६ ] ७७ अर्हन्तघनो [ © अनुवाद-सचेत हो वह बयौग करते हैं, ( गृह्य-}में रमण

  • नहीं करते, इंक जैसे सुज्ञ आहाशयको छोडफर चक्रे जाते

हैं, ( वैसे ही यह अद्वैव ) हक़ छोड़ जाते हैं । तबन वैछद्वि सीस २ध्येसं सनिचयो नत्यि ये परिख्यातभोजना । सुब्बतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस गोचरो । आकासे 'व सकुन्तानं गति तेजो दुरन्नया ॥३॥ (येपां सन्निचयो नास्ति ये परिज्ञातभोजनाः । शर्यतोsनिमित्तश्व विमोक्षो यस्य गोचरः । आकाश इव शकुन्तानां गतिः तेषां दुरन्वया ॥श) अनुवाद जो ( वस्तुओका ) सचय नहीं करते, जिनका भोजन नियत है, शून्यता-स्वरूप तथा कारण-रहित सक्ष (=निर्वाण) जिनको दिखाई पड़ता है , उनकी गति (=न्वष्य स्थान) आकाशमें पक्षियोकी ( गतिकी ) अति आशय है। = राजगृह ( वेणुवत ) अङ्ख (थेर ) 3–यम्स'सवा परिक्खीणा आहारे च अनिस्सितो । सुब्बतो अनिमित्तो च विमोक्खो यास्स गोचरो । आकासे 'ख सकुन्तानं पदं तस्स दुरवयं ॥४॥ (यस्यास्त्रवाः परिक्षीणा आहारे व अनिभयुतः । शर्यतोsनिमितश्च विमोक्षो यस्य गोचरः। आकांश इव शकुन्तानां पर्वं तस्य सुन्वयम् ॥४) 8 ] धम्मपद [ ७६ अनुवाद-टिबे आस्रव (=अछ) क्षीण हो गये, जो शहरों पर न तंत्र नहीं, जो शून्यता रूप० । आवस्ती (पूर्वोरास ) ६४-यस्सिन्द्रियाणि समर्थ गतानि, आस्सा यथा सारथिना सुदन्ता । पहीनमानस्स अनासवस्र, देवापि तस्स फ्हियन्ति तादिनो ॥५॥ (यस्येन्द्रियाणि शमतां गतानि अश्वा यथा सारथिना सुदान्ताः । प्रहीणमनस्य अननवस्य वैघा अपि तस्य स्पृहयन्ति तादृशः ॥५॥ अनुवाद-फारशीद्वारा सुखान्त सुशिक्षित ) अश्वोंकी भाँति जिसकी इन्द्रियाँ शान्त हैं, जिसका अभिमान नष्ट हो गया, ( और ) जो आतंबरहित , ऐसे ठस (पुरुष )की दैवता भी स्पृह्य करते हैं। खेळवन सारिपुत (येर ) e५–पठवीसमो नो विलन्तति इन्दखीतूपमो ताटि सुब्बतो । रहते 'ध अपेतकद्दमो संसारा न भवन्ति ताटिनो ॥६॥ ७८ ॥ अर्हन्तचा [ ५५ ( पृथिवीसमो मविरुध्यते इन्द्रकीलपमरताङॐ सुव्रतः । हद श्वापेतकर्दमः संसारा न भवन्ति तोडशः ।। ) अनुवाद-वैस सुन्दर व्रतधारी इन्द्रकीलकै समान ( स्वचछ ) तथा पृथिवीके समान जो क्षुब्ध मार्ह धोता; ऐसे ( पुरुष से कर्दमरहित सरोवरकी भाँति संसर (-अरु ) नहीं रहता । अतबन कोसम्बिमासित तिस्स ( पेर) ३३-सन्तं अस्स मनं इति सन्ता वाचा च कम्भश्च । सम्मदब्लाविसुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो ॥७॥ ( शान्तं तस्य मनो भवति शान्ता वाक् च कर्मे च । सम्यगाविमुक्तस्य उपशन्तस्य तादृशः ॥७॥ ) अनुवादडपशान्त औौर थथाएँ हानद्वारा शुरू हुये उस (अइ पुरुष ) का सन शान्त होता है, वाणी और मैं शान्त होते हैं। शैतवन साधित्र ( पेर) ६७-अस्सद्धो अकतन्व् च सन्विश्वेदो च यो नरो । इतावकासो वन्तासो स वै उत्तमपोरिसो ॥८॥ (अश्रद्धोऽकृताश्च सन्धिच्छेयश्च यो नरः। इतावकाशो थान्ताशः स वै सुखम पुरुषः ॥८) अनुवाद-जो (मूड) अद्वरहित, अकृत (=बिना बनाये-निर्वाण - श, ( संसारकी ) संधिका चैथुन करनेवाला, अवकाशरहित, ४६] धम्मपदं [ ©l° ( विषय-) भोगको चममकर दिया जो भर , बही इस पुरुष है। जतवन (खदिरखनी ) वत (वर) ६८-गामे वा यद्रि वीरंख्ने निन्ने वा यदि वा थले । यत्याग्रहतो विहरन्ति तं भूमिं रामणेय्यकं ॥६॥ (प्रमेवा यदि वाऽरण्येनिभ्ने वा यदि वा स्थले । यत्राद्दन्तो विहरन्ति सा भूमी रमणीया ॥ ९ ॥ अनुवाद-वमें या अंगझमें, निम्न या ( ऊँचे ) स्थछमें बाँ ( क ) अहंद ( लोग ) विहार करते हैं, वही रसणीय सूत्रि है। आरण्यक भिश्च ४६-मणीयानि अरण्यानि यत्य न रमते बनो। वीतरागा रमिस्सन्ति न ते कामगबेसिनो ॥१०॥ (मणीयन्यारण्यानि यत्र न रमते जनः। वीतरागा स्यन्ते न ते कामगवेषिणः ॥ १० ॥ अनुवाद--( वह ) रमणीय थन, जहाँ (साधारण ) जन मण नहीं करते, कामभागों)के पीछे म भटकनेवाले वीतराग (वर्दी) रमण करें। ७-अर्हबर्ग समाप्त ८–सहस्सवग्गो घेणुवन सम्बदाडिक ( चोरघातक ) १००सहसमपि चे वाचा अनत्यपदसंहिता। एकं अत्यपदं सेय्यो यं मुक्त्वा उपसम्मति ॥१॥ (सहस्रमपि चेद् वाचः अनर्थपदचंहिताः । एकमर्थपदं श्रेयो यच्छूलघोपशाम्यति ॥ १ ) अनुवाद-व्यथैके पदोंसे युक सहस्रों वाक्याँसे भी ( वह ) सार्थक एक पद श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर शान्ति होती है। वारुचीरिय ( पेर) १०१-सहस्रमपि च गाथा अनत्यपदसंहिता । एकं गायापर्ट सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ॥२॥ (सइनमपि चेद् गाथा अनर्थपीडिताः । एकं गाथापदं श्रेयो यच्छवोपशाम्यति ॥ २ ॥ अनुवाद-यथैके पदोंसे युक इर गाथाचसे भी एक गाथापद्. श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर० । ' धम्मपदं कुण्डल्फेख (थेरी) १०२-यो च गाया सतं भासे अनत्थपदसंहिता । एकं धम्मपई सेय्यो यं सुत्वा उपसम्मति ॥३॥ (यश्च गाथाशतं भागंतानर्थपवसंहितम् । एकं धर्मपदं श्रेयो यच्छूवोपशाम्यति ॥ ३ ॥ १०३–यो सही सहप्सेन सङ्गामे मातुसे लिने । एकं च ज्ञेय्यमत्तानं स वे सङ्गमजुत्तमो ॥४॥ (यः सहस्त्रं सहस्रेण संग्रामे मानुपान् जयेत् । एकं च जयेद् आत्मानं स वै संग्रामजिदुत्तम॥ ४ ॥ अनुवाद-जो व्यर्थळे पट्टोंसे युक सौ गाथाएँ भी भायै (उससे ) - धर्मका एक पद भी श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर ० ॥ समासतें ज इजा होणार मनुष्यको जीत ठे, (उससे कहीं अष्क) एक अपने जीतनैयाला खतम संप्रभजिद है । ) जेवन अनर्थ-शुष्छक शाखाय १० ४-भत्ता ह वै जितं सेय्यो या चायं इतरा पजा । अत्तदन्तस्स पोसस निरं सद्भिलतचारिन ॥१२॥ ( आरमा हवे जितः श्रेयान् या वेयमिनराः प्रज्ञा । दान्तान्मनः पुरुषस्य नित्यं मैयतचारिणः ॥५ ।) १०५-नेत्र देवो न गन्धवो न मारां सह बन्धुना । जितं अपलितं कपिरा तथारूपस जन्तुनो ॥६॥ ८८] आइस्लवग्ग [ ४९ (मैव दैवो न गन्धर्वो न मारः सह ब्रह्मणा । जेितें अपजितं कुर्यात् तथारूपस्य जन्तोः ॥ ६ ॥ अनुवाद-इन अन्य प्रजाओंके बीतनेकी अपेक्षा अयनेको जीतना श्रेष्ठ

  • है । अपनैको खुमल करनेवाला, नित्य अपनेको संयम

करनेवाछा जो शुरुष है। इस प्रकारले प्राणीके जीतेको, न दैवता, न गन्धर्व, न ब्रह्मा सहित मार, बैबीता कर सकते हैं। सार्तिके मामा "* १०६-मासे मासे सहस्सेन यो यजेथ सतं समं । एक भाविततानं शुद्धृतमपि पूजये । सा येव पूजना सेय्यो'थै चे वस्ससतं हुतं ॥७॥ (मासे मासे सहस्त्रेण यो यजेत शतं समान्। एकं च भावितात्मानं मुहूर्तमपि पूजयेत्। सैव पूतना श्रेयसी यच्चेद् वर्षशतं हुतम् ॥ ७ ॥ अनुवाद-सहन-दक्षिणा घाइ से जो महीने महीने औ वर्ष तक यजन करे, और यङि पछि अनचाहें ए (पुरुष) को एक मुहूर्त ही पूजे १ तो सौ वर्षीके हवन यह पूला ही श्रेष्ठ है। सापिका भावा १०७–यो च बस्ससतं जन्तु अगिं परिचरे वने । एकं च भावितानं मुहुत्तमपि पूगये । सा येव पूनना सेय्यो यं चे वस्ससतं हुतं ॥८॥ ५० ॥ धम्मपद [८७० (यश्व वर्षशतं जन्तुरग्निं परिचरेद् घने । ए च भावितात्मानं मुहूर्तमपि पूजयेत् । सैव पूतना श्रेयसी थञ्चेद् वर्षशतं सुतम् ॥ ८॥ अनुवाद-अवि प्राणी सौ वर्ष तक धनी अतिपरिवरण (=असि होत्र) करे, और यद्विना । साप्तिका मित्र आक्षण १०८–यं किंचि थिठं च हुतं च लोके संवच्छर यनेय पुब्जपेक्खो । सन्बम्पि तं न चनुभागमेति , अभिवाद्ना उज्जुगतेषु सेय्यो ॥६॥ (यत् किचिवू इष्ट' च हुतं च लोके संवत्सरं यजेत पुण्यापेक्षः। बर्धमपि तत् न चतुर्भागमेति, अभिवादना ननुगतेषु श्रेयसी ॥ ९ ॥ अनुवाद-पुण्यकी इच्छा को वर्ष भर नाना प्रकारके यह और ; हवनको करे, तो भी वह सरळताको मास (पुरुष) के लिये की गई अभिवाद्यवाके चतुर्थशठे भी यद्वक्र नहीं है। अरण्यकुवे दीघायु कुमार १०६ अभिवादनसीलिस्स निव्वं बद्धापचायिनो । चतारो धर्म्मा बहून्ति शायु चएणो सुखं बलं ॥१० ८१२ ] सहस्रचगो [५७ (अभिवाद्नशीलस्य निस्थं धूळपधायिनः । चत्वारो धर्मा बर्षान्ते आयुर्वणैः सुखं बलम्* ॥ १९ ॥ अनुवादश्च अभिवाद्य औछ है, जो भूबोंको’सैवा करनेवाछा " हैउसकी चार बातें (धर्म) बहती हैं-आयु, वर्ण, सुख और बछ । जलबन संफिच (=gांकृत्य ) सामोर ११०–यो च वस्ससतं जीवे बुस्सीलो असमाहितो । एकाहं जीवितं सेय्यो सीतवन्तम्स झायिनो ॥११॥ ( या वर्षशतं जीवेद् दुश्तोऽसमाहितः। एकाई जीवितं श्रेयः शीलवत ध्यायितः ॥ ११ ॥ अनुवाद-सुराचारी औौर एकाग्रचिलताविरहित (=असमाहित )के सौ वर्षीकै नैसे भी सदाचारी और ध्यानीका एक द्वािन का जीवन श्रेष्ठ है। कोण्डम ( धेर) १११–यो च वस्ससतं जीवे दुष्पलो असमाहितो । एकाहं जीवितं सैय्यो पञ्जावन्तस्स मायिनो ॥१२॥ ( यश्च वपंशतं जीवेद् दुष्पशोऽसमाहितः । एकाहं जीवितं श्रेयः आशावतो ध्यायिनः ॥ १२ ॥ के मदुश्चतिमें है–"अभिवादनशीलस्य निष्प हेपसेपिन)। चारि संप्रवर्धन्ते आयुर्धिया यशो बलम् ( ११९१ )। ५२] [ ८७५ अनुवाद-दुष्प्रश और असमाहितके सौ वर्षके जीनेसे भी अज्ञावान् और ध्यानीका एक दिनका जीवन श्रेष्ठ है। बेतघन सुप्पदास ( धेर) ११२–यो च वस्ससतं जीवे कुसीतो हीनवरियो । एकाहं जीवितं सैय्यो वीयिमारभतो दई ॥१३॥ (यश्च घर्षशतं जीवेत् कुसीव नषायें। एकाहं जीवितं श्रेयो बीर्यमारभतो दृढम् ॥१३) अनुवाद आश्चर्य और अनुद्योगीके सौ वर्षेके जीवनसे इढ़ उद्योग

  • करनेवालेंके जीवनका एक वित श्रड है ।

पयचारा ( पेरी ) ११३–यो च वस्स्सतं जीवे अस्सं उद्यव्ययं । एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो उदयव्ययं ॥१४॥ (यश्च वर्षशतं जीवेद् अपश्यन् उद्यव्ययम्। एकाहं जीवितं श्रेयः पश्यत उद्यव्ययम् ॥१४) अनुवाद--( संसारमै वस्तुओंके ) डरपति और विनाशका न ब्याककरनेके व बर्पके जीवन, उरुपति और विना का ख्याल करनेवाळे जीवनका एक दिन श्रेष्ठ है । जdवन किड गोतमी ११४–यो च वस्साप्ततं जीवे अपसं अमतें पढे । एकाहं जीवितं सेय्यो पसतो अमतं पदं ॥११॥ ८१६ ] सङ्कलवग्ग [५३ (यश्व वर्षशतं बीच अपश्यन् अमृतं पदम् । एकाहं जीवितुं श्रेयः पश्यतोऽभूतं पदम् १५ ) अनुवाद-अखूरुपद (=ङनिर्माण )को न बोल करनेके ौ

  • वर्षे जीवनसे, अमृतपदको खनेवाळे जीवन एक

ख़िल श्रेष्ठ है। बैतवन बहुपुत्रिका (येरी ) १११–यो च वस्ससतं जीवे अपास्सं धम्ममुत्तमं । एकाहं जीवितं सेव्यो पस्सतो धभ्म्यमुत्तमं ॥१६॥ (य७ बर्षशतं जीवेदपश्यन् धर्ममुत्तमम् । एकाई बीवितं श्रेयः पश्यतो धर्मभुजसम् ॥१३ ) अनुवादतान्तम घर्मको न देखनेके सौ वर्षकै जीवनसे, डचम धर्मके देवनैवाळूके जीवनका एक दिन श्रेष्ठ है । ८-सहस्रवर्ग समाप्त 8-पापवग्गो बैतवन (चूछ ) एकसाटक ( भाषण ) ११२-अमित्यये कल्याणे पापा चित्तं निवारये । दुन्वं हि करोतो पुत्रं पापमिं रमते मनॉ ॥१॥ (अभित्वरेत कल्याणे पपात वितं निवारयेत् । तनद्रितं हि कुर्वतः पुण्यं पापे रमते मनः ।) अनुवाद-पुण्य (कामोंमें ) जब्दी , पापसे चित्तो निवारण झरे, पुण्यको धीमी गतिसे करनेपर बिल पापमें रत होने लगता है। बैतवन सैय्यसक (घेर) ११७-पापब पुरिसो कयि न तं कयिरा पुनप्युनं । न तम्हि चन्द्रं कयिरय दुक्खो पापस्स उचयो ॥२॥ (पायं चेत् पुयः कुर्यान तत् कुर्यात् पुनः पुनः । न तस्य छन्दं कुर्यात् दुख पापस्य उच्चयः | २) अनुवाद-यदि पुरुष (कमी ) पाषकर डाळे, तो उसे पुन पुनः न करे, उसमें रत न होवे, (क्योंकि) पापका संचय लुप्त ( का कारण ) होता है। ', ५६ ] ९५] पापवगो [ ५५ तवन कामदेव कन्या ११८-पुल्लह्वे पुरिसो कयिरा कयिराथेनं पुलप्पुत्रं । तम्हि छन्दं कयिराय सुखो पुलस्स उच्वयो ॥३॥ (पुण्यं चैत्पुरुषः कुर्यात् कुर्याद् एतत् पुनः पुनः। तमि छन्वै कुर्यात् खः पुण्यस्य ॥२) उन्वयः अनुवा-–यदि पुरुषःपुण्य – तो, उसे पुनः पुनः करे, उसमें रत वे, (.क्योंकि) पुण्यका संचय सुखकर होता है। अनाथपिण्डिक ( सेठ ) ११६–पापोपि पस्तीति भद्रं याव पापं न पच्वति । यदा च पञ्चति पापं अथ पापानि पतति ॥४॥ (पापोऽपि पयति भद्रं यावत् पापं न पच्यते । यदा च पच्यते पापं अथ पापानि पश्यति ) १२०-भद्रोपि पप्सति पापं याव भद्रं न पश्यति । यदा च पच्चति भद्रं अथ भद्रानि पस्सति ॥४॥ (भद्रोऽपि पश्याति पापं यावद् भद्र’ न पठ्यते । यदा च पच्यते भद्र’ अथ भद्राणि पश्यति ॥५॥ ) अनुवाद--पापी भी तबतक भला ही देवता है, बघतक कि पापका विपाक नहीं होता! जब थापका विपाक होता है, क्षय ( उसे) पाप दिखाई पड़ने लगता है । भङ्ग ( पुष्य करनेवाला, रूप ) भी तबतक पापको देखता है जघती ५६ ॥ [ १७ छि पुण्यका वियोल नहीं होने लगता जय पुषयका विपाक होने लगता है, तो पुण्योको ठेखने लगता है। जैतवन ‘ असममी ( भिश्च) १२१-भावमनूलेय पापस्स न मन्तं आगमिस्सति । उदबिन्दुनिपातेन उठ्छन्मोपि पूरति । आतो पूति पापस्स योक-योकम्पि आचितं ॥६॥ ( मा s वमन्येत पापं न मां तद् आगमिष्यति । उद्दविन्दुनिपातेन उदकुम्भोऽपि पूर्यते । बालः पूरयति पापं स्तोकं स्तोकमष्याचिन्वन् ॥ ६ ॥ अनुवाद--"वह मेरे पास नहीं आयेगा” ऐसा ( शौच) पापकी अवहेछमा न करे। पानीकी धूवके गिरनेसे घड़ा भर जाता है ( पैसे ही ) सूखें थोड़ा थोश संचय करते पाप को भर लेता है। विशळपाव ( सैछ ) १२२-मावमब्जेय पुरॉक्षस्स न मन्तं आगमिस्सति । उदबिन्दुनिपातेन उदकृन्मोपि पूरति । धीरो पूति पुनस योक-योकम्पि आचिन ॥७॥ (मा ७ वमन्येत पुण्यं न म तद् आगमिष्यति । वदविन्दुनिपातेन उदकुम्लो ऽपि पूर्यते । धी पूरयति पुष्यै स्तोकं स्तोकमप्याचिन्बम् ॥ ७) १९ / पापघगो [५७ अनुवाद-"वह मेरे पास नहीं आयेगा"-पैसा ( सौच) पुष्प अवहेलना न करे। पानी की० । धीर थोडा थोडा संचय करते पुण्यको भर लेता है। तबन मधषन ( वणिक् ) १२ ३-वाणिजो ‘व भयं मरणं अप्पसत्थो महद्धनो । विसं जीवितुकामोव पापानि परिवर्जये ॥८॥ (वणिगिव भयं मार्ग” अल्पसाथं महाधनः। विषं जीवितुकाम इव पापानि परिवर्जयेत् ॥ ८ ॥ अनुवाद---योहे काठेि और महाधनवाया घनजारा जैसे भय्यु शस्तेको छोड़ देता है, ( अथवा ) जीनेकी इच्छावशा शुरूप जैसे विषक, (छोड देता है ) वैसे ही ( रूप ) पापों को छोड वै । वेणुबन १२ ४-पाणिम्हि चे दणो नास हय्य पाणिना विनं । नावणं विसमन्वेति नस्यि पार्षे अकुष्बतो ॥६॥ (पाणौ चेद् व्रणो न स्याद् हरैव पाणिनां विषम् । ला भणं विषमन्वेति, नास्ति पापं अकुर्वतः ॥ ९ ॥ अनुवाद–पद् िइयमें घाव न थे, वो हाथसे विषफो छे से (क्योंड्रि) घाव(=अग }-रहित ( शरीरमें ) विष नहीं लगता ( इसी प्रकार ) न करनेवाछेको पाप नहीं लगता । ५८] धम्मपदं १११ जैतवन कोक (छत्तैका शिकारी ) १२१–यो अप्पदुवम्स नरस्स दुस्सति शुद्धस्स पोसस्स अनझणस्स । । तमेव बालं । पच्वेति पापं, सुरु मो रजो पबाितं 'व खित ॥१०॥ (थोऽलङथाय नराय दुष्यति शुद्धय पुरुषायऽतङ्गणाय । तमेव बालं प्रत्येति पापं, स्मो रजः प्रतिवातमिव क्षिप्तम् ॥१०॥ अनुवाद--ओ परहित शुब निसंछ पुरुषको दोष लगाता है, बसी अज्ञको ( उसका ) पाप शेटकर लगता , ( जैसे कि ) सूक्ष्म धूलिको हावाके आनेके रूख फंकनेसे ( यह क्रनेवाले पर पड़ती है )। ( माणिकारकुपग ) तिस्स ( पैर ) १२६-भमेके उप्पजन्ति निरयं पापकम्मिनो । स्मगं सुगतिनो यन्ति, परिनिब्बन्ति अनास्मा ॥११॥ (गर्भमक उत्पद्यन्ते, निरयं पापकर्मिणः । स्वर्ग' सुगतयो यान्ति, परिनिर्वान्त्यनास्रवाः ॥ ११ ॥ अनुवाद--—कोही (पुरुष) गर्ममें उत्पन्न होते हैं, ( कोई ) पाप- कर्ता नरफमें ( जाते हैं ), (कई ) मुगतिवाळे (पुरुष) स्वर्गको जाते हैं, (और चित्तके ) मकौमै रहित (पुरुष) निर्याणकं प्राप्त होते हैं। ९१३ ॥ पापवर्ग [ ५९ ३ भिश्च बैतवन १२७-ण अन्तलिखे न समुद्वमन्ते न पञ्चतानं विवरं पविस्स । न विजती सो जगतिप्पदेसो यत्यखितो मुञ्चेय्य पापकम्मा ॥ १२॥ (नान्तरिक्षे न समुद्रमध्ये न पर्वतानां विवरं प्रविश्य । न विद्यते स जगति प्रदेश यत्रस्थितो मुच्येत पापकर्मणः ॥१२) अनुवाद आकाशमें ण सप्तबके मध्यमैं न पर्वतोंके विंवमें प्रवेश कर--संसारमैं कोई स्थान नहीं है, जहाँ रहकर-पाप कसके ( फलसे ) ( प्राणी ) यच सके । कपिछयस्तु ( म्यभधाराम ) सुष्टुव (शाक्य ) १२८– अन्ततिमखे न समृद्दमन्दं न पवतानं विवरं पवित् । न विजती सो जगतिप्पदेसो यथतिं न प्पसहेय्य मच्चू ॥ १३॥ ( नान्तरिक्षे । मुमध्ये न पर्वतानां विवरं प्रविश्य । स विद्यते स जगति प्रदेश यत्रस्थितं न प्रसहेत स्मृयुः ॥१३ ) अनुवाद--- आकाशी ०–जहाँ हनैवीको मृत्यु न सतावे । ३-पापवर्ग समाप्त १०-दण्डवग्गो लेतवन छब्यग्गिय (भिक्षुओंग ) १२६-सते तासन्ति दडम्स सन्ने मायन्ति मञ्चुनो । अतान उपमं कृत्वा न इनेय्य न घातये ॥१॥ ( सर्वे त्रस्यन्ति वुडात् सर्वे विम्यति मृत्योः । आत्मानं उपमां कृत्वा न हन्यात् न घातयेत् ।१ ) अनुवाद-शुण्ठे सभी डरते हैं, वुड्युसे ऽभी भय खाते हैं, अपने समान ( इन बातोंको ) जानफ़र में मारे ग मारनेकी प्रेरणा करे । चतवन छष्वाग्गिय (भिश्च ) १३०-सने तसन्ति दण्डस्स सब्बेर्स मीवितं पियें। अतानी उपमं वा न इनेय्य न घातये ॥२॥ ( सर्वे प्रस्यन्ति दण्डात् सर्वेषां जीवितं प्रियम् । आत्मानं उपमां कृत्वा न इन्यात् न धातयेत् ॥ ) अनुवाद--भी दण्डसे डरते हैं, सयको जीवन प्रिय , (इलें) अपने ससाग जानकर न आटे न आरमैकी भेरणा करे । ६०] १०१६ ॥ दुण्डघग्गो [ ६: जैवन बहुतसे कड़के १३ १-मुखकमानि भूतानि यो दण्डेन विहिंसति । अतनो सुखमेसानो पेञ्च सो न तभते सुखं ॥३॥ (सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिनस्ति । आमवः सुखमन्विष्य मेस्य च न लभते सुखम् ॥२) १३२-मुखकामानि भूतानि यो दण्डेन न हिंसति । अत्तनौ सुखमेसानो पैच्च सो लभते सुखं ॥ ४॥ (सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन स हिनस्ति । आत्मनः सुखमन्विष्य प्रेत्य स लभते सुखम् Iष्ट ) अनुवाद-सुख चाहनेवाळे प्राणियों, अपने पुत्र की साहसे जो दण्ड से मारता है, वह सरकर सुख नहीं पाता । सुन्न चाहनैवाळे भाणियोको, अपने सुख की चाहसे जो दुण्डसे नहीं मारता, यह अरफार सुख प्राप्त होता है। कुण्डधान ( थेर) १३ ३-मा वोच फर्मं कञ्चि चुक्ता पटिवदेय्यु तं । दुक्खा हि सारम्मकया पटिदण्डा फुसेट्यु तं ॥३॥ (मा चोचः परुषं किञ्चिद् उक्ताः प्रतिवदेयुस्त्वाम् । दुःखा हि संरम्भकथाःप्रतिदण्डाः स्पृशेयुस्स्वाम् ॥५) १३४-स चे नेरेसि अत्तानं सो उपहतो यथा । एस फ्तोसि निब्बाणं सारम्भो ते न बिज्जति ॥६॥ ६२] धम्मपदं [ १०l% ( स वेतू नेरयसि आत्मानं कांस्यमुपहतं यथा। एष प्राप्तोऽसि निर्वाणं संरम्भस्ते न विद्यते ।) अनुवाद कठोर वचन च योछ, योजनेपर ( दूसरे भी वैसे ही ) तुम्हें योलेंगे, दुर्वचन दुःखदायक ( होते हैं ), ( योछनैसे ) यदळेमें तुम्हें दुण्ड मिलेगा । दूठा कसा जैसे निःशध्द रहता है, ( बैसे ) षट्टि तुम अपनेको (नि.शब्द सूक्त्रो ), तो तुमने निर्वाणको प्रक्रिया, तुम्हारे लिये कछह (=हिंसा ) महीं रही । आखेती ( पूर्वाराम ) विसाखा आदि ( उपासिकार्ये ) १३५–यया दण्डेन गोपालो गावो पाचेति गोचरं । एवं जरा च मुच्चू च आर् पार्वन्ति पाणिनं ॥॥ (यथा वंडेन गोपालो गा भाजयति गोचरम् । एवं जरा च मृत्युद्ययुः आजयतः प्राणिनाम् ॥॥ अनुवाद--जैसे स्वा छाठीसे गायोंको चरागाहमें से बाता है, वैसे ही सुझाषा और सृज्य प्राणियोंकी आयुको ठे जाते हैं । राजगृह ( वैणुषन ) अमगर ( भेत ) १३६-अप पापानि कम्पानि कां बालो न जुति । सेहि कपेहि दुम्पेधो अगिदचे 'तम्पति ॥८॥ (अथ पाणनि कर्माणि कुर्वन् बालो न बुध्यते । स्वैः कर्मभिः दुर्मेधा अग्निदग्ध इव तप्यते ॥८॥ ) अनुवाद-पाय फर्म करते वक्च सूड (पुरुप उसे ) नहीं खाता, पीछे १०१२ ] दण्डवश | ६अ सृद्धि क्षपनै ही कम के कारण आगनै बलैकी भाँति अनुताप करता है । राबर्ड (वेणुबन ) मझनेगर्छन (पैर ) ११७-यो दण्डेन अडेसु आप्टुटेषु दुस्सति । दसन्नमर्मातरं ठानं विप्पमेव निगच्छति ॥६॥ (थो दृष्डेनादण्ठेष्वदुष्टेषु दुष्यति । दशानामन्यतमं स्थानं क्षिप्रमेव निगच्छति ॥२॥ १३८-वेदनं फलसं जानिं सरीरस्स च भेदने । गकं वापि आघावं चित्तक्खे व पापुणे ॥१०॥ ( वैद्यनां परुषां ज्यानिं शरीरस्य च भेदनम् । शुकं वाऽप्याबद्ध बिसक्षेयं घा भाग्नुयात् १० ) १३-जतो वा उपसर्ग अभक्खानं व दारुणं । परिक्खयं व जातीनं भोगानं च पभक्षणं ॥ ११॥ (शजतो वपचगगम्याख्याने वा दारुणम् । परिक्षयं धा शतीनां भोगानां वा प्रभंजनम् ॥११) १४०–अथवस्स अगारानि अम्गी डहति पावको । कायस भेदा दुष्पफलो निरयं सोषपम्जति ॥१२॥ (अथवाऽस्यागाराण्यग्निर्दहति पावकः । कायस्य भेदाद् दुष्पशो विख्यं स उपपद्यते ॥१२॥) अनुवाद—जो वुण्डरहितोंको वृष्वसे ( पीड़ित करता है ) निर्दयों पोप छाता है, वह शीघ्र ही इन स्थानोमॅसे एकको प्राप्त १४ ॥ घस्मर्षे [ १०१४ होता है । कडुची वेदना, हानि, अंगका भंग होना, भारी बीमारी, (या) चित्तविक्षेप (पागल )को प्राप्त होता है। या राजासे खण्डको (प्राप्त होता है।), दारुण निन्दा, जाति वन्धुओंका विनाश, भोगोंका क्षय; अथवा उस घरको अति = पावक जलाता है, काया छोड़नेपर वह दुष्पॅद्धि नर्ममें डरपत्र होता है । बहुमतिक ( मिछ ) x% १- न नग्गचरिया न जटा न पद्मा नानासका थण्डिलसायिका वा । रजोवनल्यै उक्कुटिकम्पधानं सोचेन्ति मञ्चं अवितिएणक्खं ॥१३॥ (न नझचर्या न जटा न पंक नाऽनशनं स्थण्डिलशायिका वा । रजोजलीयं उकुटिकप्रधानं शोधयन्ति मर्य' अवितोणकक्षम् ॥१३॥ अनुवाद–जिव पुरुपकी आकांक्षायें समाप्त नहीं हो गई, उस मनुष्य T की शुद्धि, ग नंगे रहनेछ, म जटासे, न पंक ( रुपैठने ) से, न फाफा (=ठपवास ) करनेले, न की भूसिपर सोनेसे, न धूल रूपैटनेमे, न ठकईं बैठनेसे होती है। सन्तति ( मद्यमाय ) १४२-अलङ्कतो चेपि समं चरेय्य सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी । १०१६ ] चण्डवम् | ६५ सब्बेषु भूतेषु निधाय दण्डं सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खू ॥१४॥ (अलंकृतोपि शमं चरेत् शान्तो दान्तो नियतो ब्रह्मचारी । सर्वेषु भूतेषु निधाय दण्डं स ब्राह्मणः च श्रमणः स भिक्षुः ॥१४) अनुवाद--अनूकृत रहते भी यदि वह शान्त, दान्तवियमतत्पर, ब्रह्म चारी, सारे प्राणियोंके प्रति वंशत्यागी है, तो वही आक्षण है, वही अरुण (=संन्यास ) वही भिक्षु है। पितिक (थेर) १४३–हिरीनिसेधो पुरिलो कोचि लकस्मिं विशति । यो निन्दं अष्पघोषति अस्सो भदो कक्सामिव ॥१५॥ (होनिषेधः पुरुषः कश्चित् लोके विद्यते । यो निन्दां न प्रबुध्यति अश्वो भद्धः कशामिव ॥१५ ) अनवाद---कौफमें कोई शुरूष होते हैं, जो ( आपने ही ) या करके निपिख (कर्म) को महीं करते, जैसे उत्तम धोखा कोरे को नहीं खह सकता, वैसे ही वह निन्दाको महीं सह सकते । १४B-अस्सो यथा भद्रो सानिविवे आतापिनो संवेगिनो भवाय । सद्धाय सीलेन च वारियेन-च समाधिना धम्मविनिच्चयेन च । ६६ ॥ धम्सपी [ १०१७ सम्पन्नविज्ञाचरणा पतिसता पहस्सथा दुक्खमिदं अनप्पकं ॥ १६॥ (अश्वो यथा भद्रः कशानिविष्ट आतापिनः संवेगिन भवत । श्रद्धया शीलेन च धीर्येण च समाधिना धर्मविनिश्चयेन च । सम्पन्नविद्याचरणाः प्रतिस्मृता। प्रहास्यथ दुलमिदं अनल्पकम् ॥१६) अनुवाद-झोडे प उन्हात धोपेकी भाँति, उद्योगी, ग्लामियु ( वेगवान) हो श्रद्धा, आचारवीर्य, समाधि, और धर्म निश्रेयसे ४क ( या ), विया और आचरणसे समन्वित हो, दौड़कर इस महान झुख(राशि ) को पार कर सकते हो। १४५-उदकं हि नयन्ति नेतिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं । दानं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति सुब्वता ॥ १७ (उदकं हिनयन्ति नेतृकाःइषुकारा नमयन्ति तेजनम् । दाहं नमयन्ति तक्षका आत्मानं वमयन्ति सुव्रताः ॥१७) अनुवाद--हरवाठे पानी केजाते हैं, बाण यनानेवाले बाणको ठीक करते हैं, यदुई झकरीको ठीक करते थे, सुन्दर बनवा अपने दमन करते हैं । १०-दण्डवर्ग समाप्त ११–जरावग्गो जेलबर्न विशाखाकी गिनी ११६-कोलु हासो किमानन्दो निच्वं पल्लतिते सति । अन्धकारेन ओनज पदीपं न गवेस्सय ॥१॥ ( को छु हासः क आनन्दो निस्यं प्रज्वलिते सति । अन्धकारेणाऽधनद्धः भवीषं न गवेषयथ ॥१) अनुवाद इव निंद्य ही ( आर्ग ) आछ रही हो, तो था हँसी है, । मया आनन्द है ! अंधकारसे घिरे शुम पकको (क्यों) गह डूबते हो ? सिरिभा रराजगृह ( वेणुबन ) १४७–पस्स चित्तकतं विश्वं अस्कार्यं समुस्सितं । आतुरं बहुसङ्गपं यस नत्थि ध्रुवं ठिति ॥२॥ (पश्य चित्रकृतं विवें अकायं समुच्छुितम् । आतुरं बहुसंकटं यस्य नास्ति ध्रुवं स्थिति ॥२ ) [ ६७ ६८] धम्मपदं [ १५५ अनुवाद–द्वेस्रो विचित्र शरीरको, जो माणसे चूक, भूछा, पीड़ित नाना सकवयोंसे चुका है, जिसकी स्थिति अनियत है। जैतवन उत्तरी (थेरी ) १४८–परिनिण्णमिदं रूपं रोगनिङ पभङ्गुरं । भिक्जती प्रतिसन्देहो मरणन्तं हि जीवितं ॥३॥ (परिजीर्णमिदं रूपं रोगनीडं प्रभंगुरम्। भिद्यते पूतिसन्देहो मरणन्तं हि जीवितम् ) "अनुवाद-यह रूप जीर्ण शीर्णरोगका ध, और भंगुर है, सब कर वेह भन्न होती है, जीवन मरणान् जो ठहरा। R अधिमान ( भिक्षु) ४४६ eन्यानिमानि अपत्यानि अलावूनेव सादे । कापोतकानि अदीनि तानि दिवान का रति ॥३४॥ ( यानीमन्यपथ्यन्यछाखूनीव शरदि । कापोतकान्यस्थीनि तानि दृष्ट्वा का रतिः ।) अनुवाद--रवं काली पष्य कीी भाँति ( फेंक दी गई ) या फबूतरोंकी सी (सफ़ेद रेगई) हड्डियोंको देखकर किस को इस (शरीरमें ) प्रेस होगा ? रूपनन्दा (थेरी ) १५०-आीनं नगरं कतं मंसलोहितलेपनं । यय जरा च मञ्चूच मानो मक्खो च श्रोहितो ॥१॥ चतवन १ शt७ ॥ जरावस्मो [ ६९ ५॥ (अस्थ्नां नगरं कृतं मांसलोहितलेपनम् । यश्र जरा च मृणुश्व मानो प्रझयावहितः ।) अनुवाद--इङियोंका (एक) नगर (=गढ ) बताया गया है, जो मॉस और रक्तसे कंपा गया है, जिसमें जरा, और भ्रूयु, अभि ॐ ज्ञान और शाह छिपे हुये हैं। जैवन भाछिका देवी १११-जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता अथो सरीरम्पि जरं उपेति । सतं च धम्मो न जर् उपैति सन्तो ह वे सभि पवेदयन्ति ॥३॥ (जोऍन्ति वै शतरथाः सुचित्रकयशरीरमपि बरसुपेति। लतांच धर्मानजरामुपेति सन्तोहवैद्यः प्रवेक्ष्यन्ति। अनुवाद-शुचित्रित रालरथ भी पुराने ४ जाते हैं, और शरीर भी जराको प्राप्त होता है, (किंतु ) सवन धर्म (=पुण) जराको नहीं प्राप्त होता, सन्त जल सत्पुरुषके वामें ऐसी कहते हैं। जेतुबन ( छाछ ) उदायी ( पेर) ११२-अष्पसुतायं पुरिसो बलिवर्लोब जीरति । मंसानि तस्स वहन्ति पब्ला तस्स न बड्इति ॥७॥ (अल्पभृतोऽयं पुरुषो बलीवर्दे इव जीर्यति । मसानि तस्य बर्द्धन्ते प्रशा तस्य न बर्द्धते ।) ७० धभप्रद [ ११३० अनुवाद---अपघृत (=अशनी ) पुरुप बैछकी भाँति जीर्ण होता है। उसका भाँस ही देता है, अक्षा नहीं धती । ११३–अनेकलातिसंसारं सन्धावसं अनिष्चिसं । गइकारकं गवैसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुर्न ॥८॥ (अनेकजातिसंसारं समधाविषं अनिविशमानः । गुइकाकं गवेपयन्, दुख जातिः पुनः पुनः ॥८) ११४-गहकारक | दिवोसि पुन गेहं न काहसि । सव्वा ते फासुका भग्गा गझटं विसङ्गितं । विपङ्कारगतं चित' तहानं खयमन्फगा ॥३॥ (ग्रुइकारक, व्यूोऽसि पुनर्गेहं न करिष्यसि । सर्वास्ते पार्सिवका भन्ना ग्रचक्कुटं विखंस्कृतम् । बिसंस्कारगतं चित्रं तृष्णानां क्षयमभ्यगात् ॥२) अनुवाद-बिना रुके अनेक जन्म तक संसारमें देत रहा। (इस काया रूपी ) कोठरीको थनानेवाले (=गृहकारक ) को खोजते पुन पुनः दुभत्र ( - सय ) जन्म में पता रहा। हे गृहं कारक । ( अय ) सुने पहिचान लिया, ( अय ) फिर घर नहीं बना सकेगा । तेरी राभी कड़ियाँ भन्न हो गया, गुका शिष्पर भी निर्बल हो गया। सरकाररहित धिताले सृष्णका क्षय हो गया। वाराणसी (कापिषतन ) महाधन सेठका सूत्र १५१५-अचरित्वा ब्रह्मचर्यं अलद्धा यो वने धनं । जिणणोंचा'व खायन्ति खणमच्चेष पङले ॥१० जवाबम [ ७१ ११४ ] (अचरित्वा ब्रह्मचर्यं अळकथा यौवने धनम् । ओणंॐच इबक्षीयन्ते दोषमत्स्थ इव पवळे ।१०) १५३-अचरित्वा ब्रह्मचरियं अलद्धा योज्मणे धनं । सेन्ति चापातिवीणा' पुराणानि अनुत्थानं ॥११॥ (अचरित्वा ब्रह्मचर्यं अलगवा यौवने धनम् । शेरते चापेऽतिीण ) इत्रपुराणान्यिकृतवन्तः ॥११॥ अनुवाद-अद्ध”को बिना पाछन क्रियै, जधानीमें घनफ बिना कसाथै, (पुरुष) मत्स्यहीन अछाशयमैं खुढे कैच पक्षीसे न पड़ते हैं। . ११-परावणं समाप्त १२–अत्तवर्गो बोधि राजकुमार सुशुमारगिरि ( भैसकळवन ) ११७-भत्तानं चे पियं बब्लार क्षय्य तं सुरक्खितं । तिरुणभव्जतरं यामं पटिजग्गय्य पण्डित ॥१॥ (आल्मान चेत् मियं जानीयाद् स्नेतुं सुरक्षितम् । त्रयाणामन्यतमं यामं प्रतिजागृयात् पण्डितः ।। ) अनुवाद--अपनेको यदि प्रिय समझा है, जो अपनेको सुरक्षित रखना चाहियै; पडित ( जन ) (ती) तीनों याम (=पह) में से एकमें जागरण गरे। जैतबन ( शाश्यपुत्र ) उपनन्द ( पेर) १५८-भत्तानं एव । पठमं पटिरूपे निवेसये । अयब्लमनुज्ञासेय्य न किलिस्सेय्य पण्डितो ॥३॥ (आत्मानमेव प्रथमं प्रतिरूपे निवेशयेत् । अथान्यनुशिष्यान् न क्लिश्येत् पण्डितः |श) ७२ ] १ २४ ॥ अवगो [ ०३ अनुवाद-पहिले अपनेझ ही उचित ( काम में लगावै, (फिर ) । यदि दूसरेको उपदंश झरे, ( ते ) पंडित बळेशको न आस होगा । जैवन ( अम्यासी ) तिस्स ( पैर ) १५६–अत्तानब्वै तया कयिंरा । यथब्लमनुसासति । सुदन्तो वत दम्मेय अत्ता हि किंनर दुर्लभो ॥३॥ ( आत्मानं चेत् तथा कुर्याद् यथाऽन्यमनुशास्ति । सुदान्तो घत दमयेड्, आत्मा हि किळे दुर्दमः ।। ) अनुवाद--अथनेक वैसा बनावैजैसा दूसरेको अर्शसन करना है, ( पहिले ) अपनेको भली प्रकार श्वसन करे वस्तुतः अपनेको दमन करना (ही ) कठिन है। जैतवन कुमार कस्सपकी माता ( पेरौ ) ११०-अता हि आत्तनो नायो को हि नायो परो सिया । अत्तनाव मुदत्तेन नाथं लभति दुल्लभं ॥ ४॥ (आरमा' हि आत्मनो नाथः को हि नाथः पर स्यात्। आत्मनैव सुदान्तेन नाथं लभते दुर्लभम् ।। )

  • भगवद्गीता ( अध्याय ६ मैं

डरेशमनारमान नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव आस्मनो बन्दुरात्मैव एिरास्मन• ॥४॥ बन्धुरामामनस्तस्व यैनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शुभुत्वे वर्तेतारमेव शत्रुघव ॥“ ७७ घरषद् [:२६ अनुवाद-(पुरुप) अपने ही अपना माछिक है, दूसरा कोन मायिक हो सकता है, अपनेको भली प्रकार सन कर छेने पर (वह एक) दुर्जेस आठिकको पाता है। जेवण महाकाछ ( उपासक ) १११–अत्तना'व कतं पापं अक्तजं अत्तसम्भवं । अभिमन्यति दुन्मेषं वजिरं ’स्ममयं मणिं ॥१॥ (आत्मनैव कृतं पापं आत्मनें आत्मसम्भवम् । अभिमथ्नाति दुर्मेधसं धनुमिवाश्ममयं मणिम् ॥५) अनुवाद अपनेसे जानाअपनेसे उत्प, अपने क्रिया प, (फरले मी ) डॅद्धिको पाषाणसय वग्नमणिी ( चोटी ) भाँति मन्थन (=पीडित ) करता है। १६२ यस्सचन्तदुस्सल्यं मानुवा सालमिवोततं । करोति सो तयतानं यथा 'नं इच्छती दिसो ॥६॥ (यस्याऽत्यन्तदौश्शील्यं मालुवा शालमिवाततम् । करोति स तथामानं यथैनमिच्छति द्विषः | ) अनुवाद--आखुवाच 'सै वेष्ठित शा( पृक्ष )ी ऑति जिसका द्रा चार फैला हुआ है, वह अपनेको वैसा ही कर छेता है, जैसा कि उसने खु चाहते हैं । • माझ्या एक ठता है, जो जिस पर बदती है८५ वर्षv पानके आरसे डहै तौल डाऊ है। १२९ ॥ असघग्गो [ ७५ राजणूए ( वेणुबन ) संघर्मे सुटबे समय १६ ३-शुक्रानि असाधूनि अत्तनो अहितानि च। यं ये हितच साधुश्च तं वे परमदुक् ॥ ॥७ (सुकवण्यसाधून्यात्मनोऽहितानि च। यद् वै हितं च €धु च तद् वै परमदुष्करम् ॥७॥ अनुवाद-अनुचित और अपने कियै अहित ( कमका करना ) सुकर है (लेकिन) बो हित और उचित है, उसका करना परम दुष्कर है। काळ (येर) १६ ४-१ो सासनं भरतं अपियानं धम्मजीविनं । पटिकोसति दुम्मेधो दितुिं निस्साय पापिकं । लानि कठकस्सेव अतहब्वाय फुङति ॥८॥ (यः शसनभर्हतां आर्याणां धर्मजीविनाम् । प्रतिश्यति दुर्मेधा द्वैि निश्चित्य पापिकाम्। फलानि काष्ठकस्यैवात्महत्यायै फुलति ॥८॥ ) अनुवाद--धर्मजीवी, आर्ये, अर्हतोंके शासन(=घर्छ )को, जो झुद्धि झुरी इक्षिसे जिम्दु है; वह बाँसके फशको भति अपनी हत्याके लिये फुकता है । जैतवन ( चूळ) काल ( उपासक) १६५–अत्तना 'घ कतं पापं अत्तना संकलिस्सति । अतना अकतं पापं अतना 'व विमुज्झति ॥ सुद्धि अनुद्धिश्चत नब्ब अञ्चं विसोषये ॥३॥ ७६ ] धम्मपदं | १ २१० (आरमनैव कृतं पापं आत्मना संक्लिश्यति । आत्मनाऽकृतं पापं आत्मनैव विशुष्यति । शुद्धधगुडी मल्यासमं नाऽन्योऽन्यं विशोधयेत् ।) अपनेसे क्रिया पाप अपने ही मशिन करता है, अपने पाप न करे तो अपने ही शुद्ध रहता है; द्धिआश्चद्धि प्रत्येक ( आदमी )को अलग अलग है, दूसरा (आदमी )दूसरेको शुद्ध नहीं कर सकता । जैतवन अन्तदत्थ (थैर ) १६६-अतदत्यं परल्येन बहुनाऽपि न हापये । अत्तदत्यमभिख्याय सद्यपपुतो सिया ॥१०॥ (आत्मनोऽर्थ परार्थन बहुनाऽपि न हापयेत् । आत्मनोऽर्थमभिज्ञाय सदर्थग्रसितः स्यात् ॥१०) अनुवाद-परायैके यहुत हिनके लिये भी अपने हितकी हानि न करे अपने तक जान कर सच्चे हितमें लगे। १२-आत्मवर्ग समाप्त १३-लोकवग्गो कोई अल्पवयस्क भिक्षु ११७-हीनं धम्मं न सेवेच्य, पमाढेन न संवसे । मिच्छद्भिर्दिछ न सेवेष्य न सिया लोकवड्रनो ॥ १॥ (हीनं धर्म न सेवेत, प्रमादेन न संवसेत्। मिडटिं न सेवेत, न स्यात् लोकबद्धेन ॥१) अनुवाद--याप(=नीच धर्मे )को न सेवन करे, न प्रवृत्ते लिहा डोवे, की धारणाओं का सेवन करे, ( आसीको ) छक (=जन्म मरण )-अर्धक नहीं बनना चाहिये। संवत कपिलवस्तु (थभषाराम ) १६८-उतिठे नष्पमज्जेय्य घमं सुचरितं चरे । धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च ॥२॥ ( उत्तिष्टेव् न प्रमाद्ये धर्मे सुचरितं चरेव। धर्मचारी सुखं शेतेऽस्मेिं छोके परत्र च यश ) ७७ ७८ धम्मपदं [ १३५ १६७-घन्मं चरे सुचरित न तं दुश्चरितं चरे । धम्मचारी मुखं सेति अभिमं लोके परम्हि च ॥३॥ (धर्म चरेत् शुचरितं न तं दुश्वरितं चरेत् । धर्मचारी सुखं शेतेऽस्लिम् लोके परत्र चे ॥३) अनुवाद--उत्साही बने, आरुसी न यने, सुचरित धर्मका आचरण रे, धर्मचारी ( पुरुष ) इख कोक और परछमें सुख पूर्वेक सोता है। सुचरित धर्मका आचरण करे, छुवरित फर्म (=धर्मे ) का सेवन न करे । धर्मचारी (पुरुप )० जैतवन पाँच सौ शानी ( मिश्च ) १७०–यथा बुब्बूलकं पस्से यया पस्से मरीचिकं । एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराला न पतति ॥५॥ ( यथा वुलुदकं पश्येद् यथापश्येमरीचिकाम्। एवं लोकमवेक्षमाणं मृच्युरालो न पश्यति ॥ ) अनुवाद-जैसे बुडीको देखता है, जैसे ( मह)मरीचिकाको देखता है, छकको घेरे ही (जो सुरूप) देता है, उसकी ओर यमराज ( आंख उठाकर ) नहीं देन्न सकता। राजगृह (वेणुवन ) १४१-एथय पस्सयिमं लोकं चित्त' रानपयूपर्ण । थत्य वाला विसीदन्ति, नथि सद्म विज्ञानतं ॥१॥ (एनत पक्यतेमं लोकं चित्रं राजपथोपाम् । यश बाळ विषीदन्ति नास्ति संगो विजानताम् ।) अभय राजकुमार १३% ॥ लोवरण [ ७९ ॐ अनुवादआषा, विचित्र राजपथके समान इस छोकको बेल, जिस्में भूळ आखक होते हैं, यानी जन आसक नदी होते । जैतवन सम्युक्तानि ( पैर ) १७२–यो च पुब्वे पमजित्वा पच्छ सो नष्पमलति । स'मं लोकं प्रभासेति अब्भा मुत्तेव वन्दिमा ॥६॥ (थश्च पूर्वी प्रमाद्य पश्चात् न न प्रमाद्यति । स इमं लोकं प्रक्षाल्ययैश्चान्मुक्त इव चन्द्रमा ॥ ६ ॥ अनुवाद—जो पहिले शुरू कर फिर धूळ नहीं करता, वह मैघसे उन्मुक चन्द्रमाकी ऑति इस लोकको प्रकाशित करता है । अलिशाल (थेर ) १७३–यस पापं कतं फम्भं कुसलेन पिचिय्यति । सोमं लोकं पभासेति अब्भा सूतोव चन्दिमा ॥७॥ (यस्य पापं कृतं कर्म कुशलेन पिधोयते । स इमे लोक अभासयत्यभ्रान्सुक इव चन्द्रमा ॥ ७ ॥ अनुवाद--- अपने किये पाप कर्माको शुष्यसे ढक देता है, वह मेघसे उन्डु० । आळवी रंगरेज, कन्या १७ ४–अन्वभूतो अयं लोको ततुकेय विषस्सति । सङन्तो जालमुत्तो'ख अप्पो सम्गाय गच्छति ॥८॥ (अधभूतोऽयं लोक, नुकोऽत्र विपश्यति । शकुन्तो जाल्मुक्क इवापः स्वर्गाय गच्छति ॥ ८॥ ) ४७ [ •B] अनुवाद--ग्रह छक अन्धे जैसा , यहाँ देखनेवाळे थोडे ही हैं, बाकमे मुळ पक्षीकी भाँति विरले ही स्वर्ग जाते हैं। बैतवन तस भिक्षु १७५–हंसादिष्वपये यन्ति आकासे यन्ति इद्धिया। नीयन्ति धीरा लोकम्हा नेत्वा मारं सवाहिणेि ॥६॥ (हंसा आदित्यपथे यन्ति, आकाशे यन्ति ऋद्धिया। नीयन्ते धीरा लोकान् जित्वा मारं सवाहिनीकम् ॥ ९ ॥) अनुवाद---इंस सुद्दीपय (=आकाश)में जाते हैं, (योग) यद्धि-यछ} से आकाशमें जाते हैं, धीर (पुरुष) सेना-सहित सारको पराजित कर कोकमै ( निर्वाणको ) ठे जाये जाते हैं। चिंचा ( माणविका ) १७६-एकं धम्मं अतीतस्स मुसावादिस्स जन्तुन । वितिएपरलोकस्स नयि पापं अकारिणे ॥१०॥ (एकं धर्ममतीतस्य मृषावादिनो जन्तोः। चिंतीर्णपरलोकस्य नास्ति पापमकार्यम् ॥ १० ॥ अनुवाद-यो धर्मको अतिक्रमण कर चुका, जो प्राणी पाषादी , जो परतो (का स्याल ) छौह चुका है, उसके द्वियें कोई पाप अरणीय नहीं। तमन ( अयुक्त दान ) १७७-न [ वे ] हरिणा देवलोकं वनन्ति चाला ह वै न प्पासंसन्ति दानं । १३॥१२ ॥ लोकवसौ [ ८१ धीरो च दानं अनुमोदमानो तेनेव स होति सुखं परत्य ॥११॥ ( [ वै कदर्या देवलोकं व्रजंति आला ह वै न असीति दानम् । धील दानं अनुमोदमानस्तेनैव स भवनि सुखं परत्र ॥ ११ ॥ ) अनुवाद--छूत्र घेवलोक नहीं खातेसूख ही उनकी प्रशंसा गर्दै करते, धीर दासका अनुमोदुल कर, उसी( कर्म )को पर ( क )भं सुत्री होता है। जतवाद अनाथपिण्डिकके पुत्रका मरण १७८–पथष्या एकन्जेन समगस्स गमनेन वा । न्बलोकाधिपत्येन सोतापत्तिं वरं ॥१२॥ ( पृथिव्या एकराज्यात् स्वर्गस्य गमनाद् धा । सर्वलोकाssधिपत्या वस्त्रोतआपतिफी घरम्॥ १२) अनुवाद--( सारी ) पृथिवी अकेला राजा होनैठे, या स्वर्गकै गमनळे, ( या ) सभी छकोंके अधिपति होनेसे भी स्रोतपत्ति* फळ ( ) सिलना ) दोड है । १३-लकन समाप्त

  • जे पुरुष निवण-गामी मागेपर इस प्रकार आख्द हो जाता है,

कि फिर यह उससे भ्रष्ट नहीं आ सकता, उसै स्रोत-आपत्र (=भारमें पद्म ) कहते है। इसी पदके लाभ स्त्रोत-आपलि-फल कहते हैं । १४–बुद्धवग्गो उरुवे ( बोधिमड ) मागन्द्यि ( मावण ) १७६–यस जित' नावजीयति जितमन्स नो याति कोचि लोके । तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन' नेस्सय ? ॥१॥ (यस्य जितं नावजीयते जितमस्य न याति कविलोके । तं वृद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेप्यथ ? ॥१ ) १८०-यस्स जालिनी विसतिका तण्हा नत्यि कुहिचि नेतवे । तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेस्सथ ? ॥३॥ (यस्य जालिनी विपार्मिक तृष्ण नास्ति कुत्रचित् नेतुम् । तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नैष्यथ ? काश) ४२ ॥ | } सुबघा [ ८३ अनुवाद–जिसका बीता वैजीता नहीं किया जा सक़ता, जिसके जीते ( राग, कप, मह फिर ) नहीं लौटने, उस अषद (=स्थान रहित ), अनन्तगोचर (=अनन्तक देवनैवारें ) शुद्धको किस पथसे आप्त करोगे १ जिसकी जाल फैशनेवाली विष रूपीदृष्ण कहीं भी ठेने कायक नहीं रही; बस अषट् ० संकाय नगर देव, मनुष्य १८१ध्ये माणसुता वीरा नेवखम्सूपसमे रता । देवापि तेसं पियन्ति सम्बुद्धानं सतीमतं ॥३॥ (ये ध्यानमसिता धीरा नैष्कम्यंपशसे रताः। देवा अपि तेषां स्थूयन्ति स्मंसुद्धानां स्मृतिमताम् ॥३) अनुवाद—जो धीर ध्यानमै छ, विंष्कर्मता और उपशमने त हैं, इन स्थतिभान् (=सबैन ) छबी ठेवता भी स्पृहा (होड ) करते हैं। परकपा ( नागराज ) १८९/किच्चो मनुस्सपटिकाभो किच्चें मानं जीवितं । / किब्जं सद्धम्मसवर्ण किच्छ क्षुद्धनं उपावे ॥४॥ (छब्यूमनुष्यप्रतिलाभः कृष्छु' भयनां जीवितम्। अनुवाद--अनुष्य( योनि )का आस कठिन है, मनुष्यका जीवन ( मिलना ) कठिन , मुख धर्म सुननेको सिकना कठिन है युद्ध (=परम शाबियों )का जन्म कन है । ८४ ॥ धम्मपट्टी [ १४७ बेतुबन आनन्द (येर )का मक्ष १८३-सब्वपापस्स अकरणं कुसलस्य उपसम्पदा । स-चत्तपरियोपनं, एतं बुद्धन ‘सासनं ॥१॥ (सर्षपापस्याकरणं कुरालस्योपखम्पदा। स्वचितपर्यंवदापनं एतद्बुद्धानां शासनम् ५ ) अनुवाद--सारे पापोंका न करना, पुण्योंका संचय करना, अपने चित्रको पशुिछ करत, यह है बुवोंकी शिक्षा । आनन्व (घेर) १८४-खन्ती परमं तपो तितिक्खा निर्वाणं परमं वदन्ति बुद्धा । नहि पव्वजितो परुपघाती समणो होति परं विहठयन्तो ॥६॥ (यान्ति 3 परमं तपः तितिक्षा निर्वाणं परमं वदन्ति शुद्धः । नहि प्रव्रजितः परोषघातीभ्रमणोभवति परं विवेष्टयन् ॥२) १८१-अनुपवादो अनुपघातो पातिमोक्खे च संवरो । मतङ्गता च मत्तमिमं पन्तञ्व सयनासनं । अविचिते च आयोगो एतं बुझान सासनं ॥७॥ (अनुपवादोऽसुपघात आतिमोहे च संचरः । मात्रासुता व भक्के प्रान्तं च शयनासनम् । अधिचिले बायोग एतद् क्षुद्धानां शासनम् ।। ) १९ ॥ दुखवणे [ ४५ अनुवाद--झमा है परम तप, और तितिक्षा सुख निर्वाणको पर्स (=उत्सस ) थतकाते हैं, दूसरेका धात फरनेधाका, दूसरे को भीठित करनेवाला अन्ननित (=इत्यागी ), असण (–संन्यासी) नहीं हो सकता। निन्दा न करना, बात न करना, अतिमोक्ष (निखनियम, आचारनियस ) द्वारा अपनेको सुरक्षित रखना, परिमाण जानकर भोजन करना, एकान्तमें सोना-बैठना (=शयनासन=निवासगृह), चिसको योगमैं छगन, यह अबोंकी शिक्षा है । ( उदास भिक्षु ) १८६-१ कहापणवस्सेन तिन्ति कामेसु विक्षति । अप्पस्सादा दुखा कामा इति विज्ञाय पण्डितो ॥८॥ (न कार्षापणवर्षेण तृप्तिः कामेषु विद्यते । अल्पास्वादुः कामा इति विशय पण्डितः ८ ) १८७-अपि हिन्वेषु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति । तण्हवख्यरतो होति सम्मासम्बुद्धसावको ॥|६॥ (अपि दिव्येषु कामेषु रतिं स नाधिगच्छति । तृष्णाक्षयरतो भवति सम्यसंखुवुश्रावकः ॥२। ) अनुवाद--यदि रूपयों(=+इषण )की वर्षा हो, तो भी (मनुष्य ) कामे(कुंभोग के दृप्ति नहीं हो सकती । ( सभी ) कास (=ओोग ) अल्फ्स्वाद्(और ) दु:खद हैं, ऐसा जानकर पबित दैवतालके भागोमें भी रति नहीं करता) और सभ्थसंबद्ध (=खुद )का वक (=अनुयायी ) सुधशा को नाश करनेमें लगता है । ८६ ॥ धम्मपदं ( १३ अगिश्च (प्राङ्गण ) १८८८बढं वे सरणं यन्ति पवतानि वनानि च । आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयातज्जिता ॥१०॥ (बटु वै शरणं यन्ति पर्वतान् वनानि । आरामवृक्षचैत्यानि मनुष्या भयतर्जिताः ॥१०॥ दंष्ट-नैतें खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं । नैतं सरणमागम्म सम्बदुक्खा पमुच्यति ॥११॥ नैतत् खलु शरणं क्षेमं नैतत् शरणमुत्तमम्। नैतत् शरणमागम्य सदुखान्मुच्यते ।१ ) --मनुष्य भयके आरे पर्वतवन, आरास (=बयान ), यूझ, बैत्य (=पौरा ) ( आदिको बेवता मान उनकी ) शहणजें जाते हैं, किन्तु ये शरण मंगळदायक नहीं, ये शरण उलुम वही; (क्योंकि ) इन कारणोंमें जाकर सब दुःबसे सुटकारा नहीं मिछता । चतवन अगिदत (आक्षण ) १६०-यो च दुबइ धम्मश्च सङ्गञ्च सरणं गते। चत्वारि अस्थिसच्वानि सम्मप्पद्माय पस्सति ॥१२॥ (य शुद्धे च धर्म' च संधै च शरणं गतः। वचार्यार्थस्यानि सम्यक् प्रज्ञया पश्यति ॥१ ) -दुक्खं दुक्खसमुष्पादं दुक्खस्स च अतिक्रमं । अरियब'गह्निकं मार्गे दुक्खूपसमगामिनी ॥१३॥ १७६५ ] बुडवो ८७ (दुखं दुःखसमुत्पादं सुखस्य चातिक्रमम्। आर्योषंगिक मार्ग खोपशमगामिनम् ॥१शl ) . ४६२-एतं खो सरणं क्षेमें एतं सरणमुत्तमं । एतं सरणमागम्म सन्वदुक्खा पभुञ्चति ॥ १३॥ (एतत् खलु शरणं क्षेत्रे एतत् शरणमुत्तमम् । एतत् शरणमागम्य सर्वदुखात् प्रमुच्यते ॥ १४ ॥ अनुवादश शुद्ध (=परमभ्नी ), धर्म (=वयज्ञान ) और संघ (=परम्हानियोंके अनुयायियोके समुदाय की शरण था, जो चारों आयेंत्यों को प्रशसे भीप्रकार देखता है। (वह चार मुख्य हैं–(१) , (२)दुखकी उत्पति, (३ ) दुखका अतिक्रमण, और ( , भूख झाशक ) आर्यअगिक मार्गी-जो क़ि सुपुत्रको शमनफरनैकी ओर ॐ जाता है, ये हैं मंगळप्रद शरण, ये हैं उसम शरण, इन शरणोंको पाकर ( मनुष्य ) द्वारे इखों छूट जाता है। चतवन आनन्द (येर )का अक्ष १६ ३-ड़भो पुरिसानब्को न सो सम्वत्य जायति । यथ सो जायती धीरो तं कुलं मुखमेधति ॥ १३

  • दुःख, उसका कारण उसका नाश, और नाशका उपायं---यह बुद्ध

द्वारा आविष्कृत चार उत्तम सच्चाइयाँ हैं। + आर्ष-अद्यागिक मार्ग हैं-डेक धारणा, लोक सकप, औझ बचन, श्रीक कमें, क जीविका, औौक खचौरा, जैक स्टूति, और ठीक । ध्यान धम्मपदं [ १४८ कुंभः पुरुषाजानेय न स सर्बत्र जायते। यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५॥ अनुवाद-कंठचम पुरुष दुर्रम है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह । धीर (पुरुष) जहाँ उपत्र होता है, उस कुछमें सुबकी वृद्धि होती है। जतवन बहुत मिश्र १६४-मुखो बुद्धानं उपपादौ सुख सद्धम्मदेसना । सुखा संघस्स सामगी समगानं तपो मुखो ॥११॥ (सुस्रो ख़ुदानां उत्पादः सुखा सद्धर्मवेशना । सुखा संघस्य सामनी समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६ ॥ अनुवादसुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सचे धर्मका उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है, और सुखदायक है, एकतायुक्क हो तप करना। चार्कािकै समय करसुप इंका सुबर्थे चैस्य १६१-पूज़रहे पृजयतो बुद्धे यदि व सावके । पपञ्चसमतिक्रन्ते तिण्णसोकपरिद्दवे ॥ १७॥ (पुज़ाइन पूजयतो बुझान यदि घा भ्रावकान् । प्रपंचसमतिक्रान्तान् हौर्णशोकपढिवान् ॥ १७ ॥ ६६-ते तादिसे पूनथतो निवृते अकुतोभये । न स पुल्लं संखातुं इमेत्तम्पि केनचि ॥ १८ . १४१४ सुवग [ ४९ ( ताप तादृशान् पूजयतो निर्दूतान् अकुतोभयान् । न शक्ष्यं पुण्यं संख्यातुं पचन्मात्रमपि केनचित् ॥ १८ ॥ अनुवाद-पूजनीय क्रुद्धों, अथवा ( उनके ) अनुगसियों-जो संसार को अतिक्रमणकर गयें हैं, जो शोह भय रकट गये ==ी पूजा, ( या ) चन पैसे चुक औौर निर्भय (पुरुष) की पूजकै, धुण्यका परिमाण "इतना है"-यह नहीं कहा जा सकता। १४–बुद्धवर्ग समाप्त १५-मुखवग्गो शाषय नगर बाति फाइकै उपशमनार्थं १६७-मुसुखं वत । जीवान वेरिनेट अनिो । चेरिनैडु मनुस्सेषु हिम श्रवेरिनो ॥१॥ (सुसुखं बत 1 जीवामो वैरिववैरिणः । घटिं मनुष्येषु विहरामोऽवैरिणः ॥२) १६८-मुखं वत । जीवाम आतुरेषु अनातुरा । आतुरेषु मनुस्मेषु विहराम अनातुरा ॥२॥ (सुसुखं वत ! ओबाम आतुरेष्वनातुराः। आतुरेषु मनुष्येषु विहरामोऽनातुराः ॥श ) १e€-सुमुखं वंत । जीवाम उस्सुकेसु अनुसुका । उसुकेषु मनुस्सेसु विझाम अनुसुका ॥३॥ (सुखं वत !ीयाम उत्सुकेष्वनुत्सुकाः । उरसुपु मनुष्येषु विहराम अनुत्सुकाः १० ॥ ५५ ॥ [ ९१ अनुवाद--वैरियोंके प्रति (भी ) अवैरी हो, अहो ! हस ( कैसा ) सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं, बैरी मनुष्य के बीच अवैरी होकर हल विहार करते हैं । भयभीत अनुव्योमें अभय हो, अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्य के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं। उत्सुकं (=आसक्कों)में उत्सुकता-रहित ३० । पंचखाया (आक्षणमाम, मगध ) २००-सुमुखं वत ! जीवाम येसं नो नस्थि कितनं । पीतिभा मविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥१॥ ( सुखं चत । जीवामो येषां नो नास्ति किंचन । औतिभया भविष्यामो वैवा आभास्वरा यथा ।। ) अनुवाद-जित इस (कोण के पास कुछ नहीं, अझ ! वह हरू कितना सुषसै जीवन बिता रहे हैं। इस आभास्वर देवताओं की भाँति प्रतिभक्ष्य (=औति ही भजन है जिनका) हैं। २० १-जयं वैरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो । उपसन्तो मुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥॥। (जयो वैरं अस्ते दुःखं शेते पराजितः । उपशान्सा सुखं शेने हित्वा जयपराजयौ ॥५ ) अनुवाद-विषय वैरक उत्पन्न करती है. पराजित (पुरुप ) डुपुत्रकी ( नींद ) सोता है ( राग आदि दोष जिलाके) शान्त (हैं, १२ ] धम्मपर्छ [ ७५७ वह पुरुष ) जय और पराजयको छोड़ सुबकी (नींद ) सोता है । कोई उकयो २ ०–नस्यि रागसमो अगि, नत्यि बोलपमो कलि । नथि खन्धसमा दुक्खा नथि सन्तिषरं मुखं ॥६॥ (नास्ति रागसमोऽलि, नास्ति चेपेसमः कलिः । नास्तिस्कन्धसमादुवा, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६) अनुवाद-रागके खाम अलि गहीं, वेपने क्षमान मछ नहीं, ( पाँच) स्कन्धो'के (=मुदाय ) समान हुन नहीं, शान्ति बढ़कर सुख नहीं। आलवी एक खपासक २०३-निघच्घा परमा रोग, सद्वारा परमा दुखा । एतं गत्वा ययाभूत निव्वाणं परमं सुखं ॥॥ (जिघत्सा परमो रोग, संस्कारः परमं द्वमुखम् । एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७) अनुवाद-ष सघले बहु रोग , संस्कार सबसे बड़े क्षेत्र ,

  • रूप, वेदना, सश, सरकार, विशान यह पाँच स्कन्ध हैं । वेदना, सा,

सरकार विशानके अन्दर है । शुधिव, जल, अग्नि, गड दी रूप कष है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विशान स्क है। रूप (=Metter ) और विशान (=nd ) श्रों मेसे सारा ससार बना है। पा७० ] सुखवग्गो [९३ यह जाययथार्थं निर्वाणको सबसे बड़ा सुख ( कहा बाता है )। ( पसेनदि सखराब ) २० ४-आरोग्यपरमा तामा सन्तु परमं धनं । विस्सासपरमा आती निब्बाणं परमं सुखं ॥८॥ (आरोग्यं परमो लाभा, सन्तुष्टिः परमं धनम् । विश्वासः परमा शातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ॥८॥ अनुवदनिरोग होना परम लाभ , सन्तोष परम धन है, विश्वास सबसे बड़ा घन्छ है, निर्वाण परम (=पायसे बडा ) सुना है। , - U वैशी तिस्स (घेर) २०५–पविवेकरसं ( पीत्वा रसं उपममस्स च । ८ निद्रो होति निष्पापो धम्मपीतिरसं पिव ॥६॥

  • (प्रविवेकरसं पीत्वा रसं उपशमस्य च।

निर्वैरो भवति निष्पापो धर्म प्रतिरसं पिवन् ।॥ ) अनुवाद-एकान्त ( चिन्सन )के रस, तथा ढपशस (=शान्ति )के रसको पीकर ( पुरुष ), निडर होता है, (और ) धर्मेका प्रेमरस पानकर निक्षपाप होता है । वैज्ञवमाम ( वेणुग्राम, वैशीलीके पास ) सफ (देवराज ) २०६-साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो । अवसनेन बालानं निश्चमेव मुखी सिया ॥१०॥ १४] धम्मपदं [ १५७२ ( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः । अनेन बालानां नियमेघ सुखी स्यात् ॥१०) २०७बालसंगतिवारी हि दोघमज्ञानं सोचति । दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सर्वदा। ' घोरे च मुखसंवासो मातीनं 'ध समागमो ॥११॥ (बाळसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति। दुखो थालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा। घाश्व सुखसंवासो ज्ञातीनामिव स्समागमः ॥११) अनुवादश्चय (=शब्दुज्यो )का खर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ निवास सदा सुखदायक होता है, के न दुर्लन होनैले ( मनुष्य ) सदा सुखी रहता है। सूखेकी सगतिमें रहने वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, खोंका सद्वास शत्रुकी सरह सवा दुःखदायक होता है, पन्धुओके समागम की भाँति धी”का सहवास सुखद होता है । वैल्बणाम सक (देवराज ) २०८-तस्मा हि धीरं चपब्बञ्च बृहु-सुतं च घोरय्हीतं चतवन्तमरियं । तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं भय नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥११॥ निर्वाणके पथपर अधिवळ रूपठे आरूढ़ स्रौघआप, सशुदागामी, अनागामी तथा निर्माण प्राप्त=अइंट बन चार प्रकारको धुर्को आर्य कहते हैं। १५ २ } सुखवर्णो [ ९५ (तस्माद्धि धीरं च प्राशं व बहुश्रुतं च शुर्यशो ब्रतवन्तामार्यम्। तं तादृशं पुरुषं सुमेधसं भजेत नक्षत्रपथमिव चन्द्रमा ॥१२) अनुवाद--इरिये , आ, यहुद्युक्त, उद्योगी, व्रती, आर्य एवं सुखति स्खपुरुपका चैसेही सेवन करे, जैसे जन्ममा अक्षन्न पथ ( सेवन करता है )। । १५-मुखवर्णं समाप्त १६-पियवग्गो जैतवन तन भिक्षु २०३-अयोगे युज्लमत्तानं योगस्मिन् प्रयोजयं । अत्र्य हिचा पियगाही पिढीतत्तानुयोगिनं ॥१॥ (अयोगे त्रुजन्नात्मानं योगे चायोजयन् । • अर्थं हित्वा प्रिय-श्राव स्पृहयेदात्मानुयोगिनम् ॥१) २१०-मा पियेहि समागच्ब अप्पियेहि कुदाचनं । पियानं अदर्सनं दुक्खं अष्पियानञ्च दसनं ॥२॥ प्रियै समागच्छ, अप्रियैः कदाचन । प्रियाणांडअनै दुखं, अप्रियाण च दर्शनम् ॥२॥ २११-तस्मा पियं न कयिराय पियापायो हि पापको । गन्या तेसं न विज्जन्ति येसं नस्यि प्रियाप्पियं ॥३॥ (तस्मात् प्रियं न कुर्यात् प्रियापायो हि पापकः। अन्याः तेषां न विद्यन्ते येषां नास्ति प्रियाप्रियम् ॥३) ९६ } १५५] षियवग ९७ । प्रमुवाद--अयोग(=अनासकि में अपनेको लगानेवाळे, योग (=आसकि )में न योग देनेवालेअर्थे (=वार्य ) छड प्रियका ग्रहण करनेवालै आमाङ्योगी (पुरुष)ी क्ष करे ( प्रियोंका सँग अत करो, और न कभी अभय ही ( का रंग करो ), फियोका न बँधना दुःखद होता है, और अग्रियोंका बेबना ( सी )। इस्खलिपे प्रिय व वनावे, प्रियका नाश डुरा ( कगता है ); उनके ( विछमें ) गाँठ नहीं पड़ती, जिनके प्रिय अप्रिय नहीं होते। केॐ सुझ्म्य २१२पियतो जायते सोको पियतो जायते मयं । पियातो विन्पमुत्तस्स नथि सोको कुतो भयं ? ॥४॥ ( प्रियतो जायते शोका प्रियतो जायते भयम्। प्रियतो विप्रमुकस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ?ाश्च) अनुवाद-प्रिय ( धन )से शोक डस्पन्न होता है, प्रियसे भय उत्पन्न होता है, नियकि बन्धन )ये जो शुक्क है, ब्ले शोक नहीं है, फिर भय कहॉ ( इौ ) जेनवन विशाखा (उणादिका ) २१३-पेमतो जायते सोको पेमतो जायते भयं । पेमतो विष्नुतस्स नथि सोको कुतो भयं ? ॥१॥ (प्रेमतो जायते शोकः प्रेमतो जायते भयम् । गंभतो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोककुतो भयम् । ९८ ॥ धम्मपदं [ १६८ अनुवाद-प्रेमसे भोक खपल होता , ऐससे भय उत्पन्न होता है, प्रेमसे झुकको शोक नहीं, फिर भय कसे ? वैशी ( कूटागारशण ) लिच्छवि कंग २१४-तिया जायते सोतो रतिया जायते भयं । रतिया विष्पमुत्तस्स नयि सोको कुतो भयं ॥६॥ (रत्या जायते शोको रत्या जायते भयम् । या विश्मुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतोभयम् ॥६) अनुवाद--रति-शाण से शोक उत्पन्न होता हैरति भय उत्पन्न "" जेतुबन अनाधिगन्थकुमार २११-कामतो जायते सोको कामतो जायते भयं । कामतो विन्यमुत्तस्स नस्थि सोको कुत भयं ॥७॥ (कामतो जायते शोकः कामतो जायते भयम्। कामतो विप्रमुख्य नाsस्ति शोकः क्षुतोभयम् ? ॥७) अनुबाद गर्भस शोक उत्पन्न होता है० । कोई ग्रहण २१६-तण्हाय जायते सोको तण्हाय जायते भयं । तण्हाय विमुत्तस्स नथि सोको कुतो भयं ?॥८॥ (तृष्णाया जायते शोक् । तृष्णाया जायते भयम् । तृष्णाया विप्रमुकस्य नाऽस्ति शोकाकुतो भयम १॥८) १६११ ॥ [ ९९ अनुवादळणसे शोक उत्पन्न होता है० । राजगृह ( वेणुवन) पाँच सौ बाळक २१७ सीलवसनसम्पन्नं धम्मयं संख्याविनं । अत्तनो कम्म छुष्वानं तं जनो कुरुते पिथं ॥६॥ (शीलद्दर्शनसम्पन्न' धर्मिष्ठ सस्यवादिनम् । आत्मनः कर्म कुर्वाणं तं जनः कुरुते प्रियम् ॥९। ) अनुवाद जो औछ (=आचरण ) और डीन (विया से सम्पर्क, धर्ममें स्थित, सत्यवादी और अपने कामको फरनेवाला है, उस( पुप को छग प्रेम करते हैं । जघन ( अनागामी ) २१८-छन्दजातो अनक्खाते मनसा च फुटे सिया । कामेसु च अप्पटिबद्धचितो उद्भसोतो ‘ति द्वच्चति ॥१०॥ (छन्दजातोऽनाख्याते मनसा च स्फुरितः स्यात्। - कामेषु चाऽप्रतिबद्धचित ऊर्ध्वस्रोता इत्युच्यते ॥२०॥ अनुवाद-ओो अङ्कम्प्य-वस्तुनिर्माण )का अमिछापी है, ( उसमें ) जिसका मन लगा है, काम(=मोगों में जिसका चित्र बद्ध नहीं, यह अर्बखत कहा जाता है। पिपतन २१६-चिरस्मासिं पुरिसं दूरतो सोस्थिमागतं । जातिमित्ता सुहल्ला च अभिनन्दन्ति आगतं ॥११॥ १०० ॥ धम्मपदं { १६१२ (चिप्प्रवासिनं पुरुषं दूरतो स्वस्यागतम् । शातिमिश्राणि सुहृदश्वोऽभिनन्दल्यागतम् । ११॥ ) २२०-तथेव कतपुब्बम्पि अम्मा लोका परं गतं । पुब्लानि पतिगण्हन्ति पियं जातीव आगतं ॥१२॥ ( तथैव कृतपुण्यमप्यस्मात् लोकात् परं गतम् । पुण्यानि प्रतिगृहन्ति प्रियं शतिमिवागतम् n१श) अनुवाद--चिप्रवासी (=चिर काछ दक परदेशमें रहे ) दिष) सै हामन्दु ठे पुरूपका, जातिवाळेसिन्न और सुहृद् धभि मन्दुत करते हैं; इसी प्रकार पुण्यकर्मा (gय )को इख छकसे प( छोक में जानैप, ( उसके ) पुष्य (कर्म ) प्रिय जाति( वालों की भाँति स्वीकार करते हैं। १३-प्रिथव्रणं समाप्त १७--कोधवग्गो रोहिणी अधिष्ठवड (न्यशोभाराम ) २२१कोषं आहे विपनहेय्य मानं सल्लोलनं सव्वमतिक्रमेय्य। तं नामरूपमिं अजमानं अकिदनं नानुपतन्ति दुवा ॥१॥ (क्रोधं जह्यद् विभजह्मत् मानं संयोजनं सर्वमतिमेत। तं नामरूपयोरसज्यमानं अङ्गची लांऽनुपतन्ति दुःखानि ॥१) अनुवाद-कोषको शे, अभिसानका त्याग करे, सारे मुंयोगयों (=बंधनों )से पार हो जाये, यू.कुझे आसक " गॐ दैते । १०२] धम्मपदं [ १७१४ आवौ ( अग्गाळप चैत्य ) कई मिश्र २२२–यो वे उप्पतितं कोषे रथं भन्तं व धारये । तमहं सारथिं चूमि, रस्मिगाहो इतरो जनो ॥२॥ (यो वै उत्पतितं क्रोधं पथं भ्रान्तमिव धारयेत् । तमहं सारथिं ब्रवीमिरश्मिग्राह इतरो जनः ॥२॥ अनुवाद-घ्नं च क्रोधको भ्रमण करते थकी भति पकड है, ॐ वठे मैं सारथी कहता , दूसरे छोग लगाभ पकड़नेवाले (मात्र ) हैं। राजउ (वेणुषन) उसरा ( स्पासिका ) २२३-अक्कोोधेन लिने क्रोधं असाधु साधुना लिने । जिने करियं ठनेन चेन अलिकनादिर्न ॥३॥ ( अक्रोधेन जयेल् क्रोधं, अस्थं साधुना जयेत् । । जयेत् कथं तेन सत्येनाऽलीकवाविनम् ॥३) अनुवाद-अक्रोधसे शोधको , असाधुको साg(=अछाई ) ते, कृपणको दानसे जीते, शष्ट योछनैवालैको सत्यले ( ते ) । चतवन सशमोग्गछन (धेर ) २२ ४-सचं भणे न इन्भेष्य, दब्जाप्यस्मिम्पि याचितो । एतेहि तीहि ठानेहि गच्छे देवान सन्तिके ॥४॥ (सल्यभणे नू फुध्येत्, दद्यादल्पेऽपि याचिता । तैस्त्रिभिः स्थानैः गच्छेद् दधानामन्तिके ॥था) १७६ ] कोषवणो | १०३ अनुवाद-सच बोले, ओोध न करे, आज भी माँगनेपर है, इन तीन वात्रो (मुरूप ) ठेवताओके पात्र जाता है। ओह्मण साकेत (=अयोध्या ) २२५–अहिंसका ये मुनयो निच्वं कायेन संवृता । ते यन्ति अच्चुतं ठानं यत्य गन्त्वा न सोचरे ॥५॥ (अहिंसका ये मुनयो नित्यं कार्थेन संवृताः। ते यन्ति स्वच्युतं स्थानं यत्र गत्वा न शोचन्ति ॥५॥ ) अनुवाद---को मुनि (छौग ) अहिक्षकसदा कायानें संयम करनेवाले हैं, वह ( ख ) अच्युत स्थान (=जिस स्थान पर थहुँच फिर गिरना भी होता )को आदा होते हैं, जहाँ जाकर फिर महीं शोक किया जाता । राजगृड ( गृध्रकूट ) राजगृइषीका पुत्र २२६-सवा जागरमानानं आहरत्तानुसिक्खिनं । निव्वाणं अविमुत्तानं अत्यं गच्छन्ति आसवा ॥६॥ ( सदा जाग्रतां अहोरात्रं अनुशिक्षमाणनम् । निर्वाणं अधिमुक्तानां अस्तं गच्छन्ति आनवः ॥६॥ अनुवाद–श्च सदा जागचा (=सचेत ) रखता है, रातबिंब ( उत्तम ) सीख सीखनेवाला होता है, और निर्माण ( भारत फर ) मुक हो गया है, उसके आस्रव (=चित मल ) अस्त हो जाते हैं । १०५ ॥ धम्मपर्ट [ १०९ तवत अनुक (उपासक ) २२७-पराणमेतं अतुल ! नेतं अज्जतनामिव । । निन्दन्ति तुहीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनं । मितभाणिनम्पि निन्दन्ति नत्यि लोके अनिन्दितो ॥७॥ (पुरणमेतदू अतुल ! नैतद् अद्यतनमेव । निन्दन्ति तूष्णीमासीनं निन्दन्ति बहुभाणिनम् । मितभाणिनमपि निन्दन्ति नाऽस्ति लोकेऽनन्दितः | ) २९८-न चहु न च भविस्सन्ति न चेतरहि विन्जति । एकन्तं निन्दितो पोसो, एकन्तं वा पसंसितो ॥८॥ (न चाऽभूद् न च भविष्यति न चैतहिं विद्यते । पकान्तं निन्वित’ पुरुष एकान्तं वा प्रशंसितः ॥८॥ अनुवाद है अतुल । यह झरानी यात है, आजकी भर्ती-(कोग ) सुप बैठे हुये की निन्दा करते हैं, और बहुत योलनेवाछेकी भी, मितभाषीी भी निन्दा करते हैं; दुनियामें अनिन्दित कोई नहीं है । यिकुछ ही निन्वृित या पिकुळ ही प्रशसित पुरुष न था, न होगा, र आजकल है । अतुळ ( उपासक ) २२e-यञ्चे विघ्नू पसंसन्ति अतुर्दिक्ष्व सुखे दुवे । अबिद्दवृत्तिं मेधार्वि पध्मासीलसमाहितं ॥८॥ १७३७] धबग [ ३०५ (यश्चेद् विशः प्रशंसन्ति अनुविंय कुवः श्वः । अच्छिदवृतिं मेधाविनं प्रशशीलसमाहितम् । । ) २३०-नेक्डं जम्वोनदस्सेव को तं निन्तुिमर्हति । देवापि तं पसंसन्ति चक्षुणाऽपि पसंसितो ॥१०॥ (निष्कं जम्बूनदस्यैव कस्तं निन्दितुमर्हति । देवा अपि तं प्रशंसन्ति ब्रह्मणाऽपि प्रशंसितः ॥१०॥ अनुवाद-अपने अपने ( विक्रमैं ) जान कार विश्व को अछिद्र द्युति (=वोपरहित स्वमामवाळे मेधावी, अश्लु-संयुक्त जिस (पुरुष की प्रशंसा करते हैं; जाम्बूनद (सुवर्ण ) की अशके समान उपकी कौन निन्दा कर सकता है बेवता भी उसी अक्षसा करते हैं, बहूद्वारा भी वह शंसित होता है । वेणुबन वयि (मिश्च) २३ १-कायप्पकोपं रक्खेय्य कायेन संवृतो सिया । कायदुच्चरित हित्वा येन मुचरितं चरे ॥११॥ (कायप्रकोपं रक्षेत् काथेन संवृतः स्यात्। कॉयडेश्वरितं हित्वा कायेन सुचरितं चरेत् ॥११ ) २३२–‘चीपकोपं रक्खेय्य वाचाय संवुतो सिया । वची दुच्चरितं हित्वा वची सुचरितं चरे ॥१२॥ (घचः प्रकोपं देव् धाचा संवृतः स्यात् । वचो दुश्चरितं हिस्सा धाचा सुचरितं व्रैव ॥१२॥) १०६ ॥ धम्मपदं [ १७१४ ३३३-मनोप्पकोपं रखेय्य मनसा संवृतो सिया । मनोदुच्चरितं हित्वा मनसा सुचरितं चरे ॥१३॥ (मनः प्रकोपं क्षेत्र भनसा ववृतः स्यात् । मनोदुश्वरितं हित्वा मनसा सुचरित' चरेत् ॥१३ ) २३ ४-कायेन संवृता घोरा अयो वाचाय संवृता । मनसा संवृता वीरा ते वे सुपरिसंयुता ॥१४॥ (कायेन संवृता धीरा अर्थ चाचा संवृताः। मनसा संवृता धीराः ते वै सुपरिसंवृता ॥१७) अनुवाद--~कायाकी लचकतासे रक्षा करे, कायासे संयत रहे, कामयिक दुश्चरितको छेड़ कायि सुचरितका आचरण करे । बाणी को चंचलतासे रक्षा /झरे, वाणीसे संयत रहे, बाधिक दुश्चरितको छोङ, वाचिक सुचरितका आचरण करे। मनकी चंचलतासे रक्षा करे, अनसे सयत रहे, मानसिक दुश्चरितको छोड, मानसिक सुचरितका आचरण करे । १७-कोघवर्ग समाप्त = १८ ~~मळवगो चतवन घटकत्र २३५–पाण्डुपलासबदानिसि, यमपुरिसापि चतं उपञ्चिता। उय्योगमुखे च तिष्ठसि पापैय्यपि च ते न विजाति ॥१॥ (पाण्डुपलक्षमिवैदानीमसियमपुरुषायपिबश्वउपस्थिताः उद्योगसुखे व तिष्ठसि पाथेयमपि च ते न विद्यते ॥१ ) २३६–सो कोहि दीपमत्तनो खिष्यं आयम पण्डितो भव। निजन्तमलो अनङ्गणो दिब्यें अधिसूमिमेहिसि ॥२॥ (खुकुर दीपमाळभनः क्षिभ घ्यायच्छस्व पण्डितो भव । निधृतमतोऽर्नगणो दिव्यां आर्यभूमिं एष्यसि ॥२) अनुवाद-पीछे पत्तेके समान इख वक़ है, यसबूत तेरे पास आ खड़े हैं, तू, प्रयाणके थिये तयार है, और पाधेय तेरे पास कुछ नहीं है । स तू अपने लिये क्षीण ( = रक्षास्थान ) धना, उयोग झकर, पबित धन, संळ अक्षालित कर, दौ - रहित धन आर्योके दिव्य पडुको पायेगा । १०८ ॥ धम्मपट्टी [ १८५ जेतन गोषातकपुत्र । २३७-उपनीतवयोच ढानिसि सम्ययातोसि यमस्स सन्तिके। वासोपि च ते नयिअन्त पाथेय्यपि च तेन विज्जति ॥३॥ ( उपनीतवयाइदानीमसि सम्प्रयातोऽसि थमस्यान्तिके । घासsपि च ते नास्ति अन्तश पाथेयमपि च ते न विद्यते ॥श॥ २३इसो कोहि दीपमत्तनो खिष्यं वायम पण्डितो भव। निद्धन्तमलो अनङ्गणो न पुन जातिजनरै उपेहिसि ॥४॥ (स कुरु वपमात्मनः क्षिप्रस्याच्छस्त्र पण्डितो भव। निघूमोऽनंगणो न पुखर्जीतिजरे उपेष्यसि ।। ) अनुवाद-आयु तेरी समाप्त हो गई, यमके पास पहुँच चुका, निवास ( स्थान ) भी तेरा नहीं , ( यात्राके ) मध्यके लिये तेरे पास पाथेय भी नहीं। स तु अपने लिये० । फे शक्षण २३६-अनुपब्बेन मेधावी योकयोकं खणे क्षणे । कम्मारो रजतस्व निद्धमै मलमत्तनो ॥५॥ (अनुपूर्वेण मेधावी स्तोकं तोकं क्षणे क्षणे । कर्मारो रजतस्यैव निधंमेत् मलममनः | ) अनुवाद-शुद्धिमान् / पुरुष ) क्षण क्षण मध• थोड़ा थोड़ा अपने सकको ( वैसे ही) ( जावे ), जैसे कि सोनार चाँदीके ( अकफ) बलाता है। १८] सलवग्ग [ १०९ तिस्स (थेर ) २४०-अयसा 'व भलं समुठितं तङगाय तदैव खादति । एवं अतिधोनचारित्रं सानि कम्मानि नयन्ति दुर्गाति ॥६॥ ( अयस इव मलं समुत्थितं त(स्स) उत्थाय तदैव खादति । एवं अतिधावनचारिणं स्वानि कर्माणि नयन्ति दुर्गतिम् ॥६) अनुवाद-- कोलेसे उपब मछ (= मुखं ) जैसे बिसीसे उत्पन्न होता है, उसे ही खा डाकता है; इसी प्रकार अति उंचल (श्रुप के अपने ही फर्म उसे दुर्गतिको छे जाते हैं । ( छाछ ) उदायी ( धेर) वेतन २४१: -आसन्नायमला मन्ता अनुष्ठानमला घरा। मलं वएस्स कोसज्जं पमादो रुखतो भलें ॥७॥ (अस्वाध्ययम मंत्र अनुस्थालमळा गृहाः । मलं वर्णस्य कौशोथं, प्रमादो रक्षतो भयम् | ) अनुवाद---वाध्याय ( = a एवरपूर्वक पाठकी आवृति ) न करता ( वैद् -)का भळ (= मुञ्च ) है, ( कीप पोत मरम्मत कर ) न उठाना घरोंका चर्चा है । शरीरका सुत्र आलस्य है, अखबघानी रक्षका चर्चा है। रजगृह ( वेणुवन ) फेई कुपुत्र २४२-अतिथिया दुच्चरितं मच्छे' ददतो मलं । मला चे पापका मा अस्मिं लोके परम्हि च ॥८॥ ११० ॥ { १८l११ (मलं लिया। दुश्चरितं मात्सर्यं ददतो मलम् । मठं वै पापका धर्मे अस्मिन् लोके परत्र च ॥८॥ ) २४३–ततो महा । मलतरं अविन्आ परमं मतं । एतं मलं पहचान निम्मला होय भिक्खवो ॥६॥ ( ततो मलं मलतरं अविद्या परमं मलम् । एतत् मलं प्रहाय निर्मला भवत भिक्षवः ॥१।) अनुवाद--स्त्रीका मछ दुराचार है, कृपणता (= फसी ) दाताका मल है, पाष इस लोक और परछोक दोनों )से मछ है फिर मलमें भी सबसे यठा मछ-महासळ अविद्या है। है भिक्षुओो । इस ( अविया) मलको स्याग कर निर्भछ यरो । जतवन (चुल्छ ) शरी २४४-सुजीवं अहिरीकेन काकसून वंसिना । पक्वान्दिना पगब्मेन संकिलिन जीवितं ॥१०॥ (सुजीवितं अर्हकेण करेण ध्वंसिना । प्रस्कन्दिना प्रगल्भेन संक्लिष्टेन जीवितम् ॥१०) अनुवाद-( पापाचारी प्रति ) निर्लजफए समान (चार्येर्स) शूर, ( परहित-विनाशी, पतित, उच्पल और मलिन (पुरुष) जीवन सुखर्वक शीतता ( देखा जाता ) है। ॥ का जतवन ( घुल ) सारी २४५-हिरीमता च दुन्जीवं निञ्चं सुचिगवेसिना। अलोननव्यगमेन सुद्धानवेन पस्सता ॥११॥ १८७४ ॥ अलवगो [ १११ जवन (होमता च दुजवितं नित्यं शुचिगवेषिणा। अलीनेनऽप्रगल्भेन शुद्धजीवेन पश्यता ॥१ ) अनुवाद पापाचारके प्रति ) छक्वान्निस्प ही पवित्रताका ख्याल रखने वाले, निरालस, अनुचभ्रूखक, छद जीविका चाळे सचेत( पुरुष ) के जीवनको कठिनाईंले बोतते वैखते हैं। पाँच की उपासक १४६-यो पाणमतिपातेति मुसावाच भासति । लोके अदिन्नं आदियाति पवाच गच्छति ॥१२॥ ( याः प्रणमतिपातयति मृषावादं च भाषते । लोकेऽदत्तं आदत्ते परादारांश्च गच्छति ॥१२५ ॥ ) २५७-शुरामैरयपानञ्च यो नरो आयुञ्जति । पूषेवमेसो लोकस्मिं मूलं खनति अत्तनो ॥१३ (सुगमैरेयपानं च यो नरोऽनुयुनक्ति। इदैवमेष लोके मूलं खनत्यात्मनः ॥१३ ) २४८–एवं भो पुरिस । जानाहि पापधम्मा असब्लता । मा तं लोमो अम्मो च चिरं दुक्खा रखी ॥१४॥ (पवं भो पुरुष जानहि पापधर्माणोऽसंयतान् । मा त्वां लोभमोऽधर्मश्च चिरं दुःखाय रन्धैरन् ॥१ ) अनुबॉद—जो हिसा करता , इढ धौलता हैछमें चोरी करता है (=विना दियेको लेता है ), परस्त्रीगमन करता है। ११२] धम्मपदं | १८१६ ब पुरुष अथपानी कम होता है, वह इस प्रकार इसी कोकमें अपनी जखको खोदता है । हे मुख्य । पापियों अर्द्धयसियकै घरमै पैसा जानऔर सत्त इसे , अधर्मे चिरकाल तक दुःखमें रखें। जैवन तिस ( बालक ) २४-ददन्ति। व यथासङ यथाषसादनं जनो । तय यो मंकु भवति प्रेसं पानभोजने । न सो दिवा वा रतिं वा समाधिं अधिगच्छति ॥१५॥ (ददाति वै यथाश्रद्धं यथप्रसादनं जनः। तत्र यो मूक भवति पर्यो पानभोजने । न स विवा वा रात्रौवा समाधिमधिगच्छति ॥१५ ) २५०-यस्स च तं समुच्चिन्न मूलघर्चा समूहुतं । स वै दिवा वा रतिं वा समाधिं अधिगच्छति ॥११॥ (यस्य च तत् समुच्छिन्न' सुळधतं समुखतम् । स वै दिवा रात्री वा समाधिं अधिगच्छति ॥१६ ) अनुवाद-ोग अपनी अपनी श्रद्धा और प्रसवताके अनुसार दान ऋते हैं, वहीं दूसरोले भ्राने पीनेमें जो (असन्तौपके कारण ) सूझ होता है; यह रात तिन ( कभी भी ) समाधानको गर्दा प्राप्त करता। (किन्तु) जिसका वह जड़ मूलसे पूरी तरह उच्छिष्ट हो गया, वह रात दिन (द) समाधानको प्राप्त होता है। १८१९ ॥ भलवणो [ ११३ बैतवन पांच उपासक २११-मत्थि रागसमो अग्गि गत्थि दोससमो गहो । नयि मोइसमं जालं नयि तण्हासमा नदी ॥ १७ (नास्ति रागसमोऽलिभ च5स्ति वेषसमो हः । नाऽस्ति मोहसमें अलै, नऽस्ति कृष्ण समा नदी ॥१ ) अनुवाद-गके समान आग नहीं, बेषके समान अह (=भूत, बुछेक ) नहीं सोइके समान जल नहीं, तृष्णाके समान की नहीं। भयिनग ( जातिपावन ) भण्डक (अ४ ) २५२-मुबसं वजमब्लेसं अतनो पन खुद्दसं । परेको हि सो बीजानि ओोपुणाति यथामुकं । अत्तनो पन यदेति कलैि ‘व कितवा सो ॥ १८॥ (सुदर्श" धवमन्येष आत्मनः पुनर्मुर्दशम् । परेषां हैि न वद्यानि अवपुष्णाति यथातुषम्। आत्मनः पुनः छादयतिकलिमिव कितवाव् शठः ॥१८॥) अनुवाद--बूसरेका दोष देखना आसान है, किन्तु अपना ( दोष ) वैधता कठिन है, वक्ष (पुरुष ) चूसरोंके ही दोपको शुसकी अति डड़ता फिरता है, किन्तु आपने ( दोषों )को वैसे ही ढंकता है, जैसे शठ झुआरीले पालैको । जैतवन उज्ज्ञानसब्जी ( र ) २१३-पखजानुपस्सिस्स निव्वं उन्नसच्चिनो । आसवा तस वदन्ति शारा स शासवक्खया ॥ १६॥ ११४ ॥ घनषद् [१८RS (परवद्याऽनुदर्शिननित्यं उध्यानसंज्ञिनः । आस्रवस्तस्य बर्द्धन्तेआराद् आस्रवक्ष्याव ।१९) अनुवाद--दूसरेके दोषोकी बोजमें रहनेवालेसदा' हाय हाय करने चाळे (पुरुष )= आस्रव (=चित्तमझ ) बढ़ते हैं, वह आनवोके विनाशसे दूर इढा हुआ है। ॥ कुशीनगर सुमद ( परिव्राजक ) २१४-आकासे च पदं नस्यि समर्थो नत्थि बाहिरे । पपद्याभिरता पना निष्पपञ्च तथागता ॥२०॥ (आकाशे च पदं नास्ति श्रमणो नाऽस्ति बहिः । प्रपंचाभिरताः प्रजा निष्प्रपंचास्तथागता ॥२०॥ ) २५१-आकासे च पदं नथि समणो नथि गहिरे। सखारासस्सता नत्यि, नत्यि वृद्धानमिब्जितं ॥२१॥ ( आकाशे च पदं नास्ति भूमणो नास्ति बहिः । संस्काराः शाश्वता न सन्ति, नाऽस्ति ख़ुदानामिङ्गितम् ॥२३१) अनुवाद--आकाशमें पद (चिन्ह) नहीं, याहरमै श्रमण (=संन्यासी) नहीं रहा, योग शचने की रहते हैं, (फ़िन्स ) तथा गत (=शुद्ध ) अपंधरहित होते हैं। १८-मलबर्ग समाप्त १९-धम्मह्वग्गो चतवन विनिच्छयमहामथ (ecजल ) २१६- तेन होति धम्मी येनत्यं सहसा नये । यो च अयं अनत्यञ्च उभौ निच्बैय्य पण्डितो ॥१॥ (म तेल भवति धर्मस्थो थैथै उहा नयेत् । यश्व अनर्थं च अभ निश्चिनुयात् पंडितः ॥३॥ २१७-शसाहसेन धम्पेन समेन नयती परे । धम्मस्स गुतो मेधावी धम्मोति एखुचति ॥२॥ (अEाहसेन धर्मेण समेत नयते परान् । धर्मेण नो मेधावी धर्मस्थ इत्युच्यते ॥२ ) अनुवाद-हसा जो आयें (कामकी वस्तु को करता है, वह धर्ममें अवस्थित नहीं कहा जाता, पंडितको बाहिये कि वह अर्थ, अनर्थे वोनों को विचार ( करके ) करे । [ १७५ ११६ ] धम्मपदं [ १९५ बेतवन बब्जिय ( मिश्च ) २५८-न तेन पण्डितो होति यावता बहु भासति । खेमी अवेरी अभयो पण्डिचेति पञ्चयति ॥३॥ (व तावता पंडितोभवति यावता हु भाषते । क्षेमी अवैरो अभयः पंडित इत्युच्यते ।। ) ‘अनुवाद-बहुत भाषण करनेले पंडित नहीं होता । जो वेमबाज़ अवैरी और अभय होता है, वही पंडित कहा जाता है । एकुन (घेर) २१६-न तावता धम्मधरो यावता बहु भासति । यो च अष्पम्पि सुत्वान धम्मं कायेन पस्सति । स वै धम्मपरो होति यो घर्मे नष्पभज्जति ॥४॥ ( न तावता धर्मघणे यावता बहु भाषते । यश्चाल्पमपि श्रुत्वा धर्म कायेन पश्यति । स वै धर्मधरो भवति य धर्म न प्रमाद्यति ॥४॥ ) अनुवाद--बहुत योछनैसे धर्मेषुट (=धार्मिक ग्रंथो शता ) गर्दा होता, जो थोड़ा भी सुनकर शरीरसै धर्मका आचरण करता है, और ओ धर्ममें असावधानी (=प्रसाद ) नहीं करता, वही धर्मधट है। रुकुण्टुक भट्रिय ( थेर) २६०-न तेन वैरो होति येन'स्स पलितं सिरो । परिपको वयो तस्स मोघजिणणोति चुच्चति ॥५॥ ११le ] धम्सटुबमो [ ११७ बेतवत (न तेन स्थविरो भवति येनऽस्य पलितं शिरः। परिपक वयस्तस्य मोघजीर्ण इत्युज्यते ५ ) अनुवाद-शिरके ( वाङके ) पकनैसे थे (=थविरखूब ) नहीं होता, उसकी आयु परिपक हो गई ( सही ), (किन्तु) वह यथैका शूद कहा जाता है । ठकुण्टक भविष ( पैर ) २१ १-अम्हि सच्चव घम्मो च अहिंसा सब्लमो दमो । स वै धन्तमलो धीरो थेरो ‘ति पूञ्चति ॥३॥ (यस्मिन् सत्यं च धर्मश्चहिंसा संयमो दमः। ८ स वै चान्तमलो धीरः स्थविर इत्युच्यते ॥३) अनुवाद–जिसमें सस्य, धर्छ, कहिंडा, संयम और ड्रम हैं, वही विगतमः, भीर और स्थविर कहा जाता है। कितने ही भिक्षु २६२ २न वाक्करणमन्तेन बाणपोखरतय वा । साधुरूपो नरो होति इसकी भवरी सती ॥७॥ (न वाकरणमात्रेण वर्णपुष्कळतया था। साधुरूपो नरो भवति ईर्टीको मत्सरी शठः । ) २६३–यम्स चेतं समुच्छिनं मूलथच्वं समूहृतं । स बन्दोसो मेधावी साधुरूपो 'ति च्चति ॥८॥ (यस्य चैतत् स्तुच्छिश' मूळघातं समुद्धतम् । स घान्तदोषो मेधावी धुकप इत्युच्यते ८॥ ) चतवन १४] धम्मपदं [ १५१ अनुवाद--( यदि वह ) , मत्सरी और शठ है; वौ, ब होने भान्नसेसुन्दर रूप होनेरे, आडमी अञ्चरूप नहीं होता है। लिडके यह जमूळसे बिलकुल उच्छिा हो गये हैं, जो विगतदोष, मेधावी है, वही सहप कहा जाता है । जतवन इत्थक ( भिक्षु ) २१ ४–न मुण्डकेन समणो अब्बतो अलिकं भणं । इच्छलाभसमापन समणो किं भविस्सति ॥६॥ (न मुंडकेन भमणो ऽभुतो:ीकं भणन् । इच्छालाभसमापः श्रमणः किं भविष्यति ॥९) २६५–यो च समेति पापानि अणं शूलानि सर्वसो। समितता. हि पापानं समयोति पञ्चच्वति ॥१०॥ ( यश्च शमयति पापानि अणूनि स्थूळानि सर्वशः। शमितत्वाद्धि पापानां भ्रमण इत्युच्यते ॥१०) || अनुवाद—जो व्रतरहित, मिथ्याभाषी है, वह सुण्ठित होने मात्र से असण नहीं होता। इछा काभसे भरा (: )या अमूण होगा ? जो छोटे यद्वै पापको सर्वथा शमन करनेवाला है, पापको शमित होनेकै कारण वह ससण (=श्रमण ) कहा जाता है। कई शाखण २६६-न तेन भिक्खू []होति यावता भिक्खते परे । विसं घर्मं समादाय भिक्खू होति न तानता ॥११॥ १९१४ ॥ धम्मटुवर्गो [ ११९ ( न तावता भिक्षुः [र]भवति याबता भिक्षते परान् । विश्वं धर्म समादाथ भिक्षुर्भवति न तावता ॥११ ) अनुवाद--दूसरोंके पास जाकर भिक्षा आंगने मात्रसे भि नहीं होता, " ( जो ) सारे (उरे ) घम (=कामों )ओो प्रहण करता है ( वह ) भिक्षु नहीं होता। ई आखण २६७–यो'ध पुघ्नश्च पाञ्च वाहित्वा ब्रह्मचयिवा । सखाय लोके चरति स मे भिक्खूपेति वुञ्चति ॥१२॥ (य इह पुष्यं च पापं च वाहयित्वा ब्रह्मचर्यवान् । संख्याय लोके चरित स वै भिक्षुरित्युच्यते ।१२॥ ) अनुवाद--बो यहाँ पुण्य और पापको छोड़ ब्रह्मचारी वन, शनकै शय कोकमैं विचरता है, वह मिस्र कहा जाता है । र्थिक २६८-न मोनेन सुनी होति । शुल्हरूपो अविद्दक्षु । यो च तुलं 'व पगर्ह बरमादाय पण्डितो ॥ १३॥ (न मौनेन मुनिर्भवति मूढरूपोऽबिंद्वान् । यश्च तुलामित्र प्रह्य वरमादाय पंडितः ॥१श) २१६–पापानि परिहन्नेति स मुनी तेन सो सुनि । यो सुनाति उभो लोके सुनी तेन एखुचति ॥१४॥ (पापानि परिवर्जयति स मुनिस्तेन स मुनिः । यो मनुत उभौ लोकौ मुनिस्तेन प्रोच्यते ॥१ ) १३० ॥ धक्षपद [ ११७ अनुवाद--अविद्वान् और समान (पुरुप, सिर्फ ) मौन होने सुनि नहीं होता, जो पंडित कि तुळाकी भाँति पकड़क, उत्तम (तव ) को ग्रहण कर, पापों परित्याग करता , यह सुनेि है, और एक प्रकारले सुनि होता है। चूंकि यह दोनों लोकोंका मनन करता है, इसलिये यह भुवि कहा जाता है । अरिय बाळिसिक २७०-न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति । अहिंसा सत्रपाणानं अरियो' ति पृथुचति ॥१५॥ (न तेनाऽऽयं भवति येन प्राणान् हिनस्ति । अहिंसया सर्वप्राणानां आर्य इति प्रोच्यते ॥१५ ) अनुवाद-प्राणियोको हनन फरनेसे (कोई ) आयें गहीं होता, सभी प्राणियोंकी हिंसा न करनेसे ( बसे ) आर्य कहा जाता है । लेतवन बहुतसे शकआदिशूक मिझ २७१–न सीलबतमतेन बाहुसन्चेन पन । वा अयत्रा समाधिलाभेन विविचसयनेन वा ॥ १६॥ (न शीलव्रतमात्रेण वाहुभृत्येन वा पुनः। अथवा समाधिलाभेन विचिच्य शयनेन घा १३) २७२-फुसामि नेखम्ममुखं अपृथुज्जनसेवित । भिक्खु I विसासमपादि अष्पत्तो आसवक्खयं ॥१७॥ १९५७ ॥ धम्मङवगो [ १२१ (स्पृशामि नैष्कर्म्युसुखें अपृथग्जनसेवितम् । भिक्षा । विश्वालं मा पादी अप्राप्त आस्ववक्षयम् ।१ ) अनुवाद--केवळ श्रीछ और तसे, यहुश्रुत होने ( मात्र से, या ( केवल ) समाधिलाभसे, या एकान्तमें लायन करने, पृथग्वन (=अझ ) जिसे नहीं सेवन कर सञ्जते, यस नैष्कर्ये (=निर्वाण )सुबक मैं अनुभव नहीं कर रहा हैं; हे भिक्षुओं ! जब तक आस्रवों (विखमलो )का क्षय व हो जाये, अब हाक खुप न बैठे रहो। १६-धर्मस्थवर्ग समाप्त २०–भगवग्गो जdवन पाँच सौ भिक्षु २७३-प्रगानवर्गिको सेठो सस्थानं चतुरो पदा । विशगो सेवो धम्मानं द्विषदानव चकवुमा ॥१॥ (मार्गाणामथंगिकः श्रेष्ठः सस्यानां चत्वारि पनेि । विरागः श्रेष्ठो धर्माणां द्विपदानां च चतुष्मान् ।श) २७४-प्रसोव भर्गो नत्य'ब्लो दस्सनस विबुद्धिया । एतं हि सुम्हे पटिपल्जय मास्सेतं पमोहनं ॥२॥ (एप वो माग । लऽस्त्यन्यो दर्शनस्य विशुद्धये । एतं हि यूयं प्रतिपद्यध्वं मारस्यैष प्रमोहन () अनुवद-आगमेिं अष्टांगिक मार्ग कोड है, खस्योंमें चार ध (=बार आर्धतथ ) श्रेष्ठ , धर्मामें वैराग्य श्रेष्ठ , द्विषये (=अनुष्यों )न चक्षुष्मान् (=शननेत्रधारी, इब ). श्रेष्ठ है। बुर्जुनशान )की बिद्युबिके लिये यही मार्ग , पूरा नहीं, ( भिक्षुओ !) इसीपर तुम आखल होओ, यही सारको मूर्जित करने चावल है। १२२] २०५] सव [ १२३ बेवन पाँच सौ भिक्षु २७५-एतं हि तुम्हे पटिपदा दुक्खस्सन्तं करिस्सय । अक्खातो वे मया ममगो अध्याय सल्लसन्धनं ॥३॥ (एतं हि यूयं प्रतिपदा दुःखस्यान्तं करिष्यथ। आख्यातो वै मया मार्ग आशय शल्यसंस्थानम् । ) २७६-सुम्हेहि किच्चे आतपं अक्खातारो तथागता । पप्पिना पमोक्खन्ति कायिनो मारवन्धना ॥४॥ (युष्माभिः कार्यं आतप्ये आख्यातारस्तथागताः । प्रतिपन्नः प्रमोक्ष्यन्ते ध्यायिनी मारबन्धनात् ॥श्वा । ) अनुवाद---इ ( मार्ग पर आरूढ हो तुम दुःखका अन्त कर सकोगे, (स्वयं ) बनकर ( राग आदिले बिनशमें ) शब्य ससान मार्गको मैने उपदेश कर दिया । का”के लिए मुद्दे उघोग करना है, तथागतों (=बुबों का कार्य उपदेश कर देता है, ( तद्नुसार आर्गपर ) आस्क हो, ध्यानमैं रत पुरुष ) भारते बन्धनसे शुरू हो जायेंगे । पाँच सौ भिक्षु लेखन [ अनित्य-तक्षणम् ॥ २७७-सम्बे सद्वारा अनिचा 'तेि यदा पद्माय पसति । अय निर्विन्दति दुक्खे, एस मग्गो विपुद्धिया ॥१॥ (सवें संस्कारा अनिव्या इति यदा प्रज्ञया पश्यति । अथ निर्विन्दति दुखानि एष मार्गो विशुद्धये ॥५॥ १ २४ ॥ धम्मपदं [ २०८ अनुयादि-—सभी संस्कृत (=कृत, निर्मित, वनी) चीजें अजिय ॐ , यह जय प्रज्ञा देबता , साथ समी डुचैसे विर्वेद (=विराग को प्राप्त होता है, यही मार्ग (चित्च-) आखिका है। [दुःख-लक्षणम् ॥ ९७८सन् सङ्ग्रा दुक्खा ’ति यदा पाय पसति । अथ निर्विन्दति दुक्खें, एस भगो विमुद्भिया ॥६॥ ( सर्वे संस्कारा दुवा इति यदा प्रज्ञया पश्यति । अथ निर्विन्दति दुखानि, एष मार्गो विशुद्धये ॥ ६॥ अनुवाद-सभी संस्कृत ( चीजें) हुक्षमय हैं ०॥ [ अनाम-लक्षणम् ॥ २७8-सब्वे धम्मा अनता 'ति यदा पञ्ज्ञाय प्रसति । अथ निव्विन्दति दुक्खे एस मग्गो विमुट्ठिया ॥७॥ ( सर्वे धर्मा अनात्मान इति यदा प्रज्ञया पश्यति । अथ निर्विन्दति दुखानि एप मार्गा विशुद्धये ॥७) अनुवाद-—सभी धर्म (=पदार्थ ) विना आमाके , •। जैतवन ( योगी ) तिरस (थेर ) २८०-उठानकालम्हि अनुच्हानो भुवा बली शालसियं उपेतो। संसत्र सङ्कष्पमनोकुसीतोपलायमगंजलसनन्विति॥८॥ २०९ ॥ भावग्ग [ १२५ ) ( उत्थानकालेऽनुतिष्ठन् युवा बळी आलस्यमुपेतः। संसान्न-संकल्प-अनः कुसीद् प्रज्ञया मार्ग' अलक्षो न विन्दति ॥ ८ ॥ अनुवाद—जो उद्धम ( =उद्योग के समय उद्यान न करनेवाला, युवा और बाली होकर ( भी ) आछयले युक्त होता है, मनके संक्रुपको घिसने गिरा दिया है, और जो कुसीदी (=दीर्घसूत्री ) है, वह आछसी ( पुरुष ) शके मागेको नहं स कर सकता । राणचूह ( वेणुबन ) ( शैत ) २८१-वाचानुरक्खी मनसा सुसंवृतो कायेन च अकुसलं न कयिरा । एते तयो कमपथे विमोघये आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं ॥s॥ (घाचाऽनुशी मनसा सुसंकृतः कायेन चाऽकुशलं न कुर्यात् । एतान् त्रीन् कनैपथान् विशोधयेत्, आयधयेत् मार्गी ' अधिश्रवेदितम् ॥ ९ ॥ ) अनुवाद---ओ वणीकी रक्षा करनेवाला, सनसे संयमी रहे, तथा कायासे पाप न करे, इन ( मन, वचन, काय ) तीनों कर्मेषयोंकी वृद्धि करे, और कवि =मुड )के जतछायै धर्मका सेवन करे। १२६ ] धम्मपदं [ २०१२ बेसवन पौटिल (घेर) २८२-योगा ये जायती भूरि अयोगा भूरिसड्खयो । एतं द्वापयं मत्वा भवाय विभवाय च । तयतानं निवेसेय्य यथा भूरि पद्दति ॥१०॥ (योगाद् वै जायते भूरि अयोगाद् भूरिसंक्षयः । एतं वेधायै शव भवाय विभवाय च । तथाऽऽत्मानं निवेशयेद् यथा भूरि प्रबर्धते ॥ १० ॥ अनुवाद- ( मनकै ) योग। =पुंयोग )से भूरि (=ज्ञान ) उत्पद्य होता , अयोगसै भूफाि क्षय होता है । लाभ और विनाशके इन दो प्रकारके भागौंको जानकर, अपने आप प्रकार , जिससे कि भूरिकी वृद्धि होवे । ई शुद्ध मिछ २८३–वनं विन्दय मा क्वं वनतो जायती भयं । चेवा वनञ्च वनथश्च निन्वाना होय भिक्खवो । ॥११॥ (धनं छिन्धि मा वृक्ष' वनतो जायते भयम् । छित्वा वनं च घनथं च निर्वाणा भवत भिक्षवः ॥ ११ ॥ २८४-यावं हि वनयो न छिज्जति अनुमतोपि नरस्स मारिषु। पटिबद्धमनो नु ताव सो वच्छो खीपको ‘व मातरि ॥ १२॥ (यावद्धि बनयो न छिद्यतेऽणुमात्रोऽपि नरस्य नारोg । अनिबद्धमनाः सुखावत् स चत्सभीप इव मातरि॥१२॥ २०१६ ] अगयग्गों [ २७ अनुवाद--वनको काटो, भृक्षको मत, उनले भय उपख होता है भिक्षुओं !, वन और को काटकर निर्माणको प्राप्त हो आओ। जयतक अणुमात्र भी स्कीमेंqरुपकी कामना क्षखंडित रहती है, तबतक दूध पीनेवाला बछडा जैसे आतामें आयझ रहता है, ( वैसे ही वह पुरुष चंघा रहता है )। सुवर्णकार ( धेर) २८५-उच्छिन्द सिनेहमतनो कुमुदं सारदिकं 'व पाणिना। सन्तिमगमेव चूहूय निब्वानं सुगतेन देसितं ॥१३॥ (उच्छिन्धि स्नेहमात्मनः कुमुदं शरविकमिव पाणिना । शान्तिमार्गमेव हय निर्वाणं सुगतेन दंशितम् ॥१शl ) अनुवाद --हाथसै शर( )ले कुखुद्दकी भाँति, आत्मस्तैको वच्छिव कर डालो, सुगात (=शुद्द )र उपविष्ट ( इस ) शान्तिसागै निर्माणका आश्रय लो। जतुवन (मश्वथनीं बषिक् ) २८६-ईंध बसं वसिस्सामि इश्व हेमन्तगिम्हम् । इति बालो विचिन्तेति अन्तरायं न बुल्झति ॥१४॥ (इइ वर्षाख वसिष्यामि इह हैभन्तीष्मयोः । इति बालो विचिन्तयति, अन्तरायं न मुच्यते ।१ ) अनुवाद---यहाँ वर्षमें बचेंग, यहाँ हैसन्त और भीष्ममैं ( वर्तृणा ) --भूय इस प्रकार सोचता है, (और ) अन्तराय (=विन) को नहीं खुलता । १२८ ॥ धम्मपर्व २०॥ किमा गौतमी (वैरी ) २८७-तं पुतपमुसम्मतं व्यासत्तमनसं नरं । मुक्त गामं महोघो 'व मयू आदाय गच्चति ॥१॥ (तं पुत्र-ए-सम्मतं व्यासन्नमनसं नरम् । सुप्तं प्राप्त महौघ इव मृत्युरादाय गन्छति ॥१५) अनुवाद–सोये गयफ जैमे यी याद ( यहा केलाषे ), पैमेही प्रश्न और पशुने किस आसफ़ (-) पुरुषको संश के जागी ? पारा (थरी ) २८८-न सन्ति पुत्ता ताणाय न पिता नापि यन्धवा । अन्तनेनाधिपन्नम्स नन्यि आतिष्ठ ताणुता ॥१६॥ ( न सन्ति पुआघ्राणाय न पिता नाऽपि याथरा। अन्तकेनाऽधिपम्नस्य नाम्नि शानिषु प्राणना ॥१६॥ ) अनुद--शृतं भ म कर मते, न पिता, में वन्छनंग F । दश मृत्यु पयसा, जातिले रक्षक भी होगते। २८६-एनमगमं गत्वा पण्दितो मीलिमंबुन । नित्याननामनं मरणं पिप्पम (मोगे ॥१७॥ (एनम्नां नग्न लिनः शेयरेंडनः । निर्मरागमनं मार्ग' :प्रबंध भिषग ॥१ ) wr-पग थ्य तन्त्र है । क ) wि, निध' ६२ {1 ~~** • है @ 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< २१–-पकिरणकवग्गो राजगृह ( बेणुवन) गावरोखूण २०अतासुखपरिच्वाग पम्से ये विपुलं सुखं । यो भतामुखं धीरो सम्पस्सं विपुलं सुखं ॥१॥ (मात्रसुखपरित्यागाद पश्येच्चेद् विपुलं सुखम् । त्यजेन्मात्रासुखं धीर संपश्यन् विपुलं सुखम् ॥२) अनुषाद्योर्जेसे सुखी परिंम्यागसे यदि बुद्धिमान् विपुछ सुख ( का भ ) देखें, तो विषुछ सुखका स्थाछ चरके भोजेते सुखको छेड़ है । कई पुरुष २६ १-पदुक्खुपदानेन यो अत्तनो मुखमिच्छति। बेरसंसगसंसधूमो वैरा सो न पशुष्वति ॥२॥ (परदुःखोपादानेन य आत्मनः सुखमिच्छति । वैरसंसर्गज्ञो वैशत् न प्रमुच्यते ॥२) स ॥ [ १२९ ३०] धम्मपदं [ १०७ अनुवाद दूसरेतो दुःख वैकर जो अपने लिये सुख चाहता है बैरके संसर्गमें पड़कर, वह बैरैसें नहीं छूटता। भाषियनगर ( जातियावन ) भद्रिय ( सिद्ध) २६२-थं हि किचं तदपविद्ध अचिं पन कयिरति । उनलानं पमज्ञानं तेने बदन्ति आसना ॥३॥ (यद्धि कृत्यं तद् अपविद्ध, अछट्टै पुनः । उन्मलानां प्रमत्तानां तेषां यद्भन्त आस्रवः ॥I) २६ ३-पेसक्व सुसमारबा निचं कायगता सति । अचिन्ते न सेवन्ति किम्चे सातच्चकारिनो । सतानं सम्पमानानं अन्यं गच्छन्ति आवा ॥४॥ (येषाज्व सुसमारब्धा नित्यं कायगता श्रुतिः । अकृत्यं ते न सेवन्ते कूल्यै सातत्यकारिणः । स्मरतां सम्प्रज्ञानानां अस्तं गच्छन्त्यास्रवाः ॥॥ ) अनुवाद—जो काव्य है, उसे (तो ब३धौता है, जो आकर्तव्य है वसे करता है, ऐसे धड़े मकवाळे प्रसायिके आतंत्र (=चित्समछ) धड़ते हैं। जिन्हें कायामें ( क्षणभचुरता, मछिनता आदि घोष सम्यन्धी ) स्मृति तस्यार रहती है, वह अतंर्यको नहीं करते, और कर्तब्यके निरन्तर करनेवाले होते हैं। जो स्टूति, और सम्भजन्य (=चेतपन)को रखनेवाले होते हैं, उनके आस्रव अख हो जाते हैं। ॐ सताम्। २१७] पकिण्णकवग्ग ( ३३१ वन ककुण्ठ्क भट्ठिय ( भैर) २६ ४-शातरं पितरं इन्वा राजानो वे च सत्तिये । रथं सानुचरं हन्त्वा अनिषो याति ब्रह्मणो ॥१॥ (मातरं पितरं हत्व राजानौ द्वौ च क्षत्रियौ । राष्ट्र साऽनुचरं इत्वाऽनघो याति ब्राह्मणः । ) अनुवाद-ता (=खूण ), पिता (=अहंकार ), वो क्षत्रिय राजाओं [=(१) आत्मा, अझ अकृति आदिकी निस्यताका सिखान्त, (२) अरणान्त जीवन मानना था जबूवाद ], अनुच(=ाण सहित राहू (=रूप, विज्ञान आदि संसार वपाचन पदार्थों को आर कर माझण (=शनी ) निष्पाप होता है। २६१-मातरं पितरं हन्त्वा राजानो वे च सोथिये । वैय्यग्धपक्वमं हन्वा अनिघो याति ब्राह्मणो ॥३॥ (मातरं पितरं इत्वा राजानौ वी च श्रोत्रियौ । व्याघ्रपंचमं इत्वाऽनघो याति ब्राह्मणः ॥६) अनुवाद--माता, पिता, द श्रीत्रिय राजाओं [=() नित्तावाले (२) जबूवाट्स 1 और पाँचवें व्याप्त (पाँच शन आषरणों )को भारत, श्रावण निष्पाप हो जाता है । राजगृह ( बेधुवन ) (दारुसाटिकg ) २६६-सुप्पबुद्धे पञ्चन्ति सदा गोतमसावका । येसं दिवा च रतो व निळवं बुद्धगता सति ॥७॥ १३२] धम्मपदं [ २।। । (सुप्रवृद्धे प्रबुध्यन्ते सदा गौतमश्नावकाः येषां दिवां च रात्रौ च नित्यं शुद्धगता स्मृतिः ॥७) २६७-पुष्पबुद्धे पवुल्झन्ति सदा गोतमसावका। येसं दिवा च रत्तो च निच्छं धम्मगता सति । (सुप्रवृद्धे प्रबुध्यन्ते सदा गौतमधावकाः। येषां दिवा च रात्री च निस्यं धर्मगता स्मृतिः ।e) २e६-मुष्यबुद्ध खुज्झन्ति सदा गोतमासादका । येसं दिवा च रत्तो च निघे सङ्गता सति ॥६॥ (सुमद्युद्धं प्रयुज्यन्ते सदा गौतमभ्रावकाः। येषां दिशं च रात्रौ च नित्यं संधगता स्टुतिः ॥९ ) अनुवाद- जिनको दिनरात मुख-विषयक एथति पनी रहती है, यह ॐ गौतम( झद )ले लिप्य एय जागरूक रहते हैं। जिन विनन्त धर्म-विषयक ऋति यनी रहती है ० १ लिमको दिनरात संघ-विषयक स्थूति थनी रहती है : २&E-मुष्पबुद्धे पञ्चन्तन्ति सदा गोतमसायका । येर्स दिवा च रत्तो च निघी कायगता सति ॥१० (cपथुर् भङ्ग्रन्तै०० नित्यं प्रायगता स्मृतिः ॥१०) ३००-मुष्ययुद्धे पञ्चन्ति सदा गोतममागतं । येस स्नाि च ग्रो न अहिंसाय तो मनो ॥११॥ (मुसू० ०आङिमायं तं मनः ॥११ ) ॥ २१७४] पणिक्कवलग [ १३ई ३०१-मुष्यबुद्धे पञ्चन्ति सदा गोतमसाफा । येसै दिवा च रत्तो च मावनाय रतो मनो ॥ १२॥ (सुप्रवृङ००भावनायां रतं मनः ॥१२ ) अनुवाद लिनको दिनरात कायविषयक ऋति यनी रहती है० । • जिनका सन विनन्त अहिंसामें रत रहता है०। जिनका सन दिनरात भावना (=fचंत में रत रहता है० । वैशाखी (मदाबन ) यजिबपुचफ (भिश्च ) ३०२-दुष्पवर्जं दुरभिरमं दुरावासा घरा दुखा । दुक्खोऽसमानसंवासो दुक्खानुपतितद्धरौ । तस्मा च न अङगू सिया न च बुखानुपतितो सिया ॥ १३॥ (दुष्प्रव्रज्यां दुरभिरामै डुबासे गूढं दुखम् । दुःखोऽसमानसंबाक्षो दुखाऽशुपतितोऽध्वगः। तस्मान्नचऽध्वगः स्यान्न च दुखाऽशुपतितः स्यात् ।१३) अनुवाद-झपूर्ण अत्रज्या ( = संन्यास )में रत होना हुकर है, न रहने थोम्य घर हुमाव हैअपसानके साथ थवा दुःषड् है, मार्गक घटोही होना दुःखद है, इसलिये मार्गे पटोही न बने, न दुःखमें पतित होवे । तबन चित्र ( श्रुति) ३०३–सद्धो सीलेन सम्पन्नो यसोमोगसमर्पिते । यं यं पदेसं भजति तथय तयेव पूजितो ॥१४ १३] धम्मपदं [ २०११ जेतुवन (अद्धः शोकेन सम्पन्नो यशोधवेगसमर्पितः । यं यं प्रदेशं भजते तत्र तत्रैव पूजितः ॥१४) अनुवाद–श्रद्धावान्, शीलवान् यक्षा और भोगसे युक (पुरुष) जिस जिस स्थानमें जाता है, वहीं वहीं पूजित होता है। (चुल) सुभादा ३० ४-दूरे सन्तो पकासेन्ति हिमवन्तो 'वै पब्वता । असन्तेय न लिम्सम्ति रतिख्ताि यया सरा ॥ ११ (दूरे स्वन्तः प्रकाशन्ते हिमवन्त इव पर्वताः । असन्तोऽत्र न चुक्यन्ते रात्रिदिप्त यथा शराः ।१ ) अनुवाद–सन्त ( जन ) बूर होनेपर भी हिमाछय पर्वत (फ्री ) घवळ चोटियोंी भाँति प्रकाते हैं, और अन्त थहीं ( पासमें भी ) होनैपर, शत पॅके वाणी भाँति गहीं दिखाई देते । अकेडी विहरनेवाले ( थेर) १ ०१-एकासनं एक्सेय्यं एकोचमातन्द्रितो । एको दमयमत्तानं वनन्ते रमितो सिया ॥११॥ (एकासन एकशय्य एकश्चरन्नतन्द्रितः। एको दमयमात्मानं घनान्ते रतः स्याद् १३) अनुवाद--एकही शासन रखनेवाला, एक झस्य रखनेवाओं, अकेळा विचरनैवाका ( वन ), आळस्यरहित थे, अपनेको दमन कर अकेला ही वनान्तमें डमण करे । २१–अकीर्णवर्ग समाप्त २२–निरयवर्गो । - जेठबन सुन्दरी (परिभ्राजिका ) ३०६-प्रभूत्वादी निरयं उपैति यो वापि कत्वा ‘ न करोमी' ति चाह । उभोपि ते पेच समा भवन्ति निहीनकम्मा मनुजा परय ॥ १॥ (अभूतवादी नियमुपेत, यो वाऽपि कृत्वा न करोमी' ति चाह । उभावपि तौ प्रेत्य समा भवतो निहीनकर्माणौ मनुजैः पत्र ॥१॥ अनुवाद-ऑसस्यवादी नरकमें जाते है, और वह भी जो कि करके ‘नहीं किया'-कहते हैं। न ही प्रकारके वीचकसें करने चाले मनुष्य भरकर समान होते हैं । राजगृह (वेणुबन ) ( पाप फलानुभवी आणी ) १०७-कासावकण्ठा वइचो पापघम्मा असन् मता । पापा पापेहि कम्मेहि निरयन्ते उप्पञ्जरे ॥२॥ [ १३५ १३१] धम्मपट्टी [ २२७ (काषायझूठा बहवः पापधर्मा असंयताः । पापाः पापैः कर्मभिर्निरयं त अत्पद्यन्ते ॥श) अनुवाद-फछमें काषाय-वस्ड) डाळे कितने ही पापी असंयसी हैंजो पापी कि (अपने ) पाप कमसे नरको टल्पन्न होते हैं । वैशी ( वणुऊदातीरवासी मिg ) ३०८-सैय्यो अयोग्लो सुत्तो तो अग्गिसिखूपमो। यो सुनेय्य दुस्सीलो रहपिण्डं असश्चतो ३ ॥॥ (श्रेयान् अयोगोल शुकस्तसोऽग्निशिखोपम'। यच्चेद् भुञ्जीत हुशील राष्ट्रपिंडं असंयतः ॥३) अनुवाद--असंयमी दुराचारी हो राष्ट्रका पिंड [=देशका अक्ष } ( खानेसे अग्निलिखाके समान तप्त झहेका गोला खाना उत्तम है । खेम (ठीपुत्र ) ३०६-तारि ठानानि नरो पमत्तो आपजती परदारूपसेवी । अपुत्रलाभं न निकामसेय्यं निन्दं शतीयं निरयं चतुत्यं 8॥ (चत्वारि स्थानानि नरः प्रमत्त आपद्यते परदारोपसेवी। अपुण्यलाभे न निकामशय्यां निन्दां तृतीयां निरयं चतुर्थम् ॥ ४॥ ३१०-अपूर्वताभो च गती च पापिका, मीतस्स भीताय रती च योक्ति। २७ ॥ निरयवगो [ १३७ राजा च दण्डं गरुक पणेति तस्मा नरो पहारं न सेवे ॥१॥ ( अपुण्यलाभश्च गतिश्च पापिका, भीतस्य ओतया रतिश्च स्तोकिका । राजा व ठंडी शुरुकं प्रणयति तस्मान् नरो परदारान् न सेवेत ॥ ५॥ अनुवादप्रसावी परस्त्रीणामी मनुष्यकी चार गतियाँ हैं-अपुण्य

  • का लाभ, सुखसे न निद्रा, तीसरे निन्दा, और चौथे नरक ।

(अथवा) अपुष्यासबुरी गति, भयभीत ( दुरुष की, भयभीत (जी )ले अत्यक्ष रति, और राजाका भारी दंड देना, इसलिये मनुष्यको परस्त्रीगमन न करना चाहिये। बेतवन कटुभाषी ( भिक्षु) ३११-कुसो यथा दुर्गहीतो हयमेवानुकन्तति । सामन् जो दुष्पारामठं निरयायुउपकडूदति ॥६॥ (कुशो यथा दुगृहीतो हस्तमेवाऽनुकृन्तति । श्रमण्यै दुष्परामृष्ट' निर्यायोपकर्षति ॥ ६ ॥) अनुवाद--वैसे ठीकसे न पकडनेसे ऊस झाथको ही ठेवता , ( इसी प्रकार ) असणपन (=संन्यास ) ठीकसै अहण न करतेपर नरकमें ले जाता है। ९ ३ १२ज्यं किञ्चि सिपिलं कर्म सकिलिई च यं वतं । सकस्सरं ब्रहचरियं न तं होति महप्फलं ॥७॥ १३८] धम्मपदं [ २३९ (यत् किंचिव शिथिी कर्म संक्लिष्ट' च यद् श्रतम्। सैकृच्छे ब्रह्मचर्यं न तद् भवति महत्फलम् ॥ ७॥ अनुवाद-—जो कईं कि शिथिछ है, जो बात कि बळेश (=अछ )-क्षुक है, और जो ब्रह्मचर्यं अद्ध , वह महाफळ (बय) नहीं होता । ३१३-कयिरळ्वे कथिरायेनं दृळ्हमेनं परक्कमे । सिषिलो हि परिचानो भिय्यो आकिरते रजो ॥८॥ (कुर्याचे कुलीनैतद् दृढमेतत् पराक्रमेत । शिथिलो हि परिव्राजको भूय आकिरते रुजः ॥८॥ अनुवाद-यदि ( प्रव्रज्या झर्भ ) करना है, तो उसे करे, उसमें 6 पराक्रमके साथ करा जावेठीक ढाळा परिव्राजक (= संन्यासी ) अधिक मछ बिखेरता है । जैतवन ( कई ईष्र्याछ बी ) ३१४--अक इक्कतं सेय्यो, पण तपति सूक्तं । तव सुकतं सेय्यो यं कवा नानुतप्पति ॥e॥ (अकृतं दुष्कृतं श्रेयः पश्चात् तपति दुष्कृतम् । ऋतं च सुकृतं श्रेयो यत् कृत्वा नानुवष्यते ॥९) अनुवाद--युकृत (=पाप )का छ करना श्रेष्ठ है, दुष्कृत फरनेवाश्च पीछे धनुताप करता है, सुद्धताका करना श्रेष्ठ है, जिसको वरहे ( मनुष्य ) अनुताप नहीं करता। २श1२] चिरयवर्णो [ १३९ जतवन बहुवसे भिक्षु ३१५-नगरं यथा पचन्तं गुत सन्तवाहिरं । एवं गोपेय अत्तानं स्खणे वे मा उपचगा। खणातीता हि सोचन्ति नियम्हि समष्पिता ॥१०॥ (नगरं यथा अत्यन्तं गुप्त' न्तर्याम् । एवं गोपयेदात्मानं क्षणं वै मा उपालिगाः। क्षणऽतीता हि शोचन्ति निरये समर्पिताः ॥१० ) अनुवाद-जैसे समान्तका मगर (ऋषद ) भीतर वाइरसे खूष शक्षित होता है, इसी प्रकार अपनेको रक्षित रखेक्षण भर भी न छोडे; क्षण चूछ जानैपर सरफमें पढकर शोक करना पडता है । बेतवन (बैमसाठ ) ३१६-अलज्जिता ये लज्जन्ति ललिता ये न करे । मिच्छदिविसमाना सत्ता गच्छन्ति दुर्गाति ॥११॥ (अळजिता थे ,जन्ते लजिता थे न लजन्ते। मिथ्यादृष्टि समादान खवागच्छन्ति दुर्गतिम् ॥१श) अनुवाद---अलोन( के काल में जो कब करते , और का ( के काम में जो कण नहीं करते, वह भी धारणावाने आण दुर्गतिको प्राप्त होते हैं। ३१७-अमये च भयदस्सिनो भये च अमयदस्सिनो । मिच्छदिक्रिसमादाना सत्ता गच्छन्ति दुर्गाति ॥१२॥ १४० ॥ घास्पदं [ २१४ (समये च भयदर्शिनो भये चाभयदर्शिनः। मिथ्यादृष्टिसमावृता । सस्वा गच्छन्ति दुर्गतिम् ॥१२॥ ) अनुवादभयरहन( क)में जो भय देखते , और भय (के काल )में भयको नहीं देतेयह झी धारणाबाहे० । ( तर्थिकशिम्य ) ३ १८-अवजे इज़ामतिनो यश्ने चावजमिनो । मिष्यादिष्ठि० ॥१३॥ (अवधे वयमतयो व चाऽवद्यर्शिनः। मिथ्यादृष्०ि १३ ) अनुवाद- औ अपमें डोपबुद्धि रखनेवाले , ( ओर) खूपले अद्य दृष्टि रखनेवाले, वह आठी धरणावाले० । ३१९-जाञ्च वजातो मला अवयव अवजतो । सम्मादिट्ठिसमाढाना सत्ता गच्छन्ति सुग्गर्ति ॥१४॥ (घञ्च च वद्यतो शत्वऽवरं चाचद्यतः। ) सम्यग्इसिमानाः सत्वा गच्छन्ति सुगतिम् ॥१४) अनुवाद:-दोषको दोष जानकर और अवोपको अप नान, ठीक धारणवाळे प्राणी सुगतिकी प्राप्त होते हैं। २२-निरयवर्ग समाप्त थपथम्यंम् । २३--नागवग्गो बdवन आनन्द ( थेर) ३२०-अहं नागोष सगामे चाप पतितं सरं । अतिवाक्यं तितिक्खिस्सं दुस्सीलो हि बहुजनो ॥ १ ॥ (अहं नाग इव संग्रामे वापतः पतित” शरम् । अतिवाक्यं तितिक्षिप्ये, दुश्शला हि बहुजनाः ॥१) अनुवाद-जैसे युद्धमैं हामी धनुषसे गिरे शरको ( सहन करता है ) वैसेही मैं कटुवाक्योको सहत कX; ( संसारमें तो ) दुःशीळ आदमी ही अधिक है। ३२१-दन्तं नयन्ति समितिं दन्तं राजाभिल्हति । द्वन्तो सेटो मनुस्सेसु योतिवाक्यं तितिर्खति ॥२॥ (दान्तनयन्ति समितुिं वान्त' राजाऽभिरोहति । दान्तः श्रेष्ठो मनुष्येषु योऽतिवाक्यं तितिक्षते ॥२) अनुवाद-दन्त (=शिक्षित ) (झाथी )को युद्धों के जाते हैं, १४२] धम्मपदं [ २३५ दान्तपर राचा चढ़ता है, मनुष्योंभी दान्त (=सहनपीछ ) भेड है, जो कि कटुवाक्योंको सहन करता है। ३२२-ब अस्सत्ता दन्ता आजानीया च सिन्धवा । कुज़ारा च महानागा अत्तन्ते ततो वरं ॥३॥ (घरमदवता दान्ता आजानीयाश्च सिंधवः। कुंजरा महानागा आरमदान्तस्ततो वरम् ॥३) अनुवाद-भघ , उत्तम खेतके सिन्थी घोड़े, और महानाग हाथी दान्त (=विक्षित ) होनेपर श्रेष्ठ हैं, और अपने को सन किया (पृश्य ) उनसे भी श्रेष्ठ है। तबन (चूतपूर्वं महाबत मिळ ) ३२३-नहि एतेहि यानेहि गच्छेय्य आगतं दिसे । ययाऽतना सुदन्नेन दन्तो दन्तेन गच्छति ॥४॥ (नहि पतैर्यानैः गच्छेदगतां दिशम् । यथा भना । सुदान्तेन दान्तो दान्तेन गच्छति ॥४॥ ) अनुवाद-इन (हाथी, घोड़े आदि ) यानोसे, विमा गई दिक्षा • घाटी (निर्वाण)ी और मह जाया जा सकता, संयमी पुरुष अपनेको संयम कर संयन ( इम्त्रियो )साथ (यह) = पहुँच सकता है। अतबन ( परिजिष्ण आदयपुर) ३२४-धनपालको नाम कुञ्जरो फटकम्पमैटनो दुनिवाये । वद्रो फबलं न भुञ्जति मुमरति नागवनस्स कुम्भरो ॥१॥ २२७ ॥ बाणवर्ण [ १४३ ( धनपालको नाम कुंजरो कटकप्रमेद्नो दुर्निवार्यः । बद्धः कवचै न , स्मरति नागवनं कुंजरः ॥५) अनुवाद-—सैनाको तितर बितर करने वाला, दुर्धर्च धनपालक भाभङ्ग हाथी, ( आज ) थन्धनमें पड़ जाने पर कवछ नहीं जाता, और (अपने ) हाथियोंके जंगछको स्मरण करता है। पसेनदी ( कोसळराज) ३२५-मिी यदा होति महघसो च निहायता सम्परिवचसायी । महावराहो व निवाप्युठो पुनपुनं गमभुपेति मन्दो ॥६॥ (खुद्धो यदा भघति महाघसश्च निद्रायितः सपरिवर्तशायी। महावराह इव निबाप:यु पुनः पुन' गर्भमुपैति मन्च) अनुवादकॅलो (पुरुष ) आक्सी, यहुत खाने वाला, निळकरवट घट्छ यवुछ सोने बा, तथा धाना देकर पले मोटे की भाँति, होता है, वह सन्द यार पार गर्भमें पड़ता है। ( समोर ) ३२३-ढं पुरे चित्तमचारि । चारिकं येनिच्छुकं यत्य कामं यथासुखं । तदन्ज है निगडूम्सामि योनिसो हत्यिप्यभिन्नं विय अङ्गहे ॥७॥ ( इदं पुण चितमचरत् चारिक यथेच्छं यथाकामं यथासुखम् । तथाऽहं निग्रहीष्यामि योनिशो हस्तिनं शमिवमिचांकुशम्राइ ) Itश १४४ ] धम्मपत्रे [ २३५ अनुवाद---यह ( मेरा ) चितल पहिले यथेच्छ=यथाकामजैसे सुष मालूम हुआ बैठे विचरनेवाला था; सो आज महावत जैसे मतानुष्ठे हाथीको ( पकड़ता है, वैसे ) मैं इसे जड्से पकड़ेगा। तवन कौसळराजका पावेप्यक नामक हाथी १२७-अष्पमादरता हेय सचित्तमतुखखष । दुगा उद्धरय'तानं पदं सतो व कुञ्जरो ॥८॥ (अममाद्रता भवत एवचित्तमनुक्षत । दुर्गादुद्धरताऽऽत्मानंपैके सक्क इव कुंजरः ॥८) अनुवाद-अप्रसाद (=सावधानता )में रत होओ, अपने सनकी रक्षा करो, पंक फंसे हाथीकी तरह (राग आदोिन हँसे) अपने को अपर निकाछ । बहुतने निष्ठ '३२८–सचे लभेथ निपकं सहयं सद्धिं चरं साधुविहरिषीरं । अमिभुय्य सन्यानि परिस्सयानि चरेय्य तेन’तमनो सतीमा ॥३॥ (ख चेत् लभेत निपक सहायं साई चरन्तं साधुविहारिणं धीरम् । अभिभूय सर्वान् परिस्थयान चरेत् तेनऽऽत्मनः स्मृतिमान् ।। ) २३११ ] चागवगो [ १७५ अनुवाद--यदि परिपक (- बुद्धि ) बुद्धिमान् प्रथमें विहरनेवाळा (= शिष्य ) सहचर मित्र मिले, तो सभी परिश्नयों (= विन)को हटाकर सचेत प्रसखाचित्र हो उसके साथ विहार करे। ३२६-नो चे लभेय निपकं सहायं सद्धिं च साधुविहारिवीरं । राना 'ख रट्ठे विजितं पहाय एको घरे मातङ्ग भव्लेव नागो ॥१०॥ (ल चेल् लभेत निपक सहायं खाद्धं चरन्तं साधुविहारिणं धीरम् । राजेब ' विजितं प्रदाय, एकलरेत् मातंगोऽरण्य इव नागः (१०) अनुवाद-यदि परिप, इडिमान् प्रथमें विहरनेवाला सहचर • मित्र न मिले, तो राजाकी भाँति पराजित राष्ट्रको छोड़ शवराज शथीकी तरह आवेळा विचरे। २३०-एकस्स चरितं सैय्यो नथि बाले सहायिता । एक चरे न च पापानि कपिरा अप्पोत्सुको मातङ्ग 'ब्लेख नागो ॥११ (एकस्य स्वरितं श्रेयो नास्ति बाळे सहायता । एकश्चरेत् न च पापानि कुर्याद् अपोसुको मातंगोऽरष्य इव नागः ॥११ ) १० १४६ ॥ धम्मपद [ १३१३ अनुवाद-शबेळा विचारला उत्सुलभ है, ( फितु ) सूड़की मित्रता अच्छी नहीं, आगराज हाथीकी भांति अनासक हो अकेश विवरे और पाप न करे। हिमवत्प्रदेश भार ३३१-अत्यम्हि जातम्हि सुखा सहाया तुट्ठी मुखा या इतरीतने । पुल्लं सुखं जीवितासंङ्खयम्हि सब्बस दुक्खस्स सुखं पहाणें ॥ १३॥ ( अर्थे आते सुखाः सुझाया, तुटिः सुया येतरेतरेण । पुण्यं सुखं जीवितसंक्षये सर्वस्य सुखस्य सुखं प्रहाणम् ॥ १२ ॥ अनुवाद-कुंकूम पडूनैपर मिश्र सुखद (उगते हैं ), परस्पर सन्तोष हो (यह भी ) सुखद ( वस्तु) , जीवनके क्षय होने पर ( किया हुआ) पुष्य सुखद (होता है ) सारे दु-स्रोका विनाभा (=x€थ होना ) ( यह खबसे अधिक ) सुखद है। ३३२-मुखा मत्तेय्यता लोके अयो पैतेय्यता सुखा । सुखा सामर्मता लोके अयो ब्रह्मज्मता सुखा ॥१३ (सुला मानीयता लोकेऽथ पिनीयता सुखा। सुखा श्रमणता लोकेऽथ ब्राह्मणता सुखा ॥ १३॥) अनुषाद--कोकले भाताकी सेवा सुनकर है, और पिता सेवा २३३३ } लागवग [ ७७७ ( भी ) सुखकर है, अभणभाव ( =म्यास ) छकमें सुखकर है, और प्राक्षणपन (=निष्पाप होना) सुबकर है। ३३३-सुखं याच जारा सलं सुख सजा पतिष्ठिता । मुखो पब्वाय पटिलाभो पाषानं अकरणं सुखं ॥१धा (सुखं यावद् जरां शोचें सुख श्रद्धा प्रतिष्ठिता । सुखः प्रशाथाः प्रतिलाभः पापानां अकरणं सुखम् ॥ १४) अनुवाद---सुदापेतक आचारका पकन करना सुनकर है, और स्थिर अम्ब ( सत्यमें विश्वास ) सुषकर है, शशाका लाभ सुच पर हैं, और पापका न करना सुनकर है। २३नागवर्ग समाप्त २४ तण्हावग्गो । जेतुवन कपिछमछ ३३४-मतुजस्स पमत्तवारिनोतहापद्दतिमालुवा विय। सो प्लवती हुहुरं फलमिच्बं 'व वनम्मिं वानरो ॥१॥ (मनुजस्य प्रमतचारिणः कृष्ण बर्द्धते मालुवेत्र । स प्लवतेऽहरहः फलमिच्छन् इव घने चानः ॥१॥ अनुवाद –असत होकर आचरण धरनेवाळे मलायी तृण आजुबा | ( लता )की भाँति यह्ती , चनमें 'बानरकी भंति की इच्छा रते दिनोंदिन वह भटकता रहता है । १३१–यं एसा सहती जम्मि तदा लोके विभक्तिका । सोका तास प्रवदन्ति अभिवई 'व वीर्ये ॥२॥ (साहयति जन्मिनी कृष्णा लोके विपात्मिका । यं एषा शोकास्तस्य प्रबर्धन्तेऽभिवर्द्धमानं इव धीरणम् ॥ २॥ अनुवाद-यह ( यरायर ) जनमते रहनेवाली विपरूपी तृष्णा जिको पकड़ती है, वर्जनशील औरण (= घटाई यमानैका एक गुण ) की भाँति उसके शोक पवते हैं। १४८ ॥ २५ ॥ तण्हावग्ग [ १७९ ३३६न्यो चैतं सहती जम्भिं तयहं लोके दुर्घ्ययं । सोका तम्हा पपतन्ति उदबिन्दू 'व पोखरा ॥३॥ ( यश्चैतां साहयति जन्मिनीं तृष्णां लोके दुरययाम् । शोकाः तस्मात् प्रपतन्युदविन्दुरिव पुष्करात् ॥ ३ ॥ अनुवाद--इस घराघर जनमते रहनेवाळी, झ्यालय तृष्णाक की चकृमें परास्त करता है, उससै शोक (वैसे) गिर जाते , जैसे कसल-पत्र से जरुका विन्छु । ३३७-तं वो वदामि भद्रं वो यावन्तेत्य समागता। पहाय मूलं कण्थ उसीरत्पो व वीरणं ॥३॥ (तद् वो वदामि भदधो यावन्त इव समागताः । तृष्णया भूलं खनतोशणणैव बीरणम् ॥ ४ ॥ अनुवाद-ऽलिये तुम्हें कड़ता जितने यहाँ आये हो, मुम्हारा सधका संगछ है, जैसे बसके लैिये कोण पीरको बचते हैं, वैसे ही इस तृष्णाली अञ्चको बोवो । गूय-कर-पोविक ३३८–ययापि मूले अनुषवे दळूहे विलोपि रुखो पुनरेवं रूहति । एवम्यि तण्हाळसये अनूझते निव्वत्तति दुक्खमिदं पुनपुनं ॥१॥ (यथाऽपि मूलेऽनुपद्रवे बड़े छिन्नोऽपि वृक्ष पुनरेव रोहति। एवमपि दृष्णऽनुशयैशनिहते निवर्तते दुखमिदंपुनः पुनश) अतबन ०५० ॥ धम्मपत्रे [ २०१ अनुवाद-—से जमकै ल और म की होनैपर क्या हुआ भी पूरे फिर उग आता है, इसी प्रकार तृष्णारूपी अनुसार (= अरु ) के न मg नैपरयह दु फिर फिर पैर होता है । ३ ३६-स्स छतिंसती सोता मनापासवना मुसा। थाहा वहन्ति दुद्दिष्टं सकम्पा रागनिम्सिता ॥१॥ ( यस्य पत्रंशत् श्रोतांसि मनापश्रयणानि भूयासु । यादो यन्ति दुष्टgि संकल् गगनष्ठताः ॥ ६ ॥ अग्नगद–जिसने, मतीस यौन मनरो अपनी प्रणाली (श्री) को ही आनैयाले हे, ( उपके लिए ) शणप्ति मथस्प स्पी थाहुन पुरी धारणाओफ पाहन करते हैं। ३४०-मति मन्यघि मोना लना उभिन्य तिति । तत्रच श्रिया। लतं जानं मूलं पलए भिन्न ॥ १॥ (नाम्नि प्रयतः श्रोतांसि लग उशि पि। ग ध ना ढगां जातं , मुद्रं प्रश्ण दिन ' ) गुद-- यe ) गण ॥ । ४५ " घरों ५, ( fभः । ( का की *** नहीं थे, ए २०१० / तण्हावग्ग [ १५२ उपक्ष हुई रुखको जानरप्रशसे ( उसकी) जडुको कटौ । ३४१-सरितानि सिनेहितानि च सौमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो। ते सोतसिता मुसिनो ते वे जातिजलपगा नरा ॥८॥ (सरितः निग्धाश्च सौमनस्या भवन्ति जन्तोः । ते स्रोतभ्युताः सुखैषिणस्ते वै जातिकरोपगा नराः ॥८॥ ) अनुवाद--( यह ) ( तृष्णा रूपी ) नदोिषं स्निग्ध और प्राणियोंके चिराको खुश रफ्नैवाली होती हैं (जिनके कारण ) नर स्रोतों जंघे, शुषी खोज करते, जन्म और जराकै फैर्में पड़ते हैं । ३४२-सिणाय पुरुखता पजा परिसर्पन्ति सस 'ख चापि । सब्लोजनसड्ग सत्तका दुक्खमुपेन्ति पुनर्युर्न चिराय ॥४॥ (तृष्णयापुरस्कृताः प्रजाः। परिसर्पन्ति शश ङ्घ बखः। संयोजनसंगतका दुखसुपयन्ति पुनः पुन चिराय॥२) अनुवाद-तृष्णकै पीछे पड़े प्राणी, वंचे स्वरगोशकी भाँति चङ्गर काटते हैं; सयोजनों (=जनके बंधन )में से ( जन ) पुनः पुनः चिरकाल तक इस्त्रको पाते हैं। १४३-सिणायपुखताजा परिसर्पन्ति सस चावितो । तस्मा तसिनं बिनोदये भिक्खू अकी निरागमतनो ॥१०॥ (तृष्णया पुरष्कृताः प्रजाः परिसर्पन्ति शश इव द्धः । १५२] धम्मपद [ २४२ तस्मात् तृष्णं विनोदयेद् भिक्षुराकांक्षीही विरागमात्मनः ॥१०) अनुवाद--तृष्णाके पीछे पड़े पाणी बँधे बरगोशकी भाँति बकर काटते हैं, इसलिए मिश्रको चाहिए कि वह अपने वैराग्यकी इच्छा रयतृष्णाको दूर करे। विमन्तफ (भित्र) ३१४–यो निब्बनथो वनाघिसन्तो वनसुत्तो वनमेव धावति । तं पुगलमेव पस्थ क्षुत्तो बन्धनमेव धावति ॥११॥ ( यो निर्माणार्थं धनऽधिष्ठको धनमुको घनमेव धावति । तुं पुद्गळमेव पश्यत सुको बन्धनमेव धावति ॥११) अनुवाद--शे निर्वाणकी इच्छा बाश (पुरुष ) व(दृष्णा )से सुक हो, वनसे सुसुक्क हो, फिर धन (=तृष्णा ) ही की ओर देखता है, उख व्यकिक ( वैसे ही ) जान जैसे कोई (यन्धन से मुक्क (पुरुष) फिर यन्धन ही की ओर दें। जतवन गन्धनागार ३ ७१-न तं दळूहं वन्धनमाहु धीरायद्यसै दारुनं पञ्चवणञ्च । सारतरत्तामणिकुण्डलेसु पुत्रेषु दासु च या अपेक्खा॥ १९॥ (न तद् दृढं बन्धनमाहुर्धारा थद् आयलं दारूतं पर्वीच । २७१७ } तदावा [ १५३ सर्वदुक्ता मणिकुंडलेषु पुत्रेषु दारेषु च याऽपेक्षा ॥१३) अनुवाद-( यह ) जो लोहे छकडी या रस्सीका यन्धन है, उसे बुद्धि आन ( जन ) इदं यन्धन नहीं कहते, ( वस्तुत: इट्स बन्धन है जो यह) घन(=सारख)में रुक होना, या सणि, कुष्ठक, पुत्र स्नुनै इच्छाका होना है। ३ ४६-एतं दब्दं वन्धनमाहु धीरा ओोहारिने सिथितं दुष्यमुञ्चं । एतपि चेवन परिस्बजन्ति अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥१३॥ (पतद् दृढं बन्धनमाहुर्धा क्षपहारि शिथिी दुष्पमोचम् । एतदपि छित्वा परिचजन्य नपेक्षिणः कामसुखं अहाय ॥ १३ ॥) अनुवाद--धीर पुरुष इसीको इट्स बन्धन, अपरक शिथिछ और तुरयाज्य कहते हैं,(वहे) अपेक्षा रहित हो, तथा कासमुखों- को छो, इख (ख) यन्चनको छिलकर, प्रव्रजित होते हैं। राजगृह (वेणुवन) मा (बिम्बसारमहिषी ) ३४७-थै रागतांनुपतन्ति सोते सयं कृतं मक्कको ’व झालं । एतपि चेवान बलन्ति धीरा अनपेक्खिनो सव्वदुक्खं पहथ ॥ १४॥ ५६ ] धम्मपदं [ २१६ ( थे रागरका अनुपतन्ति स्रोतः स्वयंकृतं मर्कटक इव जालम्। एतदपि छित्वा भजन्ति धीरा अनपेक्षिणः सर्वदुःखं प्रहाय ॥१४॥ अनुवाद—जो रागमें रक , वह जैसे मक़ी अपने यनायै आख्में पड़ती है, ( वैसे ही ) अपने बनाये, नोतमें पड़ते , और ( पुरुष ) इख (स्रोत )को भी छेद कर सारे इलोंको द्व आकांक्षा रहित हो चल देते हैं । राजगृह ( वेणुवन ) उगमसेन ( १ ) ३४८-झुड़ पुरे भुञ्च पच्यतो मन्के मुञ्च भवस पारणे । सञ्चत्य विमुत्तमानसो न पुन जातिनरं उपेहिसि ॥११॥ (मुंच पुरो विपक्ष मध्ये मुंच भवस्य पारगः। सर्वत्र विमुकमानसो न पुनः जातिजरे उपॅपि ॥१५) अनुवादआगे पीछे और मध्य ( सभी वस्तुओंको ) त्याग दे, (और उन्हें छोड) भव(सागर)के पार हो जाओ; जिसका मन चारों ओरमे सुरू हो गया, (ब) फिर जन्म और जरा को माप्त नहीं होता । ( शुक्ल ) पशुगर पटि ३४६ -वितरूपमयितम्स नन्तुनो तिवरागम्ससुभानुपसिनो। भिथ्यो ताहा पनातिएनो खोट करोति पन्धनं ॥१६॥ (घिनर्कश्रमथिनम्य न्नः तमगम्य शुभाऽनुदर्शिनः । भूयः दृष्णा प्रवर्द्धन र रगलु रथं करोति यन्धनम् ॥१३) चतवन २४l६८ ॥ तण्हावग्ग [ ५५५ अनुवादओ प्राणी सान्वेइसे ' मथित, तीच रागसे युक्त सुन्दर ही सुन्दरको देखने वाला है, उसकी तृष्णा और भी अधिक ' यती है, वह (अपनेफिट्) औरभी पूढ घन्धन सय्यार करता है। ३१०विकूपसमे च यो रतो असुभं भावयति सदा सती । एस खो व्यनिकाहिनी एसच्चेज्जति मारबन्धनं ॥ १७॥ (वितकपशमे च यो स्तो शुभंभावयते सदा संस्मृतः। एष खलु । ध्यन्तीकरिष्यति पप छेत्स्यति मारबन्धनम् ॥१७॥ अनुवाद--सन्देहके क्षान्त फरनेमें बौ रत है, सबैत र ( जो ) अशुभ (छवियाले अन्धेरे पहल) की भी सवा भावना करता है। यह मात्रै बन्धनलको कि करेगा, बिनाश करेगा। अतबन ३११निर्वहतो असन्तासी वीतयहो भनझणो । उच्छिल भवसल्लानि अन्तिमो'थै समुस्सयो ॥१८॥ ( निष्ठांगतोऽसंत्रसी वीततृष्णोऽनंगणः । उत्सृज्य भवशल्यानि, अतिसोऽयं भुङ्कयः ॥१८) अनुवाद--जिंखले ( पापघ्षय ) समाप्त हो गये , जो भ्रास-उत्पादक नहीं , जो तृणारहित और मलरहित है, वह भवकै शल्योको उखाडेगा, यह उसका अंतिम दैदी है। १५६] धम्मपर्व [ २०२० २५२-बीतताहो अनाढ्नो निवतिपकोविदो । अक्खरानं सन्निपातं जला पुष्चापरानि च । स वे अन्तिमसारीरो महापन्न' ति वुञ्चति ॥१६॥ ( वीततृष्णोऽनादानो निरुक्तिपदकोविदो। अक्षराणां सन्निपातं जानाति पूर्वापराणि च । स वै अन्तिमशारीरो महाप्राज्ञ इत्युच्यते ।१५) अनुवाद-- तृणारहित, पपिहित, भाषा और कार्यका जान कार है; और (जो) अक्षरोके पहिले पीछे रखनेफो जानता है, यह निश्चय ही अन्तिम शरीर गया तथा अहमाश कहा जाता है। वाराणसीसे गयाके रास्ते॥ उपक़ ( आबायझ ) १५३-सन्यामि सत्यविद्हमस्मि फ़न्सु धम्मेय् अनूपलितो । सभ्यञ्जहो तहखये विमुत्तो सयं अभिनय कमुद्दिसेय्यं ॥२०॥ । (सर्वाभिभूय सर्वविद्मम्मि सर्वेषु धर्मेप्यनुपलिप्तः सर्यजतः तृष्णाक्षये विमुक्त म्चयमभिमय यमुदिशेयम् ॥ २० ॥ अनुवाद--# (tण आदि) सभा परास्त परनैषा हैं (४ सुहि भाने) समी.(यानं )य जानकार , आर्भ |ाथे धर्मा (-पथ)में अलिप्त , अर्गणागी, नाशने २।२२] सण्हावग्ग [ १५७ जवन ७ सुक हैं (बिमल ज्ञानको ) अपने ही जानकर ( मैं अय ) किसको ( अपना शुरु ) थतयाउँ १ सक देवराज ३१४–सन्नदानं धम्मदानं जिनाति सव्वं रासं धम्मरसो जिनाति । सनं रतिं । धम्मरती जिनाति तण्हक्खयो सम्बदुक्खं जिनाति ॥२१॥ ( सर्घदानं धर्मदानं जयति सर्वं रजो धर्मरसो जयति । सवीं एतं धर्मरतिर्जयति तृष्णाक्षयः सर्वदुग्धं जयति ॥ २१ ॥ अनुवाद--धर्मका दान सारे द्वानोंले यज्ञकर है, धमॅरख सारे सोसे अबक है, धर्ममें रति सय रतियोले यद्वकर है, तृष्णाका विनाश सारे दुःखको जीत लेता है। ( स्भपुत्र भेटी ) ३१५-इनन्ति भोग दुन्मेषं नो चे पारगवेसिनो । मोगतह्य दुम्मेघो हन्ति अज्लेष अत्तनं ॥२२॥ (मन्ति भोगा दुर्मेधसै न चैव पारगवेषिणः । भोगतृष्णया दुर्मेधा इत्यन्य इवात्मनः ।। २२ । ) अनुवाद-(संसारको ) भार होनेकी कोशिश न करनेवाले दुईद्धि (पुरुष )को भाग नष्ट करते हैं, भौगी तृष्णामें पडनर (वह) इऍद्धि परायैी भाँति अपने हीको हनन करता है। जैतवन २२६ ] सण्हावग्ग [ १५१ ३१६-तिण्दोसानि खेलानि इच्छदोमो अयं पजा । ' तस्मा हि विगतिच्केसु विनी होति महप्फलं ॥२६॥ (ऋणद्याणि क्षेत्राणि, इच्छादोषेयं प्रजा । तस्माद्धि विगतेच्छेषु दत्तं भवति महाफलम् ॥ २६ ॥ अनुवाद-तोफा डोष सुण है, इस प्रका दोष इच्छा है इसहियै विगतेच्छ(=इच्छारहित)को वेनेमें महाफल होता है। २४-तृष्णावर्ग समाप्त २५५ } भिक्खुवगो [ १६१ अनुद्माद-कायाका संवर (=सँयम ) ठीक , ठीक है वचनका संवर मनका संवर ठीक है, ठीक है सचैत्र ( इन्द्रियों)का संवर; सर्वत्र संवरभ्युक भिक्षु सारे ङ खोसे छूट जाता है । ईसधातक (भिश्च ) ३६२-हत्यसब्बतो पावसज्जतो वाचाय सज्जतो सध्यतुत्तमो । अक्फतरते समाहितो एक सन्तुसितो तमाहु भिक्खू ॥३॥ (हस्तसंयतः पावसंयतो वाचा संयतः संयतोत्तमः । अध्यात्मरताः समाहित एका सन्तुष्टस्तमाहुभिक्षुम् ॥३) अनुवाद--जिसके हाथ, पैर और वचनमें संयम है, (जो) उत्तम संयमी है, जो घटके भीतर (=अप्यात्स ) रत, समाधियुत अशा (और ) सन्तुष्ट है, उले भिक्षु कहते हैं। जैतवन ३१३-यो भुखसंमतो मिक्खू मन्तभागी अनुद्धतो। अत्यं धम्मच दीपेति मधुरं तस्स मासितं ॥ ४॥ (यो भुखसंयतो भिऋमैत्रमाणी, अनुद्धतः । अर्थ धर्म व दीपयति मधुरं तस्य भाषितम् ॥७॥ ) अनुवाद-च्छ सुबमें संयम रखता है, मनन करने योकता है, उखत नहीं है, अर्थ और धर्मको प्रकट करता है, उसका भाषण मधुर होता है । अम्माराम (घेर) ३६ ४-थम्मारामो धर्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं । धर्मं अनुस्सरं मिक्खू सद्धम्मा न परिहयति ॥१॥ ११ १६२ ॥ धम्मपदं [ २५७ ॥ (धर्मारामो धर्मरतो धर्म अनुविचिन्तयन् । धर्ममनुस्मरन् भिक्षुः सद्धर्मान्न " परिहीयते ॥५) अनुवाद--धर्ममें रमण ध्रनेवाला, धर्ममें रत, धर्मका चिन्तन करते, धर्मका अनुस्मरण करते भिक्षु सच्चे धर्मसे च्युत नहीं होता। राजगृह ( वेणुबन ) विपखसैबक (भिग्गु) ३६५-लाभं नातिमव्य्यु, नाल्दोमं पिइयं चरे । अब्जेसे फ्हियं भिक्खू समाविं नाधिगच्छति ॥६॥ (स्वाभं नाऽतिमन्येत, नेऽन्येषां स्पृहयन्, चरेत् । अन्येषां स्पृहयन भिक्षुः समाधिं नाऽधिगच्छति ) अनुवादकअपने लाभको अवहेछना नहीं करनी चाहिए । दूसरोंके ( छाभ )की स्पृहा न फरनी चाहिये । दूसरोंके ( भी ) हा करनेवाला भिक्षु समाधि=चिश्री पुकांप्रता ) नहीं आस रता । ३६६-अप्यलाभोपि चे भिनवू सलाभं नातिमञ्चति । तं वै देवा पसंसन्ति मुहुर्विं अतन्दितं ॥७॥ (अल्पलाभोऽपि वै भिक्षुः मलाभं नानिरम्यते । ते वै देवाः प्रशंसन्ति शुचाऽऽजीपं अनन्दितम् ।) अनुपाद–आटे ७ष की हो, भिक्षा मापने कभी भद्रेफम ग । उसीको देग प्रशंसा करा है, (जो) शु पिराशन और माषम्यशदिन है। २०१० ] ' १६३ ( पाँच अप्रदायक भिg ) ३६७-संश्रवसो नाम-रूपमिं यास्स माथि ममायितं । असता च न सोचति स चे भिक्खूति दुष्यति ॥८॥ ( सर्वेशो नामरूपे यस्य नास्ति ममापितम् । असत व न शोचति सवै भिक्षुरित्युच्यते ॥८) अनुवादळामन्रूपव(ञ्जगत में किसी पिकुछ ही समता नहीं, न होनैपर ( ) भोक नईं करता, वही मिसु कक्ष जाता है। ववन बहुतसे सिद्ध ३६६-ताविहारी यो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्गरूपसमं सुखं ॥६॥ (मैबिहारी थ भिक्षुः प्रसभो शुद्धशासने । अधिगच्छेद पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् । अनुवाद-- संगी(भावना )से विहार क्रूरता को भिक्षु इडी उप वेशमें प्रसज्ञ (=श्रद्धावान् ) बहता है, (बह ) सभी संस्कारों को आसन करनेवाले शान्त ( और ) सुखमय षद्को आप्त करता है। ३६६-सिब मिक्खू । इमं नावं सिता ते लङगेम्सति । जैत्वा रागश्च दोसञ्च ततो निर्माणमेहिसि ॥१० (सिंच सिताइम वार्षे सिक्का छघुवं एष्यति । ड्वाि पर्ण व दोघे व तो निर्वाणलेष्यति ॥१०) + / १६ ४ ] धम्क्षपदं { २५:२ अनुवाद-~है मिछु ! इस नवको उलीच, उछीचने पर ( यह ) तुम्हारे लिये ही हो जायेगी। राग और हेपको पैदल, फिर तुम निर्वाणको प्राप्त होगे । ३७०–पंच विन्दे पञ्च जहे पदवुत्तरि भावये । पञ्च सञ्जातिगो भिक्खू ओोषतिण्णगेति युज्वति ॥११॥ (पंच छिन्धि पंच जहीहि पंचोत्तरं भावय । पंचखेगातिगो भिक्षुः, 'ओघतीर्ण' इत्युच्यते ॥१) अनुवाद--( जो रूप, राग, मान, उबतपना और अथिया इन ) ॐ पाँचको छेदन करे, ( जो निस्य आस्माकी कल्पना, शन्नेह, शीलवत पर अधिक जोरभगोमें राण, और प्रसिहिंसा इन ) पाँचक्र त्याग फरे; उपरान्त ( जो अब, जीर्य, स्टूति, समाधि और अभ्झा) इन पंचको भावना फरे ( जो, राग, दोप, मोह, मान, और शठी धारणा हुन ) चके संसर्गको अतिक्रमण फर चुका है, ( ग्रह काम, भार टि और अबिथारूपी ) ओघो=पातं )से उशीर्ण हुआ कहा जाता है । ३७१–आय भिक्खू । च पामहे। मा मा ते कामगुणे भमस्थं चित्तं । या लोहलं गिली पमत्तो मा कंदी इखमिदन्ति दय्मानो ॥ १३॥ (ध्याय भिन्न ! मा च प्रमादः मा में कामगुणे प्रमखु चित्रम् । २५५ ] भिक्नुवम्रो [ १६५ म लोइगोलं गिल अमतः मा हिन्दीः दुश्चमिदमिति वद्यमानः ॥१२) अनुवाद-- भिक्षु ! ष्यागने कगो, संत गफछत करो, तुम्हारा चित्र भत भगोके चरमै पर्छ, प्रसन्न होकर मत छहैके गोलेको निंगलो, { हाय ।) थ दुखकहकर दग्ध होते ( पीछे ) अत इदं क्रन्दुत करना पड़े । ३७२-नत्थि फानं अपद्मस पब्ला नथि अकायतो । यम्हि जानश्च पद्मा च स वे निवासन्तिके ॥१३॥ (नास्ति ध्यानमग्नलस्य प्रज्ञा नाऽस्त्यध्यायतः । यस्मिन् ध्यानं च प्रज्ञा च सर्वं निर्वाणाऽन्तिके ॥१३) अनुवाद--प्रशविहीन (पुरुष )को ध्यान गर्दा ( होता ) है, ध्यान (एकाग्रता) न करनेवाले प्रज्ञा नहीं हो सकती। लिस्में प्यात और माझा ( दोनों) हैं, वही निर्वाणके समीप है। ३७३-सुब्यागारं पवितस्स सन्तचित्तस्स भिक्खुनो। अमालुसी रती होति सम्माधम्मं विषस्सतो ॥११॥ (शम्यागारं प्रविष्टस्य शान्तचितस्य मिश्रीः । अमानुषी रतिर्भवति सम्यग् धर्मे विपश्यतः ॥१) अनुवादशून्य-पाकान्त ) गुइनें प्रविष्टे, शान्तचित्त भिक्षुको अली प्रकार धर्मका साक्षात्कार करतेअमानुषी अति (=आनंड ) होती है । ३७8-यतो यतो सम्मसति खन्धानं उद्यद्वयं । तमती पीतिपामोल्लं असतं तं विजानतं ॥१५॥ १६६ ] धम्मपर्व [ २५७ (यतो यतः संमृशति स्कन्धानां उद्यव्ययम् । लभते प्रोतिप्रामोघं अमृतं तद् विजानताम् ॥ १५ ॥ अनुवाद—( पुरुष ) जैसे जैसे ( रूप, वेव्ना, संज्ञा, सस्कारविशन इन ) पाँच स्कन्धोकी बहपति और द्विनाश पर विचार करता है, ( वैसे ही , वह ) शानियोकी फीति और प्रसद ( रूपी ) अमृतको प्राप्त करता है । ३७१-तत्रायमादि भवति इव पद्मस्स भिक्खुनो। इन्द्रियगुत्ती सन्तु पातिमोक्खे च संवरो । मिते भजम्मु कल्याणे सुद्धानीवे अतन्दिते ॥ १६॥ ( तशाऽयमादिर्भवती शशस्य मितः । इन्द्रियगुप्तिः सन्तुष्टिः आतिमोक्षे व संबर। शिाणिभजस्य कल्याणानि युद्धजीवान्यतन्द्रितानि॥१८) अनुवाद—यहाँ प्रा भिक्षुको आदि( ने करता ) –इन्द्रिय संयम, सन्तोष और प्रातिमोऑ(=भिक्षुओके आचार )ी रक्षा । ( बह, इसके लिये ) निरासशुद्ध जीविकाया, अच्छे मित्रोंका सेवन करे। ३७६ -पटिपन्यावृत्तस्स आचारकुसलो सिया । ततो पामोन्नबहुलो दुखस्सन्तं करिस्सति ॥१०॥ (प्रतिलैस्तारवृत्तस्याऽऽचारकुशलः स्यात् । ततः प्रमोऽयमुले दुःखस्याऽन्नं फरिष्यति ॥१७) अनुवाद-— सेश भरकर प्रभामा सथा आधारपार}} निपुण है, यह सानन्ट डु गएका इन्ल फरेरा। २५२० ॥ भिक्खुवर्गो [ १६७ पाँच सौ भिक्षु ३७७-वस्सिका विय पुष्पानि मद्दवानि पमुञ्चति । एवं रागश्च वोसञ्च विन्यसुथ भिक्खवो ॥१८॥ (वर्षिका इव पुष्पाणि भवितानि प्रमुंचति । एवं रागं च वेषं च विप्रमुचत मिक्षयः ॥१८॥ अनुवाद-जैसे जुड़ी हुइळाये झोंको छोड देती है, वैसे ही है। मिथुओ ( तुम ) राग और हर्षको छोड़ दो। जतवन ः ( शान्तकाय थेर) ३७८-सन्तकायो सन्तवाचो ‘सन्तमा मुसमाहितो । वन्तलोकामिसो भिक्खू उपसन्तो 'ति वुञ्वति ॥१॥ (शान्तकाय शान्तवा शान्तिमान् सुसमाहितः । घाटछोकाऽऽमिषो भित्र उपशान्त' इत्युच्यते ॥१२॥ अनुवाद-आपा (औरवचनले शान्त, भली प्रकार समाधियु, शान्ति सहित (तथा ) कोलके आसिषो वसन कर दुिवै हुए भिक्षुको ’उपधान्तकहा जाता है । लुइगूळ (येर) ३७-भत्तना चोदयत्तानं परिवासे अत्तमत्तना । सो अगुतो मतिमा सुखं भिक्खू विहाहिसि ॥२०॥ (आत्मना चोदयेदात्मानं प्रतिवसेदात्मानं आत्मना । स आत्मगुप्ताः स्मृतिमान् सुखं मिझो विहरिष्यसि ॥२० १६८] धम्मपदं [ २५२३ अनुवाद-( जो ) अपने ही आपको प्रेरित करेग, अपने ही आपके सग्न करेगा; वह आमशुरु (=अपने द्वारा रक्षित ) सूति-संयुक भिश्च सुबसे विहार करेगा । ३८०-श्रत्ता हि अत्तनो नाथो अत्सा हि अत्तनो गति । । तस्मा सब्जमयत्तानं अस्सं भद्रव वाणिजो ॥२१॥ ( आत्मा ह्यात्मनो नाथ आत्मा ह्यात्मनो गतिः । तस्माद संयमयात्मानं अश्व' भद्रमिव वणिक् ॥२१॥ अनुवाद--( सल्थ्य ) अपने ही अपना स्वामी है, अपने ही अपनी एँ गति है, इसलिये अपनेको संयमी यनावेजैसे कि सुन्दर धोखेको थनिया ( संयत करता है ) । राजगृह ( वेणुवन ) वकळेि ( थे) ३८१–पामोल्लबहुलो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्वे पहुं सन्तं सखारूपसमं सुखं ॥१२॥ (प्रामोद्यवहुलो भिक्षुः प्रसन्नो शुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥२२ अनुवाद-उद् उपवेशनं प्रखम यहुत ममोड्युक मिश्च संस्कारोंको उपशमन करनेवाले मुग्मय शान्त्र पदक प्राप्त करता है। आवस्ती ( पूर्वोरम ) सुमन ( सामनेर) ३८२–यो ह वै दहरो भिक्खू युञ्जते । शुद्धसामने । सो इमं लोकं पभासेति अज्मा मृतो 'ख चम्न्दिमा ॥२१॥ २५.२३ ॥ भिक्खुवा [ १६१ ( यो ह वै बद्रो भिक्षुर्के छुद्धशासने। स इमं लोकं प्रभासयत्यश्राम मुक इव चन्द्रमा र) अनुवाद— डुि यौवनमें युद-शासन (डुबोपदेव, बुद्ध ) में संलग्न होता है, वह मैघसे शुक चन्द्रमाकी भाँति इस कोकफो मकाशित करता है। २१-मितुर्ग समाप्त २६–ब्रह्मणवग्गो जैतवन (एक बहुत अच्छु आपण ) ३८३-छिन्द सोतं परक्लम्म कामे पनुद ब्राह्मण । संखारानं खयं मत्वा अकतचूसि ब्रह्मण ! ॥१॥ ( छिन्धि स्त्रोतः पराक्रम्य कामान् प्रणुद ब्राह्मण । संस्करण क्षयं शत्वाऽकृतशोऽखि ग्रहण In१) अनुवाद-~है ब्राह्मण ! ( तृष्णा रूपी ) स्रोतको छिड़ करदे, पराक्रम फर, (और ) कामनाओंको अगावै। संस्कृत (=कृत घतुओं, ५ उपादानन्धो के विनाशको जानक, व अकृत (= कृत, निर्वाण को पानेवाला हो जायेगा। ( ऋतसे भिश्च ) ३८१-श्रढा द्वयेषु घन्मेषु पाण् होति ब्राह्मणो । अयस्ससन्ये संयोगा आत्यं गच्छन्ति मानतो ॥२॥ (यश द्वयोर्धर्मयोः पारगो भवति ग्रह णः । यथाऽस्य सर्वे संयोगा अस्तं गच्छन्ति जानतः ॥श) १७० ॥ २६७ ॥ आवृणबगो [ १७१ अनुवादञ्जय श्रावण यो धर्मा (-चिरसंयम और भावना)में पारंगत

  • हो जाता है, तय उस जानकारले सभी संयोग (=बंधन )

अस्त हो जाते हैं। जतवन ३८५-यस पारं अपारं वा पारापारं न विन्जति । वीतहरं विससृतं तमहं बूमि ब्राह्मणम् ॥३॥ (यस्य पारं अपारं वा पारापारं न विद्यते । वीतदरं विसंयुकं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३॥ अनुवाद--जिसके पार (आँख, कान, नाक, जीभकथा, सन ), अपार (=रूप, शद, रस, रूपों, धर्म ) और पारापार (=वें और मेरा ) नहीं हैं, ( क ) निर्भय और अगस है, उसे मैं ग्रहण कहता हैं। बहबद ( कोई शाखण ) ३८६-फाणिं विरलमासीनं कतकिळवं अनासवं । उत्तमयं अनुप्पत्तं तमहं भूमि ब्राह्मणं ॥४॥ ( ध्यायिनं विरजसमासीनै कृतकृन्यं अनास्रवम् । उसमार्थमनुप्राप्त ‘ तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥em) अनुवाद-( जो ) ध्यानी, निर्भालआसमयङ (=स्थिर ), कृतकृदय आस्रव (=चित्तमछ)रहित है, जिसने उसक्ष अथै (=शव्य) को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हैं। १७२ ] [ २६१ आवस ( पूर्वाराम ) आनन्द (थेर) ३८७-दिवा तपति आकिञ्चो रति आभाति चन्दिमा । सन्नद्धो खत्तियो तपति आयी तपति ब्राह्मणो । अथ सव्वमरतिं बुद्धौ तपति तेजसा ॥३॥ (दिबा तक्त्यादित्यो राधाबाभाति अन्द्रभा । स्खलद्धः क्षत्रियस्तपति ध्यायी तपति ग्रहण । अथ सर्वमहोरात्रं शुद्धस्तपति तेजसा ॥५) अनुवाद-विषमें सूर्य खपता रागको चन्द्रमा प्रकाशता , है, कवचयड ( होनेपर) क्षत्रिय सपता है, यानी (होनैपर) माझण तपता है, और खुद्ध रातदिन ( अपने ) तेजसे सय ( से अधिक ) तपता है। ( कई प्रमजित ) ३८८-वाहितपापो ‘ति ब्राह्मणो समचरिया समयोति पृच्वति । पक्वामयमत्तनो मतं तस्मा पञ्वनितो' ति वुञ्चति ॥६॥ (वाहितपाप इति ब्राह्मणः समचर्यरश्रमण इत्युच्यते । शत्रजयजोऽऽत्मनो मलं तस्मात् प्रव्रजित इत्युच्यते ॥२) अनुवाद–जिसने पापफो ( धोकर) व्रिया वह प्राह्ण है, जो यहा समताका आचरण करता है, वह (असण समण == संन्यासी ) , (चूंकि) उसने अपने (वित्त) अछको हटा दिया, इसीलिये बाह प्रस्रजित कहा जाता है। २६८ बाणवर्गो [ १७३ चतवन सारिपुत ( पेर) ३८६-न ब्राह्मणस्स पहरेय नास्स मुंचेय ब्राह्मणो । वि ब्राह्मणस्स हन्तारं ततो वि यस्स मुवति ॥७॥ (न ग्रहणं प्रहरेत् नाऽस्मै सुब्बेद् ग्रह णः । धिग् ब्राह्मणस्य हन्तारं ततो विर् यल्मै ति ॥७॥ ) अनुवाद--आह्मण (=मिष्पाप ) पर प्रहार नहीं करना चाहिये, और । चाणको भी उस ( प्रदारवाता ) पर (प ) नहीं करना चाहिये, मह्मणको जो भारता है, उसे धिक्कार है, और धिक्कार उसको भी है, जो ( चषके ळिये ) कोष करता है । ३६ ०-न ब्रह्मणस्सेतकिष्वि सेय्यो यदा निसेघो मनसो पियेहि । यतो यतो हिंसमनो निकृत्तति ततो ततो सम्मति एव दुक्खं ॥८॥ (न आह्मणस्यैतद् आकिचित् श्रेयो य निषेधो मन प्रियेभ्यः । यतो यतो दैत्रमनो निवर्तते ततस्ततः शाम्यत्येच दुःखम् ॥८॥ ) अनुवा–आहणके लिये यह बात फस कल्याणकारी ) नहीं है, । जब वह प्रिय ( पदार्थ से अनको हटा लेता है, जो बहाँ सन हिंसे सुचता है, वहाँ वहाँ दुभव ( अवश्य ) ही प्रान्त हो जाता है । ४७४ धम्मपद् [ २६५ महापजापती गौतमी १६ १–यस कायेन वाचाय मनसा नाथि दुक्तं । संवृतं तीहि ठानेहि तमहं भूमिं ब्राह्मणं ॥६॥ (थस्य कायेन वाचा मनसा नास्ति दुष्कृतम्। संवृतं त्रिभिः स्थानैःतमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२) अनुवाद-गिसके मन वचन कायसे दुष्कृत (=पाप ) महीं होते ( जो इन ) तीनों ही स्थानोसे सवर (=यम युक्त है, उसे मैं भक्षण कता है। जैतबन साधिल (थेर) ३६२-यहा धम्मं विजानेय्य सम्मासम्बुद्धदेसितं । सकलं तं नमस्सेय्य अगिहुत्तं व बाह्मणो ॥१०॥ (यस्मादू धर्म विजानीयात् सम्यसंयुद्धदेशितम् । सत्कृत्य तं नमस्येद् अग्निहोत्रमिव ग्रामणः ॥१०) अनुवाद–जिंस( उपदेशक )से सम्ययुब(=युद्ध )वश उपहिe धर्मको जाने, डसें ( वैदेही) सत्कारपूर्वक नमस्कार फरे, जैसे अभिप्रेत आण । जालि । ३६३-न जटाहि न गोत्तं हि न जशा होति नापणं । यहि सयक्ष धम्मो न सो सुनी स च ग्रामण ॥११॥ (= जह्नभिर्ना गर्न सा या भजति प्राणः यस्मिन मस्यं च धर्मश7 म शुचिः स न ग्रामणः (१) २६१३ ॥ अत्रणवस्य [ १७५ अनुवाद--- जटासे, न गोत्रसे; न गन्ससै ब्राह्मण होता है, जिसमें सरय और धर्म हैं, षही, अचि (=पवित्र ) है, औौर आeण है । वैशाखी ( गारशा) ( पाखडी शाखण ) ३६४-किं ते जटाहि दुम्मेष । किं ते अनिसाख्याि । अकमन्तरं ते गहनं वाहिर परिमज्जसि ॥ १२॥ (कि ते जटाभिः दुर्मेध ! किं तेऽजिनाव्या। आभ्यन्तरं ते गहनं वाहिर परिमार्जयसि १ १२) अनुवाद है हुईंब! जटाखोसे तेरा क्या ( बनेगा ), (और) सुग चमेकै पद्वितैसे तेरा क्या ? भीतर (विछ ) तो तेरा ( शग आदि अलोंसे ) परिपूर्ण है, बाहर या धोखा है? राजगृह ( भक्षुट) क्साि गौतमी ३६१-पंसुकूलधरं जन्तुं किसी धमनिसन्थतं । एकं वनस्मि सायन्तं तमहं बूभि ब्राह्मणं ॥१३॥ (पांशुकुळधरं जन्तुं कृशं धमनिसन्ततम् । एकं वने ध्यायन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२३॥ अनुवाद-“यो प्राणी फटे चीयको धारण करता है, जो ङया पतछा और नसोंडे अड़े शरीरवाता है, जो अबेला धनमें ध्यानरत रहता है, उसे मैं ग्रहण कहते हैं। २६७७] प्रणवरण [ १७७ भय नहीं खाता, जो संग और आस्रजिसे विरत है, उसे मैं श्राह्मण कहता हूँ । चतवन ( व आखण ) ३६८-छेत्वा नन्दिं वरत्व सन्दानं सहज़क्कमं । उक्खित्तपतिघं बुद्धं तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥ १३॥ (छित्वा नन्दिं घर व सन्नं लहसुमम् । अत्क्षिप्तपरिर्धं युद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१६) अनुवाद---नन्दी (=कघ ), चरखा (=तृष्णा रूपी रस्सी), सन्दान (=६३ प्रकारके मतवावरूपी मगहै ), और इज़क्रम (=ट्पर बाँधनेके जावे)को काट एर्यं परित्र (=ए )को ॐ लो डब (=शनी ) हुआ, उसे मैं ग्रहण कहता हैं। राजगृह ( वेणुवन ) । ( अफस ) भारद्वाज ३६६-अच्छोकं वधबन्धञ्च अटुट्यो यो तितिष्ठति । खन्तिबलं बलानीकं तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥१७ (अकोन बधयंधं च अङो यस्तितिक्षति । क्षान्तिबछ चलानकं तमहं ब्रवीमि ब्रह णम् ।१ ) अनुवाद—जो बिना दूषित (चित्र ) किये गाळी, थध और थंधनको सहन करता है, क्षसा बलुई जिसके बछ(=सैन)को सेनापति है, उसे मै ब्राह्मण कहता हैं। १३ २६२३ ॥ आझणवग्ग [ १७१ जंतवन जान लेता है, जिसने अपने पोलको उतार झंका, और जो आसक्तिरहित है, उसे मैं माक्षिण कहता हूँ। राजगृह ( शकुंट) खेमा ( भिक्षुणी) ४०३म्मीरपी मैभाविं मगामग्गस कोविदं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥२१॥ (गंभीरप्रझ मेधाविनं मार्गामार्गस्य कोविदम्। उत्चमार्थमनुमाप्त' तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२२॥ अनुवाद--ज गम्भीर अछावाका, सेंघवी, मार्ग-शाखा, उत्तम पदार्थ (=खस्य)को पाये , उसे मैं प्राह्मण कहता हूँ। ( पोरवासी ) तिस्स (थैर ) १०४-असंसर्प गहवेहि अनागारेहि चूभयं । अनोकसारिं अष्पिच्छं तमहं लूमि ब्राह्मणं ॥२२॥ (असंसृष्ट' णुहल्यै, अनगरौधोभाभ्याम् । अनोकश्चारिणं आल्पेच्छं तमहं ब्रवीमि त्रहणम् ॥२श अनुवाद-घरवालै (=गुहस्य ) और बेघवाले दोनों ही में जो किस नहीं होता, जो विना ठिकानेके घूमता तथा बेचाह है, उसे मैं ब्राह्मण फझता हूँ। बेतवन ( कई भिg ) १०५-निघाय दण्डं भूतेषु तसेसु थावरेसु च । यो न हन्ति न घातेति तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥२३॥ १८० ॥ धम्मपदं [ २२५ (निधाय दण्डं भूतेषु जडेषु स्थावरेषु च । यो न हन्ति न घातयति तमहं ब्रवीमि शाह णम् ॥२३) अनुवाद-चर-अचर (सभी ) शाणियोमें प्रहारविरत हो, जो न आरता है, न मारनेकी प्रेरणा करता न है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हैं। जैतवन चार आमोर ४०६-श्रविरुद्धं विरुद्धेषु अत्तदाण्डेषु निवृतं । सादानेषु अनादानं तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥२४॥ (अविरुद्धं विरूद्धेषु, आलण्डेषु निवृचम् । सादानेष्वनादानं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२) अनुवादञ्चो विरोधियोंके बीच विरोधरहित रहता है, जो दंड धारियोंके बीच (दण्ड-)रहित है, प्राहियोंमें जो सप्रहरहित है, उसे मैं ग्राह्मण कहता हैं। राजगृह ( वेणुवम ) भशपन्वक (थेर) ४०७यस रागो च दोसो च मानो भक्खो च पातितो । सासपोरिव आरगा तमहं बूमि बाह्मणं ॥२५॥ (यस्य रागश्च द्वेषश्च मानो प्रदश्च पातितः। सर्यप इवाऽऽरागाद तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥५) अनुनाद आरेके पर सरसोफी मोति, जिसके (बिससे) राग, , सान, मॅक दिये गये हैं, उसे मैं अझण कर्ता हैं। २६२८ ॥ अझणवग्गो [१८ राजगृह ( वेणुबन ) पिडिन्द वच्छ (येर ) ४०८–अकई विद्यापतेिं गिरं सर्च उदीरये। थाय नाभिसने किञ्चि तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥२६॥ (अकर्कशां विज्ञापन गिरं सख्यां उदीरयेत्। यया नाऽभिपबेत् किंचित् तमहं प्रवोमि ब्राह्मणम् ॥२२) अनुवाद--( जो इस प्रकार की ) अफ़ीय, आदयुक ( तथा ) तची वाणीको घोले कि, जिसमें कुछ भी पीडा च होवे, उसे मैं भक्षण कहता हूँ। जलबन कई स्थाषिर १०६–यो 'ष दीयं वा रसं वा अयं पूतं सुमानुषं । लोके अविनं नादियते तमहं भूमि बाणं ॥२७ (य इइ दीर्घ वा ह्रस्वं घाऽथं स्थूलं शुभाशुभम् । लोकेऽदत्तं नादत्ते तमहं ब्रवीमि ब्रह णम् २७) अनुवाद--( चीन) चाहे वोर्थ हो था हरन, मोटी हो या पती, शुम ही था अष्टभ, जो संसारमैं (किसी भी ) विना श्री बीज कहीं छैन, उसे मैं आइण कहता हूँ। जतवन सापित ( पैर ) ५१०-आसा यस न विजन्ति अस्मि लोके प्ररम्हि च । निरासयं विसंयुतं तमहं भूमि ब्राह्मणं ॥२८॥ (आशा यस्य न विद्यन्तेऽस्मिन् लोके परस्मिन् च । निराशये विलंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२८) १८२] धम्मपदं [ २६३० अनुवाद—इस लोक और परछोकने विषयमें लिखी आभायें (=) महीं रहगई , जो आधारहित और आसक्रिरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हैं । चतवन महामोग्गछन (येर) ४११-यालया न विजन्ति अध्याय अकथंकथा । अमतोगधं अनुप्पत्त तमहं कूमि ब्राह्मणं ॥२६॥ (यस्याऽऽळया न विद्यन्त आशयाऽकथंकथा । अमृतावगाधमनुप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२९) अनुवाद–जिलको आछय (=तृण) नहीं है, जो भली प्रकार बामकर • अकथ(-षट् ) का कहनेवाला है, जिसने गाढे अछूतको पाकिया) उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। आवस्ती ( पूवराम ) रैवत (थर) ११२-यो'ध पुब्मच पापश्च उभो सर्गे उपचगा। असोकं विरजं शुद्धं तमहं भूमि ब्राह्मणं ॥३० (य इह पुष्यं च पापं चोभयोः संगै उपात्यगात् । आशोकं विरजं शुद्धं तमहं ब्रवीमि भ्राह्मणम् ॥३०) अनुवाद-जिसने यहाँ पुण्य और पाप दोनोंकी आपूकिको छोड खिया, जो शोकरहित, निर्मल(और ) शुद्ध , ग्से मैं आक्षण कहता हूँ। २६॥३२ ॥ महणवग्गो [ १८३ जैतुबन चन्दाम (येर) ३१३-बन्दैव विमलं शुद्धं विष्पसत्रमनाविलं । नन्दीभवपरिक्षीणं तमहं चूमि ब्राह्मणं ॥३१॥ (बन्द्रमिव विमलं शुद्धं विप्रसत्रमननाबिछम् । बन्दीभवपरीक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३१) अनुवाद--ओ । चन्द्रभाकी भाँति विमक, शैव, व=अनाविल , ( तथा जिसकी ) सभी जन्मोकी कृष्णा नष्ट हो गई है, उसे मैं हूण कहता हैं। कुण्डिया (कोलिय ) सौवडि ( थेर) ३१४–यो इमं पळिपयं दुर्गं संसारं मोहमवगा। तिएणो पारगतो झायी अनेन अयंकया । अनुपादाय निन्दुतो तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥३१॥ (य इमं प्रतिपथं दुर्ग संसारं मोहमत्यगात्। तोः पारणतो ध्यायनेऽकथंकथी। अनुपादाय निर्धेत तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३२॥ ) अनुवाद-जिसने इस दुर्गस संसार(=इन्स सरण )के चहुरमें डालने वायै भइ रूपी ) उछटे आऍको त्याग दिया, जो ( संसारसे ) पारंगत, यानी तथा तीर्ण (=तर गया ) हैसे मैं श्रावण कहता हूँ। १८५ ॥ धम्मपत्रे [ २६६५ बैतवन सुन्दर सखर ( पेर) १११–यो 'व कामे पइवान अनागारो परिष्यते । कामभवपरिक्षीणं तमहं भूमि ब्राह्मणं ॥३३॥ (य इह कामान् प्रहायनागारः परिव्रजेत्। कमभवपरिक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३) अनुवाद—जो यहाँ भौगोको छोड़, बेघर हो भभजित (=संन्यासी ) हो गया है, जिसके भोग और जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं आपण कहता है । राजगृह ( वेणुबन ) जटिल (थेर ) ४१६-योघ तण्हं पइवान अनागारो पस्विजे । तण्हामवपरिक्खणं तमहं बूमि ब्रवणं ॥३४॥ (य इह तृष्णां प्रज्ञयाऽनागारः परिव्रजेत् । तृष्णाभवपरिक्षीणं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३॥ अनुवाद- यह तृष्णाको छोड़, बेघर धन प्रव्रजित है, जिसकी तृष्णा और ( पुनर्जन्म नष्ट हो गये, उसे मैं ग्राह्मण कहता है । राजगृह (वेणुवन ) ( भूतपूर्व नट मिथु ) ११७-हित्वा मानुसकं योगं दिव्वं योगं उपचगा । सब्बयोगविसंयुत्त तमहं भूमि ब्राह्मणं ॥३१॥ (हित्वा मानुषकं योगं दिव्यं योगं उपाख्यगात् । सर्वयोगविसंयुक्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३५) २६/३८] माझणव [ ३८५ अनुवादसानुप(-आगो) शाओंक रोडदुिव्य भौगोंकाभको --, () भी (जिसने ) । दिया, रे ही लाभोंमें जो आGE नहीं है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हैं। ४१८हिना रतिश्व अरतिव सौतिभूतं निरूपयैि । सन्वलोकाभिसं वारं तमहं नृमि श्राह्मणं ॥३६॥ (हिना रतिं च5तं शीतीभूतं निरूपधिम् । सर्वलोकऽभिमुखं वीरं तमहं भुवोसि शालणम् ॥३६॥ अनुवाद--रति और अति (=खुणा )को छोझ, यो शीतलन्स्व्रभाव ( तथा ) फ्लेशरहित है( जो पैसा) सर्वलोकविषयी, बीर , उसे मैं माझण कह्ता हैं। राजगृह ( वेणुवन) बीस ( पैर ) ५१६-घृतं यो वेद सत्तानं उपपत्तित्व सव्वसो । असत्त' मुगातं बुद्धं तमहं मृमि ब्राह्मणं ॥३७॥ ( च्युतं यो वेद वानां, उपपति च सर्वशः। यसकं भुगतं शुद्धं तमहं ब्रवीमि अहणम् ॥३७॥ अनुवाद-- आाणियोंकी युक्ति (ऋगूयु) और उत्पलिको भी अकार आता है, (बो) आसक्तिरहित सुगत सुंदर गतिको प्राप्त ) और शव (बी) है, उसे मैं हालण हता हैं। ४९०यस गतिं नेषानन्ति देवा गन्धचमाञ्चसा । वीणासवं अरहन्तं तमहं भृमि प्राङ्गणं ॥३८॥ १४६] धम्मपदं [ २६७० (यस्य गतिं न जानन्ति देवगंधर्व मानुषाः। क्षीणास्रवे अरइन्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥३८) अनुवाद-लिखी गति(=पहुँच )को देवता, गंधर्व, और मक्रुध्य नहीं जानते, जो कोणास्रव (=ागाविरहित ) और आईत् है, उसे मै ब्राह्मण कहता हूँ। राजगू (वेणुवन ) धम्मडिशा (मेरी) ४२१यस पुरे च पच्छ च मघ्ने च नथि क्विनं । अकिवनं अनादानं तमहं कूमि ब्राह्मणं ॥३६ (थस्य पुरश्च पश्चाच्च मध्ये च नाऽस्ति किंचन । अकिंचनं अनादानं तमहं ब्रवीमि ब्रह्मणम् ॥३९) अनुवाद- जिसके पूर्व, और पवन और मसमें कुछ गर्मी , जो पस्प्रिहरहित=आदमरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कढ़ता हूँ। अतधन अरिमाल (येर) ४२२-उसमें पत्ररं वीरं महेतिं विजिताविनं । अनेनं महातकं बुद्धं तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥४०॥ (ऋषभं प्रचरं चीर महर्षि त्रिजितबन्तम् । अनेबं स्नातकं शुद्ध' तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४०) अनुवाद-( जो ) अषभ (= श्रेष्ठ ), प्रव, यी, महर्षि, विजेता अफम्प्य, नानक और खुब है, उसे में प्राण कहता हैं। - Ravindranathamenon (सम्भाषणम्) ०४:५४, २२ अक्तूबर २०१७ (UTC) २६I७१ ॥ ब्राह्मणवगो [ १८७ जतवन देवहित ( भाषण ) ४२१-ब्दीनिवासं यो वेदि सर्गापायश्च पप्सति । अयो शाखियंफ्तो अभिशवोपितो भुनि । सन्ववोसितनोसानं तमहं बूमि ब्राह्मणं ॥११॥ (पूर्वनिखार्न यो वेद वर्गाऽपारं च पश्यति । अथ जातिक्षयंप्राप्तोऽसिघाब्यवसितो मुनिः। सर्वव्यचलितब्यवसानं तमहं प्रवीमि ब्राह्मणम् ॥४१) अनुवाद जो पूर्व अन्नको लागत है, स्वर्ग और अगतिको जो खेलता है, और जिसका (पुनः) अन्य क्षीण हो गया, (जो) अभिश(= विध्यशन )परायण है, उसे मैं आdण हता । २)-जाह्मणवर्ग समाप्त ( इति ) गाथा-सूची ५l; अक्रोधेन जिने ३७ १९ २६।२६ अचा हि अशन झुकिकसं ५२७ २२९ अत्थमिह जातमिह २३२ अकृतं दुञ्जते अकच्छि में ,३ अथ पापानेि आयोधनं धतवन्तं २६१८ अथवस्स अगारानि १०५२ १७३ अनवह्नितचित्तस्य -३६ अचरिचा अ@- १११०११ अनवसुतचित्तस्य अलसं वधबन्धै २६१७ अनिकसावो कासाब अचिरं धतयै ३९ अनुष्टुब्वेत मेधावी → १८५ अध्या हि छ- ०१६ अनुपवाद अनुषघात १I७ अर्जुन नगरं १५५ अनेकजातिसंसा ३० अन्धंभूतो अयं १३८ अलवा चोर् २५२० अपि दिव्ये अतना व कर्ता अनन' घ कतै पार्षे २९ अष्पका ते अज्ञानम्ने तथा १२३ अष्पससे अयं अज्ञानम् पियं १२७ अष्पसन्चो पमन्येसु २९ अज्ञानमेव पठने १२२ अप्पसाक्षरता होथ • २३८ अत्ता ह वै बित १५ अष्पमादरतो मिक् श३१,१२ अता हि अत्तन २५२१ अष्पमादैन अपघा २१० ११८ २ ४९ १५ | व०० ( १९० ) २६२४ २६७ अष्पसावो ‘सतं ११ आ यस्स अप्यपि चै संहितं १२० इदं पुरे अष्पलाभोषि चे १५१७ इध तपति ११७ इध नन्दति अभये च भय २२॥१२ इध मोति अभिल्थरेथ ९१ इध घस्सं अभिवादनसीलिस ८|१० इध सोचति अभूतवादी निरर्षे २२१ खच्छिन्द्र सिनेह- अयसा च बलं २०७ ११५ २०१३ २०८ अयोगे युग्छ उडुनेन १८७ १६१ उद्वानयतो सतिक्षतो शI ' अछको चैपि १०१४ २५ अजिता थे २३५१ १३२ अवजे यज्ञ २२१३ उक हि १५१० ओविल्बं विरुखु उपनीतवयो १६२४ १८१३ असज्यमछ ७२ अस्तं भावन ५ID = बसर्भ पवरं २६० असंबद्धं असारे सारभतिम एकं धर्मं १३१० अखाहसेन धम्मैन एकस्य चरित ५९२ श८ एकायन एक्सेरर्षे २६ अरूद्ध अकतन्तू ७८ पूतं च सरण १५०५ अस्मो यथा भइ १०७ ६ पुतं दर्भ २५१३ आहें नागौ' य २३॥ श अस्फि ये १७५ एतं विषेपतो अयसे च पद १८२०,२२ पुत हि तुम्हें आरोग्यपरमा १५१८ पथ पदपथि। १५ २१ ( ९१ ) लिच्छो मंत्रु किं ते जटाहि एवम्भो मुखि १८१४ चन्द्रे 'व वंसक- २६३१ एवं संकरभूते ४१६ चलनाधि ५२ एसोध मग २०२ चरन्ति बाळ ०७ आu२ चिरप्पवार्सि १६११ फण्हं धर्भ २१२ सुतिं यो वैदि २ध३७ कयितुवे २२८ इन्द्रजाती १६१० कामतो जायते १३७ छिन्द्र सोतं २६१ १७३१ छेवा नन्दिं २५१ कायेन स्वरो २५२ जयं वैर पसषति १५९ फायेन संवृता ५७५ निघच्छपमा १५१७ २२२ जीरन्ति वै राज १५१ १४४ भय मिस्र २५ २ २६॥१२ शयिं विरज ३८ तब से l९ असो यथा २२६ तण्हाय जायते १६८ को इमं पठविं ४१ ततो अछ १४१९ कोषे महे १७७ सत्राभिरति १३ खन्ती परमं सपो १५६ तत्रापसाड़ि २५१६ गतद्धिन ७१ तथैव कत १ २ १॥११ तं पुरु-पसु २०५५ २२ तं वो वसि १३९ हासिनाय पुखता २०१०,९ गामे वा यदि ७९ । तस्या पिथं २५: तस्मा हि धीरं चतारि हानानि २२४ तिणदोEानि २४/२६,२४,२५, २३ चन्द्रन नगर १२ म्हिहे फ़ि २०४ २६७ २७४ ५६३ ५५१९ (१९३ ) ११७ ददन्ति चे २५१३ सुभो ते झायिन २३ न तं दुबई ते तादिसे १el१८ न स ता ३।। तैसें सम्पन्न ४१४ न तावता ध• १/४ १८१५ न तेन अरियो दन्त मयन्ति २३२ न तेन थेरो द्वाि तपति २३५ न तेन पडितो विसो विसं ३/१० न तेन मिख दीघा जागर ५११ न तेग इति १११ दुषख १४१३ नस्थि पार्ने दुशिग्गहस ३३ मस्थि राग तुष्पवर्षं २२॥१३ त्थि राग १८५७ १४१५ में द – १०,१३ ३५ में परे ४७ दूगर्भ दूरे सन्तो २19५ न पुप्फगन्धो २३/५ । गणस् २७ धम्मं चरे १३३ ब्राह्मणस्से २६८ धम्मीती ग भजे ६३ २५५ - मुण्ढकेन १९ १५१ न अतद्दे ६९ न शोनेन १५१७ में अन्तलिखे ११ २,१३ न बाकूकरण न कर्वेषण १४I८ न वै कदरिया नगर यथा १२१० न सन्ति भूता २०१६ न वा २६१ न शीलयत १९५६ न चाङ १७८ न हि एनेहि २४ १६११ न हि पाप ११ न तं कस्में ८ न हि वैरेण १५१ न जटाहि ( १९३ ) १६४ निद्रे गतो निधाय दुण्डं ९३ २४१८ पियतो जायते २६।२३ दुष्यन्ये ऽरिस १: तु अ' थि २६४५ ११७ १६५ १७७ मैतं खो सरणी नैव देवो नो च लभेथ पक्ष छिन्दे पटिसन्था पठवीसमो १७५० १४११ पूलरहे ८६ पैसतो जायते २१० पोराणमैत २५११ फन्दनं चपल २५१७ फुर्सासि नेत्रखम्स ७६ ३१ १९५७ ४३ फैपर्स १०५ ९५ भङ्गो ‘णि १३१२ पथब्या एकरळ्वेन २०५ २४७ १७५३ ११,२ ५१७ २६ २११ २८ अत्तासुखपरिचाग ०१० २।२ अधू’व अब्बती पखुषखुपदानेन परवज्जानुपस्सि- १८१९ मनुजस्स पसत्त परिजिष्णभिर्द , १३ अनष्पकोप ६ मनो डुब्बंगमा परे च न अविवेकर्स १५९ अमेव कत पंसुझ्छधरं २६३० अलित्थिया पस्य चिन्तकृतं १२ मात्र पितर १५ २७ पाणिहि चे ९९ आ पहुं १9a पापञ्चे प्रशिो १२ मा पिबेहि पापानि प=ि १९१७ मा' वसब्बेथ पाप मावभब्बेथ ९७ पापो' पि पति ९५ ' पु १०५ पामोच बह २५१९२ मा घोच फणसं १३ ( १९३ ) २६८ सुखतमपि भासे मासे स ५११ यस्व कायेन २६९ मासे मासे सहस्तेन ८I७ यस्य गतिं भिी यथा । २३। यस्य चेतं सु १८ मुञ्च पुरे २७१५ यरस घेत छ ५८६ ५६ थस्स इनिंसती २५६ २५९ यस्य जालिनी १R थ अचन्त १२६ यस जितं १४॥ थं एसा सहती २ यस्य पापं १३७ थं किवि यितुं el९ यस्य पारं अपार २६३ यं क्रिश्चि सि २२/७ यस्य दूरे च २६३९ य विज्ज्ञ ३७९ यस रागो च २२५ अतो यतो सम्भ २५१५ यस्माज्ञया । २६२९ अथागार दुच्छव ११३ यस्यासबा ७४ यथागारं सुच्छक १११४ यस्सिम्विणि ७५ यथा टुण्डेन १०]७ यानि’ मानि ११४ यथापि शुङ्ग ८I६० याच जीवम्पि ५५ थथापि असणे I६ यावदैव अनर्थाय ५५३ थथापि सूले २७५ याच हि चन २०५२ । यथापि एइसे १७ यै च ख ६७१ अथापि रुचिरं भ८९ वै ज्ञानपसुता ५४३ यथा खुब्बुळी १३। ये रागरंश २४.१४ यथ। ह्यकाः el१५ पैसं च सुसमा २४ यदा द्वयेषु २६।२ यैसी खनिचय ७३ यहा धम्मं २४१० यैवं सम्यधि ६१४ यं हि क्रिचर्च २३ यो अच्पद्रुह्य १० यहि सच्चं च १९६ यो इम पलिपयं २६३२ ( १९५ ) १७१२ २०११ २३३ १४१० २६३३ योगा वै जाधती २०११ वची पकोपं था च गाथा ८३ वट वाला २२१७ यो च घब्बे १३१ धनं छिन्थ यो च बुद्धच १४७R वर असतरा यो च घन्तकसाब- १\१० वस्सिका विय १८ यो च बस्खलनं ५८ वहुपि चे ५१९ थो च मैति १९१० चहुं वे सरणं यो चेतं सहती २३ वाचालुक्खी २०१९ यो ठण्डेय १०९ वाणिज' व १८ यो ङमुखस्य २६२० खारिज' च ३।२ यो'ध कामे ५१५ यो'ध तण्हं २६३४ मीहितपापो २६६ यो'ध दीर्घ १६२७ २१६ थो'घ पुष्की २६३० वितधूपसमे २७७ य'घ सुप्रै ९१२ वीततण्ड अनाद्वान २७९ यो निबनथो २०११ घेदनं फले १०१७ यो पाणमतिपातेति १८१२ स चे मेरेसि १०१६ यो यालो ५te स चे कमैय २६९ २५४ सर्च अणे यो वे उष्पतितै १७ २ सदा जागरमाणनं १७६ यो सह ८७ सखो सीलेन २५ ४ | सासनं १२८३ सन्तकायो २५१९ यो ह वै बृहरो २५२३ सन्तं तस्य ७७ रतिया जायते १६६ सध्यत्थ वे १८ रमणीयानि अरण्यानि ७५० सच्चदानं २२१ राजतो वा १०११ सुब्यपापस १४१५ यो छ १७४ ( ११६) १८१० २०१४ २०१७ सुदुह्रसं टरामेरयपानं सर्वसंयोजनं २६I७५ सुस्रो युद्धनं १४५६ रब्बसो बास २५८ सुग्रीवं सज्याभिभू २४l२० मुआगारं सव्ये तसन्ति १०|१,२ मुदस्से वच १८१८ सव्ये धम् ३४ सध्यै स्वारा अ- २०१५ शुष्पङ्कङ २१I७-१३ १७ सब्बे सद्वारा डु २०६ १८१३ सरितानि २७८ सुसुखं वत १५५-४ ३५६ सेखो पविं ४३ सवन्ति सर्व २४७ सैय्यो अयो २२३ सहस्सपि चे याथा ४२ सेलो यथा सहमपि चे चाचा 4 ] सो करोहि १८२४ साधु दसव - १५१० हत्थसज्जतो २५३ स १७२ हन्ति भोगा ३५२२ २५१० हं' द्विद्य १३९ सीकस्सन १६९ हि मानुसकं १२७ हिचा रतिं २६३१ सुस्वकामानि १०R,४ हिरीनिसेधो १०१५ सुख याव २६॥१७ हिरीमता च १८१ सुब्बा मत्तेच्यता २३७२ हीनं धर्भ ११ सिद्ध भिक्ख २३५ शब्द-सूची = आकिञ्चन–राण, हैप और महसे रहित । अनुसय (=अनुशय )-मराग (=ओगतृष्णा ), अतिष (=शति हिंघ ), टि (=वी धारण ), विचिकित्सा (=सन्देइ ), आन (=अभिमान ), अवरारा, (=समें जन्मनैकी तृष्णा), अविद्या । अरिय (=आर्थ )--स्रोतआषक, सकृदागामी, अगामी, अहंव (शुक)। आमस्सर (आमास्चर )-रूपलोक (=जहाँके आणियोका शरीर प्रकाशमय है )की एक देवताति । आयतन-ऑॉय, कान, नाकजीभ, काया (=ब्रवक् ) और सन । आसन् (=आसव अल )–सान्नव (=ओोगसषधी भल ), भवाभव " (=भिन्न भिन्न छकोंमें जन्म लेनेका काकचरूपी मछ ), याज्ञव (=खी धारणा रूपी भछ ), अविद्यान्नव । उपधि (=पाधि )-कन्ध, काम, यळेश और फर्के। खन्च (=कन्ध )–प (=परसाण और नौक रखनेवाला ,तव ), वैढ़ना, संज्ञा, संस्कार, ( वेदना आदि तीन, रूप और ( ३९८ ) पिशामके सम्पर्कसे उपस पिहान भयस्थाएं ६), शिात (=चेतना, परिमाण और तौल न रपनैयाला शर )। यैर--(=यघिर ) यूय भिक्षु । पेरी--(=स्थषिरा ) शुद्ध भिक्षुणी । १६ १४ पातिभोग (प्रातिमोक्ष )-विनय पिटफ़रों भिg•f¢नियंत्रेि पाराजिफ, मघादिसेम आदि नियम । सिके लिये उनकी संख्या इस प्रकार है पाली निम (गप्रिय ) है. पाजिक २. अंपापलं २. अनि , ५, पिक ५ पायगढ़ ६. प्रशनीय , नेहा ११४ 4. शिवाय ९ ७ e ( ३९९ ) (=परम ज्ञानको प्राहिके लिये प्रयत्न न करके, याह्य आचार और अलोंसे कृतकृत्यता मानना ), 'मराग (=स्थूलशरीर धारियों के भोगेकी तृष्णा ), रुपराग (=प्रकाशमय शरीर धारिपोके भोगी तृष्णा ), अरूपराग (रूपरहित दैवताओंके भोगी तृष्ण), प्रतिध (=प्रतिहिंसा ), मान (=अभि मान ), औदश्य (=टबतपना ), और अविद्या । सम्बोजङ्ग (=सयोध्यंग )--स्मृति, घर्मोविचय ॥=धर्मपरीक्षा ), चीटी (टद्योग ), फीति, प्रधविध (=शाम्ति ), खसाधि, उपेक्षा । साभणेर (=आभोर -भिक्षु होनेक उम्मेद्वार बौद्ध साङजिसे सिञ्चसधने अभी उपसम्पद्य (=मिसुदीक्षासे वीक्षित ) गर्दा किया । सील (= )-इंखबिरति, सिध्यभापणचिरति, 'घोरीसे विरति व्यभिचारविशति, मादक द्रव्य सेवनविरति—यह पाँच शीळ (=सदाचार ) गृहस्थ और मिझ लोके समान हैं। अपराह्नभोजन त्या, नृत्य गीत त्याम, माका आदिके श्रृंगार का त्यागमहार्घ शय्याका त्याग, सथा सोने चाँदीका त्याग, यह पाँच कैवल भिक्षुओंके शक हैं । सेख (=शैौय )-अर्हव (=शुक) पढ़को नहीं प्राप्ती हुए, आर्य (=वषय, सकृदागासी, अनागामी ) भैक्ष्य कहे जाते हैं, क्योंकि वह क्षमी शिक्षणीय हैं । सोतापल (==स्रोतआपत्र )—आध्यात्मिक विकास करते जय प्राणी इस प्रकार मानसिक स्थितिमें पहुँच जाता है, कि, फिर वह नीचे नहीं गिर सकता और निरन्तर आगे ही बढ़ता ( २०० )। जाना है, ऐसी शरथामें पहुँचे पुरपते सतापन महते हैं । सत (=तः )=मयणगामी सभी प्रचाहते स्थापन (=पड़ गया ) है।* r प्रताप्रासादमारुगाऽगोराः गोनतो जनान् । भूमिष्टानिव शैलस्य सर्वान् प्रतोऽनुपया | भगाय 13 कामं कामयानस्य यदा कागः ममृशने । भयेनभयन' मः क्षिप्रमं प्रयान्ते ॥ भ्याशभर ४९७ न तेन उद्भो भाति-मe २ | धम७ १६७ । ¥ gs ३ / ,+ • .. स ऑड़ेिइंद्द्द्दिनं सैर भनाई अड्ड: आंगखाग्रबने. भद्यथिर्भवत्सप्रंगस • *g ०६२७ " .+ s,40bodi J¢drbet (cient ,यह आख़िकपन्न

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