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नारदसंहिता
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१९०६

शब्द-१-३३-१४.४..... ॥ श्रीः ॥ नारदसंहिता। (ज्योतिषपन्थः) बेरीनिवासि-पण्डित-वसतिरामशर्मनिर्मित- भाषटीकापेता । 3a ४,८ ३८,४६६ • ) है, * \ई ६३; ३, - ३E.ठेकै; २०२९ १८ ४ ३ १२५ ३ से १ ले ६ 8, मुम्बय्यां । खेमराज श्रीकृष्णदास श्रेष्ठिना । ई स्वकीये ‘श्रीवेङ्कटेश्वर’ ( स्टीम् ) मुद्रणालये । मुंद्रयित्वा प्रकाशिता । £ , z-5८ / > माघे संवत् १९६ ३, शके १८२८. अभ्य पुनर्मुद्रणादयः सर्वेऽधिकारा: स्वायत्तीकृताः सन्ति । भूमिका। सिद्धान्त, संहिता और होरा इन तीन स्कन्धोंसे युक्त ज्योतिः शाख वेदका नेत्र कहा जाताहै । संसारका शुभाशुभ विषय आँखांसं ही देखा जासकताहैइसी प्रकार वेदविहित शुभाशुभ कर्मका उपादान और त्याग अर्थात् कोन कर्म किस समय करना और कब न करना; किस प्रकार करना इत्यादि नेत्रका कार्यज्योतिष शाश्वके द्वारा ही होता है । नेत्रान् मनुष्य जैसे मार्गमें पड़े कण्ट कादिकोंको देख, उनसे रक्षा अपनी करसक्ताहै इसी प्रकार ज्योतिष जाननेवाला, सम्पूर्ण शुभाशुभ कमको जानकर शुi कमके आचरण सुखी रहसकता है। जब मनुष्य इस मर्यलोकमें जन्म लेकर श्रेष्ठ कर्म करनेसे देवदुर्लभ कर्मोंका भी सिद्ध करस कताहै तो कौन बुद्धिमान ऐसे उत्तम लोकमें आकर अपनी उन्न- तिका साधन करनेमें चूकेगा ?। यही विचारकर स्वभावसे ही सर्वजीवोपकारी महर्षि नारदजीने मनुष्योंके लक्षके लिये स्कन्ध त्रयात्मक ज्योतिश्शास्त्र बनाया उनमेंसे यह तृतीय होरास्कन्ध नारदसंहिता नामसे प्रसिद्ध है। इसमें शास्त्रोपनयन, ग्रहचार, अब्द- रक्षण, संवत्सरफलतिथि, वारनक्षत्र, योग, मुहूर्त, उपग्रहसूर्य सङ्क्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रताराबठाध्याय, छत्रविचारप्रथमरजोद- र्शनविचार गर्भाधानसे लेकर विवाहपर्यन्त १६ संस्कार, प्रति, यात्रा, गृह्श्वेश, सद्योवृष्टि, कूर्मछक्षण, उत्पात, शान्ति इत्यादि अनेक ( ४ ) भूमिका। उपयोगी कर्मका वर्णन सरल बडे श्लोकों द्वारा ३५ अध्यायोंमें किया गयाहै देवर्षि नारदकी महिमा कौन नहीं जानता जैसे योगी विज्ञा नवेत्ता यह हैं अपनी तवज्ञानकी महिमासे बडे २ गूढ विषय इन्होंने स्वनिर्मित इस ‘नारदसंहिता” में रक्खेहैं । और भी अनेक ज्योतिष ग्रन्थ उत्चम २ विद्यमानहैं । परन्तु यह नारद संहिता आर्ष ग्रन्थ है । इसका वेदाङ्गहोना यथार्थही है। सुबोध होनेपर भी कहीं २ विषयके गहन होनेसे शास्त्र कठिन होताही है इससे सर्वसाधारण इसके समस्त आशयको भलीभांति जानसकें यह समझकर हमने बेरी-आमनिवासी पण्डित वसतिराम ज्योतिर्विद् द्वारा आषाढीका बनवायकर इस संहितको सुन्दर टाइप और कागजमें मुद्रित कराकर उत्तम जिल्द बँधाय तैयार कियाहै आशा है कि लोग इस ग्रन्थका अध्ययन कर अपना तथा दूसरोंका उपकार करेंगे. ॥ श्रीः ॥ अथ भाषाटीकानारदसंहिताविषयानुक्रमणिका।


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अध्याय १. कुलेकादथग ६५ ११ ८ ८ । • । १७ मेगलाचरण अध्याय ६. ज्योतिश्शास्त्रके आचार्य.. ... " नक्षत्रप्रकरण ६७ ज्योतिः शाखका उद्देश... ..• २ | अधोमुख नक्षत्र ... ... ... ७२ शत्रुपनयन तंयङ्मुख नक्षत्र ... .. ७३ अध्याय २, ऊध्वङख नक्षत्र जैवरसराधप ... ... ९ |स्थरसंज्ञक नक्षत्र ७४ सूर्यचार ... ७ | प्रसंज्ञक नक्षत्र अवमुहूर्ते ७५ भमखर ... १३ हलप्रवाहस्रहृत । युधचार ... १५ | रोगीका नाममुहूर्त शुरूचार १९ | नृत्य मुहूतं शुक्रचार २६ | चंद्यावन्चार ७८ शानदार २८ हुचर २९ | नक्षत्रकी तसंख्या ८० केतुचार ३२ | नक्षत्रोंसे वृक्षोंकी उत्पत्ति ८१ अध्याय ३ अध्याय ७ लंवत्सरप्रकरण . ३७ | योगप्रकरण ८३ संवत्सरफल ... ४० योगकं स्वाभ अयन तथा तुविचार.. ... ५२ अध्याय ८ अध्याय ४ तिथिळक्षण ८५ ५५ भदाका अन्यप्रकार अध्याय ५ अध्याय ९ वरलक्षण ... ... .. ६२ सुर्याद्विरोंमें भाटुभ कर्म .. ६४ | शुभाशुभमुहूर्त ... ८६ । २ ० ० t = ५१ ११ ( ६ ) नारदसहंता पृष्ठ, विषय. पृष्ठ. ga अध्याय १० अध्याय १६. कन्चयग ... ... ... ८८.| अनप्रकरण ... ११९ अवतंसयाग ८९ अध्याय १७. सिद्धयोग ••• • ९० फ़्लवनप्रकरण १३० दग्धयोग ९१ अध्याय ११. अध्याय १८. संगीतमयन १२१ ९३ अध्याय १९, अध्याय १२, ... जातकर्मविचार गचरप्रकरण ९९ | १३२ अध्याय १३ अध्याय २ १०३ | नामकरणविवार.. १२३ तबक १०४ अव्यय २१. अध्याय १४. नक्षत्रमलङ्कश्च १२४ अथ लग्नफल ... १०५ अध्याय २२. मेषलग्नल ... चलकमें .. १२५ वृषल० १०६ | मिथुनल० अध्याय २३ कक८० अंगलांकुरार्पणकरना १२७ सहळ० अध्याय २४. कन्यल० , १०७ | उपनयन विवर .. ... .. १२८ अध्याय २५. वृश्चिकदं०, धनल० ... १) | छुरिकाबंधन विचर •• १३७ अंकल० १०८ अध्याय २६. " | समावर्तन खेिचर ... ... १४० ऑनल० अध्याय २७, लश्के शुभाशुभफळ .. १०९ | विबाह भ्रश्नविचार १४१ अध्याय १९, विवाहश्रश्नका शुशुभाशुभ बिबर १२ रजस्वलाविचार १११ मध्य २८. प्रथमrतवविचार. .. ... ... १ | कन्यघरचेच{ ... ... १४४ ५) - ११ ११ ७ । = ११ ५) a विषयानुक्रमणिका । ( ७ ) विषय. पृष्ठ. विषय पृष्ठ ११ अध्याय २९. खोवृष्टिलक्षण २३३ वर्षका भाइऑफळ : ••• २३५ विवाहप्रकरण " ... ... १४६ होशचक्र देखन... ... .. १५९४ अव्यय ३६. द्रेष्काण चक्र ... ... १५५ | कूर्मक विभागकरना ३३७ त्रिंशांश चक्र १५५६ अध्याय ३७ विषघटी १६१ उत्पतिप्रकरण ०२ २३९ दुष्टमुहूर्ते १६२ विवाहमें शुभाशुभग्रह २४१ १७१ उत्पातके अर्थ होम • गणाविचार १७७ अध्याय ३८. योनिविचार १७९ | काकमैथुनदेखनेले दोष २४३ वर्णाविचार । काकघातस्रत करना ••• ••. गंडतजन्मविचार ... १८३ अध्याय ३९. लग्नका सुअकाल • छिपकली ( पल्ली ) का शुभफल २४५ अध्याय ३०. छिपकली तथा किरकंटका शु देवप्रतिष्ठा १८५ आशुभफल • • • अध्याय ३ १, किरकटके अशुभफलकी शांति २४७ वास्तु विधान १८९ अध्याय ४० वस्तुप्रकरण दूसरा प्रकार • १९५५ | कपोतकै घरमें प्रवेश शुभाशुभ क्षेत्रफल ५.०० १९६ फल •.. २४८ शशिफल झषोतप्रवेशशांति २४९ अध्याय ३ २, पिंगला ( कोतरी ) के शब्दका वास्तुलक्षण २०४ शुभाशुभफळ २५० अध्याय ३३ अध्याय ४१ यात्राप्रकरण • २०८ | शिथिलीजनन ( अचानक गिर दिक्षस्वामि और लालाटिकयोग २१० F ला) प्रकार .. २५१ अन्य चित्रपदयोग २१८ | शिथिलीजन न शुभाशुभफ ... अध्याय ३४. शिलीिजननशांसि ... . नववास्तुप्रवेशशुहू २३ अध्याय ४२. अध्याय ३५ इन्द्रलुप्त (केशंकेगिरने)का प्रकr२५३ वषप्रश्न •. .. ... २३२ | तथा उसकी शांति ... .. न 6 2; व = २ ० ० ११ @ (८) नारदसंहिता-विषयानुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. ११ a | = = } । अध्याय ४३ अध्याय ५१ उल्का तथा उल्काके •२५४ } नाम .. भूकंपलक्षण ... ••• उल्काओंके शुभाशुभफल .. २५५ | भूकंप हे विप्रादिवणको छ २७४ अध्याय ४४. परिवेष ( मंडल ) का प्रकार २६० अध्याय १२. २६१ मंडलके शुभाशुभफळ अश्विनी-आदिनक्षत्रोंमें जन्मेनेके अध्याय ४५ फल २७६ इन्द्रधनुषलक्षण ••• • •.. २६५ अध्याय १३ इन्द्रधनुषसं इभटभफल मिश्रप्रकरण..... २८२ अध्याय ४६. २६७ | गंधर्वनगर दर्शन ... ... ... ग्रहेंके स्थान ... ... ... " " ७ | अभ्यंगस्नान करना • •• २८३ तथा इसके फळ ... ... विशेषतिथिमहम्य ... ... २८४ अध्याय ४७ वैशाखादि अतिसूर्यलक्षण तथा फल ... | मासोंका विशेष ३६८ माहात्म्य .. २८६ अध्याय ४८. तिथिमें शुन्य लग्न. .. २८७ निघतलक्षण .. २६९ | तिथिमें शून्यम २८८ निर्यात ( वायुकेसंघर्षणसे विज गंडांतविचार २८९ ली पडन ) से अशुभ फल अध्याय ९४. अध्याय ४९. २९१ ........... | अश्वशतिविचार... २७० अध्याय १९, दिग्दह ( सुर्थके उदयास्तसमय के फलकथन | श्राद्धविचार Jayashri R (सम्भाषणम्) तेज ) से अशुभ २७१ २९७ अध्याय १० पुत्तलविधान • • • रजोलक्षण (धूलका प्रकार )... २७२ | श्राद्धके अर्थ निषिद्ध दिन ... २९८ ३९९ धूलीचढने शुभाशुभकथन .. २७३ । श्रद्ध के अर्थ शुभदिन इति भाषाटीका-नारदसंहिताविषयानुक्रमणिका समाप्ता । ७ । १ ५५ ॥ श्रीः ॥ अथ नारदसंहित भाषाटीकासहिता । अणोरणुतरः साक्षादीश्वरो महतो महान् । आत्मा गुहायां निहितो जंतोर्जयत्यतीन्द्रियः ॥ १ ॥ सूक्ष्मसभी अत्यन्त सूक्ष्म और महानसे भी अत्यन्त महान् ऐसे परमात्मा जो कि अतीन्द्रिय याने किसी चक्षु आदि इंद्रियसे भी ग्रहण नहीं किये जाते हैं वे साक्षात् परमेश्वर जीबके अंतःकरणमें उत्कर्षतासे वर्तते हैं ॥ १ ॥ ब्रह्मचायवसिष्ठोऽत्रिर्मनुः पौलस्त्यलोमशं । मरीचिरंगिरा व्यासो नारदः शौनको भृगुः ॥ २ ॥ बलाजी, आचार्यवसिष्ठ, अत्रि, मनु, पैलस्त्य, लोमश, मरीचि, अंगिरा, वेदव्यास, नारद, शौनक, भृगु ॥ २ ॥ च्यवनो यवनो गर्गः कश्यपश्च पराशरः ॥ अष्टादशैते गंभीरा ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकाः ॥ ३ ॥ च्यवन, यवनाचार्य, गर्ग, कश्यप, पराशर, ये अठार झी गंभीर ज्योतिःशास्रको प्रवर्ती करनेवाले भये हैं ॥ ३ ॥ सिद्धांतसंहिता होरा रूपं स्कंधत्रयात्मकम् ।

वेदस्य निर्मलं चक्षुज्योतिःशास्रमनुत्तमम् ॥ ३ ॥

सिद्धांत, संहिता, होरारूप, तीन स्कंधों वाला वेद निर्मल
नेत्ररूप परमोत्तम ज्योतिःशाख ऐसे यह ग्रंथ कहा है ॥ ४ ॥

अस्य शास्त्रस्य संबंधो वेदांगमिति कथ्यते ॥
अभिधेयं च जगतः शुभाशुभनिरूपणम् ॥ ५॥

यह ज्योतिःशास्र वेदांग कहलाता है जगवका शु अशुभ
हालको वर्णन करताहे ॥ ५ ॥

यज्ञाध्ययनसंक्रांतिग्रहघोडशकर्मणाम् ॥
प्रयोजनं च विज्ञेयं तत्तत्कालविनिर्णयात् ॥ ६ ॥

यज्ञ, अध्ययन, संक्रांतिका पुण्यफलग्रह षोडशकर्म, इन्होंके
यथार्थ समयका निर्णय (मुहूर्त ) ज्योतिःशास्रसे ही होता है ॥६॥

विनैतदखिलं श्रौतस्मार्तकर्म न सिध्यति ॥
तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा ॥ ७॥

इसके बिना संपूर्ण श्रुति स्मृतिमें कहहुआ कर्म सिद्ध नहीं हो
इस लिये बलाजीने जगतकी सिद्धिके वास्ते पहिले ज्योतिःशास्त्र
रच है ॥ ७ ॥

तं विलोक्याथ तत्सूनुर्नारदो मुनिसत्तमः॥
उक्त्वा स्कंधद्वयं पूर्वं संहितास्कंधमुत्तमम् ॥ ८॥

तिसको देखकर बालाजीके पुत्र नारद मुनि पहिले दोस्कंध
बनाकर ॥ ८ ॥

वक्ष्ये शुभाशुभफलज्ञप्तये देहधारिणाम् ॥
होरास्कंधस्य शास्त्रस्य व्यवहारप्रसिद्धये ॥ ९ ॥

फिर देहधात्रेयके शुभ अशु फलका ज्ञान होनेके वास्ते इस
होरा स्कंध शाखको व्यवहारक्की सिद्धिके वास्ते कहते हैं ॥ ९ ॥

संज्ञा हुक्तः समस्ताश्च सम्यग् ज्ञात्वा पृथक्पृथक् ।
शास्त्रोपनयनाध्यायो ग्रहचारोऽब्दलक्षणम् ॥ १०॥
तिथिवरश्च नक्षत्रं योगं तिथ्घृक्षसंज्ञकम् ॥
मुहूर्तपग्रहोऽर्कस्य संक्रांतिगचरस्तथा ॥ ११ ॥

इसमें अच्छे प्रकारसे अलग २ संज्ञा कही हैं शास्त्रोपनयनाध्याय
अर्थात् इस शास्त्रका अभिप्राय वर्णन, ग्रहचार वर्णन, संवत्सरोंका
फलतिथी, वारनक्षत्र, ओर तिथी तथा नक्षत्रसे शीघ्र हुआ योग,
इन्होंका विचारमुहूर्त प्रकरण, उपग्रह प्रकरण, सूर्य संक्रांति फल,
ग्रहगोचर, ॥ १० ॥ ११ ॥

चंद्रताराबलाध्यायः सर्वलग्नातवाह्यः ।
आधानपुंससीमंता जातनामान्नभुक्तयः ॥ १२॥

चंद्र तारा बल देखनेका अध्याय, सब लनोंका विचार प्रथम
रजस्वलाका विचार आधान, पुंसवन, सीमंत, जातकर्म, नाम
करण अनप्राशन ॥ १२ ॥

चौलांकुरार्पणं मौंजीछुरिकाबंधनं क्रमात् ॥
समावर्तनवैवाहप्रतिष्टासद्मलक्षणम् ॥ १३ ॥

चौलकर्म, मंगलाकुरोपण, मौंजी बंधन, छुरिका बंधन ये
सब क्रमसे कहे हैं और समावर्ननकर्म विवाहकर्म प्रविष्ठाकर्म,
घरका लक्षण, ॥ १३ ॥

यात्रा प्रवेशनं सद्योवृष्टिकूर्मविलक्षणम् ॥
उत्पातलक्षणं शांतिमिश्रकं श्राद्धलक्षणम् ॥ १४ ॥

यात्रा प्रकरण, प्रवेशमुहूर्त, सय वृष्टि, कूर्मलक्षण, उत्पात लक्षण,
शांतिकमें, मिश्रकक्ष्याय, श्रद्धलक्षण ॥ १४ ॥

सप्तत्रिंशद्भिरध्यायैर्नारदीयाख्यसंहिता॥
य इमां पठते भक्त्या स दैवज्ञो हि दैववित् ॥ १५ ॥

ऐसे इन प्रकरणों करके सैंतीस अध्यायोंसे यह नारद संहिता
बनाई गईहे जो भक्तिरसे इसको पहताहै वह दैवको जानने वाला ज्यो
तिषी होता है ॥ १५ ॥

त्रिस्कंधज्ञो दर्शनीयः श्रौतस्मार्तक्रियापरः ।
निदंभिकः सत्यवादी दैवज्ञ दैवचित्स्थिरः ॥ १६ ॥

इति श्रीनारदीयसंहितायां शास्त्रोपनयनाध्यायः प्रथमः॥३॥
तीनों स्कंधों को जानने वाला, दर्शन करने योग्य, श्रुतिस्मृति
विहित कर्म करनेवाला पाखंडरहित सत्यवादी दैवको जानने वाला
स्थिर दैवज्ञ होताहै ॥ १६ ॥

इति श्रीनारदसंहिताभाषायां शाखोपन
यनाध्यायः प्रथमः ॥ १ ॥




चैत्राद्येष्वपि मासेषु मेषाद्याः संक्रमाः क्रमात् ॥
चैत्रादितिथिवारेशस्तस्याब्दस्य त्वधीश्वरः ॥ १॥

चैत्र आदि इन महीनोंमें मेष आदि संक्राति यथा क्रमसे

भाषाटीकस ०-अं० २.

(५) ५ होती हैं और चैत्रशुक्ल प्रतिपदाको जो { वार होता है वह वर्षका । राजा कहलाता है ॥ १ ॥ मेषसंक्रांतिवरेशो भवेत्सोऽपि च भूपतिः । कर्कटस्य तु वारेशौ सस्येशस्तत्फलं ततः ॥ २ ॥ और मेषकी संक्रांतिको ज वार होवे वह सेनापति होताहै कई की संक्रांतिको जो वार हो वह सस्यपति होताहै ।। २ ॥ तुलासंक्रांतिवारेशो रसानामधिपः स्मृतः । मकराधिपतिः साक्षान्नीरसस्य पतिः क्रमात् ॥ ३ ॥ तुळाकी संक्रांतिका वार रसेश होता है और मकरकी संक्रांति का जो वार होवे बह नीरसेश अर्थात् सुवर्ण आदि धातु ओंका तथा वस्त्रादिकोंका पति होता है ॥ ३ ॥ अब्देश्वरश्चमूपो वा सस्येशो वा दिवाकरः॥ तस्मिन्नदे नृपक्रोधः स्वल्पसस्यार्घवृष्टिकृत् ॥ ४ ॥ वर्षपति (राज ) वा सेनापति ( मंत्री ) अथवा सस्येश सूर्य हो तो उस वर्षमें राजओंको बध रहे थोडी खेती हो अनका भाव महंगा रहे वर्षा थोडी होवे ॥ ४ ॥ अदेश्वरश्चसूपो वा सस्येशे वा निशाकरः ॥ तस्मिन्नब्दे करोतिमां पूर्णा शालिफलेझुभिः ॥५॥ वर्षपति वा सेनापति तथा सस्यपति चंद्रमा होय तो ऽसवर्ष में गेहं चैवळ आदि धान्य तथा ईख आदि से भरपूर पृथ्वी होवे ॥ ५ ॥ (६) नारदसहिता। अब्देश्वरश्वसृपो वा सस्येशो वा महीसुतः॥ स्मिन्नब्दे चौरवह्निदृष्टिक्षुद्भयकृत्सदा ॥ ६॥ जो राजा व मैत्री तथा सस्यपति मंगल होय तो उस वर्षमें चोर तथा अनिका भयहो वर्षा नहींहो दुर्निक्षहो ॥ ६ ॥ अब्देश्वरश्श्वसृपो वा सस्येशो वा शशांकजः ॥ अतिवायं स्वरुपवृष्टिं करोति नृपविग्रहम् ॥ ७ ॥ राजा व मंत्री तथा सस्यपति बुध होतो अत्यन्त पवन चले थोड़ी वर्षाहो राजाओंका युद्ध होवे ॥ ७ ॥ अब्देश्वरधसूपो वा सस्येशो वा सुरार्चितः॥ करोत्यनुत्तमां धात्रीं यज्ञधान्यार्थवृष्टिभिः ॥ ८॥ जो राजा व मंत्री तथा सस्यपति बृहस्पति होय तो यज्ञ धान् द्रव्य वर्षी, इन्हों करके पृथ्वी पारिपूर्ण होवे ॥ ८॥ अब्देश्वरश्चपूपो वा सस्येशे वा भृगोः सुतः । करोतेि सर्वा संपूर्ण धात्रींशालिफलेझुभिः ॥ ९॥ जो राजा व मंत्री था सस्यपति शुक्र होय तो चावल धान्य ईख आदिसे भरपूर पृथ्वी हो ॥ ९ ॥ अब्देश्वरश्वसृपो वा सस्येशो वार्कनंदनः॥ अंतकथरवह्यबुधान्यभूपभयप्रदः ॥ १० ॥ जो राजा व मंत्री तथा नरपति वा सस्यपतिशनि होय तो दुर्भिक्ष हो चोर अनि जल धान्य राजा इन्होंका भय होय ॥ १० ॥ ज्ञात्वा बलाबलं सम्यग्वदेत्फलनिरूपणम् ॥ दंडाकारेऽर्कवधे वा ध्वांक्षाकारेऽथ कीलके ॥ ११ ॥ भाषाटीकास ०-अ० २. ( ७ ) दृष्टेऽर्कमंडले व्याधिर्भातिधैरर्थनाशनम् ॥ छत्रध्वजपताकाचैराकरैस्तिमिरैर्धनैः ॥ १२॥ रविमंडलगैर्युगैः स्फुलिगैर्जननाशनम् ॥ सितरक्तैः पीतकृष्णैस्तैर्भिणैर्विप्रपूर्वकान् ॥ १३ ॥ ऐसे संपूर्ण बलबळ देखकर संवत्सरका फळ कहना चाहिये अब सूर्यचार फल कहते हैं कि दंडके आकार काग तथा कीलाके आकार सूर्यमें बेध दीख पड़े तो पीड़ा भय चोर द्रव्यनाश ये उपद्रव होवें और छत्र ध्वजा पताका आदि अंधकार दीख पड़े सूर्य मंडलमें बँवा सरीख दीखे अभिके किणके दीखें तो मनुष्यैका नाश हो सफेद लाल पीली काली मिली हुई ऐसी सूर्यकी किरण दीखें तो यथाक्रमसे ब्रह्मण आदिोंका नाश हो ॥११॥१२॥१३ हंति द्वित्रिचतुर्भिर्वा राज्ञोऽन्यजन संक्षयः ॥ ऊर्धर्वेभीनुकैरैस्तालैर्नाशं याति स भूपतिः ॥ १४ ॥ और दो तीन चार वर्णकी मिली हुई किरण दीखे तो राजाओंका नाश हो अन्य प्रकार कुछ दुष्ट चिह्न होवे तो प्रजाका नाश हो तांबासरीख वर्णवाली सूर्यकी किरण ऊथरको फैली हुई हो तो राजाका नाश हो ॥ १४ ॥ पतृनृपसुतः श्रीतैः पुरोधाश्चित्रितैर्जनाः॥ धूमैर्युपः पिशंगैश्चजलदोऽधोमुखैस्तथा ॥ १९॥ पीलावणं हो तो राजाके पुत्रका नाश, सफेद हो तो राजाका पुरोहित नष्टहोय अनेक वर्णाकी मिलीहुई हो तो प्रजानाश हो और धूम्र A 6 (८) नारदसंहिता । वर्ण वा भरा वर्णकी किरण बादलोंसे नीचेको मुख करके दीखें तो राजाका नाश हो ॥ १५ ॥ उदयास्तमये काले स्वास्थ्यं तैः पांडुसन्निभैः । भास्करस्तस्रसंकाशः शिशिरे कापिलोऽपिवा ॥ १६ ॥ उदय तथा अस्त समय कछु 'कपिलाई सहित सफेद रंवच्छ किरण हो और तांबा सरीखा लालवर्ण अथवा कपिलाईवर्ण सूर्य हो तो शिशिर अतृमें अच्छा कहा है ॥ १६ ॥ कुंकुमाभो वसंततं कापिलो वापि शस्यते ॥ अपांडुरः स्वर्णवर्णा ग्रीष्मे चित्रो जलागमे ॥ १७ ॥ वसंतऋतुमें केशर सरीखा लालवर्ण वा कपिलवर्ण अच्छाहै और ग्रीष्म ( गरमी ) अतुमें लालवर्ण सोनासरीख और वक्तुमें विचित्रवर्ण अच्छ कहा है ॥ १७ ॥ पद्मोदराभः शरदि हेमंते लोहितच्छविः । हेमंते प्रावृषि ग्रीष्मे रोगाणां वृष्टिभीतिकृत् ॥ १८ ॥ शरदकर्में कमठके मध्य भाग सरीखा हेमंतमें ळळलवर्ण अच्छा है और वर्षा तथा ग्रीष्म वा हेमंत कुतुमें लगळवणें हो तो रोग होवे वर्षा नहीं हो ॥ १८ ॥ पीताभः कृष्णवर्णं पि लोहितस्तु यथाक्रमात् । इन्द्रचापाईंमूर्तिश्चैद्भानुर्भूपविरोधकृत् ॥ १९॥ और पीला वर्ण काला वर्ण फिर लाल ऐसे क्रमसे तीन रंगोंवाला इंद्र धनुष होवे तथा सूर्यमें ये रंग देख पड़े तो राजाओंका युद्ध होवे ॥ १९ ॥ भाषाटीस -अ० २. (९) ' + मयूरपत्रसंकाशो द्वादशाब्दं न वर्षति ॥ शशरक्तनिभे भानौ संग्रामो ह्यचिराद्भवेत् ॥ २० ॥ मोरकी पंख सरीख सूर्यका वर्ण दीख पड़े तो बारहवर्ष तक वर्षा नहीं हो शशाके रक्त समान लालवर्ण होवे तो शीघ ही युद्धको २० चंद्रस्य सदृशो यत्र चान्यं राजानमादिशेत् । अॐ श्यामे कीटभयं भस्माभेशस्तुतोभयम् ॥ २१ ॥ चंद्रमाके समान वर्ण होवे तो अन्य राजाका राज्यहो कला वर्ण होय तो प्रजामें कीट सदिकका भयहो भस्मसरीखा वर्ण होय तो शखभय ( युद्ध ) होवे ॥ २१ ॥ छिद्रेऽर्कमंडले दृष्टे तदा राजविनाशनम् ॥ घटाकृतिः क्षुद्भयकृत्पुरहा तोरणाकृतिः ॥ २२॥ सूर्यमंडलमें छिद्र दीख पड़े तो राजाओंका नाश हो घडा सरीखा आकार दीख जाय तो दुर्भिक्ष भय ले, तोरणकी आकृति दीखे तो शहर (नगर ) अंगहो ॥ २२ ॥ छत्राकृतिर्देशहंता खंडभानुर्युपांतकृत् ॥ उदयास्तमये भानोर्विद्युदुल्काशनिर्यदि ॥ २३ ॥ छत्र सरीखा आकार होय त देश नष्टदो खंडित सूर्य हो तो राजा नष्ट होवे सूर्य अस्त होते समय अथवा उदय होते समय कोई तातरा टूटे अथवा बिजली गिरे तो ॥ २३ ॥ तदा नृपवधो ज्ञेयस्त्वथवाँ राजविग्रहः ॥ पक्षी पक्षार्द्धमर्केन्दु परिविष्टावहर्निशम् ॥ २४॥ राजा नष्ट हो अथवा राज्य विग्रह हो पंदरह दिनतक अथ वा सात दिनतक सूर्य चंद्रमाके दिनरात निरंतर मंडल रहे त॥२४॥ ( १० ) नारदसंहिता। राजानमन्यं कुरुतो लोहितावुदयास्तगौ । उदयास्तमये भानुराच्छिन्नः शस्त्रसन्निभैः ॥ २८ ॥ घनैर्युद्धं खरोष्ट्राधैः पापरूपैर्भयप्रदः । ऋतुकालानुरूपोऽर्कः सौम्यमूर्तिः शुभावहः ॥ २६ रविचारामिदं सम्यग् ज्ञातव्यं तत्ववेदिभिः ॥ २७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां सूर्यचारः ॥ दूसरा राजाका राज्य हो और उदय अथवा अस्त होते समय सूर्य वा चंद्रमा रुधिरसमान लालवर्ण होवें तो भी राज्य नष्ट हो उदयसमय वा अस्तसमय सूर्य तथा चंद्रमाको शत्र सरीखे आकार वाले बादळ आच्छदित कर लेवें तो युद्धहो और गधा ऊंट आदिके आकारवाले बादलोंसे आच्छादित होय तो प्रजामें अयहो तथा अतु और कालके अनुरूप सुंदर स्वच्छ आकार सूर्य होय तो शुभ फल होवे इस प्रकार यह सूर्यचर पंडित जनसे अच्छे प्रकार समझना चाहिये ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां सूर्यचारः । याम्यश्रृंगोन्नतभृद्रोऽशुभदो मीनमेषयोः। सौम्यश्रृंगोन्नतश्रेष्ठो नृयुग्मकरयोस्तथा ।। १ ॥ उदयकालमें मन और मेषके चंद्रमाका अँग दक्षिणकी तर्फ ऊंचा हो तो अशुभदायक है और मिथुन मकरके चंद्रमाक उत्तरी तर्फका कोना ऊंचा हो तो शुभ है ॥ १ ॥ भाटकस ७--अ०२. (११) समोऽक्षघट्योः कर्कसिंहयोः शरसन्निभः ॥ चापकीटभयोः स्थूलः शूलवत्तौलिकन्ययोः ॥ २॥ वृद्धभ कुंभके चंद्रके दोनों ने समानकी वा सिंहके चंद्रमाके कोने बाणाकारवृश्चिक और धनके चंद्रमाका स्थूल आकारतुला तथा कन्याके चंद्रमाका गूळके आकार होय तो शुभदायक है ॥ २ ॥ विपरीतोंदितधृद्रो दुर्भिक्षकलहप्रदः । यथोक्तोऽयुदितश्चैदुः प्रतिमासं सुभिक्षकृत् ॥ ३ ॥ इनसे विपरीत चंद्रमा उदय होवे तो दुर्भिक्ष तथा कळह करे और महीना २ प्रति जैसा कहा है वैसाही । उदय होय तो मुभिक्ष कारक जानना ॥ ३ ॥ आषाढद्वयमूलेंद्रधिष्ण्यानां याम्यगः शशी ॥ अग्निप्रदस्तोयचरवनसर्पविनाशकृत् ॥ ९ ॥ पूर्वाषाढउत्तराषाढ, ज्येष्ठा, मूल, इन नक्षत्रमें दक्षिणचारी चंद्रम होय तो अभिभय हो जळचर जीव वनसर्ष इन्होंका नाशहो ४R विशाखमैत्रयोर्याम्यपार्श्वगः पापकृत्सदा ॥ मध्यगः पितृदैवत्ये द्विदैवत्ये शुभोत्तरे ।। ५॥ विशाखा तथा अनुराधा नक्षत्रपर आया हुआ चंद्रमा दक्षिणी ती होके गमन करे तो सदा अशु है मघापर मध्यमचारी विशाखापर आवे तब उत्तरचारी चंद्रमा शुभदायक है । ५ ।। सम्प्राप्य पौष्णभाद्रौद्रात्षट् चक्षाणिशशी शुभः । मध्यगो द्वादशक्षाणि अतीत्य नव वासवात् ॥ ६॥ ( ३२ ) नारदसङ्गता । रेखेतीआदि छनक्षत्रोंपर आवे तब चंद्रमा शुहै ग्रंथांतरोंमें लिखाहै कि ये छः अनागत नक्षत्रहैं अर्थात् उत्तराभाद्रपदपर स्थित चैत्रमा रेवतीके तारा पर दीख पडता है इसलिये शुभ कहा औ आर्दी आदि बारह नक्षत्रपर मध्यम चारी शुभहै ॥ ६ ॥ यमेंद्रभितोयेशा मरुतधर्द्रतारकाः ॥ ध्रुवादिति दिंदैखाः स्युरध्यद्भश्च पराःस्समाः ॥ ७ ॥ भरणी, ज्येष्ठा, आश्लेषा, शतभिषा, स्वाती येअर्धसंज्ञक तारे हैं । और ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र, पुनर्वसु विशाखा ये अध्यर्ध संज्ञक हैं बाकी रहे नक्षत्र सम कहे हैं । ७ । याभ्यश्रृंगोन्नतः श्रेष्ठः सौम्यश्रृंगोन्नतः शुभः ॥ शुक्छे पिपीलिकाकरे हानिवृद्धी यथाक्रमात् ॥ ८ ॥ दक्षिणका २ीग ऊंचा श्रेष्ठ है । और उत्तरक श्रृंग की ऊंचा श्रेष्ठ है शुक्ळ्पक्षमें कीडी के आकार याने मध्यमें पतळ ऐसा चंद्रमा हानि और कृष्णपक्षमें शु दायक है और दक्षिणको स्थूल हो तो हानि उत्तरको ज्यादे स्थूळ हो तो वृद्धिदायकहै ॥ ८ ॥ सुभिक्षकृद्विशालेंदुरविशालेर्घनाशनः ॥ अधोमुखे शस्त्रभयं कलहो दंडसन्निभे ॥ ९॥ स्थूल सुंदर चंद्रमा सुभिक्षकारक है कुश, चंद्रमा उदय होय तो दुर्भिक्षकारक है नीचेको मुख होय तो शत्र भय हो दंडाकार होय तो प्रजामें कछह हो ॥ ९ ॥ भाषाटीकास ०-अ०२. ( १ ३ ) कुजायैर्निहते भृगे मंडले वा यथाक्रमात् । क्षेमार्चवृष्टिनृपतिजनानां नाशकृच्छशी ॥ १० ॥ इति श्रीनारदीयसहितायां चन्द्रचारः ॥ मंगळादि ग्रहों करके चंद्रमंडलका अँग वेधित होवे ते क्रमसे क्षेम नाश, भावमहिगा, वर्षानाश, राजानारा, प्रजानाश, यह फल होता है ॥ १० ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां चंद्रचारः। सप्ताष्टनवमर्द्धषु स्वोद्याद्वक्रिते कुजे ॥ तद्वक्रमुष्णं तस्मिन्स्याप्रजापीडाग्निसंभवः ॥ १ ॥ अपने उदय नक्षत्रमे सातवां आठव नवमा नक्षत्रपर मंगल वक्री होय तो उस नक्षत्रपर रहे तबतक प्रजामें पीडा हो अनि- कोप हो ॥ १ ॥ दशमैकादशे शते द्वादशे वा प्रतीपगे ॥ वक्रमल्पसुखं तस्मिस्तस्य वृष्टिविनाशनम् ॥ २ ॥ और दशयाँ और ग्यारहवाँ बारहवाँ नक्षत्रपर वक्री होयतो प्रजामें थोडा सुख वर्षाका नाश ।। २ ।। कुजे त्रयोदशे ऋक्षे वक्रिते वा चतुर्दशे ॥ व्यालाख्यवक्त्रं तत्तस्मिन्सस्यवृद्धिहेर्भयम् ॥ ३ ॥ रंग उदय नक्षत्रसे तेरहवें चौदहवें नक्षत्रपर चक्री होय तो यह व्यालनामक’ वक्री कहा है इसमें खेतीकी वृद्धि हो और सट्टका भय हो ॥ ३ ॥ } (१४ ) नारदसंहिता । पंचदशे षोडशी तद्वनं रुधिरानमम् ॥ सुभिक्षकृद्भयं रोगान्करोति यदि भूमिजः ॥ ९ ॥ पंद्रहवें सोलहवें नक्षत्रपर वी होय तो वह रुधिरानन वक्री कहा है तह सुभिक्ष हो भय और रोग होवे ॥ ४ ॥ अष्टादशे सप्तदशे तदासिमुसलं स्मृतम् ॥ दस्युभिर्धनह्न्यादि तस्मिन्भौमे प्रतीपगे ॥ ५॥ अठारहच नक्षत्र वा सतरहञ्च नक्षत्रषर् बक हो वह असिमुस ल नामक है तहां चौरादिकोंसे धननाश हो ॥ ५॥ फालुन्योरुदितो भौमो वैश्वदेवे प्रतीपगः ॥ अस्तगश्चतुरास्यज्ञे लोकत्रयविनाशकृत् ॥ ६ ॥ पूर्वफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रपर मंगळका उदय हो और उत्तधाराढा नक्षत्रपर वक्र हो और रोहिणी नक्षत्रपर अस्त होय तो त्रिलोकीको नष्ट करे ॥ ६ ॥ उदितः श्रवणे पुष्ये वक्रतो नृपहानिदः ॥ यद्दिग्भ्योऽभ्युदितो भैमस्तद्दिग्भूपभयप्रदः ॥ ७॥ श्रवण पुष्य इनपर उदयहोकर वक्री होय तो राजाकी हानि करे जिस दिशामें मंगल उदय हो उस दिशाके राजा भयकारक नना ॥ ७ ॥ मघामध्यगतो भौमस्तत्रैव च प्रतीपगः ॥ अवृष्टिशस्त्रभयदः पांडुदेशाधिपांतकृत् ॥ ८॥ मघा नक्षत्रपर मंगल उदय हवे फिर बी होजाय तो वर्षा नहीं हो प्रजामें युद्धभय पांडुदेशके राजाका नाश हो ॥ ८ ॥ आणटीकास ०-अ०२. (१५) पितृद्विदैवधातृणां भियंते योगतारकाः । दुर्भिक्षे मरणं रोगं करोति यदि भूमिजः॥ ९॥ मघ, विशाखा, रोहिणी इन नक्षत्रोंपर मंगल हो तब इनके तारा ऑको भेदन करे तो प्रजामें दुर्भिक्ष महामारी रोग होवे ॥ ९ ॥ त्रिधृतरासु रोहिण्यां नैऋत्ये श्रवणेदुभे । अवृष्टिदश्चरन्भौमे रोहिणीदक्षिणे स्थितः ॥ १० ॥ तीनों उत्तरा, रोहिणी, मूल,अवण,मृगशिरा इन नक्षत्रोंपर मंगल होय अथवा रोहिणी नक्षत्रके ताराने दक्षिणको स्थित होय तो वर्षा नहीं हो ॥ ३० ॥ भूमिजः सर्वधिष्ण्यानामुद्गगामी शुभप्रदः ॥ याम्यगोनिष्टफलदो भेदे भेदकरो नृणाम् ॥ ११ ॥ यह मंगल सच नक्षत्रोंसे उत्तरकी तरफ होकर चले तो शुभ- दायक जानना और दक्षिणकी तरफ होकर चले तो अशुभ दायी है तारांको भेद करे तो प्रजामें युद्ध हो ॥ ११ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां भौमचारः ॥ विनोत्पातेन क्षशिजः कदाचिन्नोदयं व्रजेत् ॥ अनावृधृष्टयग्निभयकृदनर्थं नृपविग्रहम् ॥ १ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां भौमचारः समाप्तः । कभी उत्पातके बिनाही समयपर बुध उदय नहीं होतो वर्षा नहीं हो अनिभय अनर्थ और राजाओंका युद्ध होवे ।। १ ।। वसुश्रवणविवेंदुधातृभेषु चरन्बुधः । भिनत्ति यदि तत्तारामवृष्टिव्याधिभीतिकृत् ॥ २ ॥ (१६) नारदसंहिता । धनिष्ठा श्रवण उत्तराषाढा मृगशिरा रोहिणी इन नक्षत्रोंपर विच रता हुआ बुध जो इन ताराओंको भेदन करे तो वर्षा नहीं हो प्रजा में रोगं भयहो ॥ २ ॥ आद्रदिपितृभांतेषु दृश्यते यदि चंद्रजः ॥ तदा दुभिक्षकलहरोगाणां वृद्धिभीतिकृत् ॥ ३ ॥ आङ्ग आदि मघा नक्षत्रपर्यंत बुध स्थित रहे और इन ताराओंको भेदन करे तव दुर्भिक्ष कलह रोग इन्होंकी वृद्धि प्रजामें भय हो।३।। हस्तादिरसतारासु विचरनिंदुनंदनः ॥ क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं कुरुते पशुनाशनम् ॥ ४ ॥ हस्त आदि ज्येष्ठापर्यंत नक्षत्रोंपर बुध स्थित हय तो प्रजामें कुशछ सुभिक्ष आरोग्य हो पशुओका नाश हो ॥ ४ ॥ अहिङ्भ्यायेमाग्नेय्यमभेषु चरन्यदि ॥ धातुक्षयं च जंतूनां करोति शशिनंदनः॥५॥ उत्तरा भाद्रपदा उत्तरा फाल्गुनी कृत्तिका,भरणी इन नक्षत्रोंपर हैं. गति करता हुआ बुध होय तो जीवोंके शरीरकी सात धातुओंका नाश हो अर्थात् दुर्भिक्ष हो। ५ ॥ दस्रवारुणनेत्यरेखतीषु चरन्बुधः ॥ भिषकृतुरगवाणिज्यवृत्तीनां नाशकस्तदा ॥६॥ अश्विनी, शतभिषा, मूलरेखती इन नक्षत्रोंपर विचरता हुआ वेध करता हुआ बुध, वैद्य अश्व तथा वणिजकी वृत्तिकरने वालों नाश करे ।। ६ ।। भाषाटीकास०-अ० २. (१७) पूर्वात्रये चरन् सौम्यो योगतारां भिनत्ति चेत् । छुच्छस्त्रामयर्चौरेभ्यो भयदः प्राणिनस्तदा ॥ ७॥ तीनों पूर्वाऑपर विचरताहुआ बुध अपने योग ताराको अदन करे तो दुर्मिक, राजयुद्ध, रोगचौर इन्होंने प्राणियोंको भय हो ।। ७ ।। याम्याग्निधातृवायव्यधिष्ण्येषु प्राकृतागतिः ॥ ईशंदुसार्पपित्र्येषु ज्ञेया मिश्राढ्या गतिः ॥ ८ ॥ भरणी, लिका, रोहिणी, स्वाती इन्होंपर बुध होय तो बुधकी शकत गति कही है आर्णी, मृगशिरआश्लेषा, मघा इनपर होय तो मिश्र गति कही है ।। ८ ।। संक्षिप्तादितिभाग्यार्यमेज्याधिष्ण्येषु या गतिः ॥ गतिस्तीक्ष्णाजचरणेहिनृश्येद्वधिपूषसु ॥ ९ ॥ योगांतिकांबुविधाख्यमूलगस्येंदुजस्य च । घोरा गतिहीरत्वाष्ट्रवसुवारुणभेषु च ॥ १० ॥ पॅनर्वसु, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य इन नक्षत्रपर संक्षिप्त तथा पूर्वाभाद्धदा; उत्तराभाद्रपदा, ज्येष्ठा, रेवती, अश्विनी इन्होंपर होय तो तीक्ष्णं गति कही है पूर्वाषाढाउत्तराषाढा, मूळ इन नक्षत्रोंपर बुध होय तो योगतिक गति कहलाती है। श्रवण, चित्रा, धनिष्ठा, शतभिषा इनपर होय तब घोरां गति कही है । ९ । १० ।। ( १८ ) नारदसंहिता । इन्द्रग्निमित्रमालँडभेषु पापाढ्या गतिः ॥ प्राकृताद्यासु गतिषु द्युदितोस्तमितोपि वा ॥ ११ ॥ एतावंति दिनान्येव दृश्यस्तावन्न दृश्यगः ॥ चत्वारिंशक्रमात्रिंशद्वविंशद्विंशतिर्नव ॥ १२ ॥ और विशाखा, अनुराधा, हस्त इन नक्षत्रपर होय तय पाप। गति कही है । इन प्राऊत आदि गतियोंपर प्राप्त हुआ बुध उदय होवे अथवा अस्त होजाय तब जितने दिनोंतक रहता है उनक प्रमाण यथाक्रमसे ऐसे जानना कि प्रश्त गतिमें ४० दिन फिर मिश्रमें ३० दिन संक्षिप्तमें २२ तीक्ष्णामें २० योगांतिक्रमें ९ दिन ॥ । ११ ॥ १ २ । । पंचदशैकादशभिर्दिवसैः शशिनंदनः ॥ प्राकृतायां गतैौ सस्यक्षेमारोग्यसुवृष्टिकृत् ॥ १३ ॥ घोरामें १५ और पापामें ११ दिनतक उद्य वा अस्त रहता है इन गतियोंपर दृश्यहुवा भी बुध अदृश्यही रहता है प्राकता गतिमें खेतीकी वृद्धि कुशल, आरोग्य शुभवर्षा होवे ॥ १३ ॥ मिश्रसंप्तिक्षयोर्मध्ये फलदोऽन्यास्वनिष्टदः॥ वैशाखे श्रावणे पौषे आषाढेप्युदितो बुधः॥ १४ ॥ जनानां पापफलदस्त्वितरेषु शुभप्रदः ॥ इक्षोर्जमासयोः शत्रदुर्भिक्षाग्निभयप्रदः । उदितछंद्रजः श्रेष्ठो रजतस्फटिकोपमः ॥ १८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां बुधचारः । भाषाटीकास ०-अ० २. ( १९ ) और मिश्र तथा संक्षिप्त गतिमें भी शुभफल होता है अन्य गतियोंॉमें अशुHफल होता है वैशाख, अवण, पौष, आषाढ इन महीनोंमें बुध उदय होय तो मनुष्योंको अशुभ फल देता है और अन्य महीनोंमें उदय हो तो शुतफल देताहै । आश्विन और कालैिकमें उदय होय तो युद्ध,दुर्भिक्षल, अशिक्षय थे फल करता है और चांदी तथा स्फटिक मणिके समान स्वच्छ उदय हो तो बुध शुभ कहा है ॥ १४ ॥ १५ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां बुधचरः । अथ गुरुचारः। दीभा ऊर्जादिमासास्स्युः पंचांत्यैकादशन्निभाः ॥ यद्धिष्ण्थाभ्युदितो जीवस्तन्नक्षत्राद्वत्सरः॥ १॥ कार्तिक आदि मास दो २ नक्षत्रोंसे होते हैं और पांचवाँ बारह में ग्यारहवाँ ये महीने तीन २ नक्षत्रोंसे होते हैं जिस नक्षत्रपर बृहस्पति उदय हो उसही नामक वर्ष होता है इसका भाचार्य यह है कि, कृत्तिका आदि दो दो नक्षत्रकरके कार्तिक आदि वर्ष होते हैं । पाचवें ग्यारहवाँ बारहवाँ ये वर्ष तीन २ नक्षत्रोंकरके होतेहैं जैसे कि, कृत्तिका वा रोहिणीपर स्थित बृहस्पति उदय हो उस वर्षको कार्तिक कहते हैं, मृगशिर आईंमें मार्गशिर वर्ष, पुनर्वसु पुष्यमें पौष, आश्लेषा मधामें माघपूर्वफाल्गुनी उत्तराफाल्गुनी हस्तमें फाल्गुन, चित्रा स्वामेिं चैत्र, विशाखा अनुराधामें वैशाखज्येष्ठ ( २०) नारदसंहिता । मूलमें ज्येष्ठ,पूर्वाषाढा उत्तराषाढमें आषाढ, श्रवण, धनिष्ठामें श्रवण, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपदमें भाद्रपद, रेवती अश्विनी भरणीमें स्थित बृहस्पति उदय हो वह वर्षमें आधिन कहाताहै। १॥ पीडिा स्यात्कार्तिके वर्षे रथगोश्युपजीविनाम् ॥ क्षुच्छत्राभिभूयं वृद्धिः पुष्पकौसुंभजीविनम् ॥ २ ॥ इस प्रकार कार्तिक वर्षमें बृहस्पति उदय हो तो रथ तथा गों आदि पशुओंसे आजीविका करनेवाले, अजिसे आजीविका करने वालेहलवाई आदि पुष्प वा कर्तृभा आदिसे आजीविका करनेवाले इन्हको पीडा हो और दुर्भिक्ष, युद्ध, अशिक्षय हो । । २ ।। अनावृष्टिः सौम्यवर्षे मृगाशलभांडजैः । सर्वसस्यवधो व्याधिर्बरं राज्ञां परस्परम् ॥ ३ ॥ मार्गशिर वर्षमें वर्षा नहीं हो तो, मृग, पुंसा, टीडी, तोते आदि पक्षी इन्होंसे खेतीका नाश हो संपूर्ण प्रजामें बीमारी राजाओंका परस्पर वैर होवे ।। ३ ।। निवृत्तवैरा क्षितिपा जगदानंदकारकाः ॥ पुष्टिकर्मरताः सर्वे पौषे देवरतत्पराः ॥ ४ ॥ पौषसंज्ञक वर्षमें राजाओंमें परस्पर मित्रता प्रजामें आनंद संपूर्ण मनुष्य सुखी तथा युञ्जरनेमें तत्पर रहैं ।। ४॥ माघेऽब्दे सततं सर्वे पितृपूजनतत्पराः ॥ सुभिक्षे क्षेममारोग्यं वृष्टिः कर्षकसंमता ॥८॥ माघ वर्षमें निरंतर सब मनुष्य पितरोंका पूजन करनेमें तत्पर रहें सुभिक्ष हो क्षेम आरोग्य हो किसान लोगोंके मनके माफिक वर्षा होय ॥ । ५।। भाषाढीस -अ० २. (२१ ) चौराश्च प्रबलास्त्रीणां दौर्भाग्यं स्वजनाः खलाः॥ क्वचिदृष्टिः कचित्सस्यं कचिवृद्धिश्च फाल्गुने ॥ ६ ॥ फाल्गुन नामक वर्षमें चोर प्रबल हो। खियोंको दुःख स्वज नोंमें दुष्टता वर्षा कहीं २ हो खेती थोड़ी निपजे ॥ ६ ॥ चैत्रेदे मध्यमा वृष्टिरुत्तमान्नं सुदुर्लभम् ॥ । सस्यार्घवृष्टयः स्वल्पा राजानः क्षेमकारिणः ॥ ७॥ चैत्रनामक वर्षमें मध्यम वर्षा हो उत्तम अन्न महंगा हो वर्ष थोडी हो राजाओंमें क्षेमकुशल रहे ।। ७ ।। वैशाखे धर्मनिरता राजानः सप्रजा भृशम् ॥ निष्पत्तिः सर्वसस्यानामवरोद्युक्तचेतसः ॥ ८॥ वैशाख वर्षमें राजालोग धर्ममें तत्पर रहें प्रजामें धर्मकी वृद्धि संपूर्ण खेतियाँ अच्छी निपजें सबके मनका भय निवृत्त हो । ८ । वृक्षगुल्मलतादीनां क्षेमं सस्यूविनाशनम् ॥ ज्येष्ठेदे धर्मतत्त्वज्ञाः सनृपाः पीडिताः परैः॥ ९॥ ज्येष्ठ वंर्षमें वृक्ष गुच्छ बेळ आदिक तथा खेतियोंका नाश हे धर्मतत्वको जाननेवाले राजालोग शत्रुओंसे पीडित होवें ।। ९ ।। काचिद्दष्टिः क्वचित्सस्यं न तु सस्यं क्वचित्क्वचित् ॥ आषाढेब्दे क्षितीशाः स्युरन्योन्यजयकांक्षिणः ॥ १०॥ आषाढ वर्षमें राजालोग आपसमें युद्धकी इच्छा करें कहीं वर्षा हो कहीं खेती हो कहीं बिलकुल खेती नहीं हो ।। १० ॥ अनेकसस्यसंपूर्ण सुरार्चनसमाकुला । पापपाखंडहोमी भूः,श्रावणेब्दे विराजते ॥ ११॥ ( २२ ) नरदसंहिता। आचणनामक वर्षमें अनेक प्रकारी खेतियोंसे शोभित तथा देवताओंके पूजनसे समाकुळ पाप पाखंठंडरहित पृथ्वी होवे ।। ११ ।। पूर्वं तु सस्यसंपूर्तिर्नाशं यास्यपरं तु यत् । मध्यवृष्टिर्महत्सस्यं नृपाणां समरं महत् ॥ १२॥ अब्दे भाद्रपदे लोके क्षेमाक्षमं क्वचित्क्वचित् ॥ धनधान्यसमृद्धिश्च सुभिक्षमतिवृष्टयः ॥ १३ ॥ भाद्रपद वर्षमें पहिली खेती (साम) अच्छी हो और पिछली खेती ( साडू ) नष्ट हो मध्यम वर्षा खेती अच्छी राजाओंका महान युद्ध हो और कहीं कुशल कहीं दुःख धन धान्यकी वृद्धि अत्यंत वर्षा यह फळ होता है ।। १२ ।। १३ ।। सुवृष्टिः सर्वसस्यानिफलितानि भवंति च॥ भवंत्याश्वयुजे वर्षे संतुष्टाः सर्वजंतवः ॥ १४ ॥ आश्विननमक वर्षमें सुन्दर वर्षी संपूर्ण खेतियोंकी उत्पत्ति फळ अच्छा सब प्राणी मुखी यह फळ होता है ।। १४ ।। सौम्यभागे चरन् भानां क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् ॥ विपरीतं गुरोर्याम्ये मध्ये च प्रतिमध्यमम् ॥ १९ ॥ बृहस्पति अपने योगताराके उत्तरकी तरफ होकर जाय तो प्रजामें क्षेम आरोग्य सुभिक्ष हो दक्षिणकी तरफ गमन करे तो इससे विपरीत फल हो मध्यमें रहे तो मध्यम फळ हो ।। १५ ।। पीतानिश्यामहरितरक्तवर्णागिराः क्रमात् । व्याध्यानिरणचौरास्त्रभयकृत्प्राणिनां तदा ॥ १६ भाषाटीकास ०-अ० २. ( २३ ) बृहतिका तारा पीला, अभि समान, श्याम, हरित, लालवर्ण होय तो यथाक्रमसे प्रजामें रोग, अभिभय, युद्ध, चोर, शस्त्रमय होता है ।। १६ ।। अनावृष्टिधूम्रनिभः करोति सुरपूजितः । दिवा दृष्णे नृपवधस्त्वथवा राज्यनाशनम् ॥ १७॥ धूमांसरीख वर्ण होय तो वर्षा नहीं हो, दिनमें दर्शन होय तो राजका नाश हो अथवा राज्य नष्टहो ।। १७॥ संवत्सरशरीरः स्यात् कृत्तिकारोहिणी उभे ॥ नाभिस्वाषाढद्वितयमांद्रे हृत्कुसुमं मघा ॥ १८ ॥ कृत्तिका रोहिणी ये दो नक्षत्र संवत्सरका शरीर हैं, पूर्वाषाढा उत्तराषाढा नामिहै, आङ्ग हृदय, मघा पुष्प है ॥ १८ ।। दुर्भिक्षालिमहीतिः शरीरं घ्रपीडिते ॥ नाभ्यां तु क्षुद्भयं पुष्पे सम्यक् मूलफलक्षयम् ॥ १९ ॥ शरीरके नक्षत्र अर्थात् यत्तिका रोहिणी ये नक्षत्र क्रूर ग्रहोंकरके पीडित होवें तो दुर्बिक्ष हो अभिभय और महान अथ हो नाभिके नक्षत्र कूरग्रहोंसे पीड़ित हो त दुर्भिक्ष हो पुष्प पीडित हो तो मूल फलोंका नाशहो ॥ । १९ ।। हृदये सस्यनिधनं शुभं स्यात् पीडितः शुभैः । । मेषराशिगते जीवे त्वति॥पाविनाशनम् ॥ २०॥ हृदयके नक्षत्र पीडित होवें तो खेती नशहो और इसी प्रकार ये सब अंग शुभ ग्रहोंसे पीडित होवें तो शुभ फल हो मेष (२४ ) नारदसंहिता। राशिर बृहस्पति होय तो टीडीआदि ईतिभय तथा मेंढाओंका नाश हो ।। ३० ॥ सस्यवृद्धिः प्रजारोग्यं वृष्टिः कर्षकसंमता ॥ वृषराशिगते जीवे शिशुस्त्रीपशुनाशनम् ॥ सध्या वृष्टिः सस्यहानिर्नुषाणां समरं महत् ॥ २१ ॥ खेतीकी वृद्धि प्रजामें कुशल रहै * किसान लोगोंके मनकी माफिक वर्षा हो वृषराशिपर वृहस्पति होय तो बालक स्त्री पशु इन्होंका नाशहो मध्यम वर्षा हो खेतीकी हानि राजाओंका महान युद्ध हो ॥ २१ ॥ जनानां भीतिरीतिश्च नृपाणां दारुणं रणम् ॥ विप्रपीडा मध्यवृष्टिः सस्यवृद्धिस्तृतीयभे ॥ २२ ॥ मिथुनराशिषर बृहस्पति होय तो मनुष्योंको भय हो खेतीमें । डीआदिकोंका भय हो राजाओंका दारुण युद्ध हे बालणोंको पीड मध्यमवर्षी खेतीकी वृद्धि हो ।। २२ ॥ प्रभूतपय गावः सुजनाः सुखिनः स्त्रियः ॥ मदोद्धताः कङ्किणीज्ये सस्यवृद्धियुता धरा ॥ २३ ॥ कफैराशिका वृहस्पति होय तो मैं बहुत दूध देवें श्रेष्ठजनोंको सुख स्त्री मदोन्मत्त सुखी होवे पृथ्वीवर खेतीकी वृद्धि हो ।२३। सिंहराशिगते जीवे निःश्वा भूः सुरसत्तमाः॥ अतिवृष्टिव्यलभयं नृपा युद्धे लयं ययुः॥ २४ ॥ आषाढीस -अ०२. (२५) सिंहराशिपर वृहस्पति होव तो पृथ्वीपर बालण धनहीन होवें पृथ्वीपर सयौंका भय हो वर्षा बहुत हो राजालेग युद्धमें मृत्युको आत होवें ॥ २४ ।। जीवे कन्यागते वृष्टिः हृष्टा स्वस्थाः क्षितीश्वराः । महोत्सुकाक्षितिसुराः स्वस्थास्स्युनिखिला जनाः।२ बृहस्पति कन्याराशिपर आवे तव वर्ष हो राजा प्रसन्न होवें बालणलोग बहुतऽस्म्नर सब मनुष्य स्वस्थ (प्रसन्न ) रहैं।२५।। । जीवे तुलागते सर्वधातुमूलातुलं जगत् । तथापि धात्री संपूर्णं धनधान्यसुवृष्टिभिः ॥ २६ ॥ तुलाराशिपर वृहस्पति हय तो जगतमें धातु मूल आदि सब द्रव्य बहुतहों पृथ्वी पर धन धान्य सुंदर वर्षा होवे ।। २६ ।। मदोद्धतानां भूपानां युद्धे जनपदक्षयः। अतुष्टा वृष्टिरत्युग्रं डामरं कीटगे गुरौ ॥ २७ ॥ वृश्चिकराशिका वृहस्पति होय तो मदोन्मत्त राजाओंके युद्धमें देशक क्षयदो वष खराब हो दारुण युद्धहो ।। २७ ।। जीवे चापगते भीतिरीतिीपभयं महत् ॥ अतुष्टा वृष्टिरत्युग्रा पीडा निःस्वाः क्षितीश्वराः॥ २८ ॥ धनराशिपर वृहस्पति हय तब प्रजामें भय टीडी आदि उपद्रवोंका भय राजाओंका मह्त्र भय हो वर्षा अच्छी नहीं हो अत्यंत पीडिा हो राजालोगं निर्धन होवें ।। २८ ।। अशत्रवो जना धात्री पूर्णा सस्यार्घवृष्टिभिः । वीतरागभयाः सर्वे मकरस्थे सुरार्चिते ॥ २९ ॥ ( २६ ) नारदसति । मकरका बृहस्पति होय तब पृथ्वीपर सब मनुष्योंकी मित्रता रहे वर्षों बहुतहो खेती बहुत निपजे सबलोग कुशलपूर्वक रहैं ॥२९॥ सुरस्पॅट्रैिजना धात्री फलपुष्पार्घवृष्टिभिः ॥ संपूर्णा कुंभगे जीवे वीतरांगयुता धरा ॥ ३० ॥ कुंभका वृहस्पति होय तब पृथ्वी पर मनुष्य देवताओंकी बराबर रहै फल पुष्प वर्षा बहुत हो पृथ्वीपर क्षेम आरोग्य रहैं ॥ ३० ॥ धान्यार्घवृष्टिसंपूर्ण वचिद्रोगः क्वाचिद्भयम् । न्यायमार्गरता भूपाः सर्वे मीनस्थिते गुरौ ॥ ३१ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां वृहस्पतिचारः ॥ मीनका वृहस्पति होय तव अन्न सस्ता हो, वर्षा बहुतहो, कहीं रोगहो, कहीं ज़्यहो, संपूर्ण राजा न्यायमार्गमें स्थित रहें ॥ ३१ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां गुरुचारः । सौम्यमध्यमयाम्येषु मार्गेषु त्रित्रिवीथयः ॥ शुक्रस्य दस्रभावैध पर्यायश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥ १॥ उत्तर, मध्यम,दक्षिण इन मार्गेमें तीन२वीथी कहीहैं तहां अश्विनी आदि तीन २ नक्षत्रोंपर शुके पर्याय करके यथाक्रमसे जानना १॥ नगेभैरावताश्चैव वृषभो गोजरद्भवाः । मृगजदहनाख्यास्स्युर्याम्यांता वीथयो नव ॥ २ ॥ जैसे कि नाग १ गज २ ऐरावत ३ वृषभ ४ गौ ५ जरद्रव ६ मृग ७ अज ८ दहन', ये नव वीथी दक्षिणपूर्यतX ॥ २ ॥ सौम्यमानेषु तिसृषु चरन् वीथिषु भार्गवः ॥ धान्यार्घवृष्टिसस्यानां परिपूर्ति करोति सः ॥ ३ ॥ भाषाटीकास ०-अ० २. ( २७ ) तहां उत्तरमार्गकी तीन वीथियों में विचरताहुआ शुक अन्नसस्ता . वर्षा खेतीकी वृद्धि यह फल करता है ॥ ३ ॥ मध्यमार्गेषु तिसृषु करोत्येषां तु मध्यमः । याम्यमार्गेषु तिसृषु तेषामेवाधमं फलम् ॥ ४ ॥ और मध्यमार्गकी तीन वीथियोंमें विचरे तब सच वस्तु मध्यम फळ होतौहै दक्षिणकी तीन वीथियोमें विचरे तब अनादिक सब वस्तु मॅहिगी होवें ॥ ५ ॥ पूर्वस्यां दिशि जलदः शुभकृत् पितृपंचके ॥ स्वातिघ्रये पश्चिमायां सम्यक् शुक्रस्तथाविधः ॥ ९ ॥ मघा आदि पांच नक्षत्रपर प्राप्त हुआँ शुक्र पूर्वदिशामें उदयहो वा अस्त होय वषो अच्छी हो स्वाति आदि तीन नक्षत्रोंपर प्राप्तहुआ पश्चिम दिशामें उदय वा अस्त हो तबभी ऐसा ही शुभफल जानना ॥ ५ ॥ विपरीते त्वनावृष्टिर्मुष्टिकृद्वधसंयुतः । कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्याममावास्यां यदा सितः ॥ ६ ॥ उदयास्तमयं याति तदा जलमयी क्षितिः॥ मिथः सप्तमराशिस्थौ पश्चात्प्राग्वीथिसंस्थितौ ॥ ७ ॥ गुरुशुकवनावृष्टिर्मुर्भिक्षमरणप्रदौ ॥ कुजज्ञजीवरद्विजाः शुक्रस्याग्रेसरा यदा ॥ ८ ॥ युद्धद्वातिवायुदुभिनें जलनाशकरास्तदा । कृष्णरक्तस्तनुः शुको पवनानां विनाशकृत् ॥ ९ ॥ इतिनारदीयसंहितायां शुक्रचारः । के भी A ( २८ ) नारदसंहिता । 'इससे विपरीत हो तो विपरीत फल जानना और बुधसहित -शुक होय तब वर्षा होती है कृष्णपक्षकी अष्टमी । चतुर्दशी तथा अमावास्याको शुक्र उदयहो अथवा अस्तहोय तो पृथ्वी पर वर्षा बहुतहो और वृहस्पति तथा शुक आपसमें सातवीं राशिपर स्थित होकर प्राग्वंथि और पश्चिमवीथि पर स्थितहों तो वर्षा नहीं हो दुर्भिक्ष तथा मरणहो और मंगल बुध बृहसति शनि ये शुक्र के आगे स्थितहोमैं तो युद्धहो पवन बहुत चले दुभिक्ष होत्रे वर्षा नहीं हो शुक्रका तारा काळा वगै तथा लाल वर्ण होय तो यवनों ( म्लेच्छों) का नाशहो ॥ ६-९ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां शुक्रचारः । श्रवणानिलहस्तद्भरणीभाग्यभेषु च ।। चरन्शनैश्चरो नृणां सुभिक्षारोग्यसस्यकृत् ॥ १ ॥ अवण, स्वाति, हस्त, आद्र, भरणी, पूयफाल्गुनी इन् नक्षत्रों पर विचरताहुआ शनि मनुष्यको शुभहै सुभिक्ष कुशल करताहै ।। १।।। जलेशसापैमाहेंद्रनक्षत्रेषु सुभिक्षकृत् ॥ छुच्छत्रावृष्टिदो मूलेहिर्घश्यान्त्यभयोर्भयम् ॥ २॥ शतभिष, आश्लेषा; ज्येष्ठा, इनपर होय तचनी सुभिक्षहो मूलपर होय तो दुर्भिक्ष, युद्ध, अनावृष्टि यह फळहो उत्तराभाद्रपदा तथा रेवती पर होय तब प्रजामें भयहो । २ । मूर्धेि चैकं मुखे त्रीणि गुठे द्वे नयने द्वयम् । हृदये पंच ऋक्षाणि वामहस्ते चतुष्टयम् ॥ ३ ॥ भाषकास ०-अ० २. (२९) जन्म के नक्षत्र से शनिके नक्षत्रतक गिनै फिर एक नक्षत्र मस्तकपर धरै मुखपर तीन गुदापर दो नेत्रोंपर दो हृदयपर पांच और बायें हाथपर चार नक्षत्र रक्खे ।। ३ ।। वामपादे तथा श्रीणि देया त्रीणि च दक्षिणे । दक्षहस्ते च चत्वारि जन्मभाद्रविजः स्थितः ॥ ४ ॥ बायें पैरपर तीन दहिने पैरमें तीन दहिने हाथपर चर ऐसे जन्मके नक्षत्रसे शनिके नक्षत्रतक रखना । ४ ।। रोगो लाभस्तथा हानिलाभः सौख्यं च बंधनम् । आयासं चेष्टयात्रा च ह्यर्थलाभःक्रमात्फलम् ॥ ४ ॥ इनका फल यथा क्रमसे रोग, लास, हानि, लाभ, सौख्य, बंधन, दुःख, मनोवांछित यात्रा,द्रव्यप्राप्ति, यह फल जानना ॥ ५॥ वकृद्रविजस्येहे तद्वत्फलमीदृशम् ॥ करोत्येवं समः साम्यं शत्रगो व्युत्क्रमात्फलम् ॥ ६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां शनिचारः ॥ शनि वक्री होय तब अशु फल जानना मध्यम गतिपर रहे । तुव मध्यम फल जानना शीघ्रगति होय तो शुभ फल जानना।।६।। इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां शनेिचारः । अमृतास्वादनादाहुः शिराच्छिन्नेपि सोऽमृतः ॥ विष्णुना तेन चक्रेण तथापि ग्रहतां गतः ॥ १ ॥ अमृत चषनेके कारणसे राहुका शिर विष्णु भगवानने सुदर्शन चक्रसे काटदिया था तौ भी अमृत पीकर अमरहो मह होगया ।। १ ॥ (३० ) न(दसहता । वरेण धातुर्चेंदू ग्रसते सर्वपर्वणि ॥ विक्षेपाबननेर्वशाद्राहुर्दूरं गतस्तयोः ॥ २ ॥ फिर बलांजीके वरसे अमावस्या पूर्णिमा पर्वणीविषे सूर्यचं इमाको घसताहे तह विक्षेपहनेसे और हीनवंश ( असुर ) होनेसे राहु तिन सूर्य चंद्रमासे दूर चलागया है। २ ।। षण्मासवृद्धया ग्रहणं शोधयेद्रविचंद्रयोः।। पर्वेशाश्स्युस्तथा सप्त देवाः कल्पादितः क्रमात् ॥ ३ ॥ छह २ महीनोंके अंतरमें सूर्य . चंद्रमाका ग्रहण होताहै तह कल्पकी आदिसे इस मर्यादाले प्रहणोंमें यथाक्रमसे सात देवता अधिपति होतेहैं ।। ३ । । ब्रह्रबिंद्रधनाधीशवरुणाग्नियमाह्वयाः । पशुसस्यद्विज्ञातीनां वृद्धिनले च पर्वणि ॥ ४ ॥ ब्रह्म, इंद्र, चंद्रमा, कुबेर, वरुण, अभि,यम ये सात हैं तहां ब्रह्म संज्ञक ग्रहणमें अर्थात् जिसका अधिपति बला हो ऐसे प्रहणमें पशु खेती, बालंण इन्होंॉकी वृद्धि हो । ४ । तद्वदेव फलं सौम्ये बुधपीडा च पर्धणि । विरोधो भूभुजां दुःखमैदं सस्यविनाशनम् ॥ ९ ॥ चंद्रसंज्ञक श्रृंहणमें भी यही फळ हो परंतु पंडितजनोंको पीडाह इंद्रसंज्ञक ग्रहणमें राजाओंका विरोध दुःख हो और खेतीका नाश हो । ५ ॥ अथैशानामर्थहानिः कौबेरे धान्यवर्धनम् ॥ नृपाणामशिवं क्षेममितरेषां तु वारुणे ॥ ६॥ भाषाढीस --अ०२. कुबेर संज्ञक ग्रहणमें साहूकारलोगोंके धनकी हानि हो और अजामें धान्यकी वृद्धि हो वरुणसंज्ञकमणमें राजाओंको दुःख अन्य प्रजामें सुख हो । ६ ।। । प्रवर्षणं सस्यवृद्धिः क्षेमं हौताशपर्वणि ॥ अनावृष्टिः सस्यहानिर्मुर्भिशं याम्यपर्वणि ॥७॥ अभिसंज्ञकग्रहणमें वशं अच्छी हे खेतीकी वृद्धि हो प्रजामें कुशल हो याम्य पर्वमें वर्षा नहीं हो खेतीकी हानि दुर्भिक्ष हो ॥ ७ ॥ वेलाहीने सस्यहानिनृपाणां दारुणं रणम् ॥ अतिवेले पुष्पहानिर्भयं सस्यविनाशनम् ॥ ८ ॥ वेळाहीन अर्थात् स्पष्टसमयसे पहले ही ग्रहण होने लगजाय तो खेतीकी हानि राजाओंका दारुण युद्ध हो अतिवेळ उक्तसमयसे । पछेि वा ज्यादै ग्रहण हो तो पुष्पकी हानि, भय, खेतीका नाश हो ॥ । ८ ॥ एकस्मिन्नेव मासे तुचंद्रर्कग्रहणं यदा । विरोधं धरणीशानामर्थवृष्टविनाशनम् ॥ ९॥ जो एक ही महीनेमें चन्द्रमा सूर्य इन दोनोंका ग्रहण होय तो राजाओंका वैर हो धनका और वर्षाका नाश ह ।। ९ ।। ग्रस्तोदितावस्तमितौ नृपधान्यविनाशदौ ॥ सर्वग्रस्ताविनेदुभौ श्रद्य्वग्निभयप्रदौ ॥ १० ॥ यहण होताहुआ उदय हो अथवा अस्त होय तो राजाका तथा धान्यका नाशहो सूर्य चंद्रमा इन दोनोंका सर्वे ग्रहण होय तो दुर्भि- क्ष, वायु, अभि इन्होंका भय हो ।। १० ।। ( ३२ ) नारदसंहिता । द्विजादींश्च क्रमाङ्गति राहुर्दष्टो दिगादितः । दशैव ग्रासभेदाःस्युर्मोक्षभेदास्तथा दश ॥ ११ ॥ पूर्वआदि दिशाओंमें क्रमसे जिप्तदिशामें ग्रास दीखे तह ब्राह्मण आदि चारों वर्गोको नष्ट करताहै जैसे पूर्वमें ब्राह्मण,दक्षिणमें राजा, इत्यादि शासके दश भेदहैं और मोक्षके भी दश भेदहैं ११॥ न शक्या लक्षितुं देवैः किं पुनः प्राकृतैर्जनैः । आनीय खेटान् सिद्धांतात्तेषां चारं विचिंतयेत् ॥ १२ ॥ वे सब भेद अच्छे प्रकरसे तो देवताओंसे की नहीं देखेजातेहैं फिर साधारण मनुष्योंसे क्या देखेजावेंगे सिद्धान्तशास्त्रसे श्रहोंको स्पष्टकर तिनकर भेद विचारना चाहिये ।। १२ ॥ शुभाशुभातेः कालस्य ग्रहचारो हि कारणम् । तस्मादन्वेषणीयं तत्कालज्ञानाय धीमता ॥ १३ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां राहुचारः ॥ समयकी शुरु अशुभ प्रति करनेमें ग्रहोंका चारही कारण है। इसळिये बुद्धिमान् मनुष्यने काळज्ञानके वास्ते वह कारण देखलेना चाहिये ।। १३ ॥ इति श्रीनारदसंहितानापाटीयां राहुचारः । उत्पातरूपाः केतूनामुदयास्तमया नृणाम् ।। दिव्यंतरिक्षा भौमास्ते शुभाशुभफलप्रदः ॥ १॥ केतुका उदय अस्त होना मनुष्योंको उत्पातरूप कहा है स स्वर्ग अंतरिक्षी भूमि इनमें शुभ अशुभ फलदायी उत्पात होने कहे हैं ।।१।। भाषाटीकप्त ०-अ० २. ( ३ ३ ) यज्ञध्वजास्त्रभवनरथवृक्षगजोपमाः । स्तंभशूलगदाकारा अंतरिक्षाः प्रकीर्तिताः ॥ २ ॥ जैसे यज्ञध्वजा, अन्न, मंदिर, रथ, वृक्ष, हस्ती, शूल, स्तंभ, गदा, इनके आकार चिह्न किसीको आकाशमें दीखपट्टी वह अंत रिक्ष उत्पात कहा है ।। २ ।। नक्षत्रसंस्थिता दिव्या भौमा ये भूमिसंस्थिताः । एकोष्यमित्ररूपः स्याज्जंतूनामशुभाय वै ॥ ३ ॥ नक्षत्रोंमें स्थित कोई उपात दीखें वे दिव्य उत्पति कहे हैं भूमिमें जो उत्पात दीखें वे भौम उत्पात कहे हैं इनमेंते एकभी उत्पात शत्रुरूप है प्राणियोंको अशुभफछदयी जानना ।। ३ } यावतो दिवसात्केतुर्दश्यते विविधात्मकः । तावन्मसौः फळे वाच्यं मासै चैत्र तु वत्सराः ४ ॥ जितनेदिनोंतक केतु ग्रह ( शिखावालातारा) उद्य रहे उतने ही महीनोंतक फल जानना और जितने महीनोंतक दीखे उतनेही वषततेक शुभ अशुभ फल जानन ।। ४ ।। ये दिव्याः केतवस्तेपि शश्वत्तत्रफलप्रदः । अंतरिक्षा मध्यफला भैमा मंदफलप्रदाः ।। ४ ।। जो आकाशमें केतु दीखें वे निरंतर दारुण फल करते हैं और जो आकाशमें उडत दीखतेहैं वे मध्यम फलदायी हैं पृथ्वी के उपात मंद फलदायी हैं । ५ ।। ह्रस्वः स्निग्धः सुप्रसन्नः श्वेतकेतुः सुभिक्षकृत् । क्षिप्रादस्तमयं याति दीर्घकेतुः सुवृष्टिकृत् ॥ ६॥ ( ३४ ) नारदसंहिता । छोटासा चिकना स्वच्छ सफेद पूंछवाला ऐसा केतु शुभदायकहै । जो शीघही छिपजाय ऐसा दीर्घ केतु भी शुभदायकहै । ६ । अनिष्टदो धूमकेतुः शक्रचापस्य सन्निभः । द्वित्रिचतुःशूलरूपः स च राज्यांतकृत्तदा ॥ ७ ॥ धूमासरीखा तथा इंद्रधनुषके वर्ण सरीखा केतु अशुभ है और दो, तीन, चार थोंका रूप होय तो राज्यको नष्ट करौ ।। ७ ।। मणिहारस्सुवर्णाभा दीप्तिमंतोर्कसूनवः ॥ केतवोभ्युदिताः पूर्वापरयोर्युपघातकाः॥ ८॥ मणि, हार, सुवर्ण, इन सरीखी कांतिवाले केतु उदय होयें तो पहिले और पिछले राजाओंको नष्ट करें वे सूर्यके पुत्र कहलाते हैं । ८ ॥ बंधूकबिंबक्षतजशुकतुंडाग्निसन्निभाः ॥ हुताशनप्रदास्तेपि केतवश्वग्निसूनवः ॥ ९॥ बंधूक याने दुपहरिया, नाम फूल सरीखे तथा लालवर्ण तथा तोता सरीखे हरेवर्ण, अनि समान वर्ण ये केतु अभिभय करते हैं ये अनिके पुत्र कहे हैं ॥ ९ ॥ व्याधिप्रदा मृत्युसुता वास्ते कृष्णकेतवः॥ भूसुता जलतैलाभा वर्तुलाः क्षुद्भयप्रदाः॥ १० ॥ टेढे आकारखाळे काढवणं केतु मृत्युके पुत्र हैं वे रोगदायक हैं जळके समान तथा तेल समान तिवळे गोळवर्ण केतु भूमिके पुत्र कहे हैं वे दुर्भिक्षका भय करते हैं ॥ १० ॥ भाषाटीक्स ०-अ० २. ( ३५ ) क्षेमः सुभिक्षदाः वेताः केतवः सोमसूनवः । पितामहात्मजः केतुः त्रिवर्णास्त्रिशिखान्विताः ॥ ११ ॥ सफेद वर्णवाले केतु चन्द्रमाके पुत्र कहे हैं वे होम कुशल और सुसिद्ध करनेवाले हैं ब्रह्मक पुत्र केतु तीन वर्षोंवाला तथा तीन शिखाओंवाला कहा है ॥ ११ ॥ ब्रह्मदंडाद्वयः केतुः प्रजानामंतकृत्सदा ॥ ऐशान्यां भार्गवसुताः श्वेतरूपास्त्वनिष्टदाः ॥ १२ ॥ वह बलदण्ड नामक केतु है सदा प्रजाको नष्ट करनेवाला है सफेद रूपवाले केतु ईशान दिशमें उदय होते हैं वेशुक्रके पुत्र अशु भफलदायी हैं । १२ ।। अनिष्टदाः पंगुसुताः द्विशिखाः कनकाह्वयाः । विकचाख्या गुरुसुता नेष्टा याम्यस्थिता अपि ॥१३॥ दो शिखाओंवाले सुवर्णसरीखे वर्णवाले केतु शनिके पुत्र हैं वे अशुभ कहे हैं । विकच नामक केतु दक्षिण दिशामें उदय होते हैं । वे बृहस्पतिके पुत्र अशुभ हैं ।। १३ ।। सूक्ष्माः शुकः बुधसुता घोराश्चौरभयप्रदाः ॥ कुजात्मजाः कुंकुमाख्या रक्ताः शूलास्त्वनिष्टदां॥१४॥ सूक्ष्मरूप, श्वेतवर्ण, केतु बुधके पुत्र हैं वे घोरे हैं चोरोंका भय करते हैं । छाल वर्णवाले कुंकुम नामक केतु मंगळके पुत्र कहे हैं वे अशुभ फलदायक हैं ॥ १४ ॥ ( ३६ ) नारदहता है आनिजा विश्वरूपाख्या अग्निवर्णाः शुभप्रदाः ॥ अरुणः श्यामलाकारः पापपुत्राश्च पापदाः॥ १३९ ।। विश्वरूप नामक केतु अनिके पुत्रहैं वे अभिसमान वर्णवाले शुभदायक हैं। लाल तथा श्यामवर्ण केतु पंपके पुत्र हैं वे अशुभ फलदायक हैं ? १५ ।। शुक्रज्ञ ऋक्षसदृशः केतवः शुभदायकाः ॥ कंकाख्यत्राङ्गजाः वेताः कष्ट वंशलतोपमाः। १६ ।। नक्षत्र समान अथेरवादं साधारण तशसमान कंतु शुक्रके सुत्र शुद्घक हैं। कंक्रलामक भेतवो केतु यस तथा लताप्तम् आकार उदय होते हैं वे कष्टदायक कहे हैं ।। १६ ।। कवंथा(ख्याः कालसुता भस्मरूपस्त्वनेष्टः । विधिपुत्राद्याः शुकाः केतवो नेष्टदायकः१७ ॥ कबंधनमक कालके पुत्र हैं वे भस्मसमान वर्णवाले अशुभ कहे हैं और सफेद वर्ण केतु ब्रह्मके पुत्र हैं वे शुभदायक नहीं हैं।१७। कृत्तिकासु समुद्धृतो धूमकेतुः प्रजांतकृत् ॥ प्रासादशैलवृक्षेषु जातो राज्ञां विनाशकृत् ॥ १८॥ कृत्तिका नक्षत्रोंके पास केतु उदय होय तो प्रजा नाशकरें देखीमंदिर पंचैत बड़ावृक्ष इनके ऊर केतु उदय हो तो राजाओंक लाश करे ।। १८ ॥ सुभिक्षकृत्कुमुदाख्यः केतुः कुमुदसन्निभः । आर्तकेतुः शुभदः श्वेतश्चवर्तसन्निभः ॥ १९ ॥ भाषीकास ०-अ० ३. ( ३७) कुमुद नामक केतु कुमोदिनी पुष्पसरीख होता है वह सुभिक्ष लदायक है वहीदार सफेद केतु आवर्तसंज्ञक कहा है वह शुभ- दायक है ॥ १९ ॥ संवर्त्तकेतुः संध्यायां त्रिशिरा नेष्टदारुणः ॥ २० ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां केतु चारांतर्गतग्रहचा रध्ययो द्वितीयः ॥ २ ॥ संध्यासमयमें तीन शिखऑवाळा उदय हो वह संत्री केतु कहा है सो दारुण अशुभ फलकरक है ॥ २० ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषीकायां केतुचरां तर्गतग्रह्चरध्यायो द्वितीयः ॥ २ ॥ ब्राह्मदैवं मानुषं च पूिर्णं सौरं चूसूदनम् ॥ चांदमाईं गुरोर्मानमिति मनानि वै नव १ ॥ बाह, देव, मानुष, पिघ्यू, सौर, साबुन, चक्र, नाक्षत्र, गुरुमान ऐसे नव प्रकारके वर्षे मासादि प्रमाण हैं ॥ १ ॥ एषां तु नवमानान् व्यवहारोत्र पंचभिः । तेषां पृथक्पृथक्कायै वक्ष्यते व्यवहारतः ॥ २ ॥ इन नव भेदोंमें यहां पांच प्रकारोंसे व्यवहार होताहै तिनके जुदे जुदे कार्यव्यवहार कहते हैं ॥ २ ॥ ग्रहणं निखिलं कार्यं यहूते सौरमानतः ॥ विधेर्विधानं स्त्रीगर्भ सावनेनैव गृह्यते ॥ ३ ॥ ग्रहणके सवकार्यं सौर मानसे किये जाते हैं जैिसी कार्यका विधान का गुर्घ सखतुप्रसते. पिनज है:A. ३. && ३, ® °xes३८% ३३ रे ४४७४

  • ३ & ४ ६: ( ३८ )। नारदसंहिता ।

प्रवर्षणं मेघगर्भा नाक्षत्रेण प्रगृह्यते । यात्रोद्वाहव्रतक्षौरतिथिवर्षादिनिर्णयः ॥ ४ ॥ वर्षाकाल मेघका गर्भ ये नाक्षत्र मासके क्रमसे ग्रहण किये जाते हैं । यात्राविवाहव्रत, औरतिथि वर्षादिका निर्णय ॥४॥ पर्ववास्तूपवासादि कृत्स्नं चांद्रेण ह्यते ॥ गृह्यते गुरुमानेन प्रभवाद्यब्दलक्षणम् ॥ ५॥ पंधणी वास्तुकर्म व्रत नियम यह चांद्रमाससे ग्रहण किये जाते हैं अर्थात् चैत्रशुक पक्षसे जो संवत् लगता है वही क्रम लिया जा ताहै और प्रभवादिक संवत्सरोंका लक्षण गुरुमानसे ग्रहण किया । जाता है ॥ ५॥ भचक्रगतिशी स्यात्सवनं त्रिंशता दिनैः । सौरं संक्रमणं प्रोक्तं चांदं प्रतिपदादिकम् ॥ ६ ॥ नक्षत्रकी गतिके अनुसार गिनाजाय वह आफै ( नक्षत्र मास ) कहा है और पूरे तीस दिनका होय वह सावन मास कहाहै । सूर्यकी

  1. संक्रांतिके क्रमसे हो वह सौर मासहै प्रतिप्रदाआदि क्रमसे चांद्र

संज्ञक मास होताहै ॥ ६ ॥ तत्तन्मासैर्दशभिस्तत्तदब्दो भवेत्ततः ॥ गुरुचारेण संभूताः षष्ट्यब्दाः प्रभवादयः ॥ ७ ॥ तिन बारह महीनोंकरके तिसी २ नामबाण वर्ष होता है तह बृहस्पतिकी राशिरुमसे प्रभवआदि साठ संवत्सर होते हैं ॥ ७ ॥ प्रभवो विभवः शुकुः प्रमोदोथ प्रजापतिः । अंगिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथेश्वरः ॥ ८॥ छ । भाषाढीस०-अ० ३. ( ३९) = प्रसव १ विभव २ शुक्ल ३ प्रमोद ४ प्रजापति ५ अंगिरा ६ श्रीमुख ७ भाव ८ युवा ९ धाता १० ईश्वर ११ ॥ ८ ॥ बहुधान्यः प्रमाथी च विक्रमो वृषसंज्ञकः । चित्रभानुः सुभानुश्च तारणः पार्थिवो व्ययः ॥ ९॥ बहुधान्य १२ प्रमाथी १ ३ विक्रम १४ वृष १५ चित्रभानु १६ सुभानु १७ तारण १८ पार्थिव १९ व्यय २० ॥ ९ ॥ सर्वजित् सर्वधारी च विरोधी विकृतः खरः ॥ नंदनो विजयश्चैव जयो मन्मथदुर्मुखौ ॥ १० ॥ सर्वजित्न २१ सर्वधारी २२ विरोधी २३ विछत २४ खर२५ नंदन २६ विजय २७ जय २८ मन्मथ २९ दुर्मुख ३० ॥१०॥ हेमलंबो विलंबश्च विकारीशार्वरी प्लवः ॥ शुभकृच्छोभनः क्रोधी विश्वावसुपराभवौ ॥ ११ ॥ हमीब ३१ विलंब ३२ विकारी ३ ३ शार्वरी ३४ एव ३१ शुभेक ३६ शोभन ३७ कधी ३८ विश्वावसु ३९ पराभव ४ ७ ॥ ११ ॥ धृवंगः कीलकः सौम्यः साधरणो विरोधकृत् । पारधावी प्रमादी च आनंदो राक्षसोनलः ॥ १२ ॥ पूवंग ४१ कीलक ४२ सौम्य ४३ साधारण ४४ विरोधकृत ४५ पारिधावी ४६ प्रमादी ४७ आनंद ४८ राक्षस ४९ अनल ५० ॥ १२ ॥ ( ४ ० ) नारदसंहिता । 8 पिंगलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थ रौद्रदुर्मती ॥ दुन्दुभी रुधिरोद्भारी रक्ताक्षी क्रोधनः क्षयः १३ ॥ पिंगल ५१ काळयुक्त ५२ सिद्धाथ ५३ रौद्र ५४ दुर्मति ५५ सुंदुभीि ५६ रुधिरोद्दारी ५७ रक्ताक्षी ५८ धन ५९ क्षप्र ६० से ये ६० वर्ष हैं ।। १३ ।। युगं स्यात्पंचभिर्बणैर्युगानि द्वादशैव ते । तेषामीशाः क्रमाज्ज्ञेया विष्णुर्देवपुरोहितः ॥ १४ ॥ पांचवर्षाका युग होता है फिर वे बारह युग होते हैं उन्होंके स्वामी क्रमसे विष्णु ३ बृहस्पति २ ॥ १४ ॥ पुरंदरो लोहितश्च त्वष्टहिउँध्न्यसंज्ञकः । पितरश्च ततो विवेशशीन्द्राग्नी भगेऽश्विनौ ॥ १४ ॥ युगस्य पंचवर्षेश वीतेंडुब्जजेश्वराः ॥ तेषां फलानि श्रोच्यन्ते वत्सराणां पृथक्पृथक् ॥ १६ ॥ इंद्र ३ औौम ४ त्वष्टा ५ अहिर्जुध्न्य ६ पितर ७ विश्वेदेवा ८ चंद्रमा ९ इंझाशि १० भग ११ अधिनीकुमार १२ ये बारह देवता कहे हैं। तहां एक युगके पांचवर्षश कहेहैं । अनि १ सूर्य २ चंद्रमा ३ अह्म ४ शिघ ५ ये पांच जानने ।। १५ ॥ १६ ॥ वचिहृद्धिः क्वचिद्धनिः क्वचिन्नतिः क्वचिद्वदः । तथापि मोदते लोकः प्रभवाब्दे विमत्सरः ॥ १७ ।। तिन साठ ६० संवत्सरोंके फल कहतेहैं । प्रसवनामक वर्ष में कहीं हानि हो कहीं वृद्धि हो कहीं भय हो कहीं रोग हो तौ भी संपूर्ण प्रजा वैररहित होकर सुखी रहै ॥ १७ ।। भाषाटीकास ०-अ० ३. (४१) A = आन्वीक्षिकीसु निरताः समजाः स्युः क्षितीश्वराः। कर्षकाभिमता वृष्टिर्विभवाब्दे विवैरिणः। १८ ।। वितवनाम वर्षमें राजा प्रजा नीतिमें प्रवृत्त रहैं किसानलोगोंके मनके अनुसार वर्षाहो लोगोंमें आपसमें प्रति चढे ।। १८ ।। सकलत्रात्मजाञ्छश्वद्यालयंत्यबेला जनः । अमरस्पार्जुिनः शुक्ले वत्सरे विगतारयः ॥ १९ ॥ शुक्ल नामक वर्षमें पुरुष निरंतर स्त्रीपुत्रोंका सुख भोगें और स्त्रियां पुत्रका सुख भोगें देवताओंके समान आनन्दवृद्धि हो प्रजामें शत्रुता न रहें ।। १९ ।। अतिव्याध्यर्दिता लोकाः क्षितीशः कलहोत्सुकाः । प्रमोदाब्दे प्रमोदंते तथापि निखला जनाः ॥ २० ॥ प्रमोदनाम वर्धमें लोगोंमें अत्यंत बीमारी रहै राजाओंमें कलह रहै तौभी संपूर्ण प्रजा सुख भोगें ॥ २० ॥ क्लेशः क्कचिन्न प्रेक्ष्यंते स्वजनानामनामयः ॥ एवं वै मोदते लोका प्रजापतिशरद्युतः ॥ २१ ॥ प्रजापतिनामक बर्षमें प्रमें दुःख कभी नहीं हो स्वजनोंके साथ मित्रता बढे रोग नहीं हो ऐसे प्रजामें आनंद रहै ॥ २१ ।। अतिथिस्वजनैस्सार्घमन्नं बोभुज्यते मधु ॥ पेपीयंते कामिनीभिरंगिरोऽब्दे निरंतरम् ॥ २२ ॥ अंगिरा नामक वर्षमें अतिथिजन तथा स्वजन मनुष्योंके साथ अन मिष्ट पदार्थ भोजन किया जाय स्त्रियाँ अच्छे प्रकारसे रमण कर ।। २२ ।। {४२ ) नारदसंहिता । श्रीमुखेब्दे दुग्धपूर्णा गोकर्णवलयेव भूः । सस्यपीता वरावारि गावस्तृगपयोधराः ॥ २३ ॥ प्रमुखनामक वर्षमें पृथ्वीपर दूधदेनेवाली गौओंकी वृद्धि हो खेतियोंमें वर्षा बहुत अच्छी हो गौऑके दूधकी वृद्धिहो ।२३।। स्युर्धभुजो प्रभाभाजः प्रभंजनश्रुजः परे ॥ भावाब्दे भूसुरग्राम भ्रमणं लोभतः सदा ॥ २७ ॥ भाव नामक वर्षमें राजाओंके तेजकी वृद्धि, शत्रुओंको दुःखहो ब्राह्मण छोगोंके समूह लोभके कारण प्रजामें भ्रमते रX ॥ २४ ॥ अदऽजखं रमयति युवाब्दे युवतीजनः ॥ युवानो निखिला लोकाः क्षितिधापि फलोत्कटा।२४।। युवा नामक वर्षेमें स्रियां निरंतर रमणकरें और पृथ्वीपर फल बहुत उत्पन्न होवे ॥ २५ ।। धात्री धात्रीव लोकानामभया च फलप्रदा । धात्रब्दे धरणीनाथाः परस्परजयोत्सुकाः ॥ २६ ॥ धाता नामक वर्षमें पृथ्वी छोगोंको माताके समान सुखदेनेवाली हो, भय नहींहो, पृथ्वी पर फल बहुत ह राजालोग आपसमें युद्ध करनेकी इच्छा करें ॥ २६ ॥ ईश्वराब्दे स्थिरः मेशा जगदानंदिनी मही । अध्वरे निरता विप्राः स्वस्वमार्गे रताः परे ॥ २७ ॥ ईश्वरनामक वर्षमें राजालेग सुखी रहैं पृथ्वीपर सब मनुष्य बहुत खुशी रहैं ख़ालण लोग यज्ञकरनेमें तत्पर रहें अन्य लोग अपने अपने काममें तत्पर रहैं ।। २७ ।। 4A +९ भाषाटीकाम०-अ० ३ ( ४३ ) बहुधान्ये च बहुभिर्धान्यैः पूर्णाखिला धरा ॥ प्रभूतपयसो गावो राजानः स्युर्विवौरेणः ॥ २८ ॥ बहुधान्य नामक वर्षमें पृथ्वी बहुत धान्यसे परिपूर्ण हो गौवें बहुत दूध देवें राजाओंमें वैर नहीं है ।। २८ ।। बलाहका न मुञ्चति कुत्रचित्प्रचुरं पयः । प्रमाथ्यब्दे वीतरागास्तथापि निखिला जनाः॥ २९॥ प्रमाथी नामक वर्षमें मेघ क्ह विशेष वर्षा नहीं करें मनुष्योंमें आपसमें वैर होये ।। २९ ।। प्रवहंत् िजलं स्वच्छं स्रवंति प्रचुरं पयः। विक्रमाब्देखिलाः क्ष्मेशा विक्रमाक्रांतभूमयः ॥३० ॥ विक्रम नामक वर्षमें वर्षा बहुत हो सम्पूर्ण राजा छोग सेनाओंसे भरपूरहोके पृथ्वी दबानेका उद्योग करें ॥ ३० ॥ विविधैरन्नपानाचैर्दष्टपुष्टांगचेतसः । मदोन्मत्ताखिला लोका वृषाब्दे वृषसन्निभाः ॥ ३१ ॥ वृष नामक वर्षमें अन्नादिकोंके प्रवरो सब मनुष्य हृष्टपुष्टशरीर- वाले मदोन्मत्त होकर वृष ( बैल ) समान पुष्ट रहैं ॥ ३१ ॥ विचित्र वसुधा चित्रपुष्पवृष्टिफलादिभिः ।। चित्रभानुशरथेषा भाति चित्रांगना यथा ॥ ३२ ॥ चित्रभानु वर्षमें विचित्र पुष्प फलादिकोंके प्रवसे यह पृथ्वी ऐसी विचित्र शोभित हो कि जैसे चित्रांगना ( सुंदरनारी) शोणित हो ॥ ३२ ॥ ( ४४ ) नारदसंहिता । नन्दन्तीह जनाः सर्वे श्रम‘रिफलान्विता । सुभlनुवत्सरे पूमिर्भमभूपालविग्रहा ॥ ३३ ॥ सुभानु नामक वर्षमें पृथ्वी बहुत फलोंसे भरपूर हे सब मनुष्य आनंद करें राजालोगोंका युद्ध हो ॥ ३३ ॥ प्रतरन्थंडुषोपायैः सरितोषीय संततम् ॥ तरणाब्दं त्वतुलिता अर्थवंतो हि जंतवः ॥ ३४ ॥ तारण नामक वर्षमें प्रयोजनमैवास्ते निरंतर नौकाके उपायोंकरके सब मनुष्य नदियोंसे पार गमन करें और बहुत धनका संचय करें ॥ ३४ ॥ पतन्ति करकोपेताः पयोधर निरंतर ॥ पापादपेतमनसः पार्थिवाब्दे तु पार्थिवाः ॥ ३५ ॥ पार्थिव नामक वषम ओला सहित निरंतर वर्षा हो राजालेग अपने मनमें पापका चिंतचन न करें ।। ३५ ॥ दीप्यते वसुधा वीरभद्वारणवाजिभिः॥ व्यपेतव्याधयः सर्वे व्ययाब्दे तु व्ययान्विताः ॥ ३६ ॥ ध्ययनाम वर्षमें शूखीर हस्ती घोडे इन्होंने पृथ्वी पारिपूर्ण, प्रजामें बीमारी नहीं हो सब मनुष्य द्रव्य खर्चे बहुत करें ।। ३६ ।। । गीर्वाणपूर्वगीर्वाणान् गर्वनिर्भरचेतसः ॥ सर्वाजदुसरे सर्व उवशानं हंति मिषान् ॥ ३७ ॥ सर्वजित् नामक वर्षमें गर्वसे भरपूर हुए संपूर्ण पृथ्वीकें राजालोग देवतो तथा दैत्योंको नष्ट करै अर्थात् पृथ्वीपर बहुत सुख दृढं ।। ३७ ।। आथाटीकास-अ० ३. (४५) सर्वधारीवसस्मिन् जगदानंदिनी धरा ॥ प्रशांतवैरा राजानः प्रजापालनतत्पराः ॥ ३८॥ सर्वधारी नामक वर्षमें पृथ्वीपर सबजगह आनंद होवे राजलोग आपसमें वैरभाव नहीं करें अपनी २ प्रजापालनमें तत्पर रहैं ।।३८।। विरोधं सततं कुर्वत्यन्योन्यं क्षितिपाः प्रजाः ॥ विरोधिवत्सरे भूमिर्धरिवारिधरैर्युता ॥ ३९ ॥ विरोधी नामक वर्षमें राजाछोग आपसमें युद्ध करें पृथ्वीपर वर्षा बहुत हो ।। ३९ ।। विकृतिः प्रकृतिं याति प्रतिविंशतिं तथा । तथापि मोदते लोकस्तस्मिन् विकृतवत्सरे ॥ ४० ॥ विश्चत नामक वर्षमें खरब नीच जन उत्तम पदवी प्राप्तही और अच्छे जन निरादरको प्राप्तहों परंतु सबलग सुखी रहैं ।।४०। खराब्दे सततं सम्यग्बध्यन्ते पशवः प्रजाः । । राजानो विलयं यांति परस्परविरोधतः ॥ ४१ ॥ खर नामक बर्षमें संपूर्ण प्रजा तथा पशु बंधनमें प्राप्त होवें राजा- योगं आपसमें युद्ध करके नष्टहोजायें ॥ ४१ ॥ आनंददा धराजधं प्रजाभ्यः फलसंचयैः । नंदनाब्दे स्वहानिः स्यात्कोशधान्यविनाशकृत् ॥६२॥ नंदन नभक वर्षों भजमें धन्य तो आदित्रोंसे सव प्रजाको निरंतर आनंद रहै और सोना चांदी आदि धनकाब खजानाका नाश हो ॥ ४२ ॥ ० ( ४६ ) नारदसंहिता । नश्यते वारिधाराभिः पूर्वकृष्यखिलं फलम् । राजभिश्वपरं सर्वं विजयाब्दे जयेप्सुभिः ॥ ४३ ॥ विजय नामक वर्षमें बहुत वर्षा होनेसे पहिली खेती ( सामग्री ) का नाशहो और पिछली खेतीके समय शजाओंके युद्धदिकका उपद्रव होवे ।। ४३ ।। शैलोद्यानवनारामफलैरतुलिता महीं ॥ जेगीयते वेणुनादैर्जयाब्दे च महाजलम् ॥ ३४ ॥ जय नामक वर्षमें पर्वत फुलवाड़ी वन बगीचा इन्होंमें सर्वत्र बहुत फलचाली पृथ्वी होवे और बहुत वर्षा होनेकी अत्यंत प्रशंसा होये ।। ४४ ।। मन्मथाब्देखिल लोकास्तत्केलिपरलोलुपाः ॥ शालीक्षुयवगोधूमैर्नयनाभिनवा धरा ॥ १५॥ ममथ नामक वर्षमें सब लोग कम क्रीडा करनेमें तत्पर रही चावला आदि धान्य, ईखजव, गेंहूँ इन्हों करके पृथ्वी बहुत मनो हर शोभित हो ॥ ४५ ॥ दुर्मुखाब्देशिरोगाः स्युः प्रचुरान्नं तथा पयः ॥ राजानः सप्रजास्तुष्टा निःस्वाश्च द्विजसत्तमः॥ ४६ ॥ दुर्मुख नामक वर्षमें अभिभय तथा रोग हो अन्न बहुत हो दूधकी वृद्धि हो राजा । प्रजामें आनंद रहे बालण लोग दरिद्री होर्ये ।। ४६ ।। हेमलंबे नृपाः सर्वे परस्परविरोधिनः । प्रजापीडात्वनर्घत्वं तथापि सुखिनो जनाः ॥ ४७ ॥ भाषाटीकास०--अ० ३. (४७) हेमलंब नामक वर्षमें सब राजालोग आपसमें वैरभाव करौ प्रजामें पीडा अन्नदिकका भाव महँगा रहे तौ भी लोगोंमें सुख रहे॥४७॥ विलंबवत्सरे राजविग्रहो भूरिवृष्टयः ॥ आतंकपीडिता लोकाः प्रभूतं चापरं फलम् ।। ६८॥ विलंब नामक वर्षमें राजाओंका युद्ध हो वर्षों बहुत ही लोगोंमें रोगवृद्धि हो अन्य सब फल अच्छा हो ।४८ ॥ विकारिणो विकार्यब्दे पित्तरोगादिभिर्नराः । मेघो वर्षति संपूर्ण समुद्रवसनक्षितौ ॥ ४९॥ विकारी नामक वर्षमें मनुष्य पित्त आदि रोगोंसे पीडित होवें वष बहुत ही पृथ्वीपर सर्वत्र जल फैल जावे ।। ४९ ॥ शार्वरीवत्सरे सर्वसस्यवृद्धिरनुत्तमा। चलिताचलसंकाशैः पयोदैरावृतं नभः ॥ ६० ॥ शर्वरीनामक वर्षमें पृथ्वीपर सब खेतियोंकी बहुत अच्छी वृद्धि हो और चलित अचळ ( पर्वत ) समान कांतिवाले मेघोंकरके आकाश आच्छादित रहे ।। ५० ।। दीप्यंते सततं भूपाः प्लवाब्दे ऽवगा जनाः॥ राजते पृथिवी सर्वा सततं विविधोत्सवैः ॥ ६१ ॥ gख नामक वर्षमें राजाओोग निरंतर विराजमान होवें मनुष्य नौकामें स्थित हो गमन करें संपूर्ण पृथ्वी अनेक उत्सव करके शोभित हो।। ५१ ।। शुभकृद्धत्सरे सर्वसस्यनामतिवृद्धयः ॥ नृपाणां स्नेहमन्योन्यं प्रजानां च परस्परम् ॥ ६२ ॥ (४८) नारदसंहिता । शुभक नामक वर्षमें संपूर्ण खेतियोंकी अत्यंत वृद्धि हो राज ओंकी आपसमें मित्रता बढं अजामें फीति बढी ॥ ५२ ॥ शोभूनाख्ये हूयने तु शोभनं भूरि वर्तते । नृपाश्चैवात्र निवरः सर्वसम्पद्युता धरा ॥ ९३ ॥ शोभन नामक वर्षमें पृथ्वीपर बहुत शोभन हो, और रॉबई निर्वैरहों, पृथ्वी संपूर्ण संपवसे युक्तते ।। ५३ ।। बध्यब्दे सततं रोगाः सर्वसस्यसमृद्धयः । दंपत्योर्वैरमन्योन्यं प्रजानां च परस्परम् ॥ ५४ ॥ क्रोधी नामक वर्षमें प्रजामें निरंतर रोग होवे और संपूर्ण खेति यॉकी वृद्धि स्त्रीपुरुषोंका आपसमें वैर हो ।। ५४ ।। शश्वद्विघसावब्दे मध्यसस्यार्घवृष्टयः ॥ प्रचुराश्चौररोगाश्च नृपा लोभाभिभूतयः ॥४॥ विश्वावसु नामक वर्षमें निरंतर मध्यम खेती उपन्न हों,गध्यम् व तथा अन्नका भाव महंगा रहै रोग तथा चौरॉकी वृद्धि हो राजा लोग लोगी होवें । ५५ ।। पराभवाब्दे राजानः प्रभुवंति पराभवम् ॥ आमयः क्रुद्धान्यानिप्रभूतानि सुवृष्टयः ॥ ३६ ॥ परातवनाम वर्षमें राजा लोग तिरस्कारको प्राप्त होवें रोग हो। और मरगोट आदितुच्छ धान्यज्यादे निपजे वर्षा ज्यादै हो।५६।४ एवंगाब्दे सस्यहानिश्चैौरोगदिता जनाः॥ मध्यधृष्टिः क्षितीशानां विरोधं च परस्परम् ॥ ५७ ॥ प्लवंगनामक वर्षमें खेतीकी हानि चैौरेंकी वृद्धि भजामें रोग मृध्यमवर्षे राजाओंका अपसमें युद्द हवे ।। ५७ ।। Hषाटीकास ०-अ० ३ (४९) प्रचुराः पित्तरोगाः स्युर्मध्या वृष्टिरहेर्भयम् । कीलकाब्दे वीतिभयंप्रजाक्षोभः परस्परम्॥ ९८॥ कीळक वर्षमें पित्तके रोग बहुत होवें मध्यम वर्षा हो सट्टका भयहो टीडी अदिीका अध्यक्षे प्रजामें आपसमें वैर हो ।। ५८ ।। प्रचुराः शैत्यरोगाः स्युमध्या वृष्टिरहेर्भयम् । सौम्याब्दे चैव सततं शांतवैराःक्षितीश्वराः ॥ ६९ ॥ सौम्य वर्षमें राजालोग आपसमें निरंतर प्रसन्न रहैं शरदके रोग बहुत होवें वर्षा मध्यम हो सट्टका अयह ।। ५९ ॥ साधारणेब्दे राजानः सुखिनो गतमत्सरः । प्रजाश्च पशवः सर्वे वृष्टिः कर्षकसंमता ।। ६० ॥ साधारण नामक वषेमें राजा सुखी रहें आपसमें वैरत्ताव नहीं करें प्रजामें आनंद पशुवृद्धि और किसान छोगोंके मनके माफिक वर्षा हो ॥ ६० ॥ विरोधकृद्वत्सरे तु परस्परविरोधिनः । राजानो मध्यमा वृष्टिः प्रजा स्वस्था निरंतरम् ॥ ६१ ॥ विरोधक नामक बर्षमें राजाळोग आपसमें वैरभाव करें वर्षा मध्यम हो प्रजामें निरंतर आनंद रहे ॥ ६१ ॥ अनध्यमयरोगेभ्यो भीतिरीतिनिरंतरम् ।। परिधावीवत्सरे तु नृणां वृष्टिस्तु मध्यमा ॥ ६२ ॥ परिधावी नामक वर्षमें अनादिकका आव महँगा रोग टीबी आदि उपद्रवका निरंतर अॅथहो मध्यम वर्षोंहो । ६२ ॥ , ( ५० ) नारदसंहिता ।। नृपसंशंभमत्युग्रं प्रजापीडा त्वनर्घता । तथापि दुःखमाप्नोति प्रमादीवत्सरे जनः ॥ ६३ ॥ प्रमादी वर्षेमें राजओका अत्यंत वैरभाव प्रजामें पीडा भाव महँगा हो सब जन दुःखको प्राप्त होउँ ।। ६३ ।। आनंदवत्सरे सर्वेजंतवः पशवः सदा ॥ आनंदयंति चान्योन्यमन्यथातु क्वचित् क्वचित् ॥६४॥ आनंद नामक वर्षमें संपूर्ण जीव पशु आषसमें आनंद करें कह दुःख भी रहै । ६४ ।। प्रजायां मध्यमसुखं तदधीशाहवोऽवहम् ॥ निष्क्रिया राक्षसाब्दे तु राक्षसा इव जंतवः ॥ ६६ ॥ राक्षस नामक वर्षमें प्रजामें मध्यम सुख रहे राजाआका हमेशं युद्ध होवे सब जन राक्षसोंकी तरह क्रिया रहित होवें ।। ६५ ॥ अनलाब्देऽनलभयं मध्यवृष्टिरनचंता ॥ नृपाः संक्षोभसंभूता भूरिभीकरभूमिपाः ॥ ६६ ॥ अंनल वर्षमें अभिनय मध्यम वर्षा भाव महँग राजाओंमें परस्पर बहुत भयंकर वैरभाव उत्पन्न हो ।। ६६ ॥ पिंगलोब्दे तु सततं दिपूरितघनस्वनम् । राजानः स्वभुजाक्रांता सुंजते मामनुत्तमाम् ॥ ६७ ॥ पिंगल नामक वर्षमें निरंतर दिशाओंमें मेघवर्षनेकाशब्द होता है राआलोग अपनी भुजाके बळसे पृथ्वीको भोगें ॥ ६७॥ अतिवृष्टिः कालयुक्ते वत्सरे सुखिनो जनाः॥ सततं सर्वंसस्यानि संपूर्णाश्च तथा द्रुमाः ॥ ६८॥ Ab भघाटीकस०-अ० ३. (५३१ ) काळयुक्त नामक वर्षमें वर्षा बहुत हो सब जन सुखी रहैं निरंतर संपूर्ण खेती निपजें और सब वृक्षोंके अच्छा फळ लगे ।। ६८ ॥ सिद्धथींवत्सरे भूपाश्चान्योन्यं स्नेहकांक्षिणः । संपूर्णसस्यां वसुधां दुदुहुर्गा यथा तथा ॥ ६९॥ तिङर्थ नामक वर्षमें राजालोग आपसमें मित्रता बढनेकी इच्छा करें और जैसे गैौको दहते हैं ऐसे संपूर्ण खेतियसे । भरपूर हुई पृथ्वीका दोहन करें (भोगकरें)। ६९ ।। अन्योन्यं नृपसंक्षोभं चौरव्याघ्रादिभिर्भयम् ॥ मध्यवृष्टिरनर्घत्वं रौद्राब्दे नैव गुजरे ॥ ७० ॥ रौद्र नामक वर्षमें राजालोग आपसमें वैरभाव करें और चौर व्याघ्र आदिकोंका भय हो मध्यम वर्षा हो अन्नदिकंका आव महँगा रहै परंतु गुर्जर (गुजरात ) देशमें यह फल नहीं हो अर्थात शुभफलहो ।। ७० ।। दुर्मत्यध्दे दुमेंतयो भवंत्यखिलभूमिषाः ॥ तथापि सुखिनो लोकाः संग्रामे निर्जितारयः ॥ ७१ ॥ दुर्मति वर्षमें संपूर्ण राजालोगोंकी बुद्धि खराब रहै तोही सब प्रजाके लोग युद्धमें शत्रुओंको जीतें और मुखी रहैं ॥ ७१ ॥ सर्वसस्यैश्च संपूर्णा धात्री सुंदुभिवत्सरे ॥ राजभिः पाल्यते पूर्वदेशेश्वरविनाशनम् ॥ ७२ ॥ छंदसि नामक वर्षमें पृथ्वी खेतियोंसे भरपूरहो राजालोग पंजाकी पाउना करें पूर्व देशका नाश हो ॥ ७२ ॥ ३ नारदसंहिता । A आहवे निहताः सर्वे भूपा रोगैस्तथा जनाः तथापि तत्र जीवंति रुधिरोद्भरिवत्सरे ॥ ७३ ॥ रुधिरोद्री नामक वर्षमें राजालोग युद्दमें मृत्युको प्राप्तहों और प्रजालोग बीमारीसे मरें कितेक लोग जीवते रX ।। ७३ ॥ रक्ताक्षिवत्सरे सस्यवृद्धिर्युष्टिरनुत्तमा॥ प्रेक्षते सर्वदान्योन्यंराजानो रक्तलोचनाः॥ ७४ ॥ रक्ताक्षी नामक वर्षमें खेतीकी वृद्धिको वर्षा बहुत अच्छी हो राजा लोग सदा आपसमें दूर दृष्टिसे वैरभाव करें ॥ ७४ ॥ क्रोधनाब्दे मध्यदृष्टिः पूर्वंसस्यं न तु क्वचित् । संपूर्णामितरत्सस्यं सर्वे धपरा जनाः ॥ ७६ ॥ धेन नामक वर्षमें मध्यम वर्षाहो पहली खेती (साम) कहीं निपजे पिछी सेती अच्छी निषजे संपूर्ण जन क्रोधमें तत्पर रहै७५१ कार्पासगुडतैलेझुमधुसस्यविनाशनम् । क्षीयमाणाश्वपि नरः जीवंति क्षयवसरे ॥ ७६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां संवत्सरफलम् ॥ क्षय नामक वर्षमें कपास गुड तेल ईंख शहद खेती इन्होंन नाश हो क्षीण होते हुए मनुष्य जीवें ॥ ७६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां संवत्सरफलं समाप्तम् । आद्यब्दशचमूनाथसस्यपानांबलबलम् ॥ तत्कालग्रहचारं च सम्यग् ज्ञात्वा फलं वदेत् ॥ ७७ ॥ प्रथम वर्षेश, सेनापति सस्यपति इन्हों बलावल विचारके तर्क ल ग्रहका चार विचारके अच्छे प्रकरसे संबत्का फळ कहै ॥ ७७ ॥ आषाढीकाप्त ०-अ० ३. (५३ ) सौम्यायनं मासषदं मृगाची भानुभुक्तितः ॥ अहः सुराणां तद्रात्रिः कर्काद्य दक्षिणायनम् ॥ ७८ ॥ मकर आदि छः राशियोंपर सूर्य रहै तबतक उत्तरायण कहता है वह देवताओंका दिन और कर्क आदि छह संक्रातियोंमें जो दक्षिणायन कहा है वह देवताओंकी रात्रि है ॥ ७८ ॥ गृहप्रवेशवैवाहप्रतिष्ठा मौंजिबंधनम्॥ यज्ञादिमंगलं कर्म कर्तव्यं चोत्तरायणे । याम्यायनेऽशुभं कर्म मासप्राधान्यमेव च ॥ ७९ ॥ गृहं प्रवेश, विवाहप्रतिष्ठा, मौंजीबंधन, यज्ञादि मंगल, ये कर्म उत्तरायण सूर्य हो तय करने चाहियें और दक्षिणायनमें अशुभ कर्म तथा मासप्रधान्य महीनाके योगमें होनेवाले कर्म करने चाहियें ॥ ७९ ।। क्रमाच्छिशिरस्रसंतग्रीष्माः स्युश्चोत्तरायणे॥ वर्षा शरच्च हेमंत ऋतवो दक्षिणायने ॥ ८० ॥ उत्तरायण सूर्यंमें क्रमसे शिशिर वसंत ग्रीष्म ये तीन ऊतु होती हैं, दक्षिणायनमें वर्षा शरद हेमंत ये अतु होती हैं ॥ ८० ॥ माघादिमासौ द्वौद्वौ च ऋतवः शिशिरादयः॥ वांद्रो दर्शावधिः सौरः संक्रांत्या सावनो दिनैः ॥ ८१ ॥ त्रिंशद्भिश्चैद्भगणो मासो नाक्षत्रसंज्ञकः । मधुश्च माधवः शुक्रः शुचिधापि नभाह्वयः ॥ ८२ ॥ माय आदोि दो २ महीने ये शिशिर आदि तु यथाक्रमे जानने । चांद्रमास अमावस्याको समाप्त होता है सौरमास संका (५४) नारदसंहिता । तिथर पूरा होता है सावनमास पूरे तीसदिनमें समाप्त होता है और नाक्षत्रमास चंद्रमाके नक्षत्रोंका क्रमसे होताहै मधु ३ माधव २ शुक्र-३ शुचि ४ नंभ ५॥ ८१-८२ ॥ नभस्य इष ऊर्जश्च सहाख्यश्च सहस्यकः । तपः स्तपस्यः क्रमशश्चैत्रादीनां तु संज्ञकाः ॥ ८३ ॥ नभस्थ, ६ इंध ७ ऊर्ज ८ सह ९ सहयक १० तथा ११ तपस्य १२ ये बारह चैत्र आदि महीनोंके नाम जानने ॥ ८३॥ यस्मिन्मासे पौर्णमासी येन धिष्ण्येन संयुता ॥ तन्नक्षत्राह्यो मासः पौर्णमासी तथावथा ॥ ८४ ॥ जिस महीनेमें जिस नक्षत्रसे युक्त पौर्णमासी होय उसी नक्ष त्रके नाभसे महीना होताहै और उसी नामसे पूर्णमासी होतीहै जैसे चित्रानक्षत्र होनेसे चैत्रमास चैत्री पौर्णमासी विशाखा होनेते वैशा खमास वैशाखी पौर्णमासी इत्यादि ।। ८४ ।। तत्पक्षौ दैवपैत्राख्यौ शुक्छुकृष्णं च तावुभौ । शुभाशुभे कर्मणि च प्रशस्तौ भवतः सदा ॥ ८५॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां संवत्सराध्यायस्तृतीयः । तिसके शुक्ल और कृष्णसे दो पक्ष दैव पैत्रनामसे प्रसिद्ध हैं। शुभ अशुभ कर्ममें प्रशस्त कहे हैं अर्थात् शुक पक्षमें शुभकर्म शुभ हैं ॥ ८५ ।। इति श्रीनारदसंहिताभाषीकायां संवत्सराध्यायस्तृतीयः ।। ३ ।। 8 = } भाषाटकस ०-अ० ४. ३ ३ वह्निविरिंचिगिरिजागणेशः फणी विशाखो दिनकृन्महेशः । दुर्गान्तको विष्णुरी स्मरञ्चसर्वः शशी चेतिपुराणहृष्टः॥१॥ अथ प्रतिपदा आदि तिथियोंके स्वामी अग्नि १ ब्रह्म २ गौरी ३ गणेश ४ सर्प ५ स्कंद ६ सूर्य ७ शिव ८ दुर्गा ९ यम १० विश्वेदेवा ३१ हरि १२ कामदेव १३ शिव १४ चंद्रमा १५ ये प्रतिपदा आदि पूर्णिमातक तिथियोंके स्वामी हैं ।। १ । । अमाया पितरः प्रोक्तास्तिथीनामधिपाः क्रमात् ॥ २॥ अमावस्याके स्वामी पितर हैं ऐसे तिथियोंके स्वामी यथाक्रम जानने चाहियें ।। २ ।। तिथीनामपराः संज्ञाः कथ्यन्ते ता यथाक्रमात् ॥ ३ ॥ तिथियोंकी अन्यभी संज्ञा है सो यथा क्रममे नंदा, भद्रा, जया रिक्ता, पूणां ऐसे जाननी ।। ३ ॥ पर्यायत्वेन विज्ञेया नेष्टमध्येष्टदा सिते ॥ कृष्णपक्षेपीठमध्यनेष्टदाः क्रमशः सदा ॥ ४ ॥ ये तिथि अर्थात् प्रतिपदा ५ तक फिर १० तक फिर १५ तक ऐसे शुक्लपक्षमें अशुभ, मध्यम, श्रेष्ठ, ऐसे फलदायी जाननी और कृष्णपक्षमें श्रेष्ठ मध्यम, अशुभ ऐसे क्रमसे जाननी ।। ४ ।। चित्रलेख्यासवक्षेत्रतैलशय्यासनादि यत् । वृक्षच्छेदो गृहमार्थं कर्तृप्रतिपदीरितम् ॥ ५॥ चित्र लिखना, मदिरा निकटनी, खेतका काम, तेल मालिश, शय्य, आसन, वृक्षकाटना, घर पत्थरका काम . ये कर्म प्रतिपदा तिथिविषे करने शुरु हैं ।। ५ ।। (५६) नारदसंहिता। विवाहमौंजीयात्राश्च सुरस्थापनभूषणम् ॥ गृहं पुष्यखिलं कर्म द्वितीयायां विधीयते ॥ ६ ॥ विवाह, मौंजीबंधन, यात्रा, देवस्थापन, आभूषण, घर प्रारंभ , संपूर्ण पुष्टिके कर्म, ये सब द्वितीया तिथि विषे करने चाहियें ॥ ६ ॥ मॅजी प्रतिष्ठाश्च शिल्पविद्या निखिलमंगलम् । पश्खिभोष्ट्रांबुयानोक्तं तृतीयायां विभूषणम् ॥ ७ ॥ मौंजीबंधन, प्रतिष्ठा, शिल्पविद्य, संपूर्ण मंगलकार्य, पशु, हाथी, ऊंट इनका खरीदना जलमें गमन करना ये कर्म तृतीया तिथि विषे करने शुभ हैं । ७॥ । अथर्वविद्याशस्त्राग्निबंधनोच्चाटनादिकम् । मारणाद्यखिलं कर्म रिक्तास्वेव विधीयते ॥ ८ ॥ अथर्व विद्या अर्थात् गायन तथा मंत्रादि चिया शस्त्र विद्य अपि बंधन उच्चाटन मारणआदि कर्म रिक्तता ४९।१४ तिथियोंमें करने चाहियें ॥ ८ ॥ यानोपनयनोद्वाहग्रहशांतिकपौष्टिकम् ॥ चरस्थिराखिलं कर्म पंचम्यां मंगलोत्सवम् ॥ ९ ॥ सवारी करना, उपनयनकर्म, विवाह, ग्रहशांति, पौष्टिक कर्म, चर स्थिर मंगरोत्सव, येकम पंचमी तिथिमें करने चाहियें ॥ ९ ।। पंचवास्तुमहीसेवापण्यांबुयाविक्रये॥ भूषणं व्यवहारादि कर्म षष्टयां विधीयते ॥ १९ ॥ पशुकर्म, वास्तुकर्म, पृथ्वीके कामसेवाकर्म,दूकान, जळ, खरी दनावेचना,आभूषणव्यवहार ये कम षष्ठी तिथिमें करने चाहियें - । भाषटक्रिस ०-अ० ४. (५७) . यानस्थापनवाहादि राजसेवादि कर्म यत् ॥ विवाहवास्तुषार्धे सप्तम्यां चोपनायनम् ॥ ११ ॥ गमन, स्थापन, वाहन, राजसेवा आदिकर्म, विवाह, वास्तु, आभूषण, उपनयनकर्म ये सप्तमीमें करने चाहिये ।। ११ ।। कृषिवाणिज्यधान्याश्मलोहसंग्रामभूषणम् ॥ शिवस्थापनखाताम्बुकर्माष्टम्यां विधीयते ॥ १२ ॥ खेती वणिज धान्य पत्थर लोहा संग्राम आभूषण शिवस्थापन खोदनेका काम जळकर्म ये अष्टमी विषे करने चाहियें ।। १२ ।। प्रासादस्थापनं यानमुद्वाहे व्रतबंधनम् ॥ शल्पृिष्टचादिकं कर्म दशम्यांतु प्रशस्यते ॥ १३॥ देवमंदिरकी पूजा गमन विवाह बतबंधन शांतिपुष्टि आदिकर्म ये दशमीविषे करने श्रेष्ठ हैं ।। १३ ।। व्रतोपवासवैवादकृषिवाणिज्यभूषणम् ॥ शिरुपनृत्यं गृहं कर्म एकादश्यां विचित्रकम् ॥ १४ ॥ व्रत उपवास विवाह खेती वणिज आभूषण शिल्पकर्म नृत्य गृह कर्म विचित्रकर्म ये एकादशीतिथिमें करने चाहिये ।। १४ ।। चरस्थिराखिलं कर्म दानशांतिकपौष्टिकम् ॥ यात्रान्नग्रहणं त्यक्त्वा द्वादश्यां निखिलं हितम् ॥ १९ ॥ चर स्थिर सम्पूर्ण कर्म, दानशांति पैौष्टिककर्म यात्रा अन्नसंग्रह इनकमके बिना अन्यकर्म द्वादशी तिथिमें करने शुभ हैं १५ ।। अग्न्याधानं प्रतिष्ठा च विवाहबतबंधनम् ॥ निखिलं मंगलं यानं त्रयोदश्यां प्रशस्यते ॥ १६ ॥ (५८) नारदसंहिता। अग्निस्थापन, प्रतिष्ठा, विवाह, यज्ञोपवीतसंपूर्ण मंगळकर्म यात्रा ये त्रयोदशीको करने शुभ हैं ॥ १६ ॥ बंधनालिप्रदानोग्रघातत्रणरणक्रिया॥ शस्त्रास्त्रलोहकर्माणि चतुर्दश्यां विधीयते ॥ १७ ॥ बंधन अगिलाना उग्रघात रण शस्त्र अत्र लोहकर्म ये सब चतुर्दशीको करने शुभ हैं ।। १७ ।। तैलीसंगमं चैव दंतकाठोपनायनम् ॥ सक्षौरं पौर्णमास्यां च विनान्यदखिलं हितम् ॥ १८ ॥ तेछकी मालिश, स्त्री संग, दांतून करना, यज्ञोपवीत क्षौर इनके विना अन्यकर्म पौर्णमासी विषे करने शुभ हैं॥ १८ ॥ पितृकर्मत्वमावास्यामेकं मुक्त्वा कदाचन । न विदध्यात्प्रयत्नेन यत्किचिन्मंगलादिकम् ॥ १९ ॥ अमावास्या तिथिविषे एक पितृ कर्मविना अन्य कुछ मंगळलैर्म कभी नहीं करना चहिये ।। १९।। अष्टमी द्वादशी षष्टी चतुर्थी च चतुर्दशी । तिथयः पक्षरंध्राख्या दुष्टास्ता अतिनिंदिताः ॥ २० ॥ अष्टमी द्वादशी षष्टी चतुर्थ चतुर्दशी ये तिथि परंध्रनामक अर्थात् पक्षमें छिद्ररूप कही हैं ये अशुभ अत्यंत निंदित हैं ।२०। चतुर्थमनुरंध्रांकतत्वूसंज्ञास्तु नाडिकाः॥ त्याज्या दुष्टासु तिथिषु पंचस्वेतासु सर्वदा ॥ २१ ॥ और ४-१४-७-९-५- इतनी प्रमाण घडी यथाक्रमसे इन आदि दुष्ट पांच तिथियोंमें सदा त्याग देनी चाहिये फिर अशुभ नहीं है । २१ ।। आषाढीत -अ० ४. (५९) अमावास्या च नवमी त्यक्त्वा विषमसंज्ञिकाः । तिथयस्ताः प्रसस्ताः स्युर्मध्यमा प्रतिपत्तथा ॥ २२ ॥ फिर अमावस्या नवमीको त्यागकर ये विषमसंज्ञक तिथि भी शुभदायक कही हैं और प्रतिपदा तिथि मध्यम है ।। २२ ॥ दशैषष्ठयां प्रतिपदि द्वादश्यां प्रतिपर्वसु । नवम्यां च न कुर्वीत कदाचिदंतधावनम् ॥ २३ ॥ अमावस्या षटी प्रतिपदा द्वादशी पूर्णमासी इनमें कभी दांतून नहीं करनी चाहिये ।। २३ ॥ षष्ठयां तैलं तथाष्टम्यां मांसं क्षीरं तथा कले। पूर्णिमादर्शयोर्नारीसेवनं परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥ षष्ठीमें तेल अष्टमीविषे मांस चतुर्दशी विषे क्षौर पूर्णमासी । वा अमावस्या विषे स्त्रीरमण वर्जदेना चाहिये ॥ २४ ॥ व्यतीपाते च संक्रांतौ एकादश्यां च पर्वसु । अर्कभौमदिने षष्ठयां नाभ्यंगं च न वैधृतौ ॥ २९॥ व्यतीपात, संक्रान्ति, एकादशी, पूर्णमासी, अमावस्या, रविवार मंगल, षष्ठी, वैधृतियोग इन विषे तैल उबटना आदिकी मालिश नहीं करना ॥ २५ ॥ यः करोति दशम्यां च नानमामलकैः सह । पुत्रहानिर्भवेत्तस्य त्रयोदश्यां धनक्षयः ॥ २६॥ दशमीके दिन जो आवयोंसे स्नान करता है उसके पुत्रकी हानि होती है और त्रयोदशी विषे करे तो धनका क्षय हो॥२६॥ ( ६० ) नारदसंहिता । अर्थपुत्रक्षयं तस्य द्वितीयायां न संशयः॥ अमायां च नवम्यां च सप्तम्यां च कुलक्षयः ॥ २७ ।। द्वितीया विषे धन और पुत्रका नाश हो अमावस्या नवमी सप्तमी इन विषे आंवलोंसे स्नान करे तो कुळका क्षय हो ।२७ ।। या पूर्णमास्यनुमतिनशि चंद्रवती यदा । दिवा चंद्रवती राका ह्यमावास्या तथा द्विधा ॥ २८ ॥ जिसमें रात्रिमें चंद्रमा प्राप्त हो अर्थात् चतुर्दशीमें पूर्णािम आई हो यह अनुमति कही है और दिनमें भी चंद्रमाकी पूर्ण कलाओंसे युक्त हो वह राकसंज्ञक पूर्णिमा तिथि कही है तैसे ही अमावस्या में दो प्रकारकी कही है ॥ २८ ॥ सिनीवाली सेंदुमती कुट्टनेंदुमती मता ॥ कार्तिके शुकुनवमी त्वादिः कृतयुगस्य सा ॥ २९ ॥ एक तो सिनीवाली है उसको चंद्रमा दीखजाता है और कुहू संज्ञक कही है उसको चंद्रमाकी सब कळा क्षीण होजाती हैं और कार्तिक शुक्छ नवमी तिथी सत्ययुगादितिथि कही है ॥ । २९ ।। ॥ त्रेतादिमधवे शुक्का तृतीया पुण्यसंज्ञिता । कृष्णा पंचदशी माघे द्वापरादिरुदीरि ता ॥ ३० ॥ वैशाख शुक्ला तृतीया त्रेताकी आदि तिथि कही है पवित्र है माघकी अमावस्या वापरकी आदि तिथि कही है ॥ ३० ॥ करुपास्याित्कृष्णपक्षे नभस्ये च त्रयोदशी । द्वादश्यूजें शुऋपक्षे नवम्याश्वयुजे सिते ॥ ३१ ॥ आषाढीकस ०-अ० ४. ( ६१ ) आद्रपद कृष्ण त्रयोदशी कलियुगादि तिथि कही है । और कार्त्तिक शुक्ल द्वादशी आश्विन शुक्ल नवमी ।। ३१ ॥ चैत्रे भाद्रपदे चैव तृतीया शुकसंज्ञिता ॥ एकादशी सिता पौषेष्याषाढे दशमी सिता ॥ ३२ ॥ चैत्र शुक्ळा तृतीया भाद्रपद शुक्ला तृतीया, पौष शुक्ल एकादशी आषाढ शुक्ला दशमी ।। ३२ ।। माघे च सप्तमी शुद्धा नभस्येप्यसिताष्टमी । श्रावणे मास्यमावास्या फाल्गुने मासि पूर्णिमा ॥३३॥ माघ शुक्लं सप्तमी, भाद्रपद कृष्णा अष्टमी, आवणकी अमावस्या, फाल्गुनी पूर्णिमा ।। ३३ ॥ आषाढे कार्तिके मासि चैत्रे ज्येष्ठे च पूर्णिमा । मन्वादयः खानदानश्राद्धेष्वानंत्यपुण्यदा ॥ ३४ ॥ आषाढकी पूर्णीमा और कार्तिक, चैत्र, ज्येष्ठ इन्होंकी पूर्णमा ये मन्वदिक तिथि कहीही नान दान आद्ध इन कममें अनंत फल दायक हैं ।। ३४ ।। भाद्रकृष्णे त्रयोदश्यां मघान्विदुः करे रविः । गजच्छाया तदा ज्ञेया श्राद्धेत्यंतफलप्रदा ॥ ३८॥ भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी विषे मघा नक्षत्रपर चन्द्रमा हो औ हस्तपर सूर्य होय तो गजच्छाया योग कहा है श्राद्धमें अत्यंत फल दायक हैं ।। ३५ ।। एकस्मिन्वासरे तिस्रस्तिथयः स्युः क्षयातिथिः ॥ तिथिवारत्रयेष्वेका वधिकात्यंतनिंदिता ॥ ३६ ॥ (६२ ) नारदसंहिता । R = एकवार निरंतर एक बार विषे तीन तिथि क्षय होवें अथवा निरंतर तीन उनही वारोंमें एक तिथि बढी हो वह अत्यंत निंदित कही है ।। ३६ ।। सूर्यास्तमनपर्यंतं यस्मिन् रेपि या तिथिः । विद्यते सा त्वखंडास्याद्दनाचेखंडसंज्ञिता ॥ ३७ ॥ सूर्य अस्त हो तबतक एकही तिथि उस वारमें रहे तो वह अर्ध डा तिथि कहती है जो ऊन ( अधूरी ) वह जावे तो वह खंडिता कहलाती है । ३७ ।। । तिथेः पंचदशो भागः क्रमात्प्रतिपदादयः॥ द्विघटीप्रमितं तत्र मुहूर्ते कथितं बुधैः ॥ ३८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां तिथिलक्षणाध्यायश्चतुर्थः। ९ ।। तिथिका पंद्रहवाँ भाग अर्थात चंद्रमंडलका पंद्रहवाँ भाग प्रतिपदा आदि तिथि कही हैं और दो बडीका एक मुहूर्ते होता है । । ३८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां तिथिलक्षणाध्यायश्चतुर्थः।।४।। नृषाभिषेकमांगल्यसेवायानाम्रकर्म यत् ॥ औषधादवधान्यादि विधेयं रविवासरे ॥ १ ॥ राज्याभिषेक, मंगळकर्णी, सेव, सवारी, अश्नकर्म, औषध, युद्ध, धान्य कर्म ये रविवार विषे करने चाहिये ।। १ ।। शंखमुक्तांबुरजतवृक्षेक्षुस्त्रीविभूषणम् । पुष्पगीतऋतुक्षीरकृषिकर्मेन्दुवासरे ॥ २ ॥ आषाटीकास०-अ० ५. (६३ ) शंख मोती चांदी वृक्ष ईख ढका आभूषण पुष्प गीत यज्ञ दूध खेती ये कर्म सोमवार में करने चाहियें ॥ २ ॥ विषानिबंधनस्तेयं संधिविग्रहमाहवे । धात्वाकरप्रवालास्त्रकर्मभूमिजवासरे ॥ ३॥ विष अनि बंधन चोरी युद्धमें संधि या विजह धातु खजान पुंग शश्वकर्म ये मंगलबारमें करने चाहियें ।। ३ ।। नृत्यशिल्पकलागीतलिपिरससंग्रहम् । विवाहधातुसंग्रामकर्म सौम्यस्य वासरे ॥ ४ ॥ नृत्य शिल्पकला गीत लिखना पृथ्वीके रसोंका संग्रह विवाह धातु संग्राम ये कर्म बुधवारमें करने चाहिये ।। ४ ।। यज्ञपौष्टिकमांगल्यं स्वर्णवस्त्रादिभूषणम् । वृक्षगुल्मलतायानकर्म देवेज्यवासरे ॥ ६ ॥ यज्ञ पौष्टिक कर्म मांगल्यकर्म सुवर्ण वस्त्र आदिका श्रृंगार वृक्ष गुच्छा लता सधारी ये कर्म बृहस्पति वारमें करने चाहियें ॥ ५॥ नृत्यगीतादिदित्रस्वर्णश्रीरत्नभूषणम् ॥ भूषण्योत्सवगोधान्यकर्म भार्गववासरें ॥ ६ ॥ नृत्य, गीतबाजा, सुवर्ण, स्त्री, रन, आभूषण, भूमि दूकान, उत्सव, गैौ, धान्य इन्होंके कार्य शुक्रवार विषे करने चाहियें ।। ६ ॥ त्रपुसीसायसोऽमात्रविषपापासवानृतम् ॥ स्थिरकर्माखिलं वास्तुसंग्रहं सौरिवासरे ॥ ७ ॥ रॉग, सीसा, लोहा, पत्थर, शस्त्र, विष, पाप, मदिरा, चूंठ, स्थिरकर्म, वास्तुकर्म ( घरमें प्रवेश ) संग्रह, ये कर्म शनिवारमें करने शुभ हैं ॥ ७ ॥ (६४ ) नारदसङ्गता । रविः स्थिरश्चरणैदः कुजः क्रूरो बुधोखिलः ॥ लघुरीज्यो मृदुः शुक्रस्तीक्ष्णो दिनकरात्मजः ॥ ८॥ सूर्य स्थिर है चंद्रमा चरहे मंगलर और बुध अच्छे प्रकार पूर्ण है बृहस्पति लुघु (अच्छा हलका ) है शुक्र मृदु ( कोमल ) है शनि तीक्ष्ण कहा है ॥ ८ ॥ अभ्यक्तो भानुवारे यः स नरः क्लेशवान् भवेत् ॥ कक्षेशे कांतिभाग् भौमे व्याधिः सौभाग्यमिंदुजे ॥ ९॥ जो मनुष्य रविवारको तेल आदिकी मालिश करै वह दुःखी हो चंद्रवारको तेल लगावे तो अच्छी कांति बढे मंगलको लगावे तो बीमारी हो बुधको सौभाग्य प्राप्त हो ।। ९॥ जीवे नैःस्वं सिते हानिर्मदे सर्वसमृद्धयः । उदयादुदयं वर इति पूर्वविनिश्चितम् ॥ १० ॥ बृहस्पतिको दरिद्रता शुक्रको हानि और शनिवारको तेल लगावे तो सब बातोंकी समृद्धिहो सूर्यके उदयप्रति बार लगता है यह पहिलेका निश्चय चला आताहै ॥ १० ॥ लोकोदयात् स्याद्वारादिस्तस्मादूर्ध्वमधोपि वा । देशान्तरचराद्भभिर्नाडीभिरपरो भवेत् ॥ ११ ॥ लंकामें सूर्य उदय हो वह वारादि हैं और लंकासे ऊपरक तथा नीचेको जो देशांतर हैं उनके चर खंडाओंकरके घटियोंके अंतर होते हैं अर्थात् सब जगह सब समयमें एकवक्त वार नहीं ठगवाहै शास्त्रोक्तविधंसे वाप्रवेश देखा जाता है ॥ ११ ॥ भाषाटीकास ०-अ० ५. (६५) बलप्रदस्य खेटस्य वारे सिध्यति यत्कृतम् । तत्कर्म बलहीनस्य दुःखेनापि न सिध्यति ॥ १२॥ वलदायक ग्रहके वारमें जो कर्म किया जाय यह सिद्ध होता है। वही काम जो बलहीन अहके वारमें किया जाय तो पारिश्रम होकर भी कार्य सिद्ध नहीं होता ॥ १२ ॥ बुधैदुजीवशुक्राणां वासरः सर्वकर्मसु । सिद्धिदाः क्रूरेषु यदुक्तं कर्म सिध्यति ॥ १३ ॥ बुध, चंद्र, वृहस्पति, शुक ये वार सम कामेंमें अच्छे हैं और कूरवारोंमें उग्र कर्म कहे हैं वेही सिद्ध होते हैं ॥ १३ ॥ रक्तवर्णा रविश्चन्द्रो गौरो भौमस्तु लोहितः॥ दूर्वावणं बुधो जीवः पीतः वेतस्तु भर्गवः ॥ १४ ॥ सूर्य लालावर्ण है चंद्रमा गौरवर्ण है मंगल लालवर्ण है। बुध हारितवर्ण है बृहस्पतिका पीलबर्ण है शुक्र सफेदवर्ण है॥ १४॥ कृष्णः शैरिः स्ववारेषु स्वस्ववर्णाः क्रियाःशुभाः॥१८॥ शनैश्चर कालावर्ण है तहां अपने २ वर्णानेि कामकरने शुभ्र कहे) । अद्रि ७ बाणा ६ व्धय ४ स्तकं ६ तोयाकर ४ धराधराः ७॥। बाणा ५ नं ३ लोचनानि २ स्यु र्वेद ४ बाहु २ शिलीमुखः ९॥ १६ ॥ अब कुलिक आदि योग कहते हैं रविवारको ७-५-४ इन प्रहरोंमें और चंद्रवारको ६-४-७ इन प्रहरोंमें मंगळवारको ५- ३-२- इन प्रहरोंमें खुधको ४-२-५- इन प्रहरोंमें ।। १६ |} {६६ ) नारदसंहिता। लोके ३ टु १६ वसवो ८ नेत्र २ शैला ७ ॥ ३ न्दु १ रसो ६ रसःऽकुलिका यमघंख्या अर्धप्रहरसंज्ञकाः॥१॥ बृहस्पतिको ३-१-८- इन प्रहरोंमें शुक्रको २-७-३-इन प्रहरोंमें शनिको १-६-६इन प्रहमें यथाक्रमसे कुलिक, यम बँटक, प्रहरार्ड अर्थात् वारवेला ये तीन योग होते हैं ।। १७ ।। । प्रहरार्धप्रमाणास्ते विज्ञेया सूर्यवासरात् ॥ यस्मिन्वारे क्षणो वार इष्टस्तद्वासराधिपः॥ १८॥ आद्यष्षष्ठो द्वितीयोऽस्मात्तस्मात्षष्ठस्तृतीयकः॥ ; षष्ठषष्टवैतरेषां कालहोराधिपाः स्मृताः ॥ १९ ॥ जिस वारके जो तीन प्रहर दिखाये हैं उनमें यथाक्रमसे आधे २ अहर तक ये योग रहते हैं जैसे रविवारमें ७ प्रहरमें आधे प्रहरतक कुलिकयोग फिर ५ प्रहरमें यमघंटक फिर ४ प्रहरमें ४५ घडी अर्ध प्रहर ( वारेखेळा ) ऐसे सभीमें जान ये शुभकर्ममें निंदित हैं जिसंघारमें : जिस वक्त जिसकी होरा आती है तब वह वार स्वामी होता है पहले तो वर्तमान बार फिर उससे छठा वार फिर तिससेभी छठा वार फिर दिससे छठ ऐसे छठे छटे वारकी काल होरा होती है ॥ १८।। १९ ॥ । सार्धनाडीद्वयेनैवं दिवा रात्रौ यथाक्रमात् । यस्य खेटस्य यत्कर्म वारे प्रोक्तं विधीयते । ग्रहस्य कर्म वारेऽपि तत्क्षणे तस्य सर्वदा ॥ २० ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां वारलक्षणाऽध्यायः पंचमः८॥ भाषाटीकास०-अ० ६. (६७) दिनरात्रिमें यथाक्रमसे २॥ अढाई घडीकी कल होरा जाननी जिसमुहके वारमें जो काम करना कहा है वही काम उसी वारकी होरामें भी सदा करलेना चाहिये जैसे रविवारको चंद्रमाकी होरा आवै तब चंद्रवारके कार्य करने योग्य हैं ॥ । २० ॥ । इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां वारलक्षणाध्यायः पंचमः।। ५॥ नक्षत्रेशाः क्रमाद्दस्रयमवह्निपितामहः॥ चंद्रशाऽदितिजीवाहिपितरो भगसंज्ञिताः ॥ १ ॥ दत्र ( अधिनीकुमार ) १ यम २ वह्नि ३ ब्रह्म ४ चंद्रमा ५ शिवजी ६ अदिति ७ बृहस्पति ८ सर्प ९ पितर १० भाग ३ १ । १ ।। अर्यमार्कवधूमरुच्छक्राग्निमित्रवासवाः॥ निहत्युदविधूविधि गोविंदवसुतोयपाः ॥ २॥ अयंमा १२ सूर्य १३ वटा १४ वायु १५इंद्रबि १६ मित्र १७ इंद्र १८ निति १९ जल २० विश्वेदेवा २१ बला २२ विष्णु २३ वसु २४ वरुण २५ ।। २ ।। ततोऽजपादहिर्जुध्न्यः पूषा चोत प्रकीर्तिताः ॥ वस्त्रोपनयनं क्षौरः सीबताभरणक्रिया ॥ ३ ॥ अजैकपाद्र २६ अहिब्रुध्न्य २७ पूषा ८ ऐसे ये २७ देवता आश्विनी आदि २७ नक्षत्रोंके स्वामी कहेहैं। अब इन नक्षत्रेमें करने योग्य कायाको कहते हैं वनं यज्ञोपवीत और सीमंत आभूषण क्रमे ।। ३ ।। + ! (६८) नारदसंहिता। पनाश्वादियानं च कृषिविद्यादयोऽश्विभे ॥ वापीकूपतडागादि विषशस्त्रोग्रदारुणम् ॥ ४ ॥ प्रतिष्ठा, घोड़ा आदि सवारी, खेती विद्या पढना इत्यादि काम अश्विनी नक्षत्रमें करने शुभ हैं और बावड़ी ऊंवा तळाब कराना। विष शख उग्र दारुण कम ॥ ४ ॥ विलप्रवेशगणितनिक्षेपा याम्यभे शुभाः ॥ अझ्याधानास्त्रशस्त्रोग्रसन्धिविग्रहदारुणाः ॥ ४ ॥ गुफामें प्रवेश होना गणित विश्व धरोहड़ जमा करना ये कार्यं भरणी नक्षत्रमें करने शुभ हैं अग्निस्थापन अस्र शख उग्रकर्म संधि दारुण विग्रह ।। ५ ।। संग्रामौषधवादित्रक्रियाः शस्ताश्च बाह्निभे ॥ सीमंतोपनयनोद्वाहवस्त्रभूषास्थिरक्रियाः ॥ गजवास्त्वभिषेकाश्च प्रतिष्ठा ब्रह्मभे शुभाः ॥ ६ ॥ संग्राम औषध बाजा ये काम कत्तिका नक्षत्रमें करने शुभ हैं, और सीमंतकर्म, यज्ञोपवीतविवाहवस्रषहिनना, आभूषण, स्थिरक्रिया, व हाथी लेना, वास्तुकर्म, अभिषेक, प्रतिष्ठा ये कर्म रोहिणी नक्षत्रमें शुझ हैं । ६ ॥ प्रतिष्ठाभूषणोद्वाहसीमंतोपनयनक्रियाः ॥ क्षौरखास्तुगजोष्ट्राश्च यात्रा शस्ता च चंद्रभे ॥ ७ ॥ प्रतिष्ठा, आभूषण, विवाह, समिंतकर्म, उपनयन, क्षौर, वास्तु कर्म, हाथी, ऊंटका काय, यात्रा ये मृगशिरा नक्षत्रमें शुहैं ।। ७॥ भाषाटीलांस ०-अ• ६. ( ६९ ) ध्वजतोरणसंग्रामप्राकारास्त्रक्रियाःशुभाः ॥ संधिविग्रहवैतानरसाद्यशखभे शुभाः ॥ ८ ॥ ध्वजा, तोरण, संग्राम, किला, ( कोट ) शस्र क्रिया संधि, विग्रह मंडप, रसक्रिया, ये कर्म आर्द्र नक्षत्रमें करने शु हैं ॥ ८॥ प्रतिष्ठा यानसीमंतवस्रवास्तूपनायनम् ॥ क्षीराम्रकर्मादितिभे विधेयं धान्यभूषणम् ॥ ९॥ प्रतिष्ठागमन, सीमंतकर्म, वस्त्रकर्म, वास्तु, उपनयन, क्षौरकर्म, अनृकर्म, धान्य, आभूषण, ये कार्यं पुनर्वसु नक्षत्रमें करने शुभ ह ।। ९ ।। यात्राप्रतिष्ठासीमंतव्रतबंधप्रवेशनम् ॥ करग्रहं विना सर्वं कर्म देवेज्यभे शुभम् ॥ १० ॥ यात्रा, प्रतिष्ठासीमंत, यज्ञोपवीत, गृहप्रवेश ये कर्म तथा विवाह कर्म विना अन्य सब कार्यं पुष्य नक्षत्रमें करने शुरू हैं ।। १० ॥ अनृतव्यसनयूतक्रोधाग्निविषदाहकम् ॥ विवादरसवाणिज्यं कर्म कछुजभे शुभम् ॥ ११ ॥ झठ, व्यसन, जूबा, क्रोध, अभि, विष, दाह, विवाद, रस, वाणिज्य ये कर्म आश्लेषा नक्षत्रमें करने शुन हैं ।। ११ ॥ कृषिवाणिज्यगोधान्यरणोपकरणादिकम् ॥. विवाहनृत्यगीताचं निखिलं कर्म पैत्रभे ॥ १२ ॥ खेती, वाणिज्य, गैौ, धान्य, रण, कोई वस्तुसंचय तैयारीविवाह, नत्य, गीत ये सब कर्म मघा नक्षत्रमें करने शुभ हैं ॥ १२॥ ( ७० ). नारदसंहिता । विवादविषशस्त्रागिदारुणोग्राहादिकम् । पूर्वत्रयेऽखिलं कर्म कर्तव्यं मांसविक्रयम् ॥ ३३ ॥ विवाद विष शत्र अनि दारुण उग्रकर्म युद्ध मांस वेचन इत्यादि कर्म तीनों पूर्वाश्रमें करने शुभ हैं ।। १३ ।। वस्त्राभिषेकलोहाश्मविवाहव्रतबंधनम् ॥ प्रवेशस्थापनावैभवास्तुकम्मतरात्रये ॥ १४ ॥ वत्र अभिषेक लोहा पत्थर विवाह यज्ञोपवीत प्रवेश प्रतिष्ठा कर्म घोडा हाथी वास्तुकर्म ये सब कार्य तीनों उत्तराओंमें करने शुभ हैं ।। १४ ।। प्रतिष्ठोद्वाइसीमंतयानवस्त्रोपनायनम् ॥ क्षौरवास्वभिषेकाश्च भूषणं कर्म भानुभे ॥ १५॥ प्रतिष्ठा विवाह सीमंतकर्म सवारी वस्त्र उपनयनकर्म क्षर वास्तु कर्म अभिषेक आभूषण ये कर्म हस्त नक्षत्रमें करने शुत हैं ।।१५। प्रवेशवस्त्रसीपंतप्रतिष्ठानतबंधनम् ॥ त्वाष्ट्रभे वास्तुविद्य च क्षौरभूषणकर्म यत् ॥ १६॥ प्रवेश वस्त्र सीमंत प्रतिष्ठा यज्ञोपवीत वास्तुविया क्षर आभूषण ये कर्म चित्रा नक्षत्रमें करने शुभ हैं ॥ १६॥ प्रतिष्टोपनयोद्वाहवस्त्रसीमंतभूषणम् ॥ प्रवेशाभकृष्यादिक्षौरकर्म समीरभे ॥ १७॥ प्रतिष्ठा उपनयन विवाह वस्त्र सीमंतकर्म आभूषण प्रवेश घोडा हाथी खरीदना खेती क्षौरकर्म ये स्वाति नक्षत्रमें करनेशुभहैं ।१७। A भाषीकास०-अ० ६. ( ७३ ) वस्त्रभूषणवाणिज्यवस्तुधान्यादिसंग्रहः । इंद्मनिभे नृत्यगीतशिल्पलोहाश्मलेखनम् ।। १८॥ वस्त्र आभूषण वणिज वस्तु व धान्य आदिक संग्रह, नृत्य गीत शिल्पकर्म लोहा पत्थर लिखना ये कर्म विशाखा नक्षत्रमें करने शुभ हैं ।। १८ ।। प्रवेशस्थापनेद्वाहव्रतवंधाष्टमंगलाः ॥ वास्तुभूषणवस्राश्वा मैत्रभे संधिविग्रहः ।। १९॥ प्रवेश प्रतिष्ठा विज्ञाह व्रतबन्ध अष्ट प्रकारके मंगल, वास्तुकर्म, आभूषण वस्र अधा संधि विग्रह ये कार्यं अनुराधा नक्षत्रमें करने Jझ है ॥ १९ ।। औौरास्तुशास्त्रवाणिज्यगोमहिष्यंबुकर्म यत् ॥ इंद्रभे गीतवादित्रशिल्पलहाश्मलेखनम् ॥ २० ॥ क्षरकर्म, अत्रकर्म, शत्रकर्म, वणिज, गौ, महिषी, जळ, गीत, बाज़, शिल्पलोहा, पत्थर, लिखना, ये कर्म ज्येष्ठा नक्षत्रमें करने शुभह ॥ २० ॥ विवाहकृषिवाणिज्यदारुणाहवभेषजम् ॥ नैते नृत्यशिल्पास्त्रशस्त्रलोहश्मलेखनम् ॥ २१ ॥ विवाहखेती, वणिज, दारुण, युद, औषध, नृत्य, शिल्प अत्र, शस्त्र, लोहा, पत्थर, लिखना ये कर्म मूळ नक्षत्रमें करने शुभहैं ॥ २१ ॥ प्रतिष्ठाक्षौरसीमंतयानोपनयनौषधम् ॥ पुराणे स्तु गृहारंभो विष्णुभे च समीरितम् ॥ २२ ॥ (७२) नारदसंहित। प्रतिष्ठा, क्षर, सीमंत, सवारी; उपनयन; औषध पुराना घर चिनना इन कामोंमें श्रवण नक्षत्र शुहैतीनों पूर्वो तीनों उत्तराओं का फल एकत्र कह चुकेहैं। २२॥ वस्त्रोपनयनं क्षीरं मोंजीबंधनभेषजम् । वसुभे वास्तुसीमंतप्रवेशाश्च विभूषणः॥ २३ ॥ वज्ञउपनयनकर्म, क्षौर, मौंजीबंधन, औषध, वास्तुकर्म, सीमंत; गृहप्रवेश, आभूषण ये कर्म धनिष्ठानक्षत्रमें करने शुरूहैं ।। २३ ।। वेशस्थापनं क्षौरमौंजीबंधनभेषजम् ॥ अश्वरोहणसीमंतवास्तुकर्म जलेशभे ॥ २४ ॥ गृह्नप्रवेश, प्रतिष्ठा, क्षौर, मौंजीबंधन, औषध धोडेकी सवारी करना, सीमंत, वास्तुकर्म ये शतभिषा नक्षत्रमें करने शुभहैं ।। २४ ।। विवाहव्रतबंधाश्च प्रतिष्ठायानभूषणम् । वेशवत्रसीमंतक्षौरभेषजमंत्यमी ॥ २९ ॥ विवाह, ब्रतबंध, प्रतिष्ठा, सवारी, आभूषण, प्रवेश, वस्र, सीमंत, क्षौर, औषध, ये रेवती नक्षत्रमें करने शुभहैं ।२५॥ पूर्वत्रयाग्निसूलाहिद्विदैवत्यमघांतकम् ॥ अधोमुखं तु नवकं भानां तत्र विधीयते ॥ २६ ॥ तीनों पूर्वा, कृत्तिक, मूळ, आश्लेषा, विशाखा,मया, अरणी ये व नक्षत्र अधोमुख संज्ञक हैं ।। २६ ॥ ॥ इति अधोमुखम् । विलप्रवेशगणितभूतसाधनलेखनम् ॥ शिल्पकर्म लताकूपनिक्षेपोद्धरणादि यत् ॥ २७ ॥ भाषाटीक8 ०-अ० ६. ( ७३ ) इन अधोमुख नक्षत्रोंमें गुफामें प्रवेश होना गणित मंत्र यंत्र साधन, लिखना शिल्पकर्म ळता (वेल ) लगाना छैवामें गिरी दुई वस्तु निकलना शुभ है ॥ २७ ॥ मिनेंदुत्वाष्ट्रहस्ताद्धेदितिभांत्योश्ववायुभम् ॥ तिर्यङ्मुखाख्यं नवकं भानां तत्र विधीयते ॥ २८ ॥ इति तिर्यङ्मुखम् ॥ अनुराधा, मृगशिर, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, पुनर्वसु रेवती अधि नी स्वाति ये नव नक्षत्र तिर्यङ्मुख संज्ञक हैं ।। २८ ॥ हलप्रवाहगमनं गंत्री यंत्रगजोष्ट्रकम् ॥ अजादिग्रहणं चैव हयकर्म यतस्ततः ॥ २९॥ इन नक्षत्रमें हल जोतना, गमन, गाडी बनाना, हाथी कट, बकरी आदि खरीदना घोडा खरीदना ये शुभ हैं ।। २९॥ खरगोरथनौयानं लुलायहयकर्म च ॥ शकटग्रहणं चैव तथा पश्वादिकर्म च ॥ ३० ॥ ओर गधा, बैलरथ, नौका इन्होंकी सवारी करना कैंस, बोडा का कार्य गाडीका कार्य केंट खरीदना तथा अन्य पशुका कार्य । शुक्र है ॥ ३० ॥ इति तिर्यक् कर्म । ब्रह्मविष्णुमहेशार्यशततारावमुत्तराः ॥ ऊध्वस्ये नवकं भानां प्रोक्तं चैव विधीयते ॥ ३१ ॥ इत्यूध्वैमुखम् ॥ रोहिणी, श्रवण, आर्दी, पुष्य, शतभिषा, धानिष्ठा, तीनों उत्तरा ये नव नक्षत्र ऊर्जेमुखसंज्ञक कहे हैं ॥ ३१ ॥ (७४ ) नारदसंहिता । पुरहऍणुहारामवारणध्वजकर्म च ॥ प्रासादभित्तिकोशआनप्राकाराचैव मण्डपम्॥ ३२ ॥ । इन नक्षत्रोंमें शहरहवेली, घर, बगीचा, हाथी, ध्वजा, इन्होंके कार्ये, देवमंदिर, दीवालबाग, कोटमंडप ये कार्य शुभ हैं।३२॥ इति ऊखीमुखानि ॥ स्थिरं रोहिण्युत्तराभं क्षिप्रं भूयश्खिपुष्यभम्॥ साधारणं द्विदैवत्यं वह्निभं चरसंज्ञितम् ॥ ३३ ॥ रोहिणी तीनों उत्तरा ये स्थिर संज्ञक नक्षत्र हैं हस्त, अश्विनी पुष्य ये क्षिप्रसंज्ञक हैं विशाखा, भरण, क्षत्तिका ये साधारण संज्ञक नक्षत्र हैं ॥ ३३ ॥ वस्वादित्यंवुपस्वातिविष्णुभं मृदुसंज्ञितम् । चित्रांत्यमित्रशशिभमुग्रं पूर्वामघांतकम् ॥ मूलेंद्रार्दभं तीक्ष्णं स्वनामसदृशं फलम् ॥ ३४ ॥ धनिष्ठा, पुनर्वसु,शतभिषा, खाती, श्रवण ये नक्षत्र चरसंज्ञक हैं और चित्र रेवती, अनुराधा मृगशिर ये मृदुसंज्ञक हैं । मूळ ज्येष्ठ आश्लेषा आंद्रे ये तीक्ष्णसंज्ञक नक्षत्र ये अपने नामके सदृश फल देनेवाले हैं । ये संज्ञा मुहूर्ते देखनेमें काम आती हैं ॥ ३४ ॥ चित्रादित्याश्विविष्ण्वंत्यरविमित्रवसूडुषु ।। स मुंगेषु च बालानां कर्णवेधक्रिया हिता ॥ ३८ ॥ दर्श्वद्वदिताितिष्येषु करादित्रितये तथा ॥ गजकर्माखिलं यत्तद्विधेयं स्थिरभेषु च ॥ ३६॥ भाषाटीकास ०-अ० ६. (७५) चित्रा पुनर्वसु अश्विनी, श्रवण, रेखती हस्त, अनुराधा, धनिष्ठा, मृगशिर इन नक्षत्रोंमें बालकोंके कान विंधवाने चाहियें अश्विनी, मृगशिर, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति इन नक्षत्रोंमें हाथीका लेना देना शुभहै । और स्थिरसंज्ञक नक्षत्रोंमें सेरेना देना शुझ है ॥ ३५ ॥ । ३६ ॥ अथ अश्वमुहूर्त । सुदिने चरभे क्षिप्रे मृदुभे स्थिरभेषु च। द्वाजिकर्माखिलं कर्म सूर्यवारे विशेषतः ॥ ३७॥ चंडवल आदि से शुभवार हो और चरसंज्ञकःक्षिप्र मृदु और स्थिरसंज्ञक नक्षत्र होवें तब सब प्रकरसे घोडोंका कार्य ( बेचन खरीदना आदि ) करना रविवार विषे शुभ कहा है । ३७ ॥ चित्राश्रवणवैरिचित्र्युत्तरासु गमागमम् । दर्शाष्टम्यां चतुर्दश्यां पशूनां न कदाचन ॥ ३८ ॥ चित्रा श्रवण रोहिणी तीनों उत्तरा इन नक्षत्रोंमें तथा अमावस्या अष्टमी चतुर्दशी इन तिथियोंमें गौ बैल आदि पशुओंको खरीदके घरमें नहीं लावे और घरसे बाहर भी नहीं निकालै ॥ ३८ ॥ अथ हलप्रवाहमुहूर्तः । मृदुध्रुवक्षिप्रचरविशाखापितृभेषु च॥ हतप्रवाहं प्रथमं विदध्यान्मूलेभ वृषेः॥ ३९॥ मृदु ध्रुव क्षिप्र चर इन संज्ञावाले तथा विशाखा और मया ( ७६) नारदसहिता । नक्षत्र व मूळ नक्षत्रमें खेतमैं पहिले बैलोंकरके हल जोतना शुभदायक है ॥ ३९ ॥ हलादौ वृषनाशाय भक्ष्यं सूर्यभुक्तभात् ॥ अग्रे यचैव वै लक्ष्म्यै सौम्यं पाठं च पंचकम् ॥ ४० ॥ और हळचक्की आदिमें सूर्यके नक्षत्रसे तीन नक्षत्र हैं वे बैलोंका नाश करते हैं फिर ३ नक्षत्र अग्रभागमें हैं उनमें लक्ष्मी प्राप्ति हो बराबरमें ५ नक्षत्र शुभदायक कहे हैं ॥ ४० ॥ शूलत्रयेऽपि नवकं मरणायान्यपंचकम् ॥ श्रियै पुच्छे त्रयं श्रेष्ठं स्याच्च लांगले शुभम् ॥ ४१ ॥ त्रिशलके ऊपर न नक्षत्र मरणदायक हैं अन्य पांच नक्षत्र लक्ष्मीदायक हैं फिर पूंछके ऊपर तीन नक्षत्र श्रेष्ठ हैं ऐसे हलचक्रपर २८ नक्षत्र रखकर शुभ अशुभ फल विचारना चाहिये ॥ ४१ ॥ मृदुध्रुवक्षिप्रभेषु पितृवायुवसूडुषु । समूलभेषु बीजोप्तिरत्युत्कृष्टफलप्रदा ॥ ४२ ॥ और मृदुसंज्ञक ध्रुवसंज्ञक क्षिप्रसंज्ञक तथा मघा खाति धनिष्ठा मूळ इन नक्षत्रोंमें बीज बोयना अत्यंत शुभदायक है ॥ ४२ ॥ भवेद्भत्रितयं मूर्सीि धान्यनाशाय राहुभात् ॥ गले त्रयं कलाय वृद्धयै च द्वादशोदरे ॥ ४३ ॥ राहुके नक्षत्रसे तीन नक्षत्र मस्तकपर धरने वे धान्यका नाश करने आले हैं और गलपर तीन नक्षत्र हैं उनमें जछ थोड़ा वर्षे अथवा अन्नके कैौवा लगजाता है उदरपुर बारह नक्षत्र वृद्धिदायक हैं।४३।। भाषाटीकास ०-अ० ६. (७७) निस्तंडुलत्व लांगूले भचतुष्टयमीरितम् । नाभौ वह्निः पंचकं यद्वीजोप्ताविति चिंतयेत् ॥४४॥ पूंछपर चार नक्षत्र हैं उनमें दाना कमपडता है फिर पांच नक्षत्रनाभिपर हैं उनमें अधिका भय हो ऐसे बीज बोनेमें यह राहुचक्र भी विचारा जाताहे ।। ४४ । । - अथ रोगिस्नानमुहूर्तः। स्थिरेष्वादितिसर्पयपितृमारुतभेषु च । न कुर्याद्रोगमुक्तश्च स्नानं वारेंदुशुक्रयोः॥ ४५॥ स्थिरसंज्ञक नक्षत्र और पुनर्वासु, आश्लेषा, रेवती, मघा, स्वाति इन नक्षत्रोंमें तथा चंद्र शुक्रवार विषे रोगसे छूटा हुआ पुरुषने स्नान नहीं करना चाहिये ॥ ४५॥ अथ नृत्यमुहूर्तः। उत्तरात्रयामिवेंद्रवसुवारुणभेषु च ॥ पुष्यार्कपैौष्णधिष्ण्येषु नृत्य रंभः प्रशस्यते ॥ ४६॥ तीनों उत्तरा अनुराधा ज्येष्ठा धनिष्ठा शतभिषा पुष्य हस्त रेवती इन नक्षत्रोंमें नाचना प्रारंभ करना शुहै ।। ४६ ।। पूर्वार्धयुज षङ्कानि पैौष्णभाद्रुद्रभात्ततः ॥ मध्यपुंजि द्वादशश्रेणीन्द्र्भान्नवभानि च ॥ ४७ ॥ रेखती आदि छह नक्षत्र पूर्वार्ध एंजा संज्ञक कहे हैं फिर आर्मी आदि बारह नक्षत्र मध्य पुंजासंज्ञक कहे हैं और ज्येष्ठा आदि नव नक्षत्र परार्ध गुंजासंज्ञकहैं ।। ४७ ।। (७८ ) नारदसंहिता । परार्धयुजि क्रमशः संप्रीतिंदपतेर्मिथः॥४८॥ इतिऍजा । ये नक्षत्र वरकन्याके विचारने चाहियें जो एक एंजा होय तो स्त्रीपुरुषोंकी आपसमें प्रीति रहै ॥४८॥ इतिऍजा । अथ चंद्रोदयविचारः जघन्यास्तोयमाहिपावनांत कतारकाः॥ धुवादितिद्विदैवत्यो बृहत्ताराः पराः समाः ॥ ४९ ॥ शतभिषा, आर्द्र, आश्लेषा,स्वाति, रेखती ये जघन्यसंज्ञकतारे हैं और ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र तथा पुनर्वसु, विशाखा ये बृहत् संज्ञक तारे हैं अन्य सम कहे हैं ॥ ४९ ।। क्रमादभ्युदिते चंद्रे त्वनवुर्घसमानि च ॥ अध्यग्नींदुभ नैऋत्यभाग्यभत्वाद्युत्तराः॥ ५० ॥ तह मसे अथात् जघन्यसंज्ञक नक्षत्रोंमें चंद्रमा उदय होय तX अन्नादिकक्रा व मॅहिगारहै बृहत संज्ञक नक्षत्रमें उदय होय तो सस्तीभाव होय सम नक्षत्रोंमें समानभाव जानना । अश्विनी कृत्तिका मृगशिर, मूल, पूर्वफाल्गुनी चित्रा तीनों उत्तरा ।। ५०।। अथ राजयात्र पितृद्विदैवताख्यातास्ताराःस्युः कुलसंज्ञकाः॥ धातृज्येष्ठाऽदितिस्वाती पैौष्णार्कहरिदेवताः ॥ ५१ ॥ अजपांतकभौजंगताराश्चोपकुलाह्वयाः ॥ शेषाः कुलकुलास्तारास्तासां मध्ये कुलोडुषु ॥ ५२ ॥ आषाढीकस ०-अ०६. (७९) गम्यते यदि भूपालैः पराजयमवाप्यते ॥ भेधूपकुलसंज्ञेषु जयं प्राप्नोति धूमिपः ॥ ९३ ॥ संधिर्भवेत्तयोः साम्यं तदा कुलकुलोडुषु ॥ अर्कार्किभौमवारे चेद्भद्राया विषमांनिभे ॥ ९ ॥ मघाविशाखा ये कुळसंज्ञक तारा हैंरोहिणी' ज्येष्ठा, पुनर्वसु, स्वा ति, रेखती,हस,श्रवण,पूर्वाभाद्रपद भरणी आश्लेषा ये उपकुळसेलंक नक्षत्र हैं तिनले मध्यमें कुरुसंज्ञक नक्षत्रविषे राजालोग युद्धके वास्ते गमन करें तो पराजयहार)होतीहै और उपकुठज्ञक नक्षत्रों में जय ( जीत ) होती है । कुलाकुल नक्षत्रोंमें गमन करे तो दो नों राजा समान रहैं आपसमें मिलाप रहै ।। इतिराजयात्रा, ॥ रवि, शनि, भौमधारविषे विषमांचि नक्षत्रविषे ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ ॥ ५३ ॥ ५४।। त्रिपुष्करे त्रिगुणदं द्विगुणं यमलांत्रिभम् । द्यत्तदोषनाशाय गोत्रयं मूल्यमेव वा ॥ ६८ त्रिपुष्करयोगका तिगुना फल है और यमछांघियोग दुगुना दोषकी शांतिके वास्ते तीन गौओंका दान करे ॥ ५५॥ त्रिपुष्करे द्वयं दद्यान्न दोषो ऋक्षमात्रतः ॥ पुष्यः परकृतं हंतुं शक्तोऽनिष्टं च यत्कृतम् ॥ ४६॥ दोषं परो न शक्तस्तु चंदंष्यष्टमगेपि वा । शूरो विधुयुतो वापि पुष्यो यदि बलान्वितः॥ ९७ विना शनिग्रहं सर्वमंगलेष्विष्टदः सदा ॥ ९८॥ (८० ) नारदसंहिता । और त्रिपुष्करयोगमें राजा गमन करे तो राजाने उस दोषकी शान्तिके वास्ते दो गौओं दान करना चाहिये । अथवा गो मुल्य देना चाहिये और त्रिपुष्करयोगके फकत् नक्षत्र मात्रसे दोष न ही होसक्का पुष्य नक्षत्रमें जो यात्रा आदि शुभकर्म किया जाय तह कोई अनिष्ट योग होय तो पुष्य नक्षत्र उस दोषको दूर करसकता है और जो किसीप्रकारसे पुष्य नक्षत्र ही अशुभ दायक हो तो उसको कोई अन्य शुभयोग नहीं हटा सकता है और जो पुष्य बलयुक्त होय तो आठवें चंद्रमा हो अथवा चंद्रमा कूरमहसे युक्त हो इत्यादि सब दोषोंको नष्टकरता है संपूर्ण मंगल कार्यों को सिद्धकरता है । ५६ ।। ५७ ।। ५८ ॥ अथ नक्षत्राण ताराः। रामा ३ म्नि ३ ऋतु ६ बाणा ५ लि ३ भू १ वेदा ५ मिशेरे ५ षवः ॥ नेत्र २ वाहु २ रें ५ दैि ३ दु १ वेद ४ वद्य ३ त्रिशंकराः५९॥ अथ नक्षत्र तारा। अश्विनीके ३ तारे हैं कृत्तिका० ६ ७ भरणके ३ रोहिणी ५ मृगशिर० ३ आद्रां ७१ पुनर्वसु ० ४ पुष्य०३ आश्लेषा ० % मघा ०५पूर्वा फाल्गुनी०२ उत्तरा फाल्गुनी० २ हत० ५ चित्रा • १ स्वाती० १ विशाखा ०, ४ अनुराधा ० ३ ज्येष्ठा ० ३ मूळके ११ तारे हैं ॥ ५९ ॥ - ४ भाषाढीकास ०-अ० ६. (८१ ) वेद ४ वेदा ४ नि ३ वद्य ३ ब्धि ४ शत १०० द्वि २ द्वि २ रदाः ३२ क्रमात् ॥ तारासंख्यास्तु विज्ञेया दस्रादीनां पृथक्पृथक् ॥ ६० ॥ या दृश्यते दीप्ततारा भगणे योगतारका ॥ ६१ ॥ पूर्वाषाढके ४ उत्तराषाढके ४ अभिजित्के ३ अवण ० ३ धनिष्ठा० ४ शतभिषा ० १०० पूर्वाभाद्रपदाके २ तारे उत्तरा भाद्रपदाके २ रेखेतीके ३२ तारे हैं ऐसे अश्विनी आदि नक्षत्रोंके अलग २ तारे आकाशमें जानने चाहियें शिशुमार चक्रमें जो प्रकाशमान तारा दीखते हैं वे योग तारा कहे हैं ।। ६० ॥ ६१ ॥ इति तारासंख्य ॥ वृषवृक्षेऽश्विभार्याम्यधिष्ण्यात्पुरूषकस्ततः॥ उडुबरो ह्यग्निधिष्ण्या द्रोहिण्या जंबुकस्तरुः ।| ६२ ॥ आश्विनी नक्षत्रसे बांसा उत्पन्न हुआ है, भरणी नक्षत्रसे फालसा और कृत्तिकासे गूलर, रोहिणीसे जामन वृक्ष उत्पन्न हुआ ॥ ६२ ॥ इंदुभात्खदिरो जातः कूलिवृक्षश्च रौद्रभात् ॥ संभूतो दितिभाद्वंशः पिप्पलः पुष्यसंभवः ॥ ६३ ॥ मृगशिर नक्षत्रसे पैर उत्पन्न अया, आङ्गसे बहेडाका वृक्ष उत्पन्न भयाहैपुनर्वसुसे बांस उत्पन्न भया, पुष्यसे पीपल उन अया है ॥ ६३ ॥ (८२ ) नारदसंहिता । सपैधिष्ण्यान्नागवृक्षे वटः पितृभसंभवः ॥ पालशो भाग्यजातश्च प्लक्षश्चर्यमसंभवः ॥ ६४ ॥ आश्लेषासे नाग वृक्ष (गंगेरन) उत्पन्न भई है,मघासे बड उत्पन्न भया, पूर्वीफाल्गुनीसे ढाक, उत्तराफाल्गुनी पिलखन ॥ ६४ ॥ अरिष्टवृक्षे रविभीवृक्षस्वाऽसंभवः ॥ स्वत्यूर्धादर्जुनो वृक्ष द्विदैवात्पाहिकस्ततः॥ ६५ ॥ हस्तसे रिंठडा वृक्षचित्रासे नारियल वृक्ष, स्वातिसे अर्जुन वृक्ष विशाखसे पाहवृक्ष ॥ ६५ ॥ मित्रभाद्वकुलो जातो विष्टिः पौरंदर्भजः॥ सर्जवृक्ष मूलभाच्च बंजुलो वारिधिष्ण्यजः ॥ ६६ ॥ पनसो विश्वभाष्जातो ह्याकंवृक्षस्तु विष्णुभात् ॥ वमुधिष्ण्याच्छमी जाता कदंबो वारुणीजः ॥ ६७ ॥ अजैकपाचूतवृक्षोऽहिर्मुन्ध्यपिचुमंदकः ॥ मधुवृक्षः पौष्णधिष्ण्यादेवं वृशं प्रपूजयेत् ॥ ६८ ॥ आरेियोनिभवो वृक्षे पीडनीयः प्रयत्नतः ॥ ६९ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां नक्षत्रफलाध्यायः षष्ठः ॥६॥ अनुराधासे बकुला, ज्येष्ठासे देवदारु वृक्ष उत्पन्न भया है, मूळसे राला वृक्ष, पूर्वाषाढासे जळवेत उत्पन्न भया, उत्तरषाढासे फालसा उत्पन्न भया, श्रवणसे आक उत्पन्न भया, धनिष्ठासे जॉट उत्पन्न भया, शतभिषासे कदंब, पूर्वाभाद्रपदासे आनुवृक्ष, उत्तरा भाद्रपदासे नींव | व, रेखतीसे महुवा वृक्ष उत्पन्न भया है इस प्रकार इन नक्षत्रकी भाषाटीकास०-अ० ७. ( ८३ ) शांतिके वास्ते इन वृक्षका पूजन करना चाहिये और इन नक्षत्रोंका शत्रु संज्ञक योनिवाला जो नक्षत्र हो उस क्षनत्रके वृक्षको पीडित क्ररे ॥ ६६ ॥ ६७ । ६८ ।। ६९ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां नक्षत्रफलाध्यायः षष्ठः ।। ६ ॥ योगेशा यमविष्ण्विंदुधातृजीवनिशाकराः ॥ इंद्रतोयाहिवह्नयर्कमरुद्भद्रतोयपाः ॥ १ ॥ अव योगोंके स्वामी कहतेहैं धर्मराज १ विष्णु २ चंद्रमा ३ अझ ४ बृहस्पति ५ चंद्रमा ६ इंद्र ७ जल ८ सपे ९ अशि १० सूर्य ११ भूमि १२ वायु १३ शिव १४ वरुण १५ ॥ १ ॥ गणेशरुद्धनदास्वधूमित्रषडाननाः । सावित्री कमल गौरी नासत्यौ पितरोऽदितिः ॥ २ ॥ गणेश१६ रुद्र १७ कुबेर १८ त्वष्टा १९ मित्र २० स्वामिका र्तिक २१ सावित्री २२ लक्ष्मी २३ गैरी २४ अश्विनीकुमार २५ पितर २६अदिति २७ ऐसे ये २७ देवता विष्मो आदि योगोंने स्वामी कहे हैं ॥ २ ॥ सवैधृतौ व्यतीपातो महापातावुभौ सदा ॥ परिघस्य तु पूर्वार्धे सर्वकार्येषु गर्हितम् ॥३॥ विष्कंभवजयोस्तिस्रः षी, गंडातिगंडयोः ॥ व्याघाते नव शूले तु पंचनाब्यस्तु गर्हिताः ॥४॥ और वैधृत व्यतीपात ये दोनों महापात हैं संपूर्ण त्याज्य हैं। परिघ योगका पर्वाई रयाज्यहैं सबकामोंमें निंदितॐ विष्कं, वज, {८४ ) नारदसादं । इनके आदिकी तीन २ घडी वर्जितहैं और गंड अतिगंडकी छह २ बड़ी वर्जितहैं व्याघातकी नव गूळकी पांच घडी वर्जित हैं ।३।। ४ ।। अदितीन्दुमघाश्लेषामूलमैत्रेज्यभानि च ॥ ज्ञेयानि सहचित्राणि सूत्रैिभानि यथाक्रमात् ॥ ३॥ और पुनर्वसु, मृगशिर, मघा, आश्लेषा, मूल, अनुराधा, पुष्य; चित्रा ये नक्षत्र यथाक्रमसे मस्तकफे क्रमविषे कहेहैं ॥ ५॥ लिखेदूर्वगतामेकां तिर्यग्रेखास्त्रयोदश । तत्र खार्जुरिके चक्रे कथितं मूर्छि भं न्यसेत् ॥ ६ ॥ भान्येकरेखागतयोः सूर्याचंद्रमसोर्मिथः । एकार्गलो दृष्टिपातयाभिजिद्वजितानि वै ॥ ७ ॥ तहां एक रेखा खडी खींचे और तेरह रेखा तिरछी खींचनी चाहियें ऐसा तहां खर्जीरिक यंत्र अर्थात् खजूरवृक्ष सरीखे आकार वाला चक्र बनालेवे तहां सब नक्षत्र लिखचुके पीछे विचारों को स्वी चंद्रमाके नक्षत्र एक रेखा पर आजावे तो एकार्गल दृष्टिपात योग होताहे यहां अभिजित् नक्षत्रकी गिनती नहीं करनी ॥ ६ ॥ ७ ॥ लांगले कमठे चक्रे फणिचक्रे विनाडिके ॥ अभिजिद्भणना नास्ति चक्रपाते विशेषतः ॥८॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां योगाध्यायः सप्तमः ७॥ हलचक्र, कूर्मचक, सर्पकारचक्र, त्रिनाडीचक्र इनमें अभि जित् नक्षत्रकी गिनती नहीं करनी और विशेषकरके चक्रपातमें गिनती नहीं करनी ॥ ८॥ ति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां योगप्रकरणाध्यायः सप्तमः ॥७३ ।। आषाटीकास०-अ० ८. (८५) अथ करणेशफलम्। इंद्रः प्रजापतिर्मित्रधार्यमार्हरि प्रिया । कीनाशः कलिरुक्षाख्यौ तिथ्यर्धशाख्यहिर्मरुत् ॥ १ ॥ इंदे, प्रजापति, मित्रअर्यमा, भूमि, लक्ष्मी, कीनाश, कलि, वृषभ, सर्प, वायु ये देवतां क्रमसे बबादिकरणोंके स्वामी कहे हैं ।। १ ।। ववादिवणिगंतानि शुभानि करणानि षट्। परीता विपरीता वा विधिनेष्टा तु मंगले ॥ २ ॥ बचआदि वणिजपर्यंत छह करण तो शुभ हैं और विष्टि अर्थात अद्राकी सब घडी सर्वदा अशुद्ध हैं मंगल कार्यंमें वर्जदेनी- चाहियें ॥ २ ॥ अथ भद्राया अन्यप्रकारः । सुखे पंचगले का वक्षस्येकादश स्मृताः । नाभौ चतस्रः कट्यां तु तिस्रः पुच्छयायनाडिकाः॥ ३॥ भद्राकी प्रथम पांच घडी मुखपर रखनी फिर १ घड़ी गलापर, फिर छातीपरग्यारह बडी, नातिपर चार, कटिपर तीन, चूंछपर तीन घडी ॥ ३॥ कार्यहानिर्मुखे मृत्युर्गले वक्षसि निःस्वता ॥ कल्यामुझमनं नाभौ च्युतिः पुच्छे ध्रुवो जयः ॥ स्थिरााण मध्यमान्येषां नेणें नागचतुष्पदौ ॥ ४ ॥ इतिश्रीनारदीयसंहितायां करणाध्यायोऽष्टमः ॥ ८॥ (८६) नारदसंहिता । मुखकी घाडियोंमें कार्यक्री हानि, गलापर मृत्यु, छातीपर दरिद्रता, कटिपर भ्रमण, नाभिपर हानि, पूंछपरकी वटियोंमें कार्यकी सिद्धि होती है । इन्हेंके बीचमें स्थिरसंज्ञक करण मध्यम है और नाग चतुष्पद ये दो अशुभहैं ।। ४ ॥ ॐति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकाय करणाध्यायोऽष्टमः ॥८॥ अथ शुभाशुभमुहूर्ताः। दिवा सुहूर्ता रुद्राहिमित्रपित्र्यवधूदकम् ॥ विवे विधातृज्ञानेन्द्र इन्द्राग्ननिर्देतितोयपाः ॥ १ ॥ रुद्र १ सर्ष २ मित्र ३ पितरः वसु ५ उदक ६ विश्वेदेवा ७ अभिजित् ८ ब्रह्म ९ इंद्र १० इंद्राशी ११ राक्षस १२ वरुण १३ ॥ १ ॥ अर्यमा भगसंज्ञश्च विज्ञेया दश पंच च। ईशाजयादहिर्मुन्ध्याः पूषाश्वियमवह्नयः ॥ २ ॥ धातूचंद्रदितिज्याख्यविष्ण्वर्कवाष्ट्रवायवः ॥ अह्नः पंचदशो भागस्तथा रात्रिप्रमाणतः ॥ ३॥ मुहूर्तमानं वे नाड्यौ कथिते गणकोत्तमैः । अथाशुभमुहूतानि वारादिक्रमशो यथा ॥ ४ ॥ अर्यमा १४ भग १५ ये दिवमुहूर्ते हैं अर्थात् दिनमें दोदो घडी प्रमाणतक यथाक्रमसे रुद्रआदिनामक थे १५ मुहूर्ते रहते हैं अपने रामसदृश फळ जानना और शिव १ अजपान २ अहिर्जुध्न्य ३ भाधाटीकास ०--अ० ९. (८७) पूषा ४ अश्विनीकुमार ५ धर्मराज ६ अग्नि ७ ब्रह्म ८ चंद्रमा ९ अदिति १० बृहस्पति ११ विष्णु ११ सूर्यं १३ वटा १४ वायु १५ ये पंदरह मुहूत रात्रिके हैं अथान जैसे दिनके पैदरह आग कियेहैं तैसेही रात्रिी १५ आग करठेना और २ बड्का एक मुहूर्ते होहै और दिनमान रात्रिमान्तीस घडीसे कमज्यादै होवें तो इनमेंसे एक २ मुहूर्त भी दोदो घड़ीसे कमज्यादै समझलेने चाहिये और इनमें वार आदि क्रमसे जो मुहूर्त, अशुभ होते; उनको कहतेहैं ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ अर्यमा राक्षसश्राद्भौ पित्र्याग्नेयौ तथाभिजित् ॥ राक्षसापो ब्रह्मपित्र्यौ भौजंगेशाविनादिषु ।। ४ ॥ वारेषु वर्जनीयास्ते मुहूर्ताः शुभकर्मसु । अन्यानपि तु वक्ष्यामि योगानघ शुभाऽशुभान् ॥ ६ ॥ अर्यमा मुहूर्त सूर्यवारमें अशुभहै और सोमवारमें राक्षस, बला ये अशुभहै, मंगलमें पितर, अनि ये अशुभहैं, बुधमें अभिजितमुहूर्ते अशुहैबृहस्पतिको राक्षस ओर उदक अशुभ, शुक बला पितर अशुभ, शनिको सर्प, शिव ये मुहर्तुं अशुसहैं । रविवार आदिकों में ये मुहूर्ते शुभकमौंमें यतनकरके वर्जदेने चाहियें।अब यहां अन्यभी शुभअशुत योगोंको कहतेहैं । । ५ ।। ६ ।। । सूर्यभाईंदगोतर्कदिग्विश्वनखसंमिते ॥ चंद्रयै रवियोगाः स्युदंषसंधविनाशकाः ॥ ७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां मुहूर्ताध्यायो नवमः॥ ९॥ (८८ ) नारदसहृता । जिस नक्षत्रपर सायंहो उस नक्षत्रसे चंद्रमाका नक्षत्र अर्थव वर्त मान नक्षत्र ४ -- ९- ६-१०-१३- २९ इन संख्याओंपर हो तो रयिोग होहें वे दोषोंके समूहोंको नष्टकरते, अर्थाव शुभदायक योग जानने ।। ७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितानाषाष्टकायां मुहूत्यायो नवषः ॥ ९ ॥ भृकां सूर्यभात्सप्तमॐ विद्युच पंचमे ॥ शूलोष्टमेऽब्धिदिग्भे तु शनिरष्टादशे तथा ॥ १॥ केतुः पंचदशे दंड उल्का एकोनविंशतिः । मोहनिर्घातकंपाश्च कुलिशे पारिवेषणम् ॥ २ ॥ विज्ञेयमेकविंशझेदारभ्य च यथाक्रमम् । चंद्रयुक्तेषु भेष्वेषु शुभकर्म न कारयेत् ॥ ३ ॥ सूर्यके नक्षत्रसे ( वर्त्तमाननक्षत्र ) सातवां होय तो भूकंप योग होतौहै, पांचवां विद्युत् आठवां शळ, चौदहवां शनि, अठारहव नक्षत्र होय तो केतुसंज्ञक योग, पंद्रहवां नक्षत्र होय तो दंड, १९ हो तो उल्का २१-२२-२३-२४-२५-ये होवें तो यथा- गसे मोह, निषीत, कंप, वज, परिवेषण, ये योग होते हैं ये नक्षत्र चंद्रमाके देखे जाते हैं अर्थात् सूर्य के नक्षत्रसे चंद्रमाका नक्षत्र गिनलेना चाहिये ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ अथ क्रकचयोगः। क्रकचं हि प्रवक्ष्यामि योगं शास्त्रानुसम्मतम् । निंदितं सर्वकार्येषु तस्मिनैवाचरेच्छुभम् ॥ ४ ॥ 9A आषाटीकास ०-अ० १०. (८९) अब सब कामोंमें निंदित शाखोक्त क्रकचनामक योगको कहतेहैं तिसमें कुछ भी शुभकर्म नहीं करना चाहिये ॥ ४ ॥ त्रयोदशस्युर्मिलने संख्यया थितिवारयोः ॥ क्रकचो नाम योगोयं मंगलेष्षतिगर्हितः ॥ ५॥ तिथि और बारके मिलनेसे तेरह १३ संख्या होजाय तब कच योग होताहै जैसे रविवार १ को १२। सोमवार२को ११ मंगलको दशमी, बुधको नवमी, गुरुको ८,शुक्रको ७, शनिको छठ इनके योगमें कच योग होता है यह शुभकर्मोंमें अति निंदित है ॥ ५ ॥ सप्तम्यामर्कवारश्चेत्प्रतिपत्सौम्यवासरे ॥ संवर्तयोगो विज्ञेयः शुभकर्मविनाशकृत् ॥ ६॥ इति श्रीनारदीयसंहितायांसंवर्तकयोगः ॥ सप्तमी तिथिको रविवार हो और प्रतिपदाको बुधवार होय तव संवर्द्धक योग होताहै यह योग शुभ कर्मको नष्टकरताहै । ६ ।। इति श्रीनारदीय ० भा० संवर्त्तकयोगः । आनंदः कालदंडधधूम्रधातृमुधाकराः ॥ ध्वांक्षध्वजाख्यश्रीवत्सवत्रमुद्गरछत्रकाः ॥ ७ ॥ मित्रमानसपद्माख्ययंबकोत्पातमृत्यवः ॥ काणःसिद्धिः शुभाभृतमुसलांतककुंजराः ॥८॥ राक्षसाख्यः चरस्थैर्यवर्धमानाः क्रमादमी । योगाः स्वसंज्ञफलदा अष्टाविंशतिसंख्यकाः ॥ ९ ॥ - (९० ) नारदसंहिता । आनद ३ कालदंड २ धम्र ३ धाता ४ चंद्र ५ ध्वांक्ष ६ ध्वज ७ श्रीवत्स ८ वज ९ मुद्र १० छत्र ११ मित्र १२ मानस १३ पन्न १४ चुंबक १५ उरसात १६ मृत्यु १७ कण १८ सिद्धि १९ शुरु २० अमृत २१ मुसळ २२ रोग २३ मातंग २४ राक्षस २५ चर २६ स्थिर २७ वर्धमान २८ ऐसे क्रमसे ये अठाईस योग कहैं ये योग अपने नामके अनुसार शुभ अशुभ फल देते हैं । ७ ।। ८॥ ९ ॥ रविचारे क्रमादेते दस्रभान्भृगभाद्विधौ ॥ साद्रौमे बुधे हस्तान्मैत्रभासुरमंत्रिणः ॥ १० ॥ वैश्वदेवे भृगुसुते वारुणाद्भास्करात्मजे । हस्तौं रविवारेऽजे चेदुभं दस्रभं कुजे ॥ ११ ॥ सौम्ये मित्रं सुराचार्य तिष्यं पौष्णं भृगोः सुते ॥ रोहिणी मंदवारे तु सिद्धियोगाह्वया अमी ॥ १२ ॥ यत्रस्यादिन्दुनक्षत्रं मानन्दादिगणस्ततः ॥ अष्टाविंशतियोगानां क्रमोयं प्रोच्यते बुधैः ॥ १३ ॥ इतिश्रीनारदीयसंहितायां सिद्धियोगाः॥ इनके देखने का यह क्रम है कि सूर्यवार के अश्विनी नक्षत्र { हो तो आनंद योग होताहै भरणी हो तो कालदंड ऐसा क्रम जानलेना और सोमवारको मृगशिर नक्षत्रसे मंगळको आश्लेषासे बुधक होतसे वृहस्पतिको अनुराधासे शुक्रको उत्तराषाढासे शनि को शतभिषासे आनंदादिक योग जानने और हस्त नक्षत्र सूर्य वारमें । भाषीकसo--→ ० १०, ( ९१ ) • हो चंद्रवारमें मृगशिर, मंगलको अश्विनी और बुधको अनुराधा, वृहतिको पुष्य नक्षत्र होय शुक्रको रेखती शनिको रोहिणी नक्षत्र होय तब ये सिद्धयोग होजाते हैं ऐसे यह आनंद आदि योगोंका क्रम पंडित जनोंने कहा है चंद्रमाका ( वर्तमान ) नक्षत्र जौनसा हो वही आनंदादि योग जानलेना ॥ १०।। ३१ ।। १३२ ॥१३॥ इति सिद्धियोगः। आदित्यशैौमयोर्नन्दा भङ्ग् शुशुशयोः ॥ जया सौम्ये गुरौ रिक्ता शनौ पूण तु न शुभा ॥१३४ ॥ रवि, मंगळवारको नंदासंज्ञकं तिथि होवें शुक्र व चंद्रवारको भद्रा तिथिं होवें बुधको जया और वृहक्षतिको रिक्ता शनिको पूर्णा तिथि होवें तो शुभ नहीं है अर्थात् अशुभ योग । जानना ।। १४ ।। नंदा तिथिः शुक्रवारे सौम्ये भद्रा जया कुजे ॥ रिक्ता मन्दे गुरोर्वारे पूर्ण सिद्धह्या अमी ॥ १८ शुक्रवारको नैदातिथि बुधको भद्र मंगलको जया शनिको रिक्का बृहस्पतिवारको पूर्ण तिथि हो तो ये सिद्धियोग क→हैं । १५ ।। अथ दग्धयणः एकादश्यामिवारो द्वादश्यामार्किवासरः ॥ षष्ठी बृहस्पतेर्वारे तृतीया बुधवासरे ॥ १६॥ एकादशीविषे सोमवार हो द्वादशीको शनिवार हो बृहस्पतिवारमें छठ, बुधवारविषे तृतीया हो ॥ १६ ॥ ९२ ) नारदसंहिता । अष्टमी शुक्रबारे तु नवम्यामर्कवासरः ॥ पंचमी भौमवारे तु दुग्धयोगाः प्रकीर्तिताः ॥ । १७ ॥ शुक्रवारको अष्टमी रविको नवमी पंचमीको मंगलवार हो तो ये दग्धवेग कहे हैं ॥ १७ ॥ दग्धयोगाश्च विज्ञेया पंचायोगाभिधा अमी । यमक्षमर्कवरेजे चित्रा भौमे तु विश्वभम् ॥ १८॥ बुधे धानिष्ठार्यमभं गुरौ ज्येष्ठा भृगोर्दिने ॥ रेखती मंदवारे तु दग्धयोगा भवंत्यमी॥ १९॥ ये दग्धयोग हैं इनको पंगुयोग भी कहते हैं रविवारको भरणी सोमको चित्रा मंगळको उत्तराषाढ बुधको धनिष्ठा बृहस्पतिको उत्तराफाल्गुनी शुक्रको ज्येष्ठा शनिको रेखती हो तो ये दग्धयोग फहे हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ विशाखादिचतुर्वर्गमर्कवारादिषु क्रमात् ॥ उत्पातमृत्युकाणाख्याः सिद्धियोगाः प्रकीर्तिताः ॥२०॥ और विशाखा आदि चार नक्षत्रका वर्ग सूर्य आदि ७ वारोंमें यथाक्रमसे उसात १ मृत्यु २ काण ३ सिद्धि ४ ये चार योग होते हैं जैसे कि रविवारको विशाखा होतो उत्सात अनुराधा मृत्यु ज्येष्ठा काण मूल है। तो सिद्धि योग होता है फिर समको पूर्वाषाढामें उत्पात उत्तराषाढामें मृत्यु ऐसा क्रम जानना ऐसे यही क्रम सचचारोंमें करना २८ नक्षत्रमें ७ वारेंमें ये चारों योग ठीक २ होवेंगे । २० ॥ । 8A भाषाटकास०-अ० ११ : (९३ ) तिथिवारोद्भवा नेष्टा योगा वारसँसंभवाः । हूणवंगखशेभ्योन्यदेशेष्वतिशुभप्रदः ॥ २१ ॥ इति नारदीयसंहितायामुपग्रहाध्यायो दशमः ॥ १० ॥ तिथि और वारोंमें उत्पन्नहुए योग अशुभ हैं और वार तथा नक्षत्रसे उत्पनहुए योग हूण बंग (बंगाल ) खश ( नैपाल ) इन देशोंके बिना अन्य सब देशोमें शुभ हैं ॥ २१ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायामुपग्रहाध्यायो दशमः१० ॥ अथ संक्रातभरणञ्च । घोराध्वांक्षीमहोदयं मंदाकिनी नंदा मता । मिश्रा राक्षसिका नाम सूर्यवारादिषु क्रमात् ॥ १ ॥ घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मंदाकिनी, नंदा, मिश्र, राक्षसिका इन नामोंवाली संक्राति रविवारादिोंमें अर्क होनेसे जानन जैसे रविवारमें सक्रांति अर्क होय तो बोरा नामचाली जानना ।। १ । शूद्रवितस्करमापभूदेवपशुनीचजः ॥ अनुक्तानां च सर्वेषां घोरायाः सुखदाः स्मृताः ॥ २ ॥ घोरा सक्रांति द्रको सुख देती है, ध्वांक्षी वैश्योंको, महो- दरी चोरोंको, मंदाकिनी राजाओंको, नंदा बालण तथा पंडितोंको, मिश्रा पशुवोंको, राक्षसी चांडाळ आदि संपूर्ण नीचजातियोंको सुख देतीहै । २ ॥ पूर्वाहे नृपतीन्हंति विप्रान्मध्यदिने विशः ॥ अपराहेऽस्तगे शूद्रान्प्रदोषे च पिशाचकान् ॥ ३ ॥ ९४ ) नारदसंहिता । दुपहरपहले सक्रांति अर्क तो राजाओंको नष्टकरै मध्याह्नमें बालणोंको वीसरे अहमें वैश्योंको सायंकालमें शूद्रोंको प्रदोषसमयमें पिशाचोंको ।। ३ ।। निशि रात्रिचरान्नाद्यकारानपररात्रिके ॥ गोमाहिषेति संध्यायां लिगिनो निशि संक्रम ॥ ४ ॥ रात्रीमें राक्षधोंको आधीरात पीछे नाचनेवाले और तमास करनेवालोंको पीड़ा करे आप्तःकाल संध्यामें अकें तो गोमहिष्या दिकोंको और उससेभी पीछे बिलकुछ प्रभातसमय अकें तो सन्यासी आदिकोंको पीडा करें ॥ ४ ॥ दिवा चेन्मेषसंक्रांतिरनर्थकलहप्रदा ॥ रात्रौ सुभिक्षमतुलं संध्ययोर्मुष्टिनाशनम् ॥ ५॥ दिनमें मेषी सक्रांति अर्क तो अशुभफल तथा भजामें बैरैरभाव करै रात्रिमें अकें तो अत्यंतसुभिक्ष हो दोनों संध्याओंमें अकें तो वर्षाका नाशकरै ॥ ५ ॥ हरिशार्दूलवाराहखरकुंजरमाहिषाः ॥ अधश्वजवृषाः पादायुधाःकरणवाहनाः ॥ ६ ॥ वव आदि जौनसा करण वर्त्तमान हो तिसके क्रमसे सिंहव्याघ वाराह गधा हस्ती वैसा अश्व धान बकरा वृष मुरगा ये वाहन कहे हैं यहां ववमें सिंह वाहन होता है और यह ११ करण यथा हमसे देख लेने ॥ ६ ॥ खशबाह्निकवंगेषु संक्रांतिर्धिष्ण्यवाहना ॥ अन्यदेशेषु तिथ्यर्द्रवाहना स्याद्वादितः ॥ ७ ॥ भाषाटीकास०-अ० ११. (९५) खश बाढिक वंग ( बेंगाळा ) इन देशोंमें नक्षत्रोंके कमसे सक्रांतिका वाहन जानना और अन्यदेशमें वद आदिकरणोंके कमसे संक्रांतिका वाहन होताहै ॥ ७ ॥ भृगुंडभिंदिपालासिदंडकोदंडमरान् । कुंतपाशांकुशाढपून्बिभर्ति करणेष्घिनः ॥ ८ ॥ भृगुंडी सिंदिपाळ खङ्ग दंड धनुष तोमर जाळा फास अंकुश अस्त्र (तेगा )वाण ये शत्र बव आदि करणोंके क्रमसे, संक्रतिके हे हैं ॥ ८ ॥ अन्नं च पायसं भैक्ष्यमपूपं च पयो दधि ॥ चित्रान्नं गुडमध्वाज्यशर्करा ववतो हविः ॥ ९ ॥ और अन्न पायस क्षाि पूड़ा दूध दही चित्राल गुड मधु घृत शर्करा ये संक्रांतिके भोजन, वय आदिकरणोंके यथाक्रमसे जानने चाहियें ॥ ९ ॥ निविष्टं वणिजे विष्टयां बालवे च गरे ववे । कलशकुने भानुः किंस्तुघ्ने चोध्र्वसंस्थिता ।। १० ।। और वणिज विष्टि बालव गर वव इन करणे में संक्रांति अकें तो बैठी जानना, कौलव शकुनि किंस्तुघ्न इनमें खडी जानना ।। १० ॥ चतुष्पात्तैतिले नागें सुप्तांतिं करोति सा । धान्यार्घवृष्टिसु भवेदनिष्टक्रमशस्तदा ॥ ११ ॥ चतुष्पाद तैतिल नाग इनमें अकें तो सूती हुई संक्रांति जानना बैठी हुई संक्रांतिमें अन्न सस्ता खडीमें वर्षा ओर सूतीमें अशुभ फल जानना ॥ ११ ॥ • (९६) नारदसंहिता । आयुधं वाहनाहारो यज्जातीयजनस्य च ॥ स्वापोपविष्टतिष्ठंतस्ते लोकाः क्षयमाप्नुयुः ।। १२ ।। शत्र वाहन भोजन ये सब संक्रांतिके जिसजातिके जनके हो तथा सूती बैठी खडी जैसी हो विसहीप्रकारके जनोंका व पदार्थोंक नाश हो ॥ १२ ॥ अन्धको मंदसंज्ञश्च मध्यसंज्ञः सुलोचनः । पर्यायाद्गणयेद्रान रोहिण्यादि चतुर्विधम् ॥ १३ ॥ अंध, मंदलोचन, मध्यसंज्ञक, सुळेचन, इस प्रकार रोहिणी आदि नक्षत्रोंको क्रमसे जानना तहांचार २ नक्षत्री ७ आवृद्धि करलेनी रोहिणी अंधा मृगशिर मंदळचन इत्यादि ।। १३ ।। स्थिरभेष्वर्कसंक्रांतिीया विष्णुपदावया ॥ षडशीतिमुखी ज्ञेया द्विस्वभावेषु राशिषु ।। १४ ।। वृष, सिंह, वृश्चिककुं, इन स्थिर राशियोंपर सूर्य संक्रांति होय तो विष्णुपदानामक संक्रांति जानना और मिथुन आदि द्विःस्वभावराशियों पर अर्क होय तब षडशीतिमुखी संक्रांति . नना ॥ १४ ॥ सौम्ययाम्यायने नूनं भवेतां मृगकर्किणोः । तुलाधराजयोफ़ेयो विषुवत्सूर्यसंक्रमः ॥ १४॥ मकर की संक्रांति अकें तब उत्तरायण प्रवृत्त होताहै और कर्ककी संक्रांति अकें उस दिन दक्षिणायन प्रवृत्त होताहै और तुळ तथा मेषकी संक्रांति अहें उस दिन विषुवत् अर्थात् दिनरात्रि समान्छे कल होता है ॥ १५॥ आषाढीस ०-अ० ११. ( ९७ } अङ्क संक्रमणं कृत्स्नं महापुण्यं प्रकीर्तितम् । रात्रौ संक्रमणे भानोर्यबस्था सर्वसंक्रमे । १६ ।। दिनमें संक्रांति अकें तो सारे दिनमें महान् पुण्य कहाहै और रात्रि में संक्रति अकें तो सब संक्रांतियोंमें व्यवस्था कहीहै ॥ १६ ॥ सूर्यस्योदयसंध्यायां यदि याम्यायनं भवेत् ।। तदोदयादहः पुण्यं पूर्वाहः परतो यदि ॥ १७ ॥ जैसे कि सूर्य उदय होनेकी संधिमें दक्षिणायन अर्थात् कर्ककी संक्रांति अ तो उदय होनेवाले दिनमेंही पुण्यकाल जानना और जो उदयकालकी संधिसे पहलेही संक्रांति अकें तो पहलेही दिन पुण्यकाल है यह फैकी संक्रांतिकी व्यवस्थाहै ।।१७ ।। सूर्यास्तमनवेलायां यदि सौम्यायनं भवेत् ॥ तदपेयादहः पुण्यं पराह्नः परतो यदि ॥ १८ ॥ और सूर्य के अस्तहोनेकी संधिमें मकरी संक्रांति अकें तो उसी दिन पुण्यकाल जानना संधिसे पीछे रोत्रिमें अगलेदिनपुण्यकाल जानना ।। १८।। अवुर्कस्तमनात्संध्यासंघटिकात्रयसंमिता ॥ तथैवार्योदयात्प्रातर्घटिकात्रयसंमिता ॥ १९ ।। सूर्यका आधा मंडल अस्त हानेके बाद तीन घडीतक सायंसंध्या रहतीहै और आधा मंडळ उदय होनेसे पहिले प्रातःकाल तीन घडी प्रभातकी संध्या कहीहै । १९ ॥ 1A (९८) नारदसंहिता । प्रागर्धरात्रात्पूर्वोते पूर्ववद्विष्णुपादयोः ॥ षडशीतिमुखी चैव परतश्चेत्परेऽहनि ॥ २० ॥ कॐ मकरकी संक्रांतिका यह पुण्यकाल जानना पूर्वोक्त विष्णुपदा नामक संक्रांति षडशीतिमुखी नामवाळी संक्रांति आधीरातसे । पहिले दिन पुण्यकाळ और आधीरात पीछे अर्क तो पिछले दिन पुण्यफल जानना ।। २० ।। पश्वपराहः संक्रांतिः षडशीतिर्विपर्ययात् ॥ यादृशेनेंदुना भानोः संक्रांतिस्तादृशं फलम्॥ २१ ॥ नरः प्राप्नोति तद्रशैौ शीतांशोः साध्वसाधु वा ॥ संक्रांतिग्रहणसँ वःपूर्वभाद्रणनाक्रमः ॥२२॥ रवेरयन संक्रांतिस्तदा तद्राशिसंक्रमः॥ संक्रांतिग्रह्णॐ वा जन्मभावाधि गण्यताम् ॥ २३ ॥ और षडशीति नामवाली संक्रांतिका पुण्यकाल इन विष्णु पदा नामवली संततियोंसे विपर्यय जानना जैसा चंद्रमामें संक्र ति अकें वैसाही फळ होताहै संक्रांति अर्कके दिन जिस मनुष्य को अच्छाचंद्रमा ह उसको श्रेष्ठ फळ होता है । संक्रांति अकें उस दिनसे पहले दिनले नक्षत्रसे गिननेका क्रम होताहै । सूर्यके अयनक्री संक्रांति व अन्य राशिी संक्रांति जिस दिन अर्क उसी दिनके नक्षत्रसे भी जन्मके नक्षत्रतक गिना जाता है अब इन दोनों फळ कहतेहैं ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ नेष्टं त्रयं षट् च शुभं पर्यायाच्च पुनः पुनः । हानिघृद्धिः स्थानहानिस्तत्प्राप्तिर्भनुतः क्रमात् ॥२२॥ आषाढीकस ०-अ० १२. १ (९९) पहिले तीन नक्षत्र शुभ नहीं हैं फिर छह नक्षत्र शुभदायक हैं पीछे ३ नक्षत्र हानिकारक, फिर ६ वृद्धि, फिर ३ स्थपनहानि, फिर ३ नक्षत्र स्थानप्राप्ति करतेहैं ऐसे सूर्यसंक्रांति चंद्रनक्षत्र विचारी जातीहै ।। २४ ।। तिलोपरि लिखेच्चक्रे त्रिशूलं च त्रिकोणकम् ॥ तत्र हैमं विनिक्षिप्य दद्यात्तद्दोषशांतये ॥ २५॥ जो अशुभदायक संक्रांति हो तो उस दोषकी शांतिके वास्ते तिलके ऊपर चक्र लिख त्रिकोण त्रिशूल लिखकर तिसपर सुवर्ण रखकर तिसका दान करे ॥ २५ ॥ ताराबलेन शीतांशुर्बलवांस्तद्वशाद्रविः॥ ससंक्रमणतस्तद्दशाखेटबलाधिकः ॥ २६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहि० संक्रातिलक्षणाध्याय एकादशः ११॥ ताराके बलसे चंद्रमा बछवान है और चंद्रमाके बछसे सूर्य बछ वान होता है और वह सूर्य संक्रांतिके बलसे अन्यग्रहोंका बछ पाकर बलवान् है ॥ २६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषीकायां संतिलक्षणाध्याय एकादशः ॥ ११ ॥ मease see , अथ गोचराध्यायः। शुभोक जन्मतघ्यायदशषट्सु न विध्यते ॥ जन्मतो नवपंचांखुव्ययगैर्युकिभिस्तदा ॥ १॥ जन्मराशिसे ३ । ११ । १० । ६ इन स्थानोंपर सूर्य हो तो शुभहै परन्तु जन्मराशीसे ९ । ५। ४ । १२ इन स्था (१०० ) नारदसंहिता। नोंमें कोई यह नहीं हो तो वेध नहीं होता अर्थात् ३ सूर्य शुभहै। परन्तु ९ स्थानमें अन्य कोई ग्रह होय तो वेध होजाताहै ११ शुभहै पूरु ५ में कोई ग्रह नहीं होना चाहिये। १० सूर्यहो तब ४ स्थान और ६ सूर्य हो तब जन्मराशिसे १२ स्थानमें कोई ग्रह नहीं होना चाहिये। यदि इन स्थानोंपर शनि विना कोई ग्रह होवेगा तो सूर्यवेध होजायगा फिर शुभफल नहीं रहेगा ऐसे इन बेधके सबही स्थानों का यथाक्रम लगा लेना । इसी प्रकार चंद्र आदि ग्रहोंकोभी कहते हैं ॥ १ ॥ विध्यते जन्मतो नेदुर्द्धनाशयारिखत्रिषु । खेष्वष्टांत्यांबुधर्मस्थैर्विबुधैर्जन्मतः शुभः ॥ २॥ जन्म राशिसे ७।१।११। ६ । १० । ३ इन स्थानोंपर चंद्रमा वेध नहीं करताहै याने शुभहै परंतु जन्मराशिसे २।५। ८। १२ । ४ । ९ इन स्थानोंॉपर बुध विना अन्य कोई ग्रह नहीं होना चाहिये। बुध चंद्रमाका पुत्र है इसलिये वेध नहीं करतौहै। इन वेधके स्थानोंका परस्पर यथाक्रम देखलेना चाहिये ।। २ ।। याऽऽयारेषु कुजः श्रेष्ठो जन्मराशेर्न विध्यते ॥ व्ययेष्वर्कग्रहे साररष्यसूय्र्येण जन्मतः ॥ ३ ॥ और ३। ११ । ६ । इन स्थानोंपर मंगल श्रेष्ठ है वेध नहीं करता है परंतु १२ । ५।९ इनस्थानोंपैर कोई ग्रह नहीं होना चाहिये और इस मंगल के ही समान शनिका फल जानना परंतु रानके उकस्थानोंमें सूर्य वेध नहीं करताहै । ३ । भाषाटीकास०-अ० १२. (१०१) ज्ञोद्यबध्यऽर्यष्टखायेषु जन्मतश्च न विध्यते । थीयंकघाऽष्टांत्यखेटैर्जन्मतो व्यञ्जकैः शुभः ॥ ९ ॥ जन्मराशीसे २।४। ६। ८ । १०। ११ इन स्थानोंषर बुध शुभहे वेधित नहीं है परंतु ९।३।९।१।८। १२ । इन स्थानोंपर चंद्रमा विना अन्य कोई यह नहीं होना चाहिये ।। ४ ॥ जन्मतः स्वायगोक्षास्तेष्वंत्याश्वायजलत्रिगैः ॥ जन्मराशेर्गुरुः श्रेष्ठो ग्रहैर्यदि न विध्यते ॥ ६॥ जन्मराशिसे २।११।९।५। ७ इन स्थानपर वृषति श्रेष्ठहै परंतु जन्मराशिसेही १२।८। ११ । ४ । ३ इन स्थानपर कोई ग्रह नहीं होना चाहिये ॥ ५ ॥ कुच्यकन्धिसुताष्टांकांत्यये शुक्रो न द्विध्यते ॥ जन्मभान्मृत्युसम्नाद्यखांकेष्वायारिपुत्रगैः ॥ ६ ॥ और जन्मराशिसे १ । २ । ३ । ४।५।८।९।१२। ११ इन स्थानोंपर शुक्र वेधित नहीं है अर्थात् शुभहै परंतु जन्मरशिसे ८ । ७ । १ । १० । ९ । ५ । ११ । ६.। ५ स्थानोंपर कोई ग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात १ के शुक्को ८ और २ को ७ । ३ को १ ऐसे सच स्थानका यथाक्रम वेध समझना चाहिये ॥ ६ ॥ न ददाति शुभं किंचिद्रोचरे वेधसंयुते ॥ तस्माद्वैधं विचार्याथ कथ्यते तच्छुभाशुभम् ॥७॥ वेधसे युक्हुआ यह कुछभी शुभफल नहीं देता इसलिये अहका वेध विचारके शुभ अशुभ फल कहना चाहिये ॥ ७ ॥ (१०२) नारदसंहिता। वामवेधविधानेनाप्यशुभोपि ग्रह शुभः । अतस्तान्विविधान्वेधान्विचयथ वदेत्फलम् ॥ ८ ॥ और वामवेधके विधानसे अशुभ ग्रह भी शुभदायक होजाता है। अर्थात् जैसे १२ सूर्य अशुभ है तहां जन्मराशिसे छठे स्थानमें स्थित हुए ग्रहोंकरके वेधको प्राप्त होजाय तो शुभहै इसी प्रकार विपरीततासे वेध होनेको वाम वेध कहते हैं इसलिये तिन अनेक प्रकारके वेधोंको विचारकर फल कहना चाहिये ॥ ८ ॥ अज्ञात्वा विविधान्वेधान्यो ग्रहजं फलं वदेत् । स मृषावचनाभाषी हास्यं याति नरः सदा ॥ ९॥ जो ज्योतिषी अनेकप्रकारके वेधोंको जाने बिना फल कहता है वह झठा वचन कहनेवाला है हास्यको प्राप्त होता है । ॥ ९ ॥ सौम्येक्षितो नेष्टफलः शुभदो पापवीक्षितः।

निष्फलौ तौ ग्रहौ स्वेन शत्रुणा च विलोकितः॥ १०॥

अशुभ दायक ग्रह भी शुभग्रहोंकरके देखागया हो तो शुभफल करताहै और शुभदायक ग्रह पापग्रहोंसे दृष्टहो तथा शत्रुग्रहसे देखागया हो तो ये दोनोंही यह निष्फल कहेहैं ।। १० ॥ नीचराशिगतः स्वस्य शत्रुक्षेत्रगतोपि वा । शुफाशुभफलं नैवं दद्यादस्तमितोपि वा ।। ११ ।। नचंराशिपर स्थित हुआ अथवा अपने शत्रुके घरमें प्राप्त हुआ तथा अस्तहुआ ग्रह कुछ भी शुभअशुभ फळ नहीं देता है ।।११॥ ग्रहेषु विषमस्थेषु शति यत्नसमाचरेत् ॥ हानिQद्धिर्द्रहाधीना तस्मान्पूज्यतमा ग्रहाः ॥ १२ ॥ भाषाटीकास०-अ० १ ३. (१०३ ) विषम कहिये अशुभस्थानमें ग्रह स्थित हो तो यनसे उन्होंकी शांति करानी चाहिये । हानि तथा वृद्धि ग्रहोंके अधीनहै इसलिये ग्रह सदा पूजने चाहियें ॥ १२ ॥ मणिमुक्ताफलं विद्रुमाख्यं गारुत्मकाह्वयम् । पुष्परागं वथो वनं नीलगोमेदसंज्ञकम् । वैडूर्ये भास्करादीनां तुष्टचै धायै यथाक्रमम् ।। १३ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां गोचराध्यायो द्वादशः।।१२।। माणिक्य, मोती, भंग, गरुत्मक ( हरीजातका रन ) पुषराज, हीरा, नीलमणि ( लहसुनियां) गोमेद, वैडूर्य ये रन यथाक्रम धारण करनेसे सूर्य आदि प्रहकी प्रसन्नता होतीहै ।। १३ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाष्टकायां गोचराध्यायो द्वादशः।।१२। शुक्लपक्षादिदिवसे चंद्रो यस्य शुभप्रदः । स पक्षस्तस्य शुभदः कृष्णपक्षोऽन्यथा शुभः॥ १॥ शुक्लपक्षादिदिनोंमें जिसके चंद्रमा बळयान् होता है वह पक्ष उसको शुTदायक होता है और कृष्णपक्ष अन्यथा शुभहै अर्थात कृष्णपक्षमें ताराबल देखना शुभहे ।। १॥ शुक्लपक्षे शुभशृङ्गो द्वितीयनवपंचके ॥ रिपुसृत्यंबुसंस्थश्च न विदो गगनेचरैः ॥ २ ॥ शुक्लपक्षमें दूसरा नवमां पांचवाँ चंद्रमा शुहै परंतु छठे आठवें चौथे कोई ग्रह नहीं होना चाहिये अथीव जन्मराशिसे इन स्थानों में बुध बिना कोई ग्रह होय तो संद्रमाका वेध हो जाताहै ।। २ ।। । {१०४ ) नारदसंहिता। अथ ताराः। A+ २, जन्मसंपद्विपत्क्षेमप्रत्यरिस्साधको वधः ॥ मित्रं परममित्रं च जन्मभाच्च पुनः पुनः ॥ ३ ॥ जन्म १ संपत् २ विपत् ३ क्षेम ४ प्रत्यरि ५ साधक ६ वध ७ मित्र ८ परममित्र ९ ये नव तारे कहेहैं । तहां यथाक्रमसे जन्प्रके नक्षत्रसे गिनलेने चाहियें ९ से अधिक होंय तो ९ का आग देना ।। ३ ।। जन्मत्रिपंचसप्ताख्या तारा नेष्टफलप्रदाः । अनिष्टपरिहाराय दद्यदेतद्विजातये ॥ ४ ॥ तह जन्म, तीसरा, पांचवां, सातवां ये तारा शुभ नहीं हें अशु ताराकी शांतिके वास्ते यह आगे कएहुए दान घालणके वास्ते देना चाहिये ॥ ४ ॥ शाकं गुडं च लवणं सतिलं कांचनं क्रमात् । कृष्णे बलवती तारा शुक्रुपक्षे बली शशी ॥ ४ ॥ शाक, गुड, ळवण, तिल, सुवर्ण ये यथाक्रमते देने योग्यX कृष्णपक्षमें तारा बळचा होताहै और शुक्ळपक्षमें चंद्रमा बछवान होताहै ॥ ५ ॥ चंद्रस्य द्वादशावस्था दिवा रात्रौ यथाक्रमात् ॥ यत्रोद्वाहादिकार्येषु संज्ञा तुल्यफलप्रद॥ ६॥ दिनरात्रिमें यथाक्रमसे चंद्रमाकी बारह अवस्था कहीहैं तहां विवाहआदि कार्यंमें संज्ञााके तुल्य फल जानना ।। ६ ।। = भाषाटीकास ०-अ० १४. (१०५) षष्टिनं चंदनक्षत्रं तत्कालघटिकान्वितम् । वेदनमिषुवेदाप्तमवस्थाभानुभाजिताः ॥ ७ ॥ अश्विनीआदि गत नक्षत्रोंको साठसे गुनाकरलेवे फिर वर्तमान नक्षत्रकी घटी मिळादेवे फिर उनको चारगुना करके तिसमें पैताली स ४५ का भाग देना तहां १२ से ज्यादै बचें तो बारहका आग दन् ।। ७ ।। प्रवासनष्टाख्यमृता जया हास्या रतिर्मुदा ॥ सुप्तिर्मुक्तिज्वराकंपमुस्थितिर्नामसंनिभाः ॥ ८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां चेद्बलाध्यायत्रयेदशः॥१३॥ फिर प्रवास १ नष्ट २ मरण ३ जया ४ हास्या ५ रति ६ मुदा ७ मुप्ति ८ भुक्ति ९ ज्वर १० कंप ११ सुस्थिति १२ ये बारह अवस्था नामके सदृश फलदायक जानना । तहां मेषरा शिवाले पुरुषको प्रवासआदि संज्ञा और वृषराशिवाळेको नष्टआदि संज्ञा मिथुनराशिवाछेको मरणआदि ऐसे गिनलेना चाहिये।। ८ ॥ इति श्रीनारदसंहिताभाषाटीकायां चढवळाध्यायत्रयोदशः ।। १३ ।। अथ लग्नफलम्। पट्टबंधनयानोग्रसंधिविग्रहभूषणम् ॥ धात्वाकराइवं कर्म मेषलग्ने प्रसिध्यति ॥१॥इति मेषलग्नम्। पट्टबंधन, सवारी, उग्रसंधि (मिळाप ) विग्रह, आभूषण, धातु खजान, युद्ध ये कर्म मेषळनमें सिद्ध होतेहैं । १ ॥ इति मेषलम् । । (१०६ ) नारदसंहिता । मंगलानि स्थिराण्येव वेश्मकर्मप्रवर्तनम् । कृषिवाणिज्यपश्वादि वृषलग्ने प्रसिध्यति ॥ २ ॥ इति वृषलग्नम् ॥ मंगल, स्थिरकाम, घरप्रवेश आदि कर्म, खेती, वाणिज्य, पशु आदि कर्म ये वृषलपमें सिद्ध होतेहैं ॥ २ ॥ इति वृषलान् । कलाविज्ञानसिद्धिश्च भूषणाहवसंश्रयम्॥ गजोद्वाहाभिषेकायं कर्तव्यं मिथुनोदये ॥ ३ ॥ इति मिथुनललम् ॥ कला, विज्ञानसिद्धि, आभूषण, युद्ध, आश्रय होना, हाथी लेन देना,विवाह,अभिषेक इत्यादि कर्म मिथुनलनमें करने चाहियें।।३।। इति मिथुनलब ।। वापीकूपतडागादिवारिबंधनमोक्षणे । पौष्टिकं लिपिलेखादि कर्तव्यं कर्कटोदये ॥ ४ ॥ इति कर्कलग्नम् ॥ बघड़ी, कवा, तालाबपुळबांधना, नहर चलाना, पुष्टिके काम लेखक कर्म, लेखाहिसाब ये कर्म कर्कळल्में करने शुहैं ।। ४ ।। इति कर्कल्म ॥ इक्षुधान्यवणिङ्पण्यकृषिसेवादि यत्स्थिरम् । साहसावहभूपव्यं सिंहलग्ने प्रसिध्यति ॥ ५ ॥ इति सिंहलनम् । भाषाटीकास ०-अ० १४. ( १०७ ) ईखधान्यवाणिज्य, दूकान, खेती, सेवा आदि स्थिर काम, साहस ( बलहठका ) कामयुद्ध, राजकार्य ये काम सिंहृल्में करने शुभ हैं ।। ५॥ इति सिंहलग्न ॥ विद्याशिल्पौषधकर्म भूषणं च चरं स्थिरम् ॥ कन्यालग्नविधेयं तत् पौष्टिकाखिलमंगलम् ॥ ६ ॥ इति कन्यालग्नम् ॥ विद्यया, शिल्प, औषध, आभूषण, चर स्थिर काम, पौष्टिक तथा मांगालिक कमें कन्यालगमें करने चाहियें । ६ । इति कन्यालग्न ॥ कृषिवाणिज्ययानाश्च पशूद्रहव्रतादिकम् । तुलायामखिलं कर्म तुलाभांडाश्रितं च यत् ॥ ७ ॥ इत तुलालनम् । खेती, वाणिज्य, सवारी, पशु, विवाहव्रतादिक, वरतन, ताख डी बाट इत्यादि कर्म तुळा लागमें करने चाहियें।।७॥इति तुळळ० स्थिरकर्माखिलं कार्यं राजसेवाभिषेचनम् ॥ चौर्यकर्म स्थिरारंभाः कर्तव्या वृश्चिकोदये ॥ ८॥ इति वृश्चिकलनम् ॥ संपूर्ण स्थिर काम, राजसेवा, अभिषेक, चोरीके काम, स्थिर कार्यं प्रारंभ ये कार्य वृश्चिक लग्नमें करने चाहियें ॥ ८ ।। इति वृश्चिकलश ।। व्रतोद्वाहप्रयाणचे बृगशिल्पकलादिकम् । चरं स्थिरं सशस्त्रास्त्रं कर्तव्यं कार्मुकोदये ॥ ९ ॥ इति धनलग्नम् ॥ (१०८) नारदसंहिता । व्रत नियम देना, विवाह, तीर्थादिकपर मरना, अंग, शिल्प, काचर, स्थिरकार्य, शत्रअन्न, ये काम धनुर्द्धनमें करने चाहियें ॥ ९ ॥ । इति धनञ्भ् ।। तोयबंधनमोक्षाखकृष्यं चोष्ट्रादिकर्म यत् ॥ प्रस्थानं पशुदासादिकर्तव्यं मकरोदये ॥ १० ॥ इति मकरलभम्॥ पुळ बांधना, नहर चलाना, शस्त्रकर्म, खेती, अंट आदि पशुके य, गमनपशुकर्म, दासादिकर्म ये सब मकरळ्ग्रमें करने चाहियें ।। १० ।। इति मकरलल ० ।। कृषिवाणिज्यपर्धेषु शिल्पकर्म कळादिकम् । जलयात्रास्त्रशस्त्रादि कर्तव्यं कलशोदये ॥ ११ ॥ इति कुंभलनम् ॥ खेती, वाणिज्य, पशु, जलकर्म, शिल्पकर्म, कलादिकर्म जलमें यात्रा, शत्र अस्र कर्म ये सब कुंभळभ्रमें करने चाहिये ।। ११ ।। इति कुंभल० ।। व्रतोद्वाहाभिषेकांबुस्थापनं सन्निवेशनम् । भूषणं जलपात्रं च कर्म मीनोदये शुभम् ॥ १२ ॥ इतिमीनलग्नम् । बत, विवाहअभिषेक, जळस्थापन, प्रवेशकर्म, आभूषण, जल- पात्र ये कर्म मीनलममें करने शुभ हैं ॥ १२ ॥ इति मीनल ० ॥ गोयुग्मकर्ककन्यांत्यतुलाचापधराः शुभाः । शुभक्षुहस्पदवात्स्युरितरे पापराशयः ॥ १३ ॥ भाषाटीकास ०-अ० १४. (१०९ ) ' & ४४ ॥ -

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और वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, भीन, तुळा, धनुष ये लग्न शुभदायक हैं, क्योंकि ये शुभग्रहोंके स्थान हैं और अन्य लन पापग्रहोंकी राशि हैं ॥ १३ ॥ क्षीणेदंर्कार्किभूपुत्राः पापाः स्युः संयुतो बुधः ॥ पूर्णचंद्रबुधाचार्यशुक्रस्तेस्युः शुभग्रहः ॥ १४ ॥ क्षीणचंद्रमा, सटी, शनि, मंगल ये पॉपग्रह हैं और इनके साथ होनेसे वुध भी अशुभ है और पूर्ण चंद्रबुद्धबृहस्पति:शुक्र " ये शुभग्रह हैं ।। १४ ॥ ऊ,६ ३, ;*) *३८ ६ ६ ३३ सौम्योगं तेषां राशीनां प्रकृत्येव फलं भवेत् ॥ योगेन सौम्यपापैश्च खचरैर्वीक्षितेन वा ॥ १८ ॥ तिन राशियेंका योग होनेसे शुभ अशुभ फळ स्वभावसे ही होजाता है और शुभ अशुभ ग्रहोंकी दृष्टिहानेसे भी शुभाऽशुभ फल होता है। १५ ॥ सैम्याश्रितत्वात्क्रूरो वा स राशिः शोभनः स्मृतः ॥ सौम्योपि राशिः क्रूरः स्यात्कूरग्रहयुतो यदि ॥ १६ ॥ जिसपर शुभग्रह स्थित होय वह फूरराशि होय तो भी शुभद यक जाननी और क्रूरग्रहसे युक्त होय तो शुभराशि भी छु जाननी ॥ १६ ॥ ग्रहयोगावलोकाभ्यां शशी धत्ते ग्रहोद्भवम् । फलं ताभ्यां विहीनोसैौ स्वं भावमुपसर्पति ॥ १७ ॥ (३ १० ) नारदसंहिता। प्रहृका योग तथा दृष्टिकरके चंद्रमा उसग्रहके शुभ अशुभ फल को धारण करता है और उन दोनोंसे हीन होय तव चंद्रमा केवल अपना ही फल करता है । १७ ॥ आदौ संपूर्णफलदं मध्ये मध्यफलप्रदम् । अन्ते तुच्छफलं लग्नं सर्वास्मिन्नेवमेव हि ॥ १८ ॥ लग्न, आदिमें संपूर्ण फळ करता है मध्यमें मध्यफल और अंतमें लग बहुत थोड़ा फळ करता है ।। १८ ।। सर्वत्र प्रथमं लग्नं कथंढवलं ततः ।। कन्यान्य इंदौ बलिनि संत्यन्यै बलिनो ग्रहाः ॥१९॥ सब जगह पहले लनवल देखना फिर कनॅको चंद्रबल देखना कन्याके विना अन्यराशिका चंद्रमा बळवान् होय तो सभी अहवळ वान जानने ।। १९ ।। चंद्रस्य बलमाधारआधेयं चान्यखेटजम् ॥ आधरभूतेनाधेयं दीयते पारिनिष्ठितम् ।। २० ।। चंद्धसाका बछ आधार है और अन्यग्रहका बुछ आधेय है । अर्थात् चंद्रमोके बलके आभूय है आधाररूष चंद्रबलसे आय की रक्षा कीजाती है । २० ॥ स तृदुः शुभदः सग्रहाः शुभफलप्रदः ॥ अशुभश्चेदशुभः वजयत्वा दिनाधिपम् ॥ २१ ॥ चंद्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभफल दायक जानने और अशुभ हो तो अशुभही परंतु सर्वकी यह व्यवस्था नहीं है ॥ २१ ॥ आषाढीस -अ० १५. ( ११ १ ) लग्नभ्युदयो येषां तेष्वंशेषु स्थिता ग्रहाः॥ लग्नोद्भवं फलं धत्ते चैवमेवं प्रकऋपयेत् ॥ २२ ॥ जिन ग्रहोंका लगोंमें शुफळ है वे ग्रह उन ढलोंके नवांशकमें भी लमके अनुसार शुभफल देते हैं ऐसे जानना ॥ २२ ॥ लग्नं सर्वगुणोपेतं लभ्यते यदि तेन हि ॥ दोषारुपत्वं गुणाधिक्यं बहुसंततमिष्यते ॥ २३ ॥ जो सबगुणसे संयुक्त छन मिलजाय तो दोषका योग थोड़ा रहता है और गुण ( शुभ ) बहुत विस्तृत होताहै ॥ २३ ॥ दोषदुष्टोहि कालः स परिहार्यः पितामह ॥ अथ शक्या गुणाधिक्यं दोषारुपत्वं ततो हितम् ॥२४॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां सर्वलग्नाध्यायश्चतुर्दशः११॥ दोषसे दुष्ट हुआ वह काल सबसे बड़ा है इस लिये त्याग देना चहिये और जो शक्लिक करके लुमेिं अधिक गुण होय तो अन्य दोष थोड़े रहते हैं ॥ २४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां सर्वलग्नाध्यायश्चतुर्दर्शः ॥१४॥ अथ रजस्वलाविचारः। अमारिक्ताष्टमीषष्टीद्वादशीप्रतिपत्स्वपि । परिघस्य तु पूर्वार्धे व्यतीपाते च वैधृतौ ॥ १ ॥ संध्यासूपप्लवे विष्टयामशुभं प्रथमार्तवम् ॥ (११२) नारदसंहिता । रुग्णा पतिव्रता दुःखी पुत्रिणी भोगभागिनी ॥ पतिप्रिया क्लेशयुक्ता सूर्यवारादिषु क्रमात् ॥ २ ॥ अमावस्या, रिक्ता, अष्टमी, षष्ठी, द्वादशी, प्रतिपदा ये तिथि, परिघयोगका पूर्वार्ध व्यतीपातवैधृति, सायंकाळ, दिग्दाह, भद्रा ऐसे समयमें प्रथम रजस्वला होय तो अशुभफळ जानना और रविवार आदि जिसबारेमें पहिले रजस्वला होय उसका फळ यथाक्रमसे ऐसे जानना कि रोगवारी १ पतिव्रता २ दुःखिनी ३ पुत्रिणी ४ भोगझोगिनी ५ पतिप्रिया ६ क्लेशसे संयुक्त ७ ऐसे ये फल सूर्यादिवरोंके जानने ॥ १ ॥ २ ॥ श्रीयुक्ता सुभगा पुत्रवती सौख्यान्विता स्थिरा ॥ मानी कुलाधिका नारी चाश्विन्यां प्रथमार्तवा ॥ ३ ॥ अश्विनी नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला होय तो श्रीयुक्त, सुभगा पुत्रवती सौख्यसे युक्त स्थिरमानवी कुलमें अधिक पृथ होती है ।। ३ ।। दुःशीला स्वैरिणी वंध्या गर्भपातनतत्परा । परप्रेष्या कवंध्या भरण्यां प्रथमार्तब ॥ ४ ॥ और दुष्टस्वभाववाली, व्यभिचारिणी, वंध्या, गर्भपात करनेर्भ तत्पर,दामी,काकवंध्या यह भरणी नक्षत्रमें प्रथम रजस्वलाके फलB४ अन्यथा पुंश्चली वंध्या गर्भपातनतत्परा । वेश्या मृतप्रजा चापि वह्निभे प्रथमार्तवा ॥ ४॥ व्यभिचारिणी, वंध्या, गर्भपतमें तत्पर, वेश्या, मृतवत्सा यह फळ कृत्तिका नक्षत्रमें जानना ॥ ५ ॥ भाषाटीकास०-अ० १५. (११३ ) सुशीला सुजा चान्या पतिभक्ता दृढव्रता ॥ गृहार्चनरता नित्यं धातुभे प्रथमार्तवा ॥ ६ ॥ सुंदरवभाववाडी, सुन्दरसन्तानवाढी, पतिमें भक्तिरखनेवाली, दृढनियमवाली, हमेशं गृहपूजनमें तत्पर यह फल रोहिणी नक्षत्रमें प्रथमरजस्वला हो तब जानना ॥ ६ ॥ गुणान्विता धर्मरता नारी सर्वंसहा सती । पतिप्रिया सुपुत्रा या चंद्रभे प्रथमार्तवा ॥ ७॥ गुणयुक्त, धर्ममें तत्पर, सब कुछ सहनेवाली, पतिव्रता, पतिसे प्यार रखनेवाली, अच्छे पुत्रोंवाली यह फल मृगशिर नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला हवे तब होता है ॥ ७ । कुलटा दुभगं दुष्ट मृतपुत्रा खला जडा ॥ दुष्टव्रतपरिभ्रष्टा रौद्रभे प्रथमाओवा ॥ ८॥ व्यभिचारिणी, दुर्भगा, दुष्टा, मृतवत्सा, क्ररा, मूख, दुष्ट आ- चरणवाली, पारिभष्ट, यह फळ आहूं नक्षत्रमें प्रथमरजस्वला होनेक है ।। ८ ।। पतिभक्ता पुत्रवती परसंतानमोदिनी ॥ कलाचारानुरक्ता या दितिभे प्रथमार्तवा ॥ ९ ॥ पतिमें भक्ति रखनेवाली, पुत्रवती, पराई संतानको भी आनंद देनेवाली, सबकलाओंवाली, प्रियहितमें रहनेवाली यह फल पुनर्वसु नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला होनेका है ॥ ९ ॥ (११४) नारदसंहिता । K पतिप्रिया पुत्रवती मानभोवती शुभा । सुकर्मनिरता दक्षा तिष्यर्थं प्रथमार्तवा ॥ १० ॥ पतिसे प्यार रखनेवी, पुत्रवतीमान ओगघालीशुरुंदर केर्भ में . तत्पर रहनेवाली, चतुर यह फ़छ पुष्य नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला होनेक है ।। १० ।।। परभर्तुरता प्रेष्या कोपिनी निर्गुणलला ॥ वृषवादी च दुष्पुत्रा भौजंगे प्रथमार्तवा ॥ ११ ॥ ज़ो स्त्र पहली बार आश्लेषा नक्षत्रमें रजस्वला होय वह परपुरु घुसे रमण करनेवाली, दाप्ती, क्रोधवाली , यारहित,आलस्यसहित, झूठ बोळनेवाली, दुष्ट संतानवाली होती है । । ११ ।। । निर्देष्या रोगसंयुक्ता सर्वदाज्ञा च लोलुपा ॥ पितृवेश्मरता मान्या पैतृभे प्रथमार्तवा ॥ १२ ॥ वैररहित, रोगघ्री, सदा अज्ञानवाली, लोभसे संयुक्त, पिताके घरमें मोहरखनेवाली मानवती यह फल मघा नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला होनेका है ॥ १२ ॥ परकार्यरता दीना दुष्पुत्रा कृशभागिनी ॥ मलिनी कर्कशा कुछ भाग्यभे प्रथमाओवा ॥ १३ ॥ पराये काममें रत, चीनदुष्टपुत्रोंवाली, क्लेशभागिनी, मलिन, कर्कशा, क्रोधबली यह फल पूर्वफल्गनीमें प्रथम रजस्वला होने क् है ।। १ ३ ॥ प्रजावती धर्मरता निवैरा मित्रपूजिता । सती मित्रगृहे सत्र्यमझे तु रजस्वला ॥ १४ ॥ N१ भाषाढीस०-अ० १५. ( ११५ ) संतानघी, धर्ममें तत्पर, वैररहित, सम्बर्धमित्रजनोंसे पूजित, पतिव्रत, यार दोिघलक घरमें आस यह फल प्रथम उत्तराफा- ल्गुनीमें रजस्वला होनेका है ॥ १४ ॥ निर्देष्या भूरिविभवा पुत्राव्या भोगभोगिनी ॥ प्रधाना दानकुशला हस्तकें प्रथमार्तवा ॥ १४॥ । वैररहित, बहुत ऐश्वर्युवा, पुत्रोंघी, ओमॅको भोगनेवाली, मुख्य, दानकर नेमें निपुण, ऐसी घी प्रथम हस्तनक्षत्रमें रजस्वला होनेवाली होती है । १५ ॥ चित्रकर्मा भोगिनी च कुशला क्रयविक्रये ॥ विकीर्णकामा सुलक्ष्णा त्वाष्ट्रभे प्रथमाओवा ॥ १३६ ॥ विचित्र काम करनेवाली, भोग भागनेवाली, खरीदने बेचनेके व्यवहारमें चतुर, विस्तृत कोमवाळी, सुंदर चतुर ऐसी स्त्री चित्रा नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला होनेसे होती है ॥ १६ ॥ बहुवित्तवती न स्यात्कुशला शिल्पकर्मणि । पुत्रपुत्रवती साध्वी वायुभे प्रथमार्तवा ॥ १७ ॥ स्वाति नक्षत्रमें प्रथम रजस्वला होय तो बहुत धनवाली नहीं हो • और शिल्पकर्ममें चतुर पुत्र पेत्रोंघाली तथा पतिव्रता होती है ।। १७ ।। । नीचकर्मरता दुष्टा परसक्ता परप्रिया । विपुत्र मलिना क्रुद्ध द्विदैवे प्रथमार्तवा ॥ १८॥ नीचकर्ममें रत, दुष्टा, परसक्ता, परप्रिया, पुत्ररहित, मलिनी, क्रोधिनी एंसी विशाखा नक्षत्रमें जाननी ॥ १८ ॥ A (११६) नारदसंहिता । स्वामिपक्षार्चिता सौख्यगुणैः सम्यग्विभूषिता ॥ सुपुत्रा शुभदा कांता मित्रर्थे प्रथमाएँखा ॥ १९ ॥ पातिके कुछसे पूजित, सुखदायक गुणोंकरके विभषित, सुंदर पुत्र पतिवाली यह अनुराधा नक्षत्रका फल जानना ॥ १९ ॥ दुश्चरित्ररता क्लेशिन्यार्ता पुंश्चली व्यसुः ॥ दुःसंतानवती ज्येष्ठा नक्षत्रे प्रथमार्तवा ॥ २० ॥ दुष्ट चरित्रमें रत, दुःखी, पैराकी बीमारीवाली, व्यभिचारिणी, बलरहित, दुष्ट संतानवाली, ऐसी स्त्री प्रथम ज्येष्ठा नक्षत्रमें रजस्वला होनेते होती है ॥ २० ॥ संतानार्थगुणैरन्यैर्युक्तान्यक्कृशमोचिनी ॥ स्वकर्मनिरता नित्यं मूलभे प्रथमात्र्तवा ॥ २१ ॥ संतान धन गुणसे युक्त तथा अन्य गुणोंसे युक्त, और अन्य जनके दुःखको दूर करनेवाली, अपने कर्ममें तत्पर, यह मूल नक्ष त्रका फल जानना ॥ २१ ।। प्रच्छन्नपापा दुष्पुत्रा प्राणिहिंसनतत्परा । अजस्रव्यसनासक्त तोयभे प्रथमातेवा ॥ २२ ॥ गुप्त पाप करनेवाली, दुष्ट संतानवाली, प्राणियोंकी हिंसा करने वाली, निरंतर व्यसनमें आसक्त, ऐसी स्त्री पूर्वाषाढमें प्रथम रजस्वला हानेसे होतीहै ॥ २२ ॥ कार्याकार्येषु कुशला सदा धर्मानुवर्तिनी ॥ गुणाश्रया भोगवती विश्वभे प्रथमाओवा ॥ २३ ॥ K+ भाषाटीकास ०-अ० १५. .(११७ ) १ कार्य अकार्यंमें निपुण, सदा धर्ममें रहनेवाली, गुणोंकी खानि, ऑगवती यह उत्तराषाढका फल है ॥ २३ ॥ धनधान्यवती भोगपुत्रपौत्रसमन्विता ।। कुलानुमोदिनी मान्या विष्णुभे प्रथमार्तया ॥ २४ ॥ धन धान्यवती, ओोग पुत्र पैौत्र इन्होंके सुखवाली, कुटको प्रसन्न रखनेवाली, मान्य यह फल श्रवण नक्षत्रका है ॥ २४ ॥ पुत्रपौत्रान्विता भोगधनधान्यवती सती। स्वकर्मनिरता मान्या वसुभे प्रथमार्तवा ॥ २९॥ पुत्र पौत्रोंवाली, ओग धन धान्यवाली, अपने कार्यमें निपुण, मान्य यह फल धानिष्ठा नक्षत्रका है ।। २५ ।। बहुपुत्र धनवती स्वकर्मनिरता सती ॥ कुलानुमोदिनी मान्या वारुणे प्रथमार्तवा॥ २६ ॥ बहुत पुत्रोंवाली, धनवती, अपने काममें निपुण, पतिव्रता, कुलको प्रसन्न करनेवाली, मययह फल प्रथम शतभिषा नक्षत्रमें रजस्वला होनेका है ॥ २६ ॥ बंधकी बंधुविद्वेष्या नित्यं दुष्टरता खला । शिल्पकार्येषु कुशलाऽज्ञांत्रिम प्रथमार्तवा ॥ २७ ॥ व्यभिचारिणी, बंधुओंसे विवेष करनेवाली, हमेशः दुष्टज नोंमें रत, दुष्टं, शिल्पकार्थमें निपुण यह फल पूर्वाभङ्गपदमें जनने ॥ २७॥ आब्या पुत्रवती मान्या सुप्रसन्ना पतिप्रिया ।। बंधुपूज्या धर्मवत्यहिउँथ्ये प्रथमार्तवा ॥ २८ ॥ (११८) नारदसंहिता । धनाब्या, पुत्रवती, मान्या, सुंदर प्रसन, पतिसे प्यार रखनेवाडी, बंधुओंसे पूज्या, धर्मवाली यह उत्तराभाद्रपदक फल है ॥ २८ ॥ दृढव्रता धर्मवती पुत्रसौख्यार्थसंयुता ॥ विशाखागुणसंपन्ना पौष्णभे प्रथमतया ॥ २९ ॥ आर जो स्त्री प्रथम रेवती नक्षत्रमें रजस्वला हो वह दृढत्र तवाडी, धर्मवती, पुत्र धन सुख इन्होंसे युक्त और विशाखा नक्षत्रमें कंठेहुये गुणसे युक्त होती है ॥ २९ ॥ कुलीरवृषचापांत्ययुक्कन्यातुलाधराः ॥ राशयः शुभदा ज्ञेया नारीणां प्रथमार्तवे ॥ ३० ॥ स्त्रियोंके प्रथम रजस्वला होनेमें कर्क, वृष, धन मीन, मिथुन, कन्या, तुला ये राशि अर्थात् लश शुभ कहे हैं.॥ ३० ॥ तिथ्यसँवारार्निद्यश्चेत्कर्म न कारयेत् । दोषाधिक्ये गुणाल्पत्वे तथापि न च कारयेत् ॥ ३१ ॥ जो तिथिवार नक्षत्र निंदित होवें और दोष अधिक तथा गुण अल्प होवें तो अभिषेक कर्म नहीं करना चाहिये ॥ ३३ ॥ दोषारुपत्वे गुणाधिक्ये सेककर्म समापयेत् । निंद्यज्ञे तिथिघोरेषु यत्र पुष्पं प्रदृश्यते ।। ३२ ॥ तत्र शांतिः प्रकर्तव्या चूतदूर्वातिलाक्षतैः । प्रत्येकमष्टशतं च गायत्र्या जुहुयात्ततः ॥ ३३ ॥ और दोष थोडेह गुण अधिक होवें तब - अभिषेक कर्म करना चाहिये। निंदित नक्षत्र और निंदित तिथि वार होवें तो घृत, आषाढीकास०-अ० १६. (११९) दूब, तिल, अक्षत इन्हों करके अष्टोत्तरशत १०८गायत्री मंत्र होम करे औरपहिले जपकरवाके शांति करे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ स्वर्णगोतिलान्दद्यात्सर्वदोषापनुत्तये । भर्ता तस्यापि गमनं वर्जयेद्रक्तदर्शनात् ॥ ३४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां प्रथमार्तवाध्यायः पञ्चदशः१३ सुवर्ण, गौं, भूमि, तिल इन्होंका दान करे तब सब दोष शांत होते हैं । रजस्वला होवे तव तिसके पतिने भी स्त्रीत्याग करना चाहिये ।। ३४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां प्रथमार्नेवाध्यायः पंचदशः ।। १५ ।। ace:Pages रजोदर्शनतोऽस्पृष्टा नार्यो दिनचतुष्टयम् । ततः शुद्धक्रियावैताः सर्ववर्णेष्वयं विधिः॥ १ ॥ रजश्वला होनेके बाद चार दिन स्त्री स्पर्श करने योग्य नहीं रहतीहै फिर शुद्ध होतीहै सब वर्णा में यही विधिहै ॥ १॥ ओजराश्यंशगे चंद्रे लग्ने पुंग्रहवीक्षिते ॥ उपवीती युग्मतिथौ सुस्नातां कामयोस्त्रियम् ॥ २ ॥ चंद्रमा, मेष, मिथुन आदि विषमराशिके नवांशकमें स्थितहो। ओर लय भी विषम राशिके नवांशकमें स्थित हो और पुरुष ग्रहोंकी दृष्टिसे युक्त हो तब युग्मतिथि विषे शुद्धनान करचुकी हुई स्त्रीको सत्रय हुआ पुरुष प्राप्त होवै ॥ २ ।। ( १२० ) नारदसंहिता । पुत्रार्थं पुरुषं त्यक्वा पौष्णमूलाहिंपैतृभम् ॥ युग्मभेषु शशांके च लग्नेऽस्त्रीग्रहवीक्षिते ॥ ३ ॥ और पुत्रकी इच्छावाली स्त्री रेवती, मूळ, आश्लेषा, मघा इन नक्षत्रोंमें तथा युग्म राशिपर चंद्रमा होवे और लुन स्त्रीग्रहोंकरके दृष्ट होय तव पतिसंग त्याग देवे ।। ३ ।। अयुग्मे दिवसे भार्यां कन्यार्थी कामयेत्पतिः ॥ निवजानामिमे योगाः सर्वदा निष्फलप्रदाः ॥ ४ ॥ और रजस्वलाके दिनसे विषम दिनोंमें खीको प्राप्त हो त कन्याजन्म हो ये सत्र योग निचज पुरुषोंके हैं सदा निष्फल हैं अर्थात् इनमें श्रीसंग करनेसे पुत्री संतान नहीं होसी ॥ ४ ।। ऍग्रहाः सूर्यभौमार्याः स्त्रीग्रहौ शशिभार्गवौ ॥ नपुंसकौ सौम्यसौरी शिरोमात्रं विधृतुः ॥९॥ इति श्रीनारदसंहितायामाधानाध्यायः षोडशः ॥ १६॥ सूर्य, मंगल, गुरु ये पुरुष ग्रह हैं । चंद्रमा, शुक्र ग्रह हैं । बुध शनि नपुंसक हैं राहुका शिरमात्र नपुंसक है ।। ५॥ इति श्रीनरदीयसंहिताभाषाटीकायामा- धानाध्यायः षोडशः ।। १६ ।। प्रसिद्धविषमे गर्भ तृतीये वाथ मासि च । कुर्यात्पुंसवनं कर्म सीमंतं च यथा तथा ॥ १ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां पुंसवनाध्यायः सप्तदश॥१७॥ भाषाटीकास ०-अ० १३८. (१२१ ) गर्भसे विषम मासम अथवा तीसरे महीनेमें पुंसवनकर्म तथा सीमंतकर्म करना चाहिये ।। १ ॥ इति श्रीनारदीयसांहिताभाषाकयां पुंसवनाध्यायः सप्तदशः ३७ चतुर्थे मासि षष्ठे वाप्यष्टमे वा तदीश्वरे । बलसंपन्नदंपत्योर्युद्धताराबलान्विते ॥ १॥ चौथे महीनेमें, अथवा छठे महीनेमें, तथा आठवें महीनेमें अष्टम मासपति ग्रह बलयुक्त होय और स्त्रीपुरुषको चंद्रताराका पर्ण बल होय तव ।। ३ ।। अरिक्तानपर्वदिवसे कुजजीवार्कवासरे ॥ तीक्ष्णमिश्रेण्वर्केषु पुंसंज्ञभांशके शशी ॥ २ ॥ रिक्त, अमावस्या, पूर्णिमा, मंगल, बृहस्पति, रवि, तीक्ष्ण, मिश्र, उग्रं इन संज्ञाओंवाले नक्षत्र, इन सबको वर्जकर पुरुषसंज्ञक राशि के नबंशकपर चंद्रमा स्थित होय ॥ २ ॥ शुद्धेऽष्टमे जन्मलग्नात्तयोर्लग्नेन नैधने ॥ शुभग्रहयुते दृष्टे पापखेटयुतेक्षिते ॥ ३ ॥ लुनी तथा अष्टमस्थानकी शुद्धि होवे इन दोनों स्थानोंपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो और पापग्रहोंकी दृष्टि नहीं होवे ।। ३ ।। मासेष्टके चतुर्भिर्वा दृऐकें बीजपूरकैः । स्त्रीणां तु प्रथमे गर्भ सीमंतोन्नयनं शुभम् ॥ ४ ॥ आठवां महीना हो तथा बलवीर्यको पूर्ण करनेवाले चार ग्रहों करके सूर्यं दृष्ट होवे तब खियोंका प्रथम गर्भविषं सीमंतों वरना शुभ है ।। ४ ॥ A (११२ ) नारदसंहिता । शुभग्रहेषु धीधर्मकेंद्रेष्वरिभवे त्रिषु । पापेषु सत्सु चंद्रेयनिधनाबारिवर्जिते ।। ३॥ शुभग्रह पांचवें, नवंमें तथा केंद्रस्थानमें होवें और पापग्रह छठे, ग्यारहवें, तीसरे क्षेत्रं तव और बारहवें, आठवें लशमें चंद्रमा नहीं हो तब सीमंतकर्म करना चाहिये ।। ५ ।। क्ररग्रहाणामेकोपि लग्नादैत्यात्मजाष्टः । सीमंतिनीनां सङ्कर्ये बली हंति न संशयः ॥ ६॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां सीमंतोन्नयनाध्यायोऽष्टादशः १८ और क्रूरग्रहोंके मध्यमें एक भी यह लग्नसे बारहवें, पांचवें, आठवें स्थान होय तो खियोंका उत्तम गईंको नष्ट करता है वह ग्रह बली है इसमें संदेह नहीं ।। ६ ।। इति श्रीनारदीयसंहिताभाषीथ सीमंतो नयनाध्योऽष्टदशः ।। १८ ।। अथ जातकर्म । तस्मिञ्जन्ममुहूर्तेषि सूतकांतेपि वा शिशोः ॥ जातकर्म प्रकर्तव्यं पितृपूजनपूर्वकम् ॥ १॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां जातक्ॐओध्याय एकोन विंशतितमः ॥ १९ ॥ बाळकका जन्म हो उसी घडी अथवा सूतककेअंत में पितरोंका पूजनकर (नदीमुखाद्धकर ) जातकर्म करना चाहिये ॥ १ ॥ । इति श्रीनारदीयसंहिताभाषा ०जातकर्माध्याय एकोनविंशतितमः १९ • • भाषाटकास ०-अ० २०, (१२३ ) सूतकांते नामकर्म विधेयं स्वकुलोचितम् ॥ नमपूर्व प्रशस्तं स्यान्मंगलैश्च शुभाक्षरैः ॥ १ ॥ सूतकके अंतमें अपने कळके योग्य नामकर्म करना चाहिये और नामके आदिमें शुभमंगलीक अक्षर हो वह नाम श्रेष्ठ कहा है। । ३ ॥ देशकालोपयाताधैः कालातिक्रमणं यादि॥ अनस्तगे भृगावीज्ये तत्कार्यं चोत्तरायणे ॥ २ ॥ देशकालाकी व्यवस्थाके अतिक्रमणले सूतकके अंतमें बारहवें दिन नामकरण नहीं होसके तो गुरु शुक्रका अस्त नहीं हो और उत्तरायण सूये हो । २ । चरस्थिरमृदुक्षिप्रनक्षत्रे शुभवासरे ॥ चंद्रताराबलोपेते दिवसे च शिशोः पिता ॥ ३ ॥ चर, स्थिर, मृदु, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र हो शुभ बार होवे और चंद्रमा तथा तारा बलसे युक्त दिन हो तब बाळकका पिता ।।३।। शुभलग्ने शुभांशे च नैधने शुदिसंयुते ॥ लग्नत्यनैधने सौम्ये संयुते वा निरीक्षिते ॥ ४ ॥ इति श्रीनार०संहिताय नामकरणाध्यायोऽविंशतितमः २ शुत लममेंशुभ राशीिके नवांशकमें अष्टम स्थान शुद्ध होय औ लग्न, द्वादश, अष्टमस्थानमें शुभग्रह स्थितह अथवा शुभग्रहोंकी दृष्टि हो तब नामकरण कर्म करना योग्य है ।। ४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषा०नामकरणाध्यायो विंशतितमः २०॥ ॐ A नष्ट करने लिए K १२४ ) नारदसंहिता । अथ नखान्नप्राशनम् । षष्ठमास्यष्टमे वापि पुंसां स्त्रीणां तु पंचमे । सप्तमे मासि वा कार्यं नवान्नप्राशनं शुभम् ॥ १ ॥ छठे महीनेमें अथवा आठवें महीनेमें पुरुषको ( पुत्रोंको ) प्रथम अन्न खिळाना प्रारंभ करें और कन्याओंको प्रथम, पांचवें तथ सातवें महीनेमें अन्न खिलाना चाहिये ।। १ ॥ रिक्तां दिनक्षयं नंदां द्वादशीमष्टमीममाम् । त्यवान्यतिथयः श्रेष्ठाः प्राशने शुभवासरे ॥ २॥ रिक्तातिथि, तिथिक्षय, नंदातिथि, द्वादशी, अष्टमी, अमावस्या इनको त्यागकर अन्यतिथि और शुभवार अन्न प्राशनमें शुभ दायक हैं ।। २ ।। चरस्थिरमृदुक्षिप्रनक्षत्रे शुभनैधने ॥ दशमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके ॥ ३ ॥ चर, स्थिर, मृदु, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रोंमें और लऐसे अष्टमस्थान तथा दशमस्थानकी शुद्धि होनेम शुभळम आर शुभराशिका नवां- भक होनेमें । ३ ॥ पूर्वा सौम्यखेटेन संयुक्ते वीक्षितेपि वा । त्रिषष्टलाभगैः क्रूरैः केंद्रधीधर्मगैः शुभैः ॥ ६ ॥ पूर्वाह ( दुपहरा पहिला ) ठग्न शुभग्रहसे दृष्ट हो अथवा युक्त ५ ३।६। ११ इन स्थानोंमें फेरब्रह होवें और कें, पंचव, वमें स्थानमें शुभश्र हों तव ॥ ५ ॥ R = आशटीकास०-अ० २२. ( १२५ } ययारिनिधनस्थेन चंद्रण प्राशनं शुभम् । अन्नप्राशनललस्थे क्षीणेदौ वास्तनीचगे ॥ ९ ॥ और १२ । ६ । ८ इन स्थानोंमें चंद्रमा नहीं होवे तब अक्षा शन शुभ है और उनमें क्षीण चंद्रमा नहीं हो चंद्रमा अस्त नहीं हो तथा नचिका नहीं हो ॥ ५॥ नित्यं भोज्ञश्च दारिचं रिष्फषष्ठाष्टगोप वा ॥ ६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायामन्नप्राशनाध्याय एकविंशातितमः ॥ २१ ॥ जो १२ । ६ । ८ इन स्थानोंमें चंद्रमा हो एसे लनमें अन अशन कराया जाय तो भोजन करनेवाला जन दरिद्री हो ॥ ६ ॥ इति श्रीनारदीयहिताभाषाटीकायामवमाना ध्याय एकविंशतितमः ॥ २१ ।। अथ चौलकर्म । तृतीये पंचमाब्द वा स्वकुलाचारतोपि वा । बालानां जन्मतः कार्यं चौलमावत्सरत्रयात् ॥ १ ॥ तीसरे वा पांचवें वर्षमें अथवा अपने कुळाचारके अनुसार बालकोंका चौलकर्म ( बालउतराने चाहियें ) शुभ है। विशेष करके तीन वर्षका बालक हुए पहिले करना ।। १ ।। सौम्यायनेनास्तगोसुरासुर्मंत्रिणः॥ अपवरिक्ततिथिषु शुक्रे ज्ञे ज्येंदुवासरे ॥ २ ॥ ( १२६ ) नारदसहित । उत्तरायण सूर्य हो, गुरु शुत्रका अस्त नहीं हो पूर्णमासी, रिक्ता तिथि इनको त्याग दे शुक्र, बुध, बृहस्पति, चंवार ये शुभहैं ।। २ ।। दूस्रादितीज्यचंद्रपूषाभानि शुभान्यतः ॥ चौलकर्माणि हस्तचैत्रीणिनीणि च विष्णुभात् ॥ ३॥ पट्टबंधनचौलन्नप्राशले बोपनायने । शुभदं जन्मनक्षत्रमशुभं त्वन्यकमणि ॥ ४ ॥ अविनी, पुनर्वसु, पुष्य, मृगशिर,ज्येष्ठारेवती ये नक्षत्र शुभ हैं और चौलकर्ममें हस्त नक्षत्रश्ने तीन नक्षत्र अथवा श्रवणसे तीन नक्षत्रों तक जन्मनक्षत्र होय तो चैौल कर्म, पट्टबंधन, अन्नप्राशन, उपनयन कर्म इनमें शुभदायक है अन्यतममें जन्मनक्षत्र अशुभ जानना ।। ३ ॥ ४ ॥ अष्टमे शुद्धिसंयुते शुभलग्ने शुभांशके । न नैधने भे शीतांशी षष्ठेन्ये तु विवर्जयेत् ॥ ६ ॥ शुभरून शुरु नाशक अष्टमस्थान शुद्ध अर्थात् ८वें स्थानमें कोई यह नहीं हो और ६ । ८ ५ १२ चंद्रमा नहीं हो ।। ५॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैय्यायारिगैः परैः । अभ्यक्ते संध्ययोनीते निशि भोक्तुर्न चाहवे ॥ ६ ॥ शुभग्रह २ । ९ । ५।१। ४। ७ । १ ० इन घरोंमें हों और क्रूर यह ३ । ११ । ६ घरोंमें से तय तेल आदिकी मालिश करके क्षौरकर्म कराना शुभ है तथा संध्यासमय, ओज नका अंत, शत्रि, युद्ध इन्होंमें शौर नहीं कराना ॥ ६ ॥ भाषाटीकास ०-अ० २३. (१२७ ) नोकटे भूषिते नैव न याने नवमेदिं च ॥ क्षौरकर्म महीशानां पंचमेपंचमेहनि ॥ ७ ॥ कत्तव्यं क्षरनक्षत्रे दृश्यस्योदयेऽष्टम् ।। । नृपविभाज्ञया यज्ञे मरणे बंदिमोक्षणे ।। उद्वाहेखिलबारलँतिथिषु क्षौरमिष्टदम् ॥ ८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां चौलाध्यायो द्वाविंशतितमः२२॥ अत्यंत विकराल होकर आभूषण धारणकरके तथा सवारीपर बैठके क्षौर नहीं । कराना राजाओंने नवमें २ दिन तथा पांचवें२दिन भी और नहीं करना चाहिये । क्षौर करानेके योग्य नक्षत्रोंमें क्षौर करना और मांगलीक जन्तोत्सवादिकमें कराना, राजा तथा बालणकी आज्ञासे, यज्ञ, मरण, केदसे छूटना, विवह इन्हविषे संपूर्ण तिथि द्वारोंमें क्षौर करावे कुछ मुहूर्ते नहीं देखे । ७ । ८ ॥ । इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां चौलाध्यायो द्वाविंशतितमः ॥ २२ ॥ ९ कर्तव्यं मंगलेष्वाद मंगलेष्वंकुरार्पणम् । नवमे सप्तमे मासि पंचमे दिवसेपि वा ॥ १ ॥ मंगल कर्मों में पहिले दूव आदि मंगलांकुर अर्पण करने चाहियें नघममें अथवा सातवां महीनेमें अथवा पांचवें दिन ॥ । १ ।। तृतीये बीजनक्षत्रे शुभवारे शुभोदये ॥ सयइष्य लीय वितानध्वजतोरणैः ॥ २ ॥ (१२८) नारदसंहिता । तथा तीसरे महीनेमें गर्भाधानके नक्षत्रविषे शुभवार औरशुभनक्षत्र विषे अच्छे ळभविषे अच्छे प्रकारसे घरोंको मंडप, ध्वजा, तोरण आदिकोंते विभूषितकर ॥ -२ ।। आशिषो वाचनं कार्यं पुण्यं पण्यांगनादिभिः । महावादित्रनृत्याचैर्गता प्रागुत्तरां दिशम् ॥ ३ ॥ स्वस्तिवाचन करखाना, सौभाग्यवती स्त्रियोंसे अच्छे प्रकार मंगल गायन करखाना, महान् बाजे नृत्यआदिकोंकी शोभासे युक्त होकर ईशान कोणमें जावे ।। ३ ॥ तत्र मृसिकतां श्लक्ष्णां गृहीत्वा पुनरागतः । मृन्मयेष्घथवा वैणवेषु पात्रेषु पूरयेत् ॥ अनेकबीजसंयुक्तं तेयं पुष्पोपशोभितम् ॥ ४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां मंगलांकुरार्पणं नामाध्याय • त्रयोविंशतितमः ॥ २३ ॥ तहांसे बलूरेतको लाकर मृत्तिकाके पात्रमें अथवा बांस आदिके पात्रोंमें भरदेना चाहिये फिर तिसमें सब प्रकारके बीजको बोवे और जल छिडक देवे तथा सुंदर पुष्प डालकर शोभित करदेवे ॥ । ४ ।। इति श्रीनारदीयसंहिताज्ञाषाटीकायां मंगलांकुरार्पणं नामाध्यायस्रयोविंशतितमः ॥ २३ ॥ आधानादष्टमे वर्षे जन्मतो वाग्रजन्मनाम् ॥ राज्ञामेकादशे मौंजीबंधनं द्वादशे विशाम् ॥ १ ॥ १ मयाटीन - अ० २४. (-१२९ ) गर्भाधानसे आठवें वर्षों अथवा जन्मसे आठवें वर्ष चालण को उपनयन कर्म कराना और क्षत्रियोंके ग्यारहवें वर्षमें, वैश्योंके बारहवें वर्षमें यज्ञोपवीत संस्कार कराना चाहिये ।। १ ।। आजनेः पंचमे वर्षे वेदशास्त्रविशारदः। उपनीतो यतः श्रीमान् कार्यं तत्रोपनायनम् ॥ २ जो बालण वेदशास्त्रमें निपुण होनेकी इच्छा करे वह जन्मने पांचवेंही वर्षमें उपनयन संस्कार करखावे क्योंकि, पांचवें वर्षमें संस्कार करानेवाला द्विज श्रीमान् वेदपाठी होता है । २ । बालस्य बलहीनोपि शत्या जीवो बलप्रदः॥ यथोक्तवत्सरे कार्यमनुक्तेनोपनायनम् ॥ ३ ॥ बाळकके बलहीन भी वृहस्पति शांति करवानेसे बलदायक होजाता है यथोक्ल वर्षमें यज्ञोपवीत कराना। अनुक्तः कालमें यज्ञो प्रवत नहीं कराना ।। ३ ।। दृश्यमाने गुरौ शुके दिनेशे चोत्तरायणे ।। वेदानामधिपा जीवशुक्रभौमबुधाः क्रमात् ॥ ४ ॥ वृहपति तथा शुक्रका उदय हो सूर्य उत्तरायण हो तब उपन यन करावे । बृहसति, शुक्र, मंगल, बुध ये ग्रह क्रमसे क, यज्ञ, साम, अथर्व इनके अधिपति हैं । ४ । शरीष्मवसंतेषु व्युत्क्रमात्तु द्विजन्मनाम् ॥ मुख्यं साधारणं तेषां तपोमासादि पंचसु ॥ ८॥ ( ३३०) नारदसंहिता । शरद्, भीष्मवसंत इन अतुओंमें यथाक्रमसे द्विजातियोंने यज्ञोपवीत संस्कार कराना योग्य है ये अतु मुख्य हैं और साधारण ता करके सब ही द्विजातियोंको माघ आदि पांच महीनोंमें यज्ञोपवीत संस्कार करवाना । ५ ।। स्वकुलाचारधर्मज्ञो माघमासे तु फाल्गुने ॥ विधिज्ञ ह्यर्थवांश्चैत्रे वेदवेदांगपारगः ॥ ६ ॥ धर्मज्ञ पुरुष अपने कुळाचारके अनुसार माघ महीनेमें उपनयन करखानेवाला होता है । फाल्गुनमें यज्ञोपवीत संस्कार करावे तो विधिको जाननेवाला धनाढय होवे, चैत्रमें वेदवेदांगको जाननेवाला पण्डितहो ॥ ६ ॥ वैशाखे धनवान्वेदशास्त्राविद्यविशारदः। उपनीतो बलाब्यश्च ज्येष्ठे विधिविदांवरः ॥ ७ ॥ वैशाखमें धनवान् वेदशास्त्रको जाननेवाला पंडित हो, ज्येष्ठमें यज्ञोपवीत कराने बछवान् तथा सब विधियोंको जाननेवाला होता है । ७ ।। शुक्रुपदो द्वितीया च तृतीया पंचमी तथा ॥ त्रयोदशी च दशमी सप्तमी व्रतबंधने ॥ ८ ॥ श्रेष्ठा त्वेकादशी षष्ठी द्वादश्येतास्तु मध्यमाः ॥ एका चतुर्थ संत्याज्या कृष्णपक्षे च मध्यमा ॥ ९ ॥ आपंचम्यास्तु तिथयेः पराः स्युरतिनिंदिताः । श्रेष्ठान्यर्कत्रयांत्येज्यरुद्रादित्युत्तराणि च ॥ १० ॥ आष्टीक्स ०-अ० २४. ( १३१ ) शुक्लपक्षमें द्वितीया, तृतीया, पंचमी, त्रयोदशी, दशमी, सप्तमी ये तिथि यज्ञोपवीत करानेमें शुभ कही हैं और एकादशी षष्ठी, द्वादशी, ये मध्यमातिथि कही हैं। कृष्णपक्षमें एक चतुर्थी तो यज्य है और तिथि पंचमीतक मध्यम हैं । पंचमीसे आगे अन्य तिथि अत्यंत निंदित जाननी । हस्त आदि तीन नक्षत्र रेवती, पुष्य, आद्र, पुनर्बसु तीनों उत्तरा ॥ ८ ॥ ९ ॥ १० ॥ विष्णुत्रयाश्वमित्राजयोनिभान्युपनायने । जन्मभाद्दशमं कर्म संघाती च षोडशम् ॥ ११ ॥ श्रवण आदि तीन नक्षत्र, अश्विनी, अनुराधा, पूर्वाभाद्रपदा ये नक्षत्र उपनयन संस्कारमें शुभ कहे हैं। जन्म नक्षत्र दशव व सो लहवाँ नक्षत्र कर्मसंघात अक्ष कहा है । ३१ । अष्टादशं सामुदायं त्रयोविंशं विनाशनम् ॥ मानसं पंचविंशी नाचरेच्छुभमेव तु ॥ १२ ॥ अठारहवाँ नक्षत्र सामुदाय है, ब्रेईसवाँ विनशन है, पचीसवाँ नक्षत्र मलस संज्ञक है इन नक्षत्रोंमें किंचित् भी शुभकमें नहीं करना चहिये ॥ १२ ॥ आचार्यसौम्यकाव्यानां वाराः शस्ताः शशीनयोः ॥ वारौ तौ मध्यफलदावितरौ निंदितौ व्रते ॥ १३ ॥ गुरु, बुध, शुक्र ये वार शुदायक हैं, चंदं, रविवार मध्यम हैं अन्य चार उपनयन संस्कारमें निंदित कहे हैं ॥ १३ ॥ त्रिधा विभज्य दिवसं तत्रादौ कर्म दैविकम् ॥ द्वितीये मानुषं कार्यं तृतीयांशे च पैतृकम् ॥ १४ ॥ । । (१३२) नारदसंहिता । - का दिनमानके तीन विभागकरके तहँ पहिले आपमें देवकुमं, दूसरे विगमें मानुषकर्म,तीसरे विभागमें पितृकर्म करना योग्य है।।।। स्वनीचगे तदंशे वा स्वारिभे वा तदंशके | गुरौ भृगौ च शाखेशे कुलशीलविवर्जितः ॥ १९ ॥ स्वाधिशत्रुर्हस्थे वा तदंशस्थेथवा व्रती । शाखेशे वा गुरौ शुक्रे महाघातककृद्भवेत् ।। १६ ॥ । वृहक्षति, व शुक्र तथा शाखेश अर्थात् ऋग्वेद आदिकोंके अधिपति बृहस्पति आदि ४ वार कहे हैं उनमेंसे जिप्त वेदक भत हो वही शखेश है जैसे वेदियोंका गुरु,यजुर्वेदियोंका शुक्र सामवेदियोंका मंगल, अथर्ववेदियोंका बुध जानना ऐसे इन ग्रहोंमेंसे यथाक्रमसे अपनी नीचराशिपर हो वा नीचांश अथवा शत्रुके बरमें वा शत्रुराशिके नवांशकमें हो तब उपयनसंस्कार करावे ते अपने पूर्ण शत्रुके घरमें स्थित अथवा शत्रुकी राशिके नवांशकमें स्थित शाखेश तथा भृङ, शु होय तब उपनयन कराये तो म्हघात पुरुष हो ॥ १५ ।। १६ ।। स्वोच्चसंस्थे तदंशे वा स्वराशौ राशिगे गणे । शाखेशे वा गुरौ शुक्रे केंद्रगे वा त्रिकोणगे ॥ १७ ॥ अपनी उच्चराशिमें स्थित अथवा उच्चराशिके नवांशकमें अथवः अपनी राशिमें स्थित शाखेश होवे तथा बृहस्पति, शुक्र भी इसी प्रकार स्थित होवे अथवा ललसे केंद्रमें तथा त्रिकोणमें (९ । १ ) रु शुक्र हवे तब उपनयन ओस्कार करावे तो ॥ १७ ॥ भाटील -अ० २४. ( १ ३३ ) अतीव वलयश्चैव वेदवेदांगपारगः ॥ परमोच्चमते जीवे शाखेशेघथवा सिते ॥ १८ ॥ वती शिशुर्धनाढ्यश्च वेदशास्त्रविशारदः । मित्रराशिगते जीवे तदंशे वा स्वराशिगे ॥ १९॥ अत्यंत बलवान् वेदवेदांगके पूरको जाननेवाला पुरुष हो बृहस्पति, शुक, शाखेश इनमेसे कोई परम उच्च अंशोंमेिं प्राप्त हो तो। बती बालक धनाढ्य तथा वेदपाठी होवे बृहस्पति मित्रराशिपर हो अथवा तिसराशिके नवांशकमें हो अथवा अपनी राशिपर होय ! ३८ ॥ ३९ ॥ शुक्रे वाचार्यसंयुक्ते तदा तत्र व्रती शिशुः ॥ स्वस्वमित्रहस्थे वा तस्योच्चस्थे तदंशके ।। २० शुक्र, बृहस्पति एक राशिपर स्थित होवें तब उपनयन कराना शुक्र है बृहसति शुक्र शाखेश ये ग्रह अपने २ मित्रोंके धर्में ईस्थत हॅ अथवा मित्रग्रहकी उच्चराशिपर स्थित होवें अथवा उसरा शिके नवांशकमें स्थित होवें तय उपनयन रवावे तो विया धन धान्यसे संयुक्त होवे ॥ २० ॥ गुरौ भृगौ वा शाखेशे विद्याधनसमन्वितः । शाखाधिपतिवारश्च शाखाधिपबलं शिशोः ॥ शाखाधिपतिलग्नं च दुर्लभं त्रितयं व्रते ।। २१ ॥ शाखाधिपति ग्रहका वर, बालकको शखाधिपतिका बछ और शाखाधिपतिके राशिका टल ये तीन वस्तु उपनयन कर्ममें दुर्लभ हैं अर्थात् बड़ी उन्चम हैं ।। २१ ।। (१३४ } नारदसहित । तस्माच्छुभांशगे चंद्रे व्रती विद्याविशारदः। पापोऽष्टगे स्वांशगे वा दरिद्रो नित्यदुखितः ॥ २२ ॥ इसीलिये शुभराशिके नवांशकमें चंद्रमा हो तो वतीजन विद्यामें निपुण हो और पापग्रह अष्टमस्थानमें हो तथा अपनी राशिके नवांशकमें हो तो दरिद्री नित्य दुःखी हवे ।। २२ ।। श्रवणादितिनक्षत्रे कथंशस्थे निशाकरे । सदा व्रती वेदशास्त्रधनधान्यसमृद्धिमान् ॥ २३ ॥ अवण तथा पुष्य नक्षत्र हो, कर्क शशिके नवांशकपर चंद्रमा स्थित हो तब उपनयन संस्कार करानेवाला चालक वेदशाख धनधान्यकी समृद्धिवाला होता है ।। २३ ।। शुभलग्ने शुभांशे च नैधने शुद्धिसंयुते ॥ लग्ने वनैधने सौम्यैः संयुक्ते वा निरीक्षिते ॥ २४ ॥ शुओळच शुभराशिका नवांशक हो आठौं घर कोई लग्नमें शुभग्रह स्थित हो अथवा शुभग्रहोंकी दृष्टि हो ।। २४ ।। दृढूजीवार्कचंद्रयैः पंचभिर्बलिभिर्जुहैः । स्थानादिबलसंपूर्णश्चतुर्भिर्वा समन्वितैः ॥ २४ ॥ बृहस्पति, सूर्य, चंद्र इत्यादि पंच अहोंसे इष्ट शुस्थान होवें अथवा पंचम आदि स्थानोंमें चार बी शुग्रह स्थित होवें।२५। बॅक्षिते वा चैकविंशन्महादोषविवर्जिते । राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः ॥ २६ ॥ अथवा शुरु चार ग्रहोंसे दृष्ट लग्न होवे और २१ इक्कीस महा दोष जो ग्रंथांतरोंमें तथा इसी ग्रंथमें आगे कहे हैं । पंचागशुद्धिक भाषाटीकस ०-अ० २४. ( १३५) अभाव १ उदयास्त शुद्धिका अभाव २ सूर्य संक्रांति ३ पाष षड्वर्ग ४ गंडांत ५ कर्तुरीयोग ६ इत्यादि हैं ये नहीं होने चाहियें और शुभग्रहोंसे युक्त तथा दृष्ट संपूर्ण राशि श्रेष्ठ कही हैं ।। २६ ।। शुभा नवांशाश्च तथा गृह्यास्ते शुभराशयः । पापग्रहस्य लग्नांशः शुभेक्षितयुतोपि वा ॥ २७ ॥ और जिनमें शुभराशिके नवांशक आगये हों वे राशी ग्रहण करने योग्य शुभ हैं और पाप ग्रहके लगका नवांशक शुभग्रहसे दृष्ट तथा युक्त होय तो शुभ है । । २७ ॥ तस्माद्रोमिथुनांत्याश्च तुलाकन्यांशकाः शुभाः । एवंविधे लग्नगते नवांशे व्रतमीरितम् ॥ २८ ॥ इसलिये वृष, मिथुन, मीनतुळ, कन्या इन राशियोंके नवां शक शुभ हैं ऐसे उनमें अथवा नवांशकमें यज्ञोपवीत कराना शुभ है॥ २८ ॥ त्रिषडायगतैः पापैः षडष्टांत्यविवर्जितैः । शुभैः षष्ठाष्टलग्नत्यवर्जितेन हिमांशुना ॥ २९॥ पापग्रह ३ । ६ । ११ घरमें हों और शुभग्रह ६।८ । १२ इन घरोंमें नहीं हों और ६ । ८ लनमें चंद्रमा नहीं हो ॥ २९ स्वोच्चसंस्थोपि शीतांशुव्रतिनो यदि लग्नगः ।। तं करोति शिरौ निःस्वं सततं क्षयरोगिणम् ॥ ३० ॥ उच्चराशिका भी चंद्रमा लनमें होय तो उपनयन संस्कारवाले बालकको निरंतर दरिद्री और क्षयी रोगयुक्त करता है ।। ३० ॥ । ( ३ ३६ ) नारदसंहिता । स्फूर्जितं केंद्रगे भानौ व्रतिनो वंशनाशनम् ॥ कूजितं केंद्रगे भीमे शिष्याचार्यविनाशनम् ॥ ३१ ॥ केंद्रमें सूर्य होवे तब उपनयन संस्कार होनेसमय मेध गर्ज पडे तो वंशका नाश होताहै और मंगळ केंद्रमें होय ऐसे लयमें उपनयनसमय पक्षियोंके कूजनेका शब्द होय तो शिष्य और आचार्य का नाश हो ॥ ३१ ॥ करोति रुदितं केंद्रसंस्थे मंदेऽतुलान् गदान् ॥ लग्नात्केंद्रगते रातै रंभे मातृविनाशनम् ॥ ३२ ॥ उग्रकेंद्रगते केतौ तातवित्तविनाशनम् ॥ पंचदोपैर्युतं लग्नं शुभदं नोपनायने ॥ ३३ ॥ और केंद्रमें शनि होवे ऐसे समयमें रोनेको शब्द सुनजाय तो अत्यंत रोग हो । लभ्से केंद्रमें विशेष करके ७ में राहु होय तो माताको नष्ट करै, उप केंद्रमें केतु होय तो पिताको और धनको नष्ट करै इन पांच दोषोंसे युक्त छन् उपनयन संस्कारमें शुभ नहीं है । ३२ ॥ ३३ ॥ विना वसंतऋतुना कृष्णपक्षे गलग्रहे । अनाध्यायोपनीतश्च पुनः संस्कारमर्हति ॥ ३९ ॥ वसंततुके विना कृष्णपक्षमें तथा गळ्ग्रह योगमें उपनयन् किया जाय तो फिर संस्कार करनेके योग्यहै अर्थात इन योगमें संस्कार नहीं कराना ॥ ३४ ॥ {टीकास ०-० २५. ( ३३७ ) त्रयोदश्यादिचत्वारि सप्तम्यादिदिनत्रयम् । चतुर्थी चैकतः प्रोक्ता ह्यष्टावेते गलग्रहः ॥ ३५ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायामुपनयनाध्याय श्चतुर्विंशतितमः ॥ २४ ॥ त्रयोदशी आदि चार तिथि और सप्तमी आदि ३ दिन एक चतुर्थी ऐसे ये ८ तिथि गलग्रह योगसंज्ञक हैं । ३६ ॥ इतेि श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायामुपनयनाध्याय- श्चतुर्विंशतितमः ॥ २४ ॥ छुरिकाबंधनं वश्ये नृपाणां प्राकरशृहात् ॥ विवाहोक्तेषु मासेषु शुक्ळ्पक्षेष्यनस्तगे ॥ १ ॥ शुक्रे जीवे च भूपुत्रे चंद्रताराबलान्विते । मैौंजीबंधक्षतिथिषु कुजवर्जितवासरे ॥ २ ॥ अब छुरिकाबंधन मुहूर्नको कहते हैं । राजाओंने विवाहसे पहिले छुरिका ( कटारी ) बांधनी चाहिये सो विवाह कर्ममें कहहुए महीनोंमें और शुक्लपक्षमें तथा गुरु शुक्रके उद्यमें और मंगलके उदयमें और चंद्धमा तथा ताराका बल होय, यज्ञोपवीतमें हे हुए नक्षत्र तिथि वार हों, मंगल विना अन्यचार होवें॥१॥२ तेषां लग्नोदये कर्तुरष्टमोदयवर्जिते ॥ शुद्धेऽष्टमे विथैौ लग्नात्षडष्टांत्यविवर्जिते ॥ ३ ॥ (१३८) नारदसंहिता है तिन शुस ग्रहोंकी राशिक लभ हो और कत्र्ताकी जन्भराशिसे आठवें कोई ग्रह नहीं हो तथा वर्तमान लअसे आठवें कोई ग्रह नहीं हो लग्नसे ६।८। १२ इन घरोंमें चंद्रमा नहीं हो। ३ ।। धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैय्यायारिगैः परैः छुरिकाबंधनं कार्यमर्चयित्वामरान्पितृन् ॥ ४ ॥ धन, त्रिकोण (९ । ५ ) केंद्र इन स्थानोंमें शुभ ग्रह होवें और ३ । ११ । ६ इनमें चूप ग्रह होवे ऐसे मुहूर्तमें देवता तथा पितरोंका पूजन कर छुरिकाबंधन (कटारी बांधनां )भ है ।। ४ ॥ अर्चयेच्छुरिकां सम्यग्देवतानां च सन्निधौ ॥ ततः सुलग्ने बभीयात्कव्यां लक्षणसंयुताम् ॥ ४९ ॥ देवताओंकी मूर्तियोंके सन्मुख छुरिका ( कटारी ) का पूजन करें फिर अच्छे तुममें अच्छे लक्षणवाली छुरिक ( खङ्ग ) को कटिकै बांधना चाहिये ॥ ५ ॥ तस्यास्तु लक्षणं वक्ष्ये यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा । संमितं छुरिकायामविस्तारेणैव ताडयेत् ॥ ६ ॥ अब जो पहिले बलाजीने कहा है ऐसा खङ्गक लक्षण कहतेहैं। खङ्गकी रुवाईके बराबरके निशानेको उस नवीन खङ्गसे ताडित करे ।। ६ ।। भाजितं गजसंख्यैश्च हृणुलीः परिकल्पयेत् । आयामाद्धग्रविस्तारप्रमाणेनैव छेदयेत् ॥ ७ ॥ फिर उस लंबे चिह्नमें आठका भाग दे अंगुल कल्पित रे अर्थात् अंगुलोंसे नांपकर आठसे कम तक रहैं इतने चिह्नको ग्रहण भाषाटीकास०-अ० २५. ( १ ३९) कर पीछे खङ्ग लंबाईके आधे विस्तारके अग्रभागसे उस चिह्नित वस्तुको काट देवे ।। ७ ।। तच्छेदखंडान्यायाः स्युर्ध्वजाये रिपुनाशनम् ॥ धूम्राये मरणं सिंहे जयधये निरोगिता ॥ धनलाभो वृषेयंतं दुःखी भवाति गर्दभे ॥ ८ ॥ फिर उस कटेहुए टुकडेके आय होतेहैं अर्थात् जितनी अंगुलका होय उसका फल कहतेहैं । एक अंगुलकाःय तो ध्वज आय जाने शत्रुको नष्ट करताहै । और २ अंगुल धम्रआय होय तो मरण, ३ सिंह होय तो जय (त) हो,चौथा धन आय होय तो आराग्य ता होफिर ५ वृष आय हो, तो धनका लोभ६गर्दभआयमें अत्यंत दुःखी होवे ॥ ८ ॥ गजायेऽत्यंतसंप्रीतिर्वीक्षे वित्तविनाशनम् ॥ खङ्गपुत्रिकयोर्मानं गणयेत्स्वांगलेन तु ॥ ९ ॥ मानांगुले तु पर्यायानेकादशमितांस्त्यजेत् ॥ शेषाणामंगुलानां च फलानि स्युर्यथाक्रमात् ॥ १० ॥ पुत्रलाभः शत्रुवृद्धिः स्त्रीलाभो गमनं शुभम् । अर्थहानिश्चार्थवृद्धिः प्रीतिः सिद्धिर्जयः स्तुतिः ॥ ११ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां छुरिकाबंधनाध्यायः पंचविंशतितमः ॥ २८॥ स। तव गजआयमें सम्यक् प्रीतिहो और आठवाँ ध्वांक्ष आयमें धनका नाश हो खङ्गके मानक और छार्कके X • • अ (१४०) नारदसंहिता । । मानको अपनी अंगुठोंसे नापकर फिर उनमें ११ अप्रैल प्रमाण त्याग देवे अर्थाव ग्यारहका भागदेकर बाकी रखलेवे तळ चारकी अंगुल और मातमें जितने अंगुल्तक घात भयाहो उनको अंगुल करके जोडकर ११ का भागदेनाफिर १ बँचे तो पुत्रलाभ २वेंचे तो शत्रुवृद्धि, ३हुँचे तो स्त्रीलाभ,४ हुँचे तो गमन,५ वेंचे तो शुभ फल, ६ बँचे तो द्रव्यहानि, ७ उँचे तो द्रव्यवृद्धि, ८ उँचे तो औति, ९ बॅचे तो सिद्धि, १० उँचे तो विजय, ११ उँचे तो स्तुति ( यश ) ऐसा फल जानना ॥९॥१ ०॥ ११ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां छुरिकाबंधनाध्यायः पंचविंशतितमः ॥ २५ ॥ अथोत्तरायणे शुक्रजीवयोद्देश्यमानयोः ॥ द्विजातीनां गुरोर्गेहान्निवृत्तानां यतात्मनाम् ॥ १ ॥ उत्तरायण सूर्य हो, बृहस्पति तथा शुक्रका उदय हो तव नियम रखनेवाले अर्थाव चलचर्यमें रहनेवाले द्विजातियोंने गुरुके घरसे निवृत्त होना चाहिये ॥ १ ॥ चित्रोत्तरादितीज्यांत्यहरिमैनेंदुभात्रिषु ॥ भेष्वकॅद्विज्यशुनज्ञवारलग्नांशकेषु च ॥ २॥ अथवावस्थानक्षत्रवारलग्नांशकेष्वपि । प्रतिपत्सर्वेरिक्तमा सप्तमीतो दिनत्रयम् ।। ३ ।। । हित्वान्यदिवसे कार्यं समावर्तनमंडनम् ॥ ९ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां समावर्तनाध्यायः षटेिंशतितमः ॥ २६ ॥ भाषाटीकास ०-अ० २७, ( ३४१ ) चित्र, तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, मृगशिर आदि तीन नक्षत्र, रवि, चंद्र, बृहस्पति, शुक्र, बुध इन वारोंविषे और इनहीकी राशियोंके लग्न रथा नवांशकों विषे अथवा यात्राके नक्षत्र वार लच नवांशों विषे समावर्तन कम करना चाहिये और प्रतिपदा, संपूण रिक्कातिथि, अमावस्या, सप्तमी आदि तीनदिन इनको त्यागकर समावर्तन कर्म करना चाहिये ( हस्थाश्रममें प्राप्त होना चाहिये) ॥ २ ॥ ३ ॥ ४॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां सवर्जन ध्यायः षड्विंशतितमः ॥ २६ ॥ सर्वाश्रमाणामाश्रेयो गृहस्थाश्रम उत्तमः ।। यतःसोऽपि च योषायां शीलवत्यां स्थितस्ततः ॥ १॥ संपूर्ण आश्रमोंका आश्रयरूप गृहस्थाश्रम कहाहै वह गृहस्था अम भी अच्छी शळ्वितीर्जीके आश्रयास्थित रहता है ।। १ ।। तस्यास्तच्छीललब्धिस्तु सुलग्नवशतः खलु । पितामहोक्तां संवीक्ष्य लग्नशुद्धं प्रवच्म्यहम् ॥ २॥ और तिस स्रके शील स्वभावकी प्राप्ति अच्छे लग्नके प्रभवसे होतीहै इसलिये मैं बल्लाजीसे कहीहुई लग्नशुद्धिको कहताहूं।२।। पुण्येन्नि लक्षणोपेतं सुखासीनं सुचेतसम् ॥ प्रणम्य देववत्पृच्छेदैवज्ञ भक्तिपूर्वकम् ॥ ३ ॥ पवित्र शुभदिनविषे सुंदर ढक्षणोंसे युक्त सुखपूर्वक स्वस्थ चित्तसे बैठेहुए जोतिषीको भक्तिपूर्वक प्रणाम कर देवताकी तरह सत्कार करके पूंछे. ॥ ३ ॥ ( १४२ ) नारदसंहिता । तांबूलफलपुष्पावैः पूर्णाजलिरुपागतः ॥ कर्ता निवेद्य दंपत्योर्जन्मराशिं स जन्मभम् ॥ ४ ॥ तांबूळ, फळे, पुष्प आदिकोंसे हाथोंको पूणकर (मेंट चढ़कर) वह पृच्छक वरकन्य ओंके जन्मके नक्षत्रको और जन्मकी राशि को उस ज्योतिषीके आगे बतलादेवे ३ ४ ॥ पृच्छकस्य भवेदशादिंदुः षष्टाष्टकोपि वा ॥ दंपत्योर्मरणं वाच्यमष्टमझतरे यदि ॥ ९॥ तह प्रश्नसमयके लग्नसे छठे आठवें स्थानपर चंद्रमा हो अथवा उनके नक्षत्रसे आठवें नक्षत्रपर होय तो स्त्रीपुरुषका (वर कन्याओंका ) मरण होगा ऐसा कहना चाहिये ॥ ५ ॥ यदि लग्नगतञ्चद्रस्तस्मात्सप्तमगः कुजः ॥ विज्ञेयं भर्तृमरणं त्वष्टमे दे न संशयः॥ ६॥ जो चंद्रमा प्रश्नळभमें हो और तिस चंद्रमासे सातवें स्थानपर मंगळ हो तो आठवें वर्षमें निश्चय पतिका मरण होता है ॥ ६ ।। लग्नात्पंचमगः पापः शत्रुदृष्टः स्वनीचगः ॥ मृतgघा तु सा कन्या कुलट न तु संशयः ॥ ७ ॥ लभसे पांचवें स्थान पापग्रह शत्रुग्रहसे दृष्ट तथा अपनी नीचराशिपर स्थित हो तो वह कन्या मृतवत्सा हो और व्यभिचारिणी हो इसमें संदेह नहीं ।। ७ ।। तृतीयपंचसप्तायकर्मगश्च निशाकरः॥ लग्नात्करोति संबंधं दंपत्योर्गुरुवीक्षितः ॥ । ८ ॥ । भाषाढीक्रस ०-अ० २७. (१४३ ) तीसरे, पांचवें, सातवें, ग्यारहवें तथ दशवें स्थानपर चंद्रमा हो और बृहस्पतिकरके दृष्ट हो तो स्त्री पुरुषका संबंध ( मेल ) करता है । ८॥ । तुलागो कर्कटे लग्ने संस्थाः शुकेंदुसंयुताः ॥ वीक्षिताः स्त्रीग्रहा नृणां कन्यालाभो भवेत्तदा ।। ९ ॥ प्रश्नसमय तुला, वृष, कर्क, ळनमें स्त्रीग्रह स्थित होवें और शुक्र चंद्रमासे युक्त होवें तो तथा दृष्ट होवें तो मनुष्योंको न्यका लाभ जरूर कळून | ९ || शुजेंदू थुश्मराशिस्थ युग्मांशकगतौ तदा ॥ वलिनै पश्यतो लग्नं कन्यालाभो भवेत्तदा ॥ १० ॥ प्रश्नसमय शुक्र और चंद्रमा युग्मराशिपर स्थित होवें अथवा युग्मराशीके नवशकपर स्थित बढी होकर लश्को देखते होवें तो वरको कन्याका लाभ कहना ।। १० । । अयुग्मशशिरौ चेतौ शु“दू बलिनौ तथा ॥ पश्यतो लग्नमेतौ चेद्वरलाभो भवेत्तदा ॥ ११ ॥ जो वे दोनों चद्रमा शुक्र बी होकर लगको देखतेहों और विषम राशिपर स्थित होवें तो कन्याको अच्छे वरका लाभ कहना ।। ११ ।। एवं स्त्रीणां भर्तृलब्धिः पुंग्रहैरवलोकिते ॥ कृष्णपक्षे प्रश्नलग्नाद्युग्मराशौ शशी यदि । यापदृष्टेथ व थं न संबंधो भवेत्तदा ॥ १२॥ ( १४४ ) नारदसंहिता । ऐसेही पुरुष ग्रहकरके लग्न ईष्ट होय भी कन्याओंको बरकी शान्ति कहना उष्णपक्षमें प्रश्रळयसे युग्मराशिपर चंद्रमा स्थित है पापग्रहोंसे दृष्ट अथवा सातवें स्थान होवे तो संबंध नहीं हो अथवा विवाहू नहीं होगा ॥ १२ ॥ पुण्यैर्निमित्तशकुनैः प्रश्नकाले तु मंगलम् । दंपत्योरशुभैरेतैरशुभं सर्वतो भवेत् ।। १३ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितयाँ विवाहप्रश्नलग्नाध्यायः सप्तविंशतितमः ॥ २७ ॥ प्रज्ञसमय शुभशकुन होवे तो मंगल जानना और अशुभशकुन हवे तो वरकन्याओंको अशुभ फल होगा ऐस ? कह्नना ।। १३ ।। इति श्रीनारदीयसंहिताभाषीकायां विवाहप्रकलशध्यायः सप्तविंशतितमः ॥ २७ ॥ S पंचांगशुद्धिदिवसे चंद्रतराबलान्विते । विवाहभस्योदये वा कल्यावरणमिष्यते ॥ १ ॥ पंचांगशुद्धिके दिन चंद्रताराका बल होनेके दिन विवाहके नक्षत्र और लग्नविषे कन्यावरण ( संबंध ) करना चाहिये ।। १ ।।। भूषणैः पुष्पतांबूलैः फलगंधाक्षतादिभिः॥ शुक्लांबरैर्गीतवाचैर्विप्राशीर्वचनैः सह ॥ २॥ कारयेत्कन्यगेहे वरणं प्रीतिपूर्वकम् ॥ तदा कुर्यात् पिता तस्याः प्रधानं प्रीतिपूर्वकम् ॥ ३ ॥ षटीकास ०--अ० २८, (१४५) आभूषण, पुष्प, तांबूळ, फल, गंध, अक्षत, खेतवत्र इन्होंसे युक्त हो गीतवाजा आदि मंगळ तथा ब्राह्मणोंके आशीर्वादोंसे युक्त कन्याके घरमें उत्सव ‘कर कन्याका पिता वरण करें तब् पीछे तिस कन्याका पिता प्रीतिपूर्वकं कन्याक प्रदान (वाग्दान ) करें ॥ २ ॥ ३ ॥ कुलशीलवयोरूपवित्तविद्ययायुतय च॥ वराय रूपसंपन्नां कन्यां दद्याद्यवीयसीम् ॥ ४ ॥ कुल, शलि, अवस्था, रूप, धन, विद्या इन्डसे युक्त बरके वांस्ते वरसे छोटी उमरखाली सुरूपवती कन्याको देवे ।। ४ ॥ संपूज्य प्रार्थयित्वा तां शचीं देवीं गुणाश्रयाम् ॥ त्रैलोक्यसुंदरीं दिव्यां गंधमाल्यांबरावृताम् ॥६॥ गुणोंकी आधाररूपं, इंद्राणी देवीको पूजाकर तिसकी प्रार्थना कर त्रैलोक्य सुंदरी, दिव्य गंध मालाओंवाली सुंदखत्रोंको धारण किये हुए ॥ ५ ॥ सर्वलक्षणसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम् ॥ अनयैमणिमालाभिर्भासयंतीं दिगंतरान् ॥ ६ ॥ संपूण लक्षणोंसे युक्त, संपूर्ण आभूषणोंसे विभूषित, बहुत उत्तम मणियोंकी मालओंसे दिशाओंको प्रकाशित करती हुईं । ६ ॥ विलासिनीसहस्रावैः सेव्यमानामहर्निशम् ॥ एवंविधां कुमारीं तां पूजांते प्रार्थयेदिति ॥ ७ ॥ हजारों स्त्रियोंसे सेवित ऐसी कमारी इंद्राणी देवीको पूजिके अंतमें ऐसी प्रार्थना करें । ७ ॥ १० 4 ( ३४६ ) दारदसंहिता । देवींद्राणि नमस्तुभ्यं देवेंद्रप्रियभाषिणि ॥ विवाहं भाग्यमारोग्यं पुत्रलाभं च देहि मे ॥ ८ ॥ इति श्रीनारदीयसं० कन्याघरणाध्यायोऽष्टाविंशतितमः२८॥ हे देवि!हे इंद्राणि !हे देवेंद्रप्रियभाषिणी तुमको नमस्कार है विवाह सौभाग्य, आरोग्य, पुत्रलाभ ये मुझको देवो ।। ८ ।। इति श्रीनारदसंहिताभाषाढीकायां कन्थावर- णाध्यायोऽष्टाविंशतितमः ॥ २८ ॥ अथ विवाहप्रकरणम्। युग्मेब्बे जन्मतः स्त्रीणां प्रीतिदं पाणिपीडनम् ॥ एतत्पुंसामयुग्मेब्दे व्यत्यये नाशनं तयोः ॥ १॥ जन्मसे पूरे सम वर्षमें कन्याका विवाह करना शुभहै और्वरको अयुग्म ( जरा ) वर्ष होना चाहिये इससे विपरीत होवे तो तिन्हों का नाश होताहै ।। १ ।। माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासाः शुभप्रदाः ॥ मध्यमः कार्तिको मार्गशीर्षे वै निंदिताः परे ।। २१ ॥ । माध, फाल्गुन, वैशाखज्येष्ठ इन महीनोंमें विवाह करना शुभहै और कार्तिकमार्गशिर मध्यम हैं अन्यमहीने विवाहमें अशु हैं।२॥ न कदाचिद्दशीषु भानोराश्नप्रवेशनात् ॥ विवाहं देवतानां च प्रतिष्ठां चोपनायनम् ॥ ३ ॥ आवें अदि दश नक्षत्रोंपर सूर्य प्रवेश होवे तब ( चातुर्मासमें ) ही विवाहदेवताओंकी प्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत ये नहीं करने चाहिये ॥ ३ ॥ भाषाटीस ०-अ० २९: . ( १४७ ) नरस्तंगते सिते जीवे न तयोर्बालवृद्धयोः । न गरौ सिंहराशिस्थे सिंहांशकगतेपि वा ॥ ४ ॥ बृहसति व शुक्रके अस्त होनेमें तथा तिन्होंकी वाल और वृद्ध अवस्था होनेके समय और सिंहके वृहस्पतिविषे अथ्धा सिंह राशीके नवांशमें बृहस्पति होवे तत्र भी ये विवह्नदिक नहीं करने चहिये ।। ४ ।। पश्चात् प्रागुदितः शुक्रः पंचसप्तदितं शिशुः । अस्तकाले तु वृद्धत्वं तद्वद्देवगुरोरपि ॥ ६ ॥ पूर्वमें तथा पश्चिममें शुक्र उदय हो तब सात दिन तथा च दिन बाल संज्ञक रहता है और अन्त ओलसे पांच सात दिन पहले वृद्ध संज्ञा होजाती है तैसेही बृहस्पति की संज्ञा जाननी चाहिये ॥ ५ ॥ अप्रबुद्धो हृषीकेशो यावत्तावन्न मंगलम् । उत्सवे वासुदेवस्य दिवसे नान्यमंगलम् ॥ ६ ॥ ॥ जबतक देव नहीं उठे तबतक मंगल कार्य नहीं करना और देख छठनी एकादशीको विवाहादि मंगल करना शुभदायक नहीहै।६।। न जन्ममासे जन्मी न जन्मदिवसेपि च ॥ नाधगर्भसुतस्याथ दुहितुव करग्रहम् ॥ ७ i. प्रथम संतान ( जेठी संतान ) का विवाह जन्ममास तथा जन्मनक्षत्र तथा जन्मतिथि विषे नहीं करना चाहिये ।। ७ ॥ । नैवोद्वाहो ज्येष्ठपुत्रीषुषयोऽपरस्परम् । ज्यैष्ठमासजयोरेकज्यैष्ठे मासे हि नान्यथा ॥ ८ ॥ • (१४८) नारदसंहिता ।। ज्येष्ठ वर और जेठी संतानकी कन्या इन दोनों तथा ज्येष्ठमासमें उत्पन्न हुए वरकन्याओंका विवाह ज्येष्ठमासमें नहीं करना चाहिये ॥ ८ ।। उत्पातग्रहणादूर्वै सप्ताहमखिलग्रहे । नाखिले त्रिदिनं चक्षी तदा नेष्टमृतुत्रयम् ॥ ९ ॥ वजपात आदि उंपात तथा सर्व ग्रहणके अनंतर सात दिन तक विवाहादि मंगळकार्य करना शुभ नहीं है। सर्व ग्रहण नहीं हो तो तीन दिन पीछेतक और अतुकालके उसातमैभी तीन दिन पीछेतक शुद्ध कार्यों नहीं करना ॥ ९ ॥ ग्रस्तास्ते त्रिदिनं पूर्वं पश्चात् प्रस्तोदये तथा ॥ संध्याकाले चित्रिदिनं निःशेषे सप्तसप्त च ॥ १० ॥ ग्रस्तास्त ग्रहणसे पहले तीन दिन और प्रस्तोद्य ग्रह्णसे पीछे तीन दिन और संध्याकालमें उत्पात होय तो तीन २ दिन बाकी सर्व दिनमें सात २ दिन वर्जित जान ॥ १० ॥ । मासांते पंचद्धिसांस्त्यजेद्रिक्तां तथाष्टमीम् ॥ षष्ठीं च परिघाद्यर्द्ध व्यतीपातं सवैधृतिम् ॥ ११ ॥ मारुतमे पंच दिन, रिक्का तिथि, अष्टमी पर्व परिघ योग के आदिका आधा भाग वैधृति, व्यतीपात संपूर्ण, इनको विवाहदिके संपूर्ण कार्यों में वर्ष देखे ॥ ११ ॥ पौष्णभयुत्तरामैत्रमरुचंद्रार्कपैतृभम्॥ समूलभं विधेभे च स्त्रीकरग्रह इष्यते ॥ १२ ॥ भाषाटीकास०-अ० २९. ( १४९ ) 8 A रैवती, तीन उतरा, अनुराधा, वति, मृगशिर, हतमध, रोहिणी, मूल इन नक्षत्रोंमें विवाह करना चाहिये ॥ १२ ॥ । विवहे वलमावश्यं दंपत्यगुरुसूर्ययोः ।। तत्पूज़ यत्नतः कार्यो दुष्फलप्रद्यस्तयोः ॥ १३ ॥ विवहमें वर कन्याको सूर्य बृहस्पति बळ अवश्य देखना चाहिये और ज़ो ये अशु फलदायक हों तो यन करके इन्हेंकी पूजा अवश्य करनी चाहिये ॥ १३ ॥ गोचरं व वेधजं चाष्टवरूपजं बलम् । यथोत्तरं बलाधिक्यं स्थूलं गोचरमार्गजम् ॥ १४ ॥ गोचर बल, वेधरहितका बल, अष्टवर्गबल ये सब बल यथोत्रर कममे बलाधिक्य हैं और गोचर मार्गमे स्थूल बल है । १४ ।। चंद्रताराबलं वीक्ष्य ग्रहपांगनं बलम् । तिथिरेकगुणा वारो द्विगुणस्त्रिगुणं च भम् ॥ १९॥ चंद्र ताराबल, हॅबल, टुशुकं शकुनकर बळ् तथा अंग्फुरण काभी बल कहा है । तिथि एकगुणा बल करती है, वर दुगुना बेळ ओर नक्षत्र तिगुन बल करता हैं ॥ १५ ॥ योगश्चतुर्गुणः पंचगुणं तिथ्यर्धसंज्ञकम्॥ ततो मुहूत्तों बलवाँस्ततो लग्नं बलाधिकम् ॥ १६ ॥ योग चर शुना, तिथ्यर्द्ध (करण ) पांचगुन बूल करता है, जिससे अधिक दुघड़िया मुहूर्त, तिससे अधिक बली लग्न है ॥१६॥ ततोतिबलिनी होरा द्रेष्काणोतिबली ततः ॥ ततो नवांशो बलवान् द्दशांशो बली ततः ।। १७ ।। {१५० ) नारदसंहिता । तिसस बी होरा, तिससे बली दुष्काण है, ऐकणसे बली नवांशक है, नवांशकसे बली द्वादशश है ॥ १७ ॥ त्रिंशांशो बलवांस्तस्मांद्वीक्ष्यते तद्वलाबलम् । शुभयुक्तेक्षिताः शस्ता विवाहेऽखिलराशयः ॥ १८ ॥ द्वादशांशसे बली त्रिंशांश है, ऐसे बलाबल विचारना चाहिये विवाहमें संपूर्ण राशि शुभग्रहोंसे युक्त और दृष्ट होनेसे शुभदायक होती हैं ॥ १८ ॥ चंद्रार्केज्यादयः पंच यस्य राशेस्तु खेचराः॥ इष्टास्तच्छुभदं लग्नं चत्वारोपि बलान्विताः ॥ १९ ॥ चंद्रमा, सूर्य, बृहस्पति आदि पांच ग्रह जिस राशिंके स्वामी हैं, वह लुन शुभदायक है, और बलान्वित हुए चार ग्रह शुभ होनें वहभी लग शुभ दायक है ॥ १९ ॥ जामित्रशुद्धयेकविंशन्महादोषविवर्जितम् । एकविंशतिदोषाणां नामरूपफलानि च ॥ २० ॥ पितामहोक्तान्यावीक्ष्य वक्ष्ये तानि समासतः । पंचांगशुद्धिरहितो दोषस्वायः प्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ यामित्र दोषकी शुद्धि करना और इक्कीस महादोषोंको वर्ज इक्कीस दोषोंके नाम प फलको बलाजीसे कहे हुएको पमात्रसे कहते हैं। पेंचांगशुद्धि नहीं होना यह प्रथम ॥ २ ० ॥ २६ ॥ भाषाटीकास ०-अ० २९, ( १५१ ) R = उद्यास्तशुद्धिहीनो द्वितीयः सूर्यसंक्रमः । तृतीयः पापषड्वग भृगुः षष्ठे कुजोष्टमे ॥ २२ ॥ गंडांतकर्तरीरिःफषडष्टुंदुश्च संग्रहः ॥ दंपत्योरष्टमं लग्नं राशिर्विषघटीभवः ॥ २३ ॥ दुर्मुहूतों वारदोषः खर्जुरीकः समांत्रिजः ॥ ग्रहणोत्पातभं क्रूरविद्धी क्रूरसंयुतम् ॥ २४ ॥ कुनवांशो महापातो वैधृतिं चैकविंशतिः ॥ तिथिवारर्दयोगानां करणस्य च मेलनम् ॥ २५॥ पंचांगमस्य संशुद्धिः पंचांगं समुदाहृतम् । यस्मिन्पंचांगदोषोस्ति तस्मिघ्नं निरर्थकम् ॥ २६ ॥ १ 8A उदयास्तशुद्धिहीन यह दूसरा दोष है सूर्यसंक्रम ३, पाप पवर्ग ४, छठे घर शुक्र हो यह ५दोष है।आठवें मंगल हो यह ६ दोष है गंडांत दोष७कुत्तेरी योग ८, और १२/६।८ इन घरोंमें चंद्रमा हो यह ९, दोष है और स्त्रीपुरुषका अष्टमलझ१०,संग्रह दोष ११, राशिदोष १२विषघट १३, दुष्ट मुहूर्त १४, वारदोष१५ खर्जुरीक समांघ्रिज अर्थात् एकार्गल दोष १६, प्रहणनक्षत्र तथा उत्पातका नक्षत्र १७पापग्रहवेध१८,पापग्रहयुक्त१९, छंटनवांशक २०वैधृति तथा व्यषाित ये२ १ इक्कीस महादोष कहे हैं तहां तिथी १ वार २ नक्षत्र ३ योग ४ करण ५ इन्होंका मेल करना इन्होंकी शुद्धि देखना यह पंचांग कहता है। जिसमें पंचांगदोष हो उस दिन विवाह लग्न करना निरर्थक है * यह एक पंचांग दोष ( १५२ ) नारदसंहित । लक्षण कहा और बाकी रहे २० दोषकेभी लक्षण कहते हैं ॥ २२ ।। २३ ।। २४ ।। २५ ।। २६ ।। लग्नलग्नांशके स्वस्वपतिना वीक्षितौ शुभौ ॥ न चेद्रान्योन्यपतिना शुभामित्रेण वा तथा॥ २७॥ वरस्य मृत्युः परमो लम्यूननवांशकौ ॥ नवं तैर्वीक्षितयुतौ मृत्युर्वध्वाः करग्रहे ॥ २८ ॥ लग्न और छद्मका नवांशक ये दोनों अपने २ स्वमीसे दृष्ट हो।ों तथा युक्त होवें तो शुटुकी है अथवा आपसमें परस्पर पतिसे तथा शुभ मित्र ग्रहसे दृष्टयुक्त होवें तोसी शुभ है, और उन तथा लनमें मनम घर तथा इन बरोंके नवांशकोंके स्वामी लक्ष तथा सप्त स घर को देखते नहीं हो और दृष्टिभी नहीं करते हों तथा इनके शुभ मित्रभी दृष्टि नहीं करते हो।ों तो उसळल्में विवाह किया जाय तो वरकी तथ कन्याकी मृत्यु होती है। लम्की शुद्धि नहीं होनेते वरकी मृत्यु और सप्तमकी शुद्धि नहीं होने से कन्याकी मृत्यु होती है ऐसे यह उदयास्त शुद्धि रहित दोषका लक्षण है।।२७।२८।। त्याज्या सूर्यस्य संक्रांतिः पूर्वतः परतः सदा ॥ विवाहादिषु कार्येषु नाड्यः षोडशषोडश ॥ २९॥ सूर्यकी संक्रांति अॐ उससे १६ घड़ी पहली और १६ घडी {छकी युग देनी चाहिये यह विवाहादिकोंमें अशुभ कही हैं यह संक्रांति दोषका लक्षण है ।। २९ ।।। का & • आषाढीस -अ० २९ . ( १५३ ) - ४

त्रिंशद्भोगारमकं लग्नं होरा तस्यार्धमुच्यते ॥ लग्नत्रिभागो द्रेष्काणो नवमांशे नवांशकः॥ ३० ॥ लुन तीस अंशका होता है तिसका आधा भाग (१५ अंश) को हरा कहते हैं । लझी तीसरे भागकी श्रेष्काण संज्ञा है उनके नवमांशको नवांशक कहते हैं ।। ३० ।। द्वादशांशो द्वादशांशः त्रिंशशस्त्रिंशदंशकः ॥ सिंहस्याधिपतिर्भानुश्चैवः कर्कटकेश्वरः॥ ३१ ॥ बारहवें अंश करलेनेको द्वादशांश, त्रिंशांश तीसवेही अंशका होता है इनके देखनेकी विधि आगे चक्रमें स्पष्ट लिखते हैं । सिंहका स्वामी सूर्य और कर्कका स्वामी चंद्रमा है । ३१ ।। मेषवृश्चिकयोर्भामः कन्यामिथुनयोर्युधः । धनुर्मीनद्वयोर्मी शुको वृषतुलेश्वरः ॥ ३२ ॥ मेष और वृश्चिकका मालिक मंगल है, कन्या और मिथुनका स्वामी बुध, धनु और मीनका स्वामी बृहसति, वृष और तुलाका स्वामी शुक्र है ।। ३२ ।। शनिर्मीरकुंभेश इत्येते राशिनायकाः॥ होरेनविध्वोरोजराशौ समभे चंद्रसूर्ययोः ॥ ३३ ॥ मकर कुंभक स्वामी शनिहै ऐसे ये राशियोंके स्वामी कहे हैं तहाँ। विषम राशिमें पहले १५ अंशतक सूर्यकी होरा, पीछे चंद्रमाक होरा और समराशिमें पहले चंद्रमाकी पीछे सूर्यकी होरा होतीहै ३३ (१५४ ) नारदसंहिता । होराचक्रम् । विषमराशि मे. १ मि. चिं. | तु. ध. की ऊं. १५ | १५ | १५ | १५ | १५ | १५ ३० ९ ३० ३० | ३० | ३० | ३० समराशिः चू. कर्क कन्या ) वृद्धि. म. मी. १५ | १५ | १५ | १५ | १५ | १५ वें, वं. ३० ३० ३० \ ३० १ ३० ३० स्.) सु.सू . — } सु . शू . [ स्युद्रेष्काणे लम्रपंचनंद्राशीश्वराः क्रमात् । आरभ्य लग्नराशेस्तु द्वादशाशेश्वराः क्रमात् ॥ राशिके १० अंशतक लग्नस्वामी फिर २० अंशतक लग्नसे ४ घर स्वामी फिर ३० अंशतक लऐसे ९ घरके स्वांमीका बैंक ण होता है ऐसा क्रम जानन.और लम राशिसे लेकर द्वादशांश् अर्थात् २॥ अंशका पति ग्रह यथाक्रमसे जानना जैसे मेष २॥ अंशतक मंगलका फिर५अंशतक शुक्का द्वादशांश है ।।३४।। भाषाटीकसि०-अ० २९. (१५५)

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भृगुः श्रेष्टाह्वयो दोषो लग्नात्षष्ठगते सिते ॥ उच्चगे शुभसंयुक्ते तलने सर्वदा त्यजेत् ॥ ३६ ॥ भाषाटीक्स ०-अ० २९. . (१५७ ) उनसे छठे स्थान राहु होवे बह भृगु षष्ठाह्वयनामक दोष इतF है वह लश उच्चग्रहसे युक्त तथा शुभग्रहसे युक्त हो तो भी सबैथ त्याग देना चाहिये ॥ ३६ ।। कुजाष्टमे महादोषो लग्नादष्टमग कुजे ॥ शुभत्रययुतं लग्नं त्यजेतुंगगते यदि ॥३७॥ लुग्रसे आठवें स्थान मंगल हो वहभी महादोष कहा है वह छल तीन शुभग्रहोंसे युक्त तथा उच्चग्रहसे युक्त हो तौभी त्याग देना चाहिये ॥ ३७ ॥ पूर्णानंदाख्ययोस्तियोः संधिर्नाडीद्वयं सदा ॥ गंडांतं मृत्युदं जन्म यात्रोद्वाहव्रतादिषु ॥ ३८ ॥ पूर्णा नंदा इन तिथियोंकी सांधिमें दो घड़ी अर्थात् पूर्णिमाके अंतकी एक घडी और प्रतिपदाकी आदिकी १ घडी गंडांत कही है वह जन्म, यात्राविवाह आदिकोमें मृत्युदयक जाननी पंचमी आदि सब पूर्णा और संपूर्ण नंदा तिथियोंी घटी जानलेनी॥ ३८३ कुलीरसिंहयोः कीटचापयोमीनमेषयोः । गंडान्तमंतरालं स्याद्धटिकाथै मृतिप्रदम्।। ३९ ।। और कर्क, सिंह, वृश्चिक, धन, मीन, मेष इन लनोंकी संधि। गंडांत संज्ञक जाननी बहभी मृत्युकारक हैं ॥ ३९ ॥ सापेन्द्रपौष्णभेष्वंत्यं नाडीयुग्मं तथैव च ॥ तदग्रभेष्वाद्यपादभानां गंडतसंज्ञिकाः४० ॥ 4 - (१५८) नारदसंहिता । और आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती इन्होंके अंतकी दो बडी और इन से अगले नक्षत्रोंके प्रथमचरणोंकी दो घडी ऐसे ये नक्षत्रोंकी ४ बुडी गंडांत संज्ञक हैं ।। ४० ।। उग्रं च संवित्रितयं गंडांतद्वितयं महत् । मृत्युप्रदं जन्मयानविवाहस्थापनादिषु ॥ ११ ॥ ऐसे यह तीन प्रकारका गंडांत दारुण खराब है जन्म, यात्रा, विवाह इन्होंमें अशुभ कहा है । । ४१ ।। “लनस्य घृष्टाग्रगयेरसध्वोः सा कर्तरी स्याः दृजुवक्रगत्योः । तावेव शीनें यदि वक्रचारों नो कर्तरीति न्यगदन्मुनींदः ॥ ४२ ॥ उनसे बारहवें स्थान् मार्गे कोई क्रूर ग्रह होवे और दूसरे स्थानमें वक्रगतिवाला कोई क्रूरग्रह होय तो कर्तरी नामक अशुn योग होता है यदि वे दोनों मेह शीन गतिवाले तथा वक्रगतिही होवें तो कर्तरी योग नहीं होता ऐसा यह वसिष्ठ जी मुनिका अत है ।। ४२ ।। । लग्नाभिमुखयोः पाश्र्वग्रहयोरुभयस्थयोः । सा कर्तरीति विज्ञेया दंपत्योर्मुतिकर्तरी ॥ ४३ ॥ लग्नसे आगे पीछे दोनों बराबरोंमें पापग्रह होवें वह फर्नरीयोग है खपुरुषकी मृत्यु करता है । ४३ ॥ अपि सौम्यग्रहैर्युक्तं गुणैः सर्वैः समन्वितम् । व्ययरिपुगे चंद्रे लग्नदोषः स संज्ञितः ॥ ४४ ॥ और सौम्य ग्रहोंसे युक्त तथा सब गुणोंसे युक्त लग्न हो भी • 2 भाषटकिस ०-अ० २९.. ( ३५९) कर्तरी योगंमें विवाह नहीं करना और १२८६ चंद्रमा हो तो भी लनमें दोष कहा है ।। ४४ ।। तलगं वर्जयेद्यत्नाज्जीवशुक्रसमन्वितम् । उच्चगे नीचगे वापि मित्रगे शत्रुराशिगे ॥ ४५॥ वह लझ बूझक्षति शुत्रसे युक्त होय तो भी यत्नसे दर्ज देना चहिये उच्चका हो अथवा नीच प्रहसे युक्त मित्रराशीका अथवा शत्रुराशिका कैसाही चंद्र होतेपरंतु इन स्थानोंमें अर्क "देना चहिये ॥ ४५{ * ***,७३४१३२६ ४ ३४४४ अपि सर्वगुणोपेतं दंपत्योर्निधनप्रदम् । शशके पापसंयुक्ते दोषः संग्रहसंज्ञकः ॥ ४६ ॥ जो सब गुणोंसे युक्त छम हो तोली खी पुरुपैकी मृत्यु करता है और चंद्रमा पापग्रहोंसे युक्त हो वह संभह दोए कहा ३ ९ ४६ ॥ तस्मिन्संग्रहदोषे तद्विवाहं नैव कारयेत् ॥ सूर्येण संयुते चंद्रे दारिघं भवति ध्रुवम् ॥ ४७ ॥ तिस संग्रह दोषमें विवाह नहीं करना सूर्यके साथ चंद्रमा हो तो निश्चय दारिद्यु हो ॥ ४७ ।।। कुजेन मरणं व्याधिर्नुधेन त्वनपत्यता ॥ दौर्भाग्यं गुरुणा चैव सापयं भार्गवेन तु ॥ ७८॥ मंगळका साथ हो तो मरण वा रोग,बुध साथ हो तो संतान नहीं हो,वृहपतिका साथ हो ते दुर्भाग्य, शुक्रका साथ हो तो शत्रुका । दुःख हो ॥ ४८ ॥ (१६० ) नारदसंहिता । प्रव्रज्या रविपुत्रेण राहुणा कलहः सदा ॥ केतुना संयुते चंद्रे नित्यं कष्टं दरिद्रता ॥ ४९ ॥ शनिक सोथ हो तो संन्यास धारण हो, राहुक साथ हो तो कलह, केतुके साथ चंद्रमा हो तो सदा कष्ट दारद्रत ! होवे ।। ४९ ।। पायययुते चंद्रे दंपत्योर्मरणं भवेत् ॥ पापग्रहयुते चंद्रे नीचस्थे राहुराशिगे ॥ ९९ । । दो पापग्रहोंसे युक्त चंद्रमा हो तो कन्या वरकी मृत्यु हो चंद्रमा पापग्रहोंने यल हो नीचा हो राहुकी राशिषर हो तो ॥ ५० ॥ दोषायनं भवेल्छनं दंपत्योर्मरणप्रदम् । स्वक्षेत्रगः स्वोच्चगो वा मित्रग्रहगतो विधुः ॥ ६१ ।। वह लग्न दोषेक स्थान होजाता है स्त्री पुरुषी मृत्यु करता है और अपने क्षेत्रमें चंद्रम । हो तथा अपनी उच्चराशिका अथवः । अपने मित्रके धर्में हो तो ॥ ५१ ॥ युतिदोषाय न भवेदंपत्योः श्रेयसे तदा । दंपत्योः षष्ठमा लग्नं वष्टमो राशिरेव च ॥ ५२ ॥ यदि लग्नगतः सषि दंपत्योर्मरणप्रदः ॥ स राशिः शुभयुक्तोपि लग्नं वा शुभसंयुतम् ॥ । ५३ ॥ । युतिदोष नहीं होता त्री पुरुषको शुभदायकहै स्त्री पुरुषकी छग्रसे आठवी राशिक लग्न हो अथवा स्त्री पुरुषकी राशिसे आठवीं शिका या हो तो स्त्री पुरुषकी मृत्यु होती है वह राशि तथा लग्न भ ग्रहोंसे युक्त हो तभी अशु है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ भाषाटीकास ०-अ० २९, (१६६ ) लम विद्वर्जयेद्यत्नात्तदंशांश्च तदीश्वरान्। दंपत्योद्दशं लग्नं राशियाँ यदि लग्नगम् ।। ९४ ।। उस लग्नको यनसे वर्ना देवे तिसके नवांश और तिसके स्वामी भी अशु होते हैं स्त्री पुरुषकी राशिका छन हो अथवा उनके जन्म लभसे १२ राशि लग्न होवे तो ॥ ५४ ॥ अर्थहानिस्तयोर्यस्मात्तदंशस्वामिनं त्यजेत् ॥ जन्मराश्युद्दमे चैव जन्मलग्नोदये शुभा ॥ ६५॥ तयोरुपचयस्थाने यदा लग्नं गतं शुभम् । खमार्गेणा वेदपक्षाः खरामः शून्यसागराः ॥ ९६ ॥ । वाषिंचद् रूपद्व्राः खरामा व्योमबाहवः । द्विरामाः खाद्यः शून्यदत्रकुंजरभूमयः ॥ ४७ ॥ द्रव्यकी हानि होतींहै इसलिये तीन ळनोंके नवांशकके स्वामी ग्रहोंको लनमें रयाग देवे और जन्मकी राशिपर तथा जन्मलयपर शुभ ग्रह होवें फेर तिन्होंसे उपचय स्थानमें (३।११।५) ह्न हो तो शुभ है यह राशिदोष कहा है अब विषघटी दोष कहते हैं अश्विनीनक्षत्रमें ५० घडी, भरणीमें २४, कृत्तिकामें ३० रोहिणीमें, ४० घडी, मृगशिरमें १४, आीमें २१, पुनवर्समें ३०, पुष्यमें २०, आश्लेषामें ३२, मघामें ३०, पूर्वोफा ० २०, उत्तशफा ० १८ घडी ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ रूपपक्षा व्योमदस्रा वेदचंद्राश्चतुर्दश । शून्यचंद्रा वेदचंद्राः षट्पंच वेदबहवः ॥ ९८॥ ११ ( १६२) नारदसंहिता। A७ शून्यदस्राः शून्यचंद्राश्शून्यचंदा गजेंदवः ॥ तर्कचंदा वेदपक्षाः खरामाधाश्विनीक्रमात् ॥ ४९ ॥ हस्तमें २१, चित्रा २०, स्वाति १४, विशाखामें १४, अनुराधा १०, ज्येष्ठा १४, मूल ५६, पूर्वाषाढमें २४, उत्तराषाढमें २०, श्रवण ० १०धनिष्ठामें १०, शतभिषा ० १८, पूर्वाभाद्र०१६, उत्तराभा० २४, रेवतीमें ३० घड़ी ऐसे अधिनी आदि नक्षत्रोंकी ये घड़ी कही हैं ।। ५८ ॥ ५९ ॥ आभ्यः पराःस्युश्चतस्रो नाडिका विषसंज्ञिकाः॥ विवाहादिषु कार्येषु वज्र्यास्ता विषनाडिकाः॥ ६० ॥ सो इन घड़ियोंसे परली चार घड़ी विषसंज्ञक हैं जैसे रेखेतीकी ३० घड़ी की तो तीससे आगे ३४ तक चार घड़ी विषघटी जाने ऐसेही सच नक्षत्रोंमें जानलेना ये विषघटी विवाहादिक कायोंमें वर्जित हैं ॥ ६० ॥ हयंतघटिमितं विषमानेन ताडितः।। षष्टिभिर्हरते लब्धं पूर्वऋक्षेण योजयेत् ॥ ६३ ॥ जो नक्षत्र परी साठ ६०घड़ीक नहीं हो तहां ऐसे करना कि नक्षत्रके धुघांककी घड़ियको नक्षत्रके भोगकी घड़ियोंसे गुन लेवे फिर साठ ६०का भाग देवे फिर जितनी घड़ी लब्ध हों उतनीकेही उपरांत विषघटी प्राप्त हुई जाननी ॥ ६१ ॥ इति विषघटी ॥ भास्करादिषु वारेषु ये मुहूतश्च निदितः । विवाहादिशुभे वज्य अपि लग्नगुणैर्युताः ॥ ६२ ॥ आषाटीकास०-अ० २९. ( १६३ ) सूर्यादिकवारोंमें जो निंदित मुहूर्त कहे हैं वे लग्नके गुणोंसे युक्त होवें तौ भी विवाहादिक शुभ कार्यों में वर्ष देने चाहियें ॥ ६२ ।। ते वयं यदि तळल्गुणैर्युक्ताश्च निंदिताः ॥ ६३ ॥ वे वारोंके दुष्टमुहूर्त वर्जनेही योग्य हैं जो वह उन गुणोंसे युक्त हो तौ ती वे दुष्ट मुहूर्त तो निंदितही कहे हैं । ६३॥ वारमध्ये तु ये दोषाः सूर्यवारादिषु क्रमात् ॥ अपि सर्वगुणोपेतास्ते वज्र्याः सर्वमंगले ॥ ६४ ॥ और सूर्यवारादिकॉमें क्रमसे जो वारदोष कहे हैं वे संपूर्ण गुणोंसे युक्त हों तो भी सब मंगळकर्मों में वर्ष देने चाहिये।। ६४ ।। एकार्गलः समांत्रिश्चेत्तत्र लग्नं विवर्जयेत् ॥ ६८॥ और खजूरिक योग एकागैल दोष को कहते हैं वह समांब्रिज हो अर्थात् सूर्य चंद्रमाकं योगसे सम अंकमें देखना कहा है उसमें एकार्गछ दोष आता हो तो उस नक्षत्रमें विवाह लग्न नहीं झरना ।। ६५ ।। अष् िशुक्रेज्यसंयुक्ता विषसंयुक्तदुग्धवत् ॥ ग्रहणोत्पातभं त्याज्यं मंगलेषु त्रिधाऽशुभम् ॥ ६६ ॥ तहां शुरु बृहस्पतिसे युक्त ठन हो तौ भी विषसे मिला हुआ दूधकी तरह त्याज्य हो जाता है और ग्रहणका नक्षत्र तथा आकाश भूकंप अदि तीन प्रकारके उत्पातके नक्षत्रको भी याग देवे ॥ ६६ ॥ यावचरणकं भुक्तं शेषं च दग्धकाष्ठवत् ॥ मंगलेषु त्यजेत्क्रूरं विॐ भं क्रूरसंयुतम् ॥ ६७॥ (१६४) नारदसंहिता । और विवाह आदि मंगलमें झूर अहसे षिद्ध हुए तथा कूर ग्रहसे युक्त हुए नक्षत्रको त्याग देवे एक चरण ओगा तो तो भी शेषक भी दग्धुकधुकी समान जानना ॥ ६७ ॥ अखिलं, पंचगव्यं सुराबिंदुयुतं तथा ॥ पादमेव शुभैर्विद्धमशुभं नैव कृत्नभम् ॥ ६८ ॥ मंगलीक कामें में एक चरणगत विद्ध होनेसे संपूर्ण नक्षत्र ऐसे याज्य होते हैं कि जैसे मदिराकी हुँद लगनेसे पंचगव्य अशुद्ध होजाता है और शुभग्रहा वेध चरणगत ही अशुद होता है संपूर्ण नक्षत्रका वेध नहीं होसक् ॥ ६८ ॥ क्रूरविद्धयुतं धिष्ण्यं निखिलं चैव पादतः॥ तुलामिथुनकन्यांशं धनुरंशैश्च संयुताः ॥ ६९ ॥ एते नवांशाः संग्राह्या अन्ये तु कुनवांशकाः ॥ कुनवांशकलनं यत्त्याज्यं सर्वगुणान्वितम् ॥ ७० ॥ कूर नक्षत्रका चरण गत वेध तथा कूर अह्न योगसे संपूर्ण ही नक्षत्र अर्थ होता है और तुळामिथुन, कन्या, धनु इनके नवां शक शुभ कहे हैं और अन्य कुनवांशक हैं । कुनवांशकका लझ सब गुणोंसे युक्त हो तो भी त्याग देना चाहिये ॥ ६९ ॥ ७० ॥ पस्मिन्दिने महापातस्तद्दिनं वर्जयेहुधः ॥ अपि सर्वगुणोपेतं दंपत्योर्मेत्युदं यतः ॥ ७१ ॥ असदिन व्यतीपात योग हो वह दिन त्यागदेना चाहिये वह दिन णोंसे युक्त हो तौभी स्त्री पुरुषकी मृत्यु करनेवाला है ॥७१॥ है झाषाटीकास ०-अ० २९. ( १६५) अनुक्ताः स्वल्पदोषाः स्युर्विद्युन्नीहारवृष्टयः । प्रत्यर्कपरिवेषंद्रचापांबुघनगर्जनम् ॥ ७२ ॥ और बिजली पडना, बर्फ ओले पडना इत्यादिकं विना हे हुए स्वल्प दो५ हैं तथा सूर्यके सन्मुख बादलमें दूसरा सूर्य देखना, मंडळ, मेघ गर्जना, इंद्रधनुष ॥ ७२ ।। एवमाद्यस्ततस्तेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना॥ अकाले संभवंत्येते विद्युन्नीहारवृष्टयः ॥ ७३ ॥ प्रत्यर्कपरिवेषंद्रचापाभ्रघनयोर्यदि । दोषाय मंगले नूनमदोषायैव कालजाः ॥ ७४ ॥ इयादि दोष हैं उनकी व्यवस्था करते हैं ये बिजली आदि उसात, धमर पडना, दूसरा सर्वे तथा सूर्यके मंडळ दीखना इंद्र धनुष दीखना, मेघ गर्जना ये उत्पात वर्षाकालके विना अकालमें होवें तो विवाहादिक मंगलमें निधय दोष है और कालमें होवें तो कुछ दोष नहीं है ॥ ७३ ।। ७४ ॥ बृहस्पातिः केंद्रगतः शुक्रो वा यदि वा बुधः ॥ एकोपि दोषविलयं करोत्येवं सुशोभनम् ॥ ७६ ॥ वृहक्षति अथवा शुक्रबुध, एक भी कोई केंद्में होय तो अने दोषोंको नष्ट करता है शुभ फल होता है ॥ ७५ ॥ तियेंझपंचोऊँगाः पंच रेखे बेड़े च कोणयोः ॥ द्वितीयं शंभुकोणेग्निभचक्रे तत्र विन्यसेत् ॥ ७६ ॥ + ( १६६ ) नारंदसंहित। पाँच रेखा तिरछी और पांच रेखा ऊपरको खींचे दो दो रेखा कोणोंमें खींचनी फिर ईशानकोणमें जो दो रेखा हैं तहां कृत्तिका नक्षत्र धरना और सभी नक्षत्र यथा क्रमसे लिखने ।। ७६ ।। भान्यतः साभिजियेकरेखा खेटेन विद्धभम् । पुरतः पृष्ठतोर्कीद्या दिनी लतयंति च ॥ ७७ ॥ अभिजिन सहित संपूर्ण नक्षत्र लिखने पीछे एक रेखापर दो ग्रहोंके नक्षत्र आजायें वह वैध होताहै ऐसा यह वेधदोष कहाहै । और सूर्य आदि ग्रह आगेके तथा पीछेके नक्षत्रको ताडित करते हैं वह लत्तादोष होता है उसका क्रम कहते हैं ।। ७७ ।। ज्ञराहुपूर्णेन्दुसिताः स्वपृष्ठे भं सप्तगोजातिशरैर्मितं हि ॥ संलत्तयन्तेर्कशनीज्यभौमा सूर्याष्टतऋग्नि मितं पुरस्तात् ॥ ७८ ॥ बुध,राहु,पूर्ण चंद्रमा,शुक ये,अपने पछेिके नक्षत्रोंको यथाक्रमसे सातवां, नवमां, बाईस, पांचवां नक्षत्रको ताडित करतेहैं जैसे अश्विनीपरं राहु हो तो आश्लेषाको ताडित करेगा और सूर्य शनि बृहस्पति मंगल ये आगेके नक्षत्रको यथाक्रमसे १२८१६ ३ इनको ताडित करेंगे । जैसे सूर्य अश्विनीपर हो तो अपने आगे चारहवें नक्षत्र उत्तराफाल्गुनीको ताडित करेगा शनि ८ को नाडित करेगा ऐसे यथाक्रम जानो ॥ ७८॥ सौराष्ट्रशाल्वदेशेषु ललितं भं विवर्जयेत् । कलिंगवंगदेशेषु पातितं भमुपग्रहम् ॥ ७९ ॥ आयटीकास०-अ० २९. (१६७) सौराष्ट्र व शाल्वदेशमें लत्ता दोषवर्जित है और कटिंग तथा बंगालादेशमें पातदोष वर्जित है और उपग्रह दोष ।। ७९ ॥ बाहिके कुरुदेशे च यस्मिन्देशे न दूषणम् ॥ तिथयो मासदग्धाख्या दग्धलग्नानि तान्यपि ॥ ८० ॥ बाहिक तथा कुरुदेशमें वर्जितहै तहांही दोषहै और मास दग्धा तिथि, तथा दग्धलग्न ॥ ८० ॥ मृध्यदेशे विचर्याणि न दूष्याणीतरेषु च । पंग्वंधणलग्नानेि मासशून्याश्च राशयः ॥ ८१ ॥ इनको मध्यदेशमें बन्देवे अन्य जगह दोष नहीं है और पंगु, अंधा, काणा, लग्न मासशून्य, राशि ॥ ८१ ॥ गौडमालवयोस्त्याज्याश्वन्यदेशे न गर्हिताः ॥ दोषदुष्टः सदा काले वर्जनीयः प्रयत्नतः ॥ ८२॥ ये गड तथा मालवा देशमें त्याज्य हैं अन्यजगह दोष नहीं है। दोषसे दूषित हुआ समय सदा यनसे वर्जदेना चाहिये ॥ ८२ ॥ अपि भूरगुणोऽन्यार्थे दोषाल्पत्वं गुणोदयः॥ परित्यज्य महादोषाञ्छेषयोर्गुणदोषयोः ॥ ८३ ॥ और कहीं बहुत गुण होये तथा दोष थोडा हो तह गुण दोषोंके महान् दोषको त्याग कर ।। ८३ ।। गुणाधिकः स्वल्पदोषः सकलो मंगलप्रदः । दोषो न प्रभवत्येको गुणानां परिसंचये ॥ ८४ ॥ गुण अधिक रहैं और दोष थोडे रहजायें तो वह मुहूर्त संपूर्ण मंगलदायक है बहुतगणोंके बीच एक दोष अपना बल नहीं कर सकता ॥ ८४ ॥ • • • > F; । ९३९ ॐ है। a (१६८ ) नारदसंहिता । एको यथा तोयबिंदुरुदचिषिं हुताशने । एवं संचिंत्य गणितशास्त्रोक्तं लग्नमानयेत् ॥ ८४ ॥ जैसे एकही जरी बंद बहुत बढीहुई अनिको नहीं बुझास कती तैसे ही गणितशाखको लनका बलाबल देखके विचार करना चाहिये ।। ८५ ।। तघ्नं जळयंत्रेण दद्याज्जोतिषिकोत्तमः ॥ षडंगुलमितोत्सेधं द्वादशांगुलमायतम् ॥ ८६॥ कुर्यात्कपालवत्ताम्रपात्रं तद्दशभिः पलैः ॥ पूर्ण षष्टिर्जलपलैः षष्टिर्मज्जति वासरे ॥ ८७॥ उत्तमज्योतिषी जळयंत्रसे घर्म बनाकर लग्नका निश्चय करै छह अंगुल ऊंचा और बारह अंगुळ विस्तारखळा दशपल (४० ताळे) तांबाका कपाळसरीख पात्र बनावे जो किसाठपळ (२४० तोळे) जठसे भरजावे ऐसे पात्रको जलमें गेरनेसे अहोरात्रमें ६० बार जळमें डूबेगा ॥ ८६॥८७ ॥ मषमात्रत्र्यंशयुतं स्वर्णवृत्तशलाकया ॥ चतुर्भिरंगुलैरापः तथा विद्धे परिस्फुटम् ॥ ८८ ॥ तह सोनाकी शलईसे उडदप्रमाण छिद्रका स्थान बना तहां बीचमें छिद्रकरे और चार अंगुल ऊपरतक जळभरदेना ॥ ८८ ॥ कार्येणाभ्यधिकः षङ्गिः पलैस्ताम्रस्य भाजनम् ॥ द्वादशं सुखविष्कंभ उसेधः षङ्गिरंगुलैः ॥ ८९॥ स्वर्णमासेन वै कृत्वा चतुरंगुलकास्मकः ॥ मध्यभागे तथा विद्ध नाडिका घटिका स्मृता ॥९० ॥ । भाषाटीस ०-अ० २९.(१६९) ¢ c । और छपछप्रमाणका भी ताम्रपात्र बनता है उसमें बारह अंगु लका विस्तारकरना, छह अंगुछ ऊँचा करना, चार अंगुल प्रमाण बीचमें सुवर्णका माप्ता ळगावे मध्यभागमें जळी नाडी बंधे वह घटिकायंत्र जानो ॥ ८९ ॥ ९० ॥ ताम्रपात्रे जलैः पूर्णे मृत्पात्रे वाथ वा शुभे । गंधपुष्पाक्षतैः साँडैरलंकृत्य प्रयत्नतः ॥ ९१ ॥ तंदुलस्थे स्वर्णयुते वस्त्रयुग्मेन वेष्टिते ॥ मंडलाद्धोंयं वीक्ष्य रखेस्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ९२ ॥ फिर जळसेभरे हुए तांबाके पात्रमें अथवा मिट्टीके पात्रमें गंध पुष्पादिकोंसे पूजनकर शोभितकर तंदुळ सुवर्णसे युक्कर दो वस्रोंसे आच्छादितकर (ऐसे जलके भरे हुए पात्रमें) इस घटीयंत्र आधा सूर्योदय होनेके समय छोड देखे ।। ९१ ।। ९२ ।। मंत्रेणानेन पूर्वोक्तलक्षणं यंत्रमुत्तमम् ॥ मुख्यं त्वमासि यंत्राणां ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ ९३ ॥ भाव्याभव्याय दंपत्योः कलसधनकारणम् । द्वादशंगुलकं प्रोक्तमिति शंकुप्रमाणकम् ॥ ९४ ॥ पूर्वोक्त लक्षणचाले तिस यंत्रक इस मंत्रसे छोड़े “तुम सचयंत्र के बीचमुख्य हे पहले बलाजीने ये वरकन्याके सुखदुःखके वास्ते कलसाधनके कारण कहो " और यह यंत्र नहीं बने तो बारह अंगुळका शंकु बनाकर इष्टका निश्चयकरना ।। ९३ ॥ ९४ ।। अन्ययंत्रप्रयोगा ये दुर्लभाः कालसाधने । एवं सुलग्ने दंपत्योः कारयेत्सम्यगीक्षणम् ॥ ९९ ॥ (१७० ) नारदसंहिता । अन्य यंत्रोंके प्रयोग इष्टसाधनमें दुर्लभ कहेहूँ ऐसे सुंदरश्में वरकन्याका विवाह करना चाहिये ।। ९५ ।। इस्तोच्छूितां चतुर्हस्तैश्चतुरस्रां समंततः । स्तंभैश्चतुर्भिः श्लक्ष्णैर्वा वामभागे स्वसद्मनः ॥ ९६ ॥ तहाँ एक हाथ ऊँचे चौकटी चार मंदरस्तंभोंसे शोभित वेदी घरकी बाँयीतर्फ बनानी चाहिये ।। ९६ ।। समंडलं चतुर्दिक्षु सपानैरतिशोभनम् ॥ प्रागुदक्प्रवणारंभास्तंभा हयादिभिः ॥ ९७ ॥ चारों दिशाओंमें मंडल पारीधियोंकरके शोभित बनाने चाहियें पूर्व और उत्तरी तर्फ मंडपका विस्तार करना स्तंभोंपर अधतोते आदि चित्रमोंकी शोभां करनी ॥ ९७ ॥ विचित्रित चित्रकुंभैर्विविधैस्तोरणांकुरैः । श्रृंगारपुष्पनिचयैर्वर्णकैः समलंकृताम् ॥ ९८ ॥ विप्राशीर्वचनैः पुण्यीभिर्दीपैर्मनोरमम् ॥ वादित्रनृत्यगीताचैर्दूदयनंदिनीं शुभाम् ।। ९९ ।। विचित्र कलशकरके शोभित और अनेक प्रकारको तोरण, अंकरमंगलीक पूर्णकुं पुष्यके समह तथा सुंदर रंगोंकरके शो भित, बालणोंके पवित्र आशीर्वादोंसे युक्त,सौभाग्यवती स्त्रियोंके गीतों से शोभित,दीपीकी पंक्तियोंसे मनोहरबाजा नृत्य गीत आदिकों से हृदयको आनंद देनेवाली शुभवेदी बनानी चाहिये।।९८।९९।। एवंविधां तामारोहेन्मिथुनं साग्निवेदकम् ।। त्रिषडायगताः पापाः षष्ठाष्टमं विन विधुः ॥ १०० ॥ आषाढीस -० अ० २९. ( ३७१ ) ऐसी तिस वेदीके पास अग्नि और वेदकी साक्षीसे विवाह विधि करना। विवाह समय पापग्रह ३।६।११घरमै होवे चंद्रमा छठे आठवें नहीं हो तो ॥ १०० ॥ कुर्वंत्यायुर्धनारोग्यं पुत्रपौत्रसमन्विताः ॥ त्रिकोणकेंद्रखध्याये शुभं कुर्वंति खेचराः ॥ १०१ ॥ आयु, धन, आरोग्य पुत्रपौत्रोंकी समृद्धि करते हैं और ९॥५ १ ०१३।११ इन घरमें सबसह शुभफल करते हैं ॥ १०१ ॥ यूनकेंद्रभगं शुकं हित्वा पुत्रधनान्विताम् ।। धूनत्रिबंधुतनयधर्मखायेषु चंद्रमाः ।। १०२ ।। और सातवें घरबिना अन्यकेंद्रमें शुक शुहै पुत्र धनवती कन्य होती है और २।३।४।५९।१०। ११ इन घरोंमें चंद्रमा शुभ है ॥ १०२ ॥ करोति सुतसौभाग्यभोगयुक्तां विवाहिताम् ॥ अस्तगा नीचगः शत्रुराशिगश्च पराजिताः ॥१०३ ॥ विवाहिता कन्याको पुत्रवती व सौभाग्य भोगवती करता है। और अस्तहुए नीचराशिके शख़ुकी राशिमें प्राप्तहुए ग्रह पराजित (हरे हुए ) हैं ॥ १०३ ॥ नाशक्तास्ते फलं दातुं दानमश्रोत्रिये यथा ॥ गुरुरेकोपि लग्नस्थः सकलं दोषसंचयम् ॥ १०४ ॥ विनाशयति धर्मगुरुदितस्तिमिरं यथा ॥ कोपि लग्नगः काव्यो बुधो वा यदि लग्नगः ॥ १०९ ॥ ९ {१७२ ) नारदसंहिता । वे इसप्रकार फल देनेको समर्थ नहीं हैं कि जैसे मूत्रं बाह्मणको दान देनेका फछ नहीं है, अकेलाभी गुरु टलमें स्थित हो तो संपूर्ण दोषंको ऐसे नष्ट करता है कि जैसे सर्वे अंधेरेको नष्टकरता है। और उनमें प्राप्तहुआ अकेला शुक्र अथवा बुध ।१०४॥१०५॥ नाशयत्यखिलान्दोषांस्तूलराशिमिवानलः ॥ गुरुरेकोपि केन्द्रस्थः शुक्रो वा यदि वा बुधः ॥१०६॥ संपूर्ण दोषको ऐसे नष्ट करताहै कि जैसे रूईकी राशिको अग्नि नष्ट करदेवे अकेळा बृहस्पति वा बुध तथा शुक केंद्र हो तो ॥ १०६ ।। दोषसंघान्निहंत्येव केसरीवेभसंहतिम् ॥ दोषाणां शतकं हंति बलवान् केंदगो बुधः ॥ १०७ ॥ शुनोऽपहाय वै छूनं द्विगुणं लक्षमंगिराः ॥ लग्नदोषश्च दोषा ये दोषा षडर्गजाश्च ये ॥१०८॥ दोषोंके समहको ऐसे नष्टकरताहै जैसे सिंह हाथियोंके समूहको नष्टकर देता है तैसेही बलवान् केंद्में प्राप्तहुआ बुध सैकडों दोषोंको नष्टकरता है शुक सातौं घरके बिना अन्यकेंद्रमें हो तो बुधसे दूना शुरु फळ करता है । और वृहस्पति लाख दोषको नष्ट करता है जो लपके दोष हैं और इसे उत्पन्नहुए दोष हैं ।। ३ ०७ । १ ०८ ।। हंति तेंझिन्नगो जीवो मेघसंघमिवानिलः ॥ केंद्रत्रिकोणगे जीवे शुक्रो वा यदि वा बुधः ॥ १०९ ॥ भाषाढीस०-अ० २९ ( १७३ ) ७ तिन सबदोषोंको लनमें प्राप्तहुआ बृहस्पति ऐसे नष्ट करता है कि जैसे बादलोंके समूहूको वायु खंडित करदेती है । बृहस्पति अथवा शुक्र तथा बुध केंऽमें तथा नवमें पांचवें घरमें होवे तो ॥ १०९ ॥ दोषा विनाशमायांति पापानीव हरिस्मृतेः । गुरुर्बली त्रिकोणस्थः सर्वदोषविनाशकृत् ॥ ११० ॥ सव दोष ऐसे नष्ट होजाते हैं कि जैसे विष्णुके स्मरण करनेसे पाप नष्ट होजाते हैं । बढी गुरु नवमें पांचवें घरमें होय तो संपूर्ण दोषोंको नष्ट करता है ॥ ११० ॥ निहंति निखिलं पापं प्रणाममिव शूलिनः॥ मुहूर्तपाषषट्सकुनवांशग्रहस्थिताः ॥ १११ ॥ जैसे शिवजीको प्रणाम करनेसे संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं और मुहूर्ते दोष, पापषड्र्ग,कुनवांशक आह इनसे उत्पन्न हुए दोष ३११॥ ये दोषास्तान्निहंत्येव यथैकादशगः शशी ॥ नाशयत्यखिलान्दोषान्यत्रैकादशगो रविः ॥ ११२ ॥ तिन संपूर्ण दोषोंको लभसे ग्यारहवें स्थानसे प्राप्तहुआ चंद्रमा दूर करता है अथवा ग्यारहवें स्थानमें प्राप्तहुआ सूर्यभी संपूर्ण दोषों को नष्ट करता है । ११२ ॥ गंगायाः स्रानतो भक्त्या सर्वपापानिवाचिरात् ॥ वायूपसूर्यनीहरमेघगर्जनसंभवाः॥ ११३ ॥ दोषा नाशं ययुः सर्वे केन्द्रस्थाने वृहस्पतौ ॥ ये दोषा मासदग्धास्तिथिललसमुद्भवाः ॥ ११४ ॥ (१७४ ) नारदसंहिता । ७ ओर वायप्रतिसूर्य,धूम,रज,मेघगर्जना इत्यादि दोष केंद्रस्थानमें बृहस्पति होनेसे ऐसे नष्ट होजाते हैं कि जैसे भक्तिरसे गंगानीमें स्नान करनेसे शीघही पाप नष्ट होते और जो मासदग्ध, तिथि दग्ध तथा लग्नदग्ध आदिदोष हैं ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ ते सर्वे विलयं यांति केंद्रस्थाने बृहस्पतौ ॥ बलवान् केंद्रगो जीवः परिवेषोत्थदोषहा ॥ ११४ ॥ वे संपूर्ण केंद्रस्थानमें बृहत्क्षति प्राप्त होने से नष्ट होते हैं और केंद्रमें प्राप्तहुआ बृहस्पति सूर्यमंडळ आदि उत्पात दोषको नष्ट करता है ॥ ११५॥ एकादशस्थः शुको वा बलवाञ्छुभवीक्षितः । त्रिविधोत्पातजान् दोषान् हंति केंद्रगतो गुरुः॥ ११६ ॥ ग्यारहवें स्थानमें प्राप्तहुआ शुभग्रहतं दृष्ट बलवान् शुक्र वा केंद्र बृहस्पति तीन प्रकारके उत्पातसे उत्पन्न हुए दोषोंको नष्ट करता है ॥ ११६ ॥ स्थानादिबलसंपूर्णः पिनाकी त्रिपुरं यथा ॥ लग्नलग्नांशसंभूतान् बलवान्केंद्रगो गुरुः ॥ ११७ ॥ स्थानादि वळसे पूर्णहुआ बलवान् तथा केंद्र में प्राप्तहुआ बृहस्पति लग और लपके नवांशकसे उत्पन्न हुए दोषोंको ऐसे नष्टकरता है कि जैसे शिवजीने त्रिपुर भस्म कियथा ॥ ११७ ।। भस्मीकरोति तान्दोषानिंधनानीव पावकः ॥ अब्दयनर्तुमासोत्था ये दोषा लग्नसंभवाः ॥ सर्वे ते विलयं यांति केंद्रस्थाने वृहस्पतौ ॥ ११८ ॥ भाषाटीकाक्ष०-अ० २९. ( १७५) और केंद्रस्थानमें बृहस्पति होवे तो वर्ष, अयन, अतुमासरॉय इनसे उत्पन्न हुए दोष ऐसे नष्ट होजाते हैं कि जैसे अक्षि इंधनको भस्म करदेती है ।। ११८॥ उक्तानुक्ताश्च ये दोषास्तान्निहंति बली गुरुः । केंद्रसंस्थः सितो वापि भुजंगं गरुडो यथा ।। ११९॥ केंद्रमें स्थित हुआ बली गुरु अथवा शुक्र कहे हुए अथवा विनाकहे हुए छोटे मोटे दोषको ऐसे नष्ट कर देता है कि जैसे गरुड सर्पको नष्ट करता है । ११९ ।। वर्गोत्तमगते लग्ने सर्वे दोषा लयं ययुः ॥ परमाक्षरविज्ञाने कर्माणीव न संशयः ॥ १२० ॥ लग्न वर्गोत्तममें प्राप्तहेवे तो सब दोष ऐसे नष्ट होजावें कि जैसे बलज्ञानसे कर्मवासना नष्ट होजाती है । । २२० ।। दुःस्थानस्थग्रहकृताः पापखेट्समुद्भवा। ते सर्वे लयमायांति केन्द्रस्थाने बृहस्पतौ ॥ १२१॥ दुष्ट स्थांनमें स्थित हुए ग्रहोंके किये हुए दोष तथा पापग्रहोंके किये हुए सच दोष केंद्रस्थानमें बृहस्पति स्थित होनेसे नष्ट होजाते हैं ॥ १२१ ॥ उच्चस्थो गुरुरेकोपि लग्नगो दोषसंचयम् ॥ हंति दोषान् हरिदिने चोपवासव्रतं यथा ॥ १२२ ॥ उच्चरारोपर स्थितहुआ बृहस्पते अलाही जो लझमें प्राप्त होय तो दोषोंके समुहको ऐसे नष्ट करता है कि जैसे एकादशीका व्रत करनेसे पाप नष्ट होते हैं ।। १२२ ।। (१७६ ) नारदसंहिता । अष्टधा राशिकूटं च स्त्रीदूरगणराशयः ॥ राशीशयोनिवणंख्यशुद्धचेत् पुत्रपौत्रदाः ॥ १२३ ॥ आठप्रकारका राशिकूट नंदूर, गणराशि, राशिस्वामी, योनि, वर्ण ये शुद्ध होवें तो पुत्र पैौत्रदायक कहे हैं ॥ १२३ ॥ एकराशौ पृथग् धिष्ण्ये दंपत्योः पाणिपीडनम् ॥ उत्तमं मध्यमं भिन्नराश्चैकलैजयोस्तयोः ॥ १२४ ॥ एकराशीि हों और जुदा २ नक्षत्र हो तो कन्य ३ वरका विवाह करना ( योग्य है) उत्तमहै और राशि जुदी २ हो नक्षत्र एक ही हो तो मध्यम जानना ॥ १२४ ॥ एकसँ वेकराशौ च विवाहः प्राणहानिदः ॥ स्त्रधिष्ण्यादाद्यनवके स्त्रीदूरमतिनिंदितम् ॥ १२६ ॥ और एक ही नक्षत्र तथा एकही राशि हो तो विवाह करनेमें प्राणहानि होती है बकिं नक्षत्रसे नव नक्षत्रोंके भीतर ही पुरुषक= नक्षत्र होय तो वह स्त्री दूर, अत् िनिंत् िहै ॥ १२५ ॥ र्हतय मध्यमं श्रेष्ठं तृतीये नवके भृशम् । तिस्रः पूर्वोत्तरा धातृयाम्यमाहेशतारकाः॥ १२६॥ और उसमें आगेके नव ९ नक्षत्रोंमें द्वितीय नवकमें पुरुषक नक्षत्र हो तो मध्यम फल जानना। तिसके आगेले नव नक्षत्रोंमें हो तो अत्यंत शुभफल जानना । और तीनों पूर्वातीनों उत्तरा,रोहिणी भरणी ॥ १२६ ॥ इति मर्यगणो ज्ञेयः स्यादमर्यगणः परः ॥ इयादित्यर्कवाय्विज्यमित्रेन्दुविष्णु चान्यभम्॥१२७॥ A भाषटकास ०-अ० २९. ( ३७७) ये मनुष्पगण जानने और आश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, स्वाति, पुष्य, अनुराधा, मृगशिर, श्रवण, रेवती देवतगण है ॥ १२७ ॥ रक्षोगणः पितृत्वाष्ट्रद्विदैवानींद्रतारकाः॥ वसुतोयेशमूलाहितारकाभिर्युतोऽनलः ॥ १२८॥ मुघ, चित्र, बिशाख, ज्येष्ठा, धानिष्ठा, शतभिषा, मूल, आश्लेषा, कतिका ये राक्षसगण है ॥ १२८ ॥ दंपत्योर्जन्मभमेकगणे प्रीतिरनेकधा । मध्यमा देवमर्थानां राक्षसानां तयोर्युतिः ॥ १२९ ॥ स्त्री पुरुषको एक गण होय तो अनेक प्रकार उत्वम् औति रहै । देखता तथा मनुष्यकी मध्यम श्रीते रहे । राक्षस तथा देवगणका क- लह रहे । राक्षस और मनुष्यगण होय तो दोनोंकी मृत्यु हो।। १२९॥ मृत्युः षष्टाष्टके पंच नवमे त्वनपत्यता ॥ नेष्टं छिद्रदशेन्येषु दंपत्योः प्रीतिरुत्तमा ॥ १३० ॥ स्त्री पुरुषकी राशि परस्पर छठे आठवें हो तो मृत्यु हो, पांचवें नवमें स्थानपर हो तो संतान नहीं हो और परस्पर दूसरे बारहवें राशि होय तौ भी शुभ नहीं है अन्यराशिशु है। अन्यराशियोंमें स्त्री पुरुषकी उत्तम प्रीति रहती है ॥ १३० ॥ एकाधिपे मित्रभावे शुभदं पाणिपीडनम् ॥ द्विदशे त्रिकोणे च न कदाचित् षडष्टके ।। १३१ ॥ शठ्षष्ठाष्टके कुंभकन्ययोर्घमीनयोः ॥ वामोक्षयोर्युयुक्कीटभयोः कुंभकुलीरयोः॥ १३२ ॥ १२ ( १७८ ) नारदसंहित । क = पंचास्यमृगयोश्चैव निंदितं तदतीव तु ॥ सितार्कज्येभौमसो रिपुमित्रसमा रखेः ।। १३३ ॥ शत्रु षडाष्टकमें प्राप्त तथा अशुभराशियोंको कहतेहैं। कुंभकन्या, कुंभमीन, कन्यावृष, मिथुनवृश्चिक, कुंभकर्क, सिंहकर, ये राशि कन्याबरकी परस्पर होवें तो अत्यंत निंदित हैं और शुक शनि सूर्यके शत्रु हैं । बृहस्पति, चंद्रमा, मंगल मित्र हैं तथा बुध सम है ॥ १३१ ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ इन्दनं शत्रुरर्कज्ञौ कुजेज्यभृगुसूर्यजाः ॥ कुजस्य झर्कचंद्रज्याः शुक्रसूर्यसुतौ क्रमात् ।। १३ ।। चंद्रमाके शत्रु कोई नहीं है सूर्य बुध मित्र हैं। और मंगल, गुरु शुक भूये ये सम हैं । मंगळका बुध शत्रु है । । सूर्य, चंद, गुरु ये । मित्र हैं। शुक्र शनि सम हैं। १ ३४॥ ज्ञस्यैदुरर्कौ च कुजजीवशनैश्चराः ॥ गुरोर्जशुक्रौ सूर्येन्दुकुजाः स्युर्भास्करात्मजः ॥ १३॥ - बुधका चंद्रमा शत्रु है, सूर्य शुक मित्र और मंगलगुरुशनि ये सम हैं। बृहस्पतिका बुध तथा शुक्रशत्रु हैं । सूर्य, चंद्रभा, मंगल, ये मित्र हैं शनि सम है । १३५ ॥ शुक्रस्येंदुरखी खाली कुजदेवेशयूजितौ ॥ शनेरकन्दुपत्रा ज्ञशुक्र देवपूजितः॥१३६ ।। शुक्रके चंद्रमा सर्यं शत्रु हैं, बुधं शनि मित्र और मंगळ बृहस्पति सम हैं । शुनिके सूर्य, चंद्रमा ये शत्रु हैं, बुध शुछ मित्र हैं, बृह क्षति सम है ॥ १३६ ॥ इति० ॥ भाषाटीकास ०-अ० २९. (१७९) अथ योनिः। अभमेषसपहिश्चोतुमेषोतुमूषकाः ।। आखुर्गामहिषव्याघ्रः श्वद्विड् व्यात्रो मृगद्वयम् ॥१३७॥ श्वनोःकपिर्बध्युग्भं कपिसिंहतुरंगुमाः ॥ सिंहगोहस्तिनो भानामेषां योनिर्यथाक्रमात् ॥ १३८ अध १ हस्ती २ मेष ३ सयं ४ सर्प ५ श्वन ६ मार्जार ७ मेष ८ मार्जार ९ मेष १० मषक मूषक ११ गौ १२ महिष १३ व्याघ १४ महिष १५ व्याघ १६ मृग १७ सृग १८ श्श्वन १९ वानर २० नकुळ २१ नकुल २२ वानर २३ सिंह २४ अश्व २५ सिंह २६ गौ २७ हस्ती २८ ऐसे ये अश्विनी आदि नक्षत्रोंकी योनि यथाक्रभसे जननी ।। १३७ ॥ १ ३८ ॥ वैरं बधूर्गमेषवानरं सिंहदंतिनम् ॥ गोब्य।त्रमाखुमार्जारं महिषधं च शात्रवम् ॥ १३९ ॥ तहां नकळ सर्षक बैर है, और मेष वानरका वैर है, सिंह हस्तीका वैर है, गौ व्याघका और मषक मार्जार तथा महिष अश्वका वैर है ॥ १३९ ॥ इति । । अथ वर्णविचारः।। मीनालिकर्कटा विप्राः क्षत्री मेद्यो हरिर्धनुः । शूदो युग्मं तुलाकुंभौ वैश्यः कन्या वृषो मृगः।।११० ॥ (१८० ) नारदसंहिता । मीन वृश्चिक कहें ये बालणवर्ण हैं, मेष सिंह धनु क्षत्रीवर्ण हैं, मिथुन तुळा कुंआ, शूद्रवर्ण हैं कन्या, वृष, मकर वैश्यवर्णहैं१४०॥ ( नोत्तमामुद्वहेत्कन्यां निणों वरः सदा ॥ आयमध्यान्त्यचरममध्याद्य ह्यश्विनीमात् ।। ) गणयेत्संख्यया चैकनाड्यां मृत्युर्न पार्श्वयोः । प्राजापत्यत्राह्मदैवा विवाहार्षकसंयुताः॥ १४१ ॥ उत्तमवर्षे कन्याओं हीनवर्ण वाळे वरको विवाह नहीं करना चाहिये। और अश्विनी आदि नक्षत्रकी क्रमसे आद्य मध्य अंत्य, अंत्य मध्य आयआय मध्य अंत्य, ऐसे नाड़ी होती हैं तहां एक नाड़ीमें विवाहकरे तो मृत्यु हो । पृथक् नाड़ी रहनेमें कुछ दोष नहीं है और प्राजापस्य, बल, दैव, आर्ष ये विवाह श्रेष्ठ कहे हैं १४१।। उक्तकाले तु कर्तव्याश्चत्वारः फलदायकाः ॥ आसुरो द्रविणादानापैशाचः कन्यकाछलात् ॥१४२॥ ये चार प्रकारके विवाह उक्तकालमें (शुभं मुहूर्तमें ) करनेसे अच्छा फल प्राप्त होता है जो द्रव्यलेकर कन्याका पिता विवाहकरै वह आसुरर्विवाह है। जो वर छलसे कन्याको हर ठेजाय वह पैशाच विवाह है ॥ १४२ ॥ राक्षस युद्धहरणाङ्गांधर्वः समयान्मिथः ॥ गांधर्वासुरपैशाचराक्षसाख्यास्तु नोत्तमाः ॥ १४३ ॥ युद्धमें जीतकर कन्याको लेजाय वह राक्षस विवाह, घर कन्या आपसमें बतलाकर विवाह करलें वह गंधर्व विवाह है, गांधर्व, आ सुर पैशाच, राक्षस ये विवाह पहलोंके समान उत्तम नहीं हैं३४३॥ आषाढीकास ०-अ० २९. ( १८१ ) चतुर्थमभिजिन्मुदयश्नत्तु सप्तमम् ।। गोधूलिकं तदुभयं विवाहे पुत्रपौत्रदम् ॥ १६४ ॥ सूर्यके उदयशंसे चौथालन अभिजित् संज्ञहै और सातवां यन्न गोधूलिक संज्ञक है ये दोनों सम विवाहमें पुत्र पौत्रदायकहैं ॥ १४४॥ प्राच्यानां च कलिंगानां मुख्यं गोधूलिकं स्मृतम् ॥ अभिजित्सर्वदेशेषु मुख्यं दोषविनाशकृत् ॥ १४४॥ पूर्ववासी तथा कलिंगदेश निवासी जनोंको गोधूलिक लग्न शु- कहा है अभिजिव उन सबदेशोंमें मुख्य है सच दोषोंको नष्ट करने वाला है ॥ १४५ ॥ मध्यंदिनगते भानौ मुहूतभिजिताह्वयः ॥ नाशयत्यखिलान्दोषान्पिनाकी त्रिपुरं यथा ॥ १४६ ॥ मध्याह्नसमयमें अभिजित् नामक मुहूर्ते आता है वह संपूर्ण दोषोंको ऐसे नष्ट करता है कि जैसे महादेवजीने त्रिपुर दग्ध किया था ॥ १४६ ॥ मध्यंदिनगते भानौ सकलं दोषसंचयम् ॥ करोति दोषमभिजितूलराशिमिवानलः ॥ १४७ ॥ मध्याह्नसमयमें प्राप्त हुआ अभिजिव संपूर्ण दोषोंको ऐसे नष्ट क- रताहै कि जैसे रुईकी राशिको अभि नष्ट करदेता है । । १४७ ।। दैत्येकश्च महादोषो गुणलक्षमपीह सः ॥ पावने पंचगव्यं तु पूर्णकुंभं सुरालयम् ॥ १४८॥ AP (१८२ ) नारदसंहिता । औरै जो एकभी कोई महान् दोष हो तो वह लाखों गुणोंको ऐसे नष्ट करता है कि जैसे पवित्र पंचगव्यके कलशको मदिराका कणक अशुद्ध करदेवे ॥ १४८ ॥ पुत्रोद्वाहात्परं पुत्रीविवाहो न तुत्रये ॥ न तयोर्घतमुद्वाहान्मंगले नान्यमंगलम् ॥ १४९॥ पुत्र विवाहसे पीछे छहृमहनेतक पुत्रका विवाह नहीं करना तीन पुत्र पुत्रियोंके विवाह पछेि छह महीनोंतक कोई बत तथा अन्यमंगलभी नहीं करना चाहिये ।। १४९ ।। विवाहश्चैकजन्यानां षण्मासाभ्यंतरे यदि । असंशयं त्रिभिवर्षेस्तत्रैका विधवा भवेत् ॥ १४० ॥ एक उदरखाली बहनोंका विवाह छहमर्हनिोंके भीतर होय तो तनिवर्ष भतिर एकजनी विधवा होये ॥ १५० ॥ प्रत्युद्वाहो नैष कायों नैकस्मै दुहितुर्जेयम्॥ न चैकजन्मनोः पुंसोरेकजन्ये तु कन्यके ॥ १९३ ॥ विवाहमें दूसरा विवाह नहीं करना एकवरके वास्ते दो कन्या साथही नहीं विचाहनी और एज उदरवे दो भाइयोंको एउदरकी दो बहनें नहीं विवाहनी ।। १५१ ॥ नैवं कदाचिदुद्वाहो नैखा मुंडनद्वयम् । देवाजातस्तु पितरं राज्ञौ तु जननीं तथा ॥ १५२॥ आत्मानं संध्योर्हति नास्ति गंडे विपर्ययः ॥ सुतः सुता वा नियतं श्वशुरं हंति मूलजाः ॥ १९३ ॥ भाषाटीस०-अ० २९. (१८३ ) ५ एकवार दोविवाहएकवार दोओंश मुंडन, नहीं कराना अब गंडांत जन्मक विचार कहतेहैं। दिनमें जन्म होय तो पिताको नष्ट करे रात्रिमें जन्म होय तो माताको नष्ट करे संधियोंमें जन्म हो तो आत्माको [आपको नष्ट कैरै गंडांत नक्षत्रमें अन्य विपर्यय नहींहे मूलनक्षत्रमें उस न पुत्री अथवा पुत्र अपने श्वशुरको नष्ट करते हैं।१५२।१५३। तदंत्यपादजो नैव तथाश्लेषाद्यपादजः ॥ ज्येष्ठांत्यपादजो ज्येष्ठं हंति बालो न बालिका॥१९१ ॥ मूलनक्षत्रके अंयचरणमें जन्मे तो दोष नहीं है और आश्लेषाके आयचरणमें दोष नहींहैं, ज्येष्ठां नक्षत्रको अंत्यचरणमें जन्माहुआ पुत्र बडेभाईको नष्ट करता है और कन्या जन्में तो यह दोष नहीं है१५४ बालिका मूलऋक्षे तु मातरं पितरं तथा । ऐन्द्री धवाग्रजं हंति देवरं तु द्विदैवजा॥ १९४ मूळनक्षत्रमें कन्या जन्में तो माता पिताको नष्ट करती है और ज्येष्ठानक्षत्रमें जन्में तो अपने ज्येष्ठको नष्ट करती है बिशाखमें जन्में तो देवरको नष्ट झरे ॥ १५५ ॥ इति ॥ स्वस्थे नरे सुखासीले यावत्स्पंदति लोचनम् । तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ॥ १४६ स्वस्थसुखसे बैठे हुए मनुष्पकी आंखिझिमैं ऐसा प्रल संज्ञक काल है तिसका तीसवाँ हिस्सा तत्परसंज्ञक कहा है ॥ १५६ ॥ तपराच्छतगो भागवटिरित्यभिधीयते ॥ नृटेः सहस्रगो यशो लग्नकालः स उच्यते ॥ १९७ ॥

  1. A (१८४ )

नारदसंहिता । देवोपि तन्न जानाति किं पुनः प्राकृतो जनः॥ स कालोथान्यकालो वा पूर्वकर्मवशाद्भवेत् ॥ १९८ ॥ तत्परसे समाँ हिस्सा बुटि है, त्रुटिसे हजारवाँ हिस्सा रुभकाळ कहा है उसको देवता भी नहीं जाने फिर प्राकृत मनुष्य तो क्या जान सके वह लुप्तकाल अथवा अन्यकाल पूर्वकर्म वशसे आपही प्राप्त होजाता है ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ निमित्तमात्रं दैवज्ञस्तद्वशान्न शुभाशुभम् । न्यग्रोधखदिराश्वत्थरक्तचंदनवृक्षजाः ॥ १६९ ॥ श्रीखंडागरुदंतस्थं शुभशंकुमकल्मषम् ॥ द्वादशांगुलमुत्सेधं परिणाहे षडंगुलम् ॥ १६० ॥ तह्नां ज्योतिषी तो निमित्तमात्र है तिसके वशसे कुछ शुभ अशुभ फल नहीं होता तहां बडु, मैर, पीपळ, काळचंदन, नारियल्, अगर इनवृझोंका अथवा हस्तीदंतका शुभ पवित्र शंकु बारह अंमुलका ऊंचा और छह अंगुळ मोटाईका बनावे १५९॥ १६०॥ एवं लक्षणसंयुक्तं कल्पयेत्कालसाधने । आरभ्योद्वाहदिवसात्षष्ठे वाप्यष्टमे दिने ॥ १६१ ॥ ऐसे लक्षणयुक्त शंकुको कालसाधनमें बनावे विवाहदिनसे छठे दिन वा आठवें दिन ॥ १६१ ।। आषाढीकास०-अ० ३०: (१८५) वधूप्रवेशः संपत्यै दशमेथ समे दिने ॥ ययनं द्वितयं जन्ममासा दिवसानपि ॥ संत्यज्य प्रतिशुक्रोषि यात्रा वैवाहिकी शुभा॥ १६२ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां विवाहाध्याय एकोनत्रिंशत्तमः ॥ २९ ॥ वधूप्रवेश करना दशवेंदिन अथवा समदिनमें शुभ है और दोनों अयन वरकन्याके जन्मका मास व दिन सन्मुख शुक्र इनको त्यागकर विचढ़कर बहू लानेकी यात्रा शुभ कही है ॥ १६२ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितासापुटीकायां विवाहाध्याय एकोनत्रिंशत्तमः ॥ २९ ॥ श्रीप्रदं सर्वगीर्वाणस्थापनं चोत्तरायणे । गीर्वाणपूर्वगीर्वाणमंत्रिणोर्दश्यमानयोः ॥ १ ॥ उत्तरायण सूर्यंमें संपूर्ण देवताओंका स्थापन करना शुभ है गुरु शुका उदय होना शुभ है ।। १ ।। विचेंत्रेष्वेवमासेषु माघादिषु च पंचसु । शुक्ळपक्षेषु कृष्णेषु तदादि पंचसु स्मृतम् ॥ २ ॥ चैत्रविना माघ आदि पांचमहीनों देवप्रतिष्ठा करनी शुभ है शुक्ल प्रक्षमें अथवा कृष्णक्षमें पंचभीतक देखाप्रतिष्ठा करनी शुभ है ॥ २at दिनेषु यस्य देवस्य या तिथिस्तत्र तस्य च । द्वितीयादिद्वयोः पंचम्यादितस्तिसृषु क्रमात् ॥ ३ ॥ (१८६ ) नारदसंहिता । जिसदेचकी जो तिथ है उसी तिथिको प्रतिष्ठ करनी भी शुभ है और द्वितीया आदि दो तिथि पंचमी आदि तीन तिथि कमसे शु। ।। ३ ।। दृशम्यादेश्चतसृषु पौर्णमास्यां विशेषतः । त्रिरुत्तरादितिधत्यहस्तत्रयगुरूडुषु ॥ ४ ॥ दशमी आदि चार तिथि पौर्णमासी विशेषतासे शुभहै तीनों ४ ।। उत्तरा, पुनर्वसु, रेवती, हस्त आदि तीनपुष्य इन नक्षत्रोंमें।। साखिधातृजलाधीशद्दरिमित्रवसुष्वपि । कुजवर्जितवारेषु कर्तुः सूर्यबलप्रदे ॥ ९ ॥ तथा अश्विनी, रोहिणी, शतिष, अषण, अनुशथ, धनिष्ठा इन नक्षत्रोंमें तथा मंगल बिना अन्य वार कर्ताको सूर्य बलदायक होनेमें ॥ ५ ॥ चंद्रताराबलोपेते पूर्वोक्ते शोभने दिने । शुभलग्ने शुभांशे च कर्तुर्न निधनोदये ॥ ६ ॥ चंद्र ताराबल युक्त दुपहर पहिये शुभदिन, शुभलग्नमें, शुभ नवां- शक्रमें कतको अष्टम राशि अष्टम लम शुद्ध होने सम्य ।। ६ ।। राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः । शुभग्रहयुते लग्ने शुभग्रहयुतेक्षिते ॥ ७ ॥ सब ही राशि शुभग्रहोंकी दृष्टि होनेसे शुभ कही हैं। शु। अहते युक्त तथा लग्न होना चाहिये ॥ ७ ॥ । राशिः स्वभावजं हित्वा फलं शहजमाश्रयेत् । अनिष्टफलः सोपि प्रशस्तफलदः शशी ॥ ८ ॥ भाषाटकस०-अ० ३ ७, ( १८७ ) सौम्यसैंगोधिमित्रेण गुरुणा व विलोकितः ॥ पंचेष्टिके शुभे लग्ने नैधने शुद्धिसंयुते ॥ ९ ॥ लम् राशि स्वभावज फलको त्यागकर ग्रहोंसे उत्पन्न हुआ कल करती है और अशुन चंद्रमाभी शुक्र ग्रहले घरमें हो, मित्रसे | गुरुसे दृष्ट होय तो शुभदायक है और पंचांग शुद्धियुक्त लश

  1. अष्टमे स्थान शुद्ध होनेके समय प्रतिष्ठा करनी शुभ है।८॥९॥

लग्नस्थाः सूर्यचंद्रराहुकेत्वर्कसूनवः । कर्तृमृत्युप्रदाश्चान्ये धनधान्यसुखप्रदाः ॥ १० ॥ ठभमें स्थित सूर्य, चंद्रमा, राहु, केतु, शनि ये कर्ताकी मृत्यु करते हैं अन्य ग्रह धन धान्य सुखदायक हैं ।। १० ।। द्वितीये नेष्टदाः पापाः शुभाश्चैव वित्तदाः ॥ तृतीये निखिलाः खेटाः पुत्रपौत्रसुखप्रदः ॥ ११ ॥ दूसरे घर पाप ग्रह शुभ नहीं हैं और शुभग्रह तथा चंद्रमा धन दायक है तीसरे घर संपूर्ण ग्रह पुत्र पौत्र सुखदायक हैं ।। ११ ।। चतुर्थे सुखदाः सौम्याः कूर्मुश्च दुःखदाः ॥ हानिदः पंचमे कूराः सौम्याः पुत्रसुखप्रदाः ॥ १२ ॥ चौथे वर सौम्यग्रह शुभदायक हैं, क्रूर ग्रह और चंद्रमा दुःख दायक हैं, पांचवें क्रूरग्रह हानिदायक हैं शुभ ग्रह पुत्र सुख दायक हैं ।। १२ ॥ पूर्णः क्षीणः शशी तत्र पुत्रः पुत्रनाशनः ।। षष्ठे शुभाः शष्टदाः स्युः पापाः शत्रुञ्जयप्रदाः ॥ १३ ॥ १८८ ) नारदसंहिता । पूर्णचंद्रमा ५ हो तो पुत्रदायक, क्षीण हो तो पुत्रनाशक है, छठे घर शुभ ग्रह शत्रु उत्पन्न करते हैं और पापग्रह शत्रुको नष्ट करते हैं । १३ ॥ पूर्णः क्षीणोपि वा चंद्रः षष्ठेखिलरिपुक्षयम् । करोति कर्तुरचिरादायुपुत्रधनप्रदः ॥ १६ ॥ छठे घर चंद्रमा प्रतिष्ठा करनेवालेले शत्रुओंको शीघ्र ही नष्ट करता है और आयु, पुत्र, धन दायक है ।। १४ ।। व्याधिदाः सप्तमे पापाः सौम्याः सौम्यफलप्रदाः ।। अष्टमस्थानगाः सर्वे कर्तृ मृत्युप्रदा ग्रहः ॥ १९॥ सातौं घर पापग्रह व्याधिदायक है और शुग्रह शुभफल दायक है प्रतिष्ठा ठग्नसे अष्टमस्थानमें प्राप्त हुए संव ग्रह कनीकी मृत्यु करते हैं ॥ १५ ॥ में पापा नंति सैम्याः शुभदः शुभदः शशी ॥ भंगः कर्मगाः पापाः सौम्याघ्रद्रश्च कीर्तिदाः। १६ ॥ नवमें घर पापग्रह अशुभ हैं शुनं ग्रह और चंद्रमा शुदायक हैं । दशव पापग्रह और चंद्रमा अशु हैंशुभग्रह कर्तिदायक हैं १६ लाभस्थानगताः सर्वे भूरिलाभप्रदा ग्रहाः ।। व्ययस्थानगताः १४इहुव्ययकरा ग्रहः ॥ १७ ॥ छाअस्थानमें प्राप्त हुए सी यह बहुत लाभदायक हैं बारहवें घर सभी यह निरंतर बहुत खर्च करवाते हैं । १७ ।। गुणाधिकतरे लग्ने दोषपवतरे यदि । सुराणां स्थापनं तत्र कर्तुरिष्टार्थासद्धिदम् ॥ १८ ।। भाषाटीकास ०--अ० ३१.८ ( १८९ जिस लभमें गुण आधिक हों दोष थोडे होवें विसमें देवताकी प्रतिष्ठा करनेवाले मनुष्यके मनोरथ सिद्ध होते हैं ।। १८ ।। हंत्यर्थहीना कर्तारं मंत्रहीना तु ऋत्विजम् ॥ श्रियं लक्षणहीना तु न प्रतिष्ठासमो रिपुः ॥ १९ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां सुरप्रतिष्ठा- ध्यायस्त्रिंशत्तमः ॥ ३० ॥ उद्यहीन प्रतिष्ठा यजमानको नष्ट करती है, मंत्रहनि प्रतिष्ठा आचार्यको नष्ट करती है, ल्क्षणहीन प्रतिष्ठा लक्ष्मीको नष्ट करती है। इसलिये हीन रही प्रतिष्ठाके समान कोई शत्रु नहीं है ।। १९ ।। इति श्रीनारदीयसंहिताभाटीकायां सुर प्रतिष्ठाध्यायत्रिंशत्तमः ।। ३० ।। | अथ वस्तुप्रकरणम् । निर्माणे पत्तनम्रामगृहादीनां समासतः। क्षेत्रमादौ परीक्षेत गंधवर्णरसप्लवैः ॥ १ ॥ शहर, ग्राम, घर इन्होंने रचने (चिनने ) के समयके संक्षेपमात्रसे पहिले गंध, वर्ण, रसप्लुव (डुळाई ) इन्ह करके क्षेत्रकी अर्थात् भूमिस्थळकी शुद्धि करनी चाहियें ॥ १ ॥ मधुपुष्पाम्लपिशितगंधान् विप्रानुपूर्वकम् ॥ सितरक्तेशहरितकृष्णवर्णं यथाक्रमात् ॥ २ ॥ बालणके वास्ते मधु (शहद ) समान सुगंधिवाली, क्षत्रियोंको पुष्प समान सुगंधिवादी, वैश्यको सट्टी (कॅजी) समान सुगंधिवाडी, ( १९० ) नारदसहिता । शृङ्गको मांससमान सुगंधिवाली भूमि शुभहे और वेत, लालहरा, काळा ये भूमिके रंग ब्राह्मणादिकोंको यथा क्रमसे शुभ हैं। २ ॥ मधुरं कटुकं तिक्तं कषायश्च रसः क्रमात् । अत्यंतं वृद्धिदं नृणामीशानप्रागुदक्प्लवम् ॥ ३ ॥ और मधुर, चर्चरा, कडुवा, कसैला ये भूमिके स्यादनलण आदिकोंको शुभ हैं। और जिस पृथ्वी की डुलाई ईशान कोण तथा पूर्व व उत्तरी ती हो तो सब जातियोंको अत्यंत वृद्धिदायक जाननी ।। ३ ।। अन्यदिक्षु प्लवं तेषां शश्वदत्यंतहानिदम् ॥ तत्र कृत इस्तमात्रं निखा तत्र पूरयेत् ॥ ४ ॥ अन्य दिशाओंमें दुकान रहे तो निरंतर तिन सब जातियोंको अशुभ है । पृथ्वीकी अन्य परीक्षा कहते हैं कि, कत्र्ता पुरुष अपने हाथ प्रमाण भूमिको खोदकर फिर उसहीं मिट्टीसे उस खदेको भरौ ।। ४ ।। अत्यंतवृद्धिरधिके हीने हानिः समे समम् । तथा निशादं कृत्वा तु पानीयेन प्रपूरयेत् ॥ ५॥ प्रातईष्टे चले वृद्धिः समं पंके व्रणे क्षयः । एवं लक्षणसंयुक्ते क्षेत्रे सम्यक्समीकृते ॥ ६ ॥ जो मिट्टी बढजाय तो घर चिननेवालेकी अत्यंत वृद्धि रहे हीन मृत्तिका रहे अर्थात् वह खढा नहीं भरे तो हानि हों,समान मृत्तिका रहे तो समान फल जानना और एक हाथ खडा खेदकर रात्रि में पानीसे भरदेवे प्रातःकाल देखे तध जलसे वह गर्ने कुछ ऊँचा A क भाषाटीकास०--अ० ३१. (१९१ ) बढा दीखे तो वृद्धि जानना और समान फीच रहे तो समान फळ जानना कीचमें छिद्र दखेि तो क्षयकारक भूमि जानना ऐसे छक्ष णसे देखे हुए भूमि स्थलको समान बनाईवे ॥ ५ ॥ ६ ॥ दुिसाधनाय तन्मध्ये समे मंडलमालिखेत् ॥ पूर्वोक्तक्षणसंयुक्ते तन्मध्ये स्थापयेत्ततः ॥ ७॥ फिर दिसाधन करनेके वास्ते तिस भूमिके मध्यमें समान भागमें मंडळ लिखना चाहिये । पूर्वोक्त छनमें तहां यंत्रको स्थापित करे ॥ ७ ॥ ततश्छायाँ स्पृशेद्यत्र वृत्ते पूर्वापराळयोः ॥ तत्र कार्यावुभौ बिंदू वृत्ते पूर्वापराविधे ॥ ८॥ फिर जहां दुपहर पहले और दुपहर पछेिकी छाया आती हो तहां छयाकी पिछानके वास्ते पूर्व पश्चिममें दो बिंदु कर देनी ॥ ८ ॥ रेखा या सोत्तरा साध्या तन्मध्येतिमिना स्फुटा ॥ तन्मध्येतिमिना रेखा कर्तव्या पूर्वपश्चिमा ॥ ९॥ इसप्रकार रेखा करके उत्तर दिशाका सधन करना। उत्तर दिशा दिसाधन करके तिसके बीच मरस्यसमान तिरछीसे। पूर्वपश्चिमी तर्फ रेखा खींचनी चाहिये ।। ९ ॥ तन्मध्यमत्स्यैर्विदिशः साध्या सूचीमुखास्तदा । मध्याद्विनिर्गतैः सूत्रैश्चतुरस्र लिखेद्वहिः ॥ १० ॥ फिर मध्यमें मत्स्याकार सूईके मुखसदृश बारीक रेखा खींच कर विदिशा (कोणोंका ) साधन करना चाहिये, मध्यभागते निकले हुए सूत्र करके बाहिर चतुरस्र चौंकूटा स्थल बनावे।।।। 4A (१९२) नारदसंहिता । चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे षट्सर्गपरिशोधिते । रेखामा च कर्तव्यं प्राकारं सुमनोहरम् ॥ ११ ॥ फिर चतुरत्र स्थल विषे षट्सरी विधिसें शोधन कर रेखमार्ग विषे चौगिर्द एक गोलाकार रेखा खींच लेचे ॥ ११ ॥ आयामेषु चतुर्दिक्षु प्रागादिषु च सत्स्वपि । अष्टाष्टौ च प्रतिदिशं द्वाराणि स्युर्यथाक्रमात् ।। १२ ।। प्रदक्षिणमात्तेषाममूनि च फलानि वै ।। हानिनैःस्वं धनप्राप्तिर्नुपपूजामहद्धनम् ।। १३ ।। उस विस्तारमें चारों दिशाओंके विभाग करलेना, फिर पूर्व आदि दिशाओंमें आठ २ बार यथाक्रमसे. वनाने चाहियें । पूर्व दिशामें प्रदक्षिण क्रमसे आठ ८ दर लगते हैं, तिनके फल कहते हैं (ईशानके समीपही पूर्वके प्रथमभागमें हानि, दूसरे जागमें दरिद्रता, फिर ३ धन प्राप्ति, ४ राज्यसे लाभ, ५ में बड़ा भारी धन छाभ ) ।। १२ ॥ १३ ॥ अतिचौर्यमतिक्रोधो भृतिर्दिशि शचीपतेः । निधनं बंधनं भीतिरर्थाप्तिर्धनवर्द्धनम् ॥ १४ ॥ फिर ६ भागमें अत्यंत चोरी, ७ में अत्यंत कध८ में भय थे पूर्व दिशामें ८ द्वारोंके फल हैं । और दक्षिण दिशमें यथात्रमसे मृत्यु १, बंधन २, भय ३, अव्यप्राप्ति ४द्रव्यवृद्धि ५॥ १४ ।। अनातंकं व्याधिभयं निश्सत्त्वं दक्षिणादिशि । पुत्रहानिः शत्रुवृद्धिर्लक्ष्मीप्राप्तिर्धनागमः । १५॥ । भाषाटकस०-अ० ३१. ( १९३ ) आरोग्य ६, व्याधिभय ७, दारिद्रता ८ ये फळ दक्षिणदिशामें आठ द्वारोंके हैं। और पुत्रहानि १, शत्रुवृद्धि २, लक्ष्मीप्राप्ति है, धनगम ४ ॥ १५ ॥ सौभाग्यमतिदौर्भाग्यै दुःखं शोकश्च पश्चिमे ।। कलघहानिर्निःसत्त्वं हानिर्धान्यं धनागमः ॥ १६ ॥ सौभाग्य ५, अतिदौर्भाग्य ६, दुःख ७, शोक ८ये फळ पश्चि मदिशामें ८ द्वारोंके हैं। और खीहानि १, दरिद्रता २, हानि ३, धान्य ४, धनागम ५, ॥ १६ ॥ संपबृद्धिर्महाभीतिरामये दिशि शीतगोः । एवं गृहादिषु द्वारं विस्ताराद्विगुणोच्छूितम् ॥ । १७ ॥ संपत्तिकी वृद्धि ६, महाभय ७, रोग ८ ये फल उत्तर दिशामें आठ बार करनेके हैं, ऐसे घर आदिकोंमें वार करने चाहियें द्वारकी चौडाईसे दूनी उंचाई करनी शुभ्र है ॥ १७ ॥ इति प्रदक्षिणं द्वारं फलमीशानकोणतः ॥ सूलद्वारस्य चोक्तानि नान्यथैवं वियोजयेत् ॥ १८ ॥ से ईशानकोणसे दहिने हमसे दूर करनेके सब दिशाओंके फ़ल कहे हैं । मूळद्वार अर्थात मुख्य द्वारका यह फल है खिड़की आदिका फळ नहीं है ॥ १८ ॥ पश्चिमे दक्षिणे वापि कपाटं स्थापयेद्वहे । प्राकारतां क्षितिं कुर्यादेकाशीतिपदं यथा ॥ १९ ॥ १३ (१९४ ) नारदसंहिता । बरसे पश्चिमी तर्फ अथवा दक्षिणकी तर्फ किवाड़ स्थापन करने और धरमें ८१ पदका वास्तु होता है अर्थव वास्तुमें ८१ देवते स्थित कहे हैं ॥ १९ ॥ मध्ये नवपदं ब्रह्मस्थानं तदतिनिंदितम् ।

  1. द्वात्रिंशदंशाः प्राकाराः समीपांशाः समंत : । २० ॥

तर्हां मध्यमे ९ पद ( ९ कोष्ट ) ब्रह्मस्थान कहा है वह जगह प्रतिनिंदित जानो और चारोंतर्फ किलाककी तरह भाग करके बत्तीस अंश ( ग ) हैं ।। २० ।। ३. पिशाचांशा गृहारंभे दुःखशोकभयप्रदाः ॥ शेषः स्युर्मुहनिर्माणे पुत्रपौत्रधनप्रदाः॥ २१ ॥ वे गृहारंभमें पिशाचोंके अंशहैं तिस जगहमें पहिले घर चिनना आरंभ करे तो दुःख, शोक, भय हो अन्य जगह किसीठौरसे घर चिनना प्रारंभ किया जावे तो पुत्र, पौत्र, धनकी प्राप्तिहोय ।।२१।। शिरस्यद्वक्तना रेखा दिग्विदिङ्गध्यसंभवाः । ब्रह्मभागपिशाचांशाः शिशूनां यत्र संहतिः ॥ २२॥ मध्यमें चलीहुई रेख दिशा और कोणोंमें प्राप्त है तां वास्तु पुरुषले शिरसे उरली तर्फ रेखा होती है तह बलबाग और पिशा- चांशके शिशुओंके समूहकी स्थिति है ॥ २२ ॥ तत्र तत्र विजानीयाद्वसतो मर्मसंधयः ॥ के मर्माणि संधयो नेष्टास्तेष्वेव विनिवेशने ॥ २३ ॥ तहाँ २ निवास करे तो घास्तु मर्म और संधि जानना तहां प्रथम निवास करना अशुभ है ॥ २३ ॥ भाषाटीकास ०-अ० ३३. (१९५) सौम्यफारुनवैशाखमाघश्रावणकार्तिकाः॥ मासाः स्युर्रहनिर्माणे पुत्रारोग्यधनप्रदाः ॥ २५ ॥ मार्गशिर, फाल्गुन, वैशाख, मधश्रवण, काञ्जिक इन महीनोंमें घर चिनवाना प्रारंभ करे तो पुत्र, आरोग्य, धनकी । श्राप्ति हो ॥ २४ ॥ अकारादिषु वर्णेषु दिक्षु प्रागादिषु क्रमात् ॥ खगेशौ तु हरीशाख्यसपंखुगजसूकराः ॥ २६॥ वगैशाः क्रमतो ज्ञेयाः स्ववीत्पंचमो रिपुः ॥ स्ववर्गे परमा प्रीतिः कथ्यते गणकोत्तमैः ॥ २६ ॥ पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमसे अकारादि वर्गीविषे अरुड़ १, बिलाव २, सिंह ३, इन ४, सर्प ५, मूषद् ६, गज ७, सूकर ८ ये आठ वर्ग पूर्व आदि दिशाओंके जानने तहां अपने वफ़ेसे पांचवें वर्गको शत्रु जाने ऐसे ज्योतिषी जनने कहा है ॥ २५ ॥ २६ ॥ अथान्यप्रकारः । स्ववर्गे द्विगुणं कृत्वा परवर्गेण योजयेत् । अष्टभिस्तु हरेद्गं योऽधिकः स ऋणी भवेत् है. २७॥ और दूसरा प्रकार यह है कि अपने वर्गको दूना कर प्रखगंमें मिलादेवे फिर आठक आग देना तहां जो अंक बाकी रहे उसको फूलप जाने इसी प्रकार पराये वर्गको भी दना कर अपने वर्गमें मिला ८ का भाग देना अंक बँचे स देखना इन ऊँचेहुए अंकॉमें जिस का अंक अधिक उँच जाय वह ऋणी जानना यहां घरके वर्ग अंक ऋणी होना ठीक है । २७ ।। ७ है (१९६) नारदसंहिता। A ९ क्षेत्रफलम्। विस्तारगुणितं दैघ्र्यं गृहक्षेत्रफलं भवेत् ॥ तत्पृथङ् वसुभिर्भक्तं शेषमायो ध्वजादिकः ॥ २८॥ घरकी चौडाईको लंबाईसे गुणा करदेना वह क्षेत्रफळ होताहै फिर आठका भाग देना बाकी रहा ध्वज आदिक आय जानना२८ ध्वजो धूमोऽथ सिंहः श्व सौरभेयः खरो गजः ॥ ध्वांक्षश्चैव क्रमेणैतदायाष्टकमुदीरितम् ॥ २९ ।। ध्वज १, धूम २, सिंह ३, पान ४, वृष ५, खर ६, गज७,

  1. ध्वांक्ष ८ ऐसे क्रमसे ये ८ आय कहे हैं ।। २९ ॥

ब्राह्मणस्य ध्वजो ज्ञेयः सिंहो वै क्षत्रियस्य च ॥ वृषभधैव वैश्यस्य सर्वेषां तु गजः स्मृतः ॥ ३० ॥ तहां बालणको ध्वज आय शुभ है, क्षत्रियको सिंह शुभ है, वैश्यको वृष शुभ है, गज आय सच वणको शुश है।। ३० ।। कीर्तिः शोको जयो वैरं धनं निर्धनता सुखम् ॥ रोगश्चैते गृहारंभे ध्वजादीनां फलं क्रमात् ॥ ३१ ॥ और ध्वज १ आय आवे तो कीति, फिर धूम २ हो तो शो क, फिर ३ जय, ४ वैर, ५ धन, ६ निर्धनता, ७ सुख, ८ रोग ऐसे इन आठ ध्वज आदिकोंका फल जानना ।। ३१ ।। अथ राशफलम्। द्विद्वदशं निर्धनाय त्रिकोणं कलहाय च । षडष्टकं मृत्यवे स्याच्छुभदा राशयः परे ॥ ३२ ॥ b आषाटीकास०-अ० ३३. (१९७७ ) चरकी राशि व स्वामीकी राशि परस्पर दूसरे बारहवें स्थान हो तो निर्धनता फल कहना, नवमें पांचवें हो तो कलह कहना, छठे आठवें हो तो मृत्यु कहना,अन्यराशीि शुभदायक जानना३२॥ सूयगारकवारांश वैश्वानरभयप्रदः ॥ इतरे ग्रहवारांशाः सर्वकामार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥ सूर्य तथा मंगली राशिके नवांशकमें घर चिनना प्रारंभ करे तो अनिका भय हो और अन्यचारोंके नवांशकमें करे तो सब कामना सिद्ध होये ।। ३३ ।। नभस्यादिषु मासेषु त्रिषु त्रिषु यथक्रमात् ॥ यद्दिङ्मुखं वास्तु पुमान्कुर्यात्तद्दिङ्मुखं गृहम् ॥ ३४ ॥ भाद्रपद आदि तोन २ महीनोंमें पूर्वदि दिशाओंमें वास्तुका मुख रहता है जिस दिशामें वास्तुका मुख हो तिसही दिशामें घर- का द्वार करना शंभहै ॥ ३४ ॥ प्रतिकूलमुखो गेहे रोगशोकभयप्रदः ॥ सर्वतोमुखगेहानामेष दोषो न विद्यते ॥ ३ ॥ तिश्से विपरीत द्वार लगवे त रोग शोक भय हो और जिन घरोंके चारोतर्फ चौखट लगाई जाती हैं उन घरोंमें यह दोष नहीं होता है ॥ ३५ ॥ मृत्पेटिका स्वर्गधुन्यशैवालसंयुता ॥ गृहमध्ये हस्तमात्रे गर्ते न्यासाय विन्यसेत् ॥ ३६ ॥ वास्त्वायामदलं नाभिस्तस्मादब्ध्यंगुलत्रयम् । कुक्षिस्तस्मिन्यसेच्छंकुं पुत्रपुत्रप्रवर्द्धनम् ॥ ३७ ॥ {१९८ ) नारदसंहिता । मृत्तिकाकी पिटरी,सुवर्ण,रन,धवन्यशिवाळ इन सबोंको - इकहे कर बरके बीच एक हथ खढा खोदकर तिनमें रेखदेवे वास्तुके विस्तारदळमें नाभि है तिस नाभिसे ७ अंगुलक कुक्षि जानना तह शंकु रोपै तो पुत्र, पौत्र, धनकी प्राप्ति हो ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ चतुर्विंशत्रयोविंशत्षोडशद्वादशांगुलैः । विप्रादीनां शंकुमानं स्वर्णवस्त्रावलंकृतम् ॥ ३८ ॥ चौंवी व अंगुल, तेईस अंगुलसोलह अंगुळ, बारह अंगुळ ऐसे बालण आदि वर्णाके क्रम का प्रमाण करना चाहिये । सुवर्ण तथा वङ्गादिकसे शंकुको विभूषित करे ॥ ३८ ॥ खदिरार्जुनशायथं पूगपत्रतरूद्भवम् ॥ रक्तचंदनपालाशरक्तशालविशालजम् ॥.३९ ।। खैर, अर्जुन वृक्ष, शाल, सुपारीवृक्ष, तेजपातवृक्ष, लाल चंदन , ढाक, लाक सुंदर शाळ ॥ ३९ ॥ नीयकूटुं च कुटजं वैषावं बिल्ववृक्षजम् । शंकं त्रिधा विभज्याथ चतुरवं त्तः परः ॥ ४० ॥ कट. वृक्ष, कदंब वृक्ष, बस, बेलवृक्ष इन्होंने शंकु बनना चाहिये । शंङमें तीन विभाग करकेचे अथवा चौंफ़ेटा शंकु करना ॥ ४० ॥ अष्टांशं च तृतीयांशमनस्रभुजुमव्रणम्। एवं लक्षणसंयुक्तं परिकर्ष्य शुभे दिने ॥ ४१ ॥ आष्ठ दळका अथवा तीन दळग करना अथवा दलरहित साफ़ गोल करना ऐसे लक्षणसे युक शंकु बनाय शुभदिनमें इष्ट साधनकर ह्रारंभ करना ॥ ४१ ॥ A = भाषाटीकास०-अ० ३ १. (३९९ ) व्यक़रवारलग्नेषु चापे चाष्टमवर्जिते । नैधने शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके ॥ ४२ ॥ तहां रवि मंगलके लुश नहीं हों, अष्टमस्थानमें धनु छम नहीं हो, अष्टम घरमें कोई ग्रह नहीं हो, शुलन तथा शुभराशीका नवां शक होवे तव ॥ ४२ ॥ शुभेक्षितेऽथ वा युक्ते लग्ने शंकुं विनिक्षिपेत् ॥ पुण्याहवाचैर्वादिपैः पुण्यैः पुण्यगनादिभिः ॥ ४३ ॥ शुभग्रहोंकी दृष्टि होशुग्रहयुक्त हो,ऐसे लुभमें शंकुको स्थापि तकरै पुण्याहवाचन बाजा, गीत, स्त्रीमंगलगीत इन्होंसे मंगल कराना ।। ४३ ।। स्वकेंद्रस्थैस्त्रिकोणस्थैः शुभैस्त्र्यायारिगैः परैः । लग्नात्षष्ठायचंद्रेण दैवज्ञचैनपूर्वकम् ।। ४९ ।। शुभग्रह धनस्थान तथा केंद्में हवे अथवा ९५ घरमें हो और पापग्रह ३।११।६ घरमें हो, चंद्रमा ६ तथा १ १ होवे ऐसे लन् में ज्योतिषीके पूजन पूर्वक घर चिनवाना प्रारंभ करे ।। ४४ ।। एकद्वित्रिचतुःशालाः सप्तशायाह्वयाः स्मृताः । ताः पुनः षविधाः शालः प्रत्येकं दशषद्विधाः ।। ४६।। एक शासे युक्त घर, दो शालावा तीनचारसात शाळाका घर होता है जिनके भी छह भेदहैं सोलहूपकारके घर होते हैं तिनके नाम ॥ ४५ ।। ध्रुवं धान्यं जयं नंदं खरं कांतं मनेरमम् ॥ सुमुखं दुर्मुखं क्रूरं शत्रुस्वर्णप्रदं क्षयम् ॥ ४६ ॥ A = ( २०० ) नारदसंहिता । आनंदं विपुलाख्यं च विजयं षोडशं गृहम् ॥ गृहाणि षण्णवत्येव तेषां प्रस्तारभेदतः ॥ ४७ ॥ ध्रुव १ धान्य २ जय ३ नंद ४ खर ५ त ६ मनोरम ७ व सुमुख ८ दुर्मुख ९ फ़ेर १० शत्रप्रद ११ स्वर्णप्रद १२ क्षयप्रद ३३

  1. आनंद १४ विपुळ १५ विजय १६ ऐसे ये सोळह प्रकारके घर

ॐ होतेहैं इनके प्रस्तारका भेद९६प्रकारके भेद होते हैं।४६॥४७ गुरोरधो लघुः स्थाप्यः पुरस्तादूर्घवन्यसेत् ॥

  • गुरुभिः पूजयेत्पश्चात्सर्वलब्धविधिर्विधिः ॥ ४८ ॥
  • गुरुस्थानके नीचे लघु स्थापित करना तिसके आगे ऊपरके
  1. क्रमसे लिमै फिर बडे छोटे स्थानों भेद करना ऐसे एक

। घरके छह २ फेदहनेसे ९६ भेद होयेंगे ॥ ४८ ॥ ॐ दिक्षु पूर्वादितः शालाध्रुवा भूदं । कृता गजाः॥ शालाध्वांकसंयोगः सैको वेश्म ध्रुवादिकम् ॥ १९॥ अव सोळह नामवाले इन घरोंके भेद कहतेहैं। पूर्वद्वरखाले मकानका ध्रुवांक १ है । दक्षिणद्वारवाले मकानका धुघांक २ पश्चिमदरवाले मकानका ध्वांक८है। उत्तरद्वाखाले मकानका ध्रुवांक ८ है इस ध्वांकमें३ मिलाकर जितनी संख्या हो वह धुध धान्यआदि । संज्ञाछा मकान जानना जैसे पूर्वपश्चिम दो द्वारोंवाला मकान हो तो पूर्वका ध्वांक १ पश्चिम ४ जोड ५ हुआ १ मिळा ६ हुआ तो यह कांतंनामक स्थान जानना ॥ ४९ ॥ ०

  1. आषाढीस -अ० ३१. (२०१ )

नानागारं दिशि प्राच्यामाग्नेय्यां पचनालयम् ॥ याम्यायां शयनागारं नैत्यां शस्त्रमंदिरम् ॥ ९० ॥ मकानकी पूर्वदिशामें स्नानकरनेका स्थानअभिकोणमें रसोई । पकाने स्थान, दक्षिणमें सोनेका मकान, नैर्जतमें शत्रस्थान करन ।। ५० ।। एवं कुर्यादिदं स्थानं क्षीरपानाज्यशालिकाः ॥ शय्यासूत्रास्त्रतद्विद्याभोजनामंगलाश्रयाः ॥ ५१॥ और बूथ, जलपान, वृत इन्होंके स्थान ईशानकोणमें शय्या, सूत्र, शस्त्र, भोजन इनके स्थान अभिकोणमें,।। ५१ ।। धान्यस्त्रीभोगवित्तं च श्रृंगारायतनानि च । ईशान्याद्विक्रमस्तेषां गृहनिर्माणकं शुभम् ॥ ६२ ॥ धान्य, स्त्रीभोग, धन ये स्थान नैनैतमें, श्रृंगारादिकके स्थान वायव्य कोणमें ऐसे ईशानादिकः कोणोंमें ये भी स्थान कहेहैं ॥ ५२ ॥ एते स्वस्थानशस्तानि स्वस्व।यस्वस्वदिश्यपि । लुओटुंबरचूताख्या निंबस्नुहीविभीतकाः ॥ ४३ ॥ ये अपने २ कर्मविस्तारके योग्य स्थान अपनी २ कोणमें होनेसे शुत हैं जैसे अभिस्थान अभिकोणमें होना शुभहै और मकनके आगे पिळ खन, गलर, आम, नींब, थोहर, बहेडा ॥ ५३ ॥ ये कंटका दग्धवृक्षा वदाश्वत्थकपित्थकाः ॥ अगस्त्यशिष्टतालाख्यतिंतिणीकाश्च निंदिताः ॥४९॥ + C ( २० २) नारदलोहित । ये वृक्ष तथा कांटेवाले वृक्ष, जळेहुए वृक्ष, बडपीपल; कैथ, अगास्तिवृक्ष, सह्रजना वृक्ष, ताडवृक्ष, अमलीवृक्ष ये वृक्ष अत्यंत निंदित कहे हैं घरके आगे नहीं लाने चाहिये ॥ ५४ ॥ पितृवत्स्वाग्रजं गेहं पश्चिमे दक्षिणेऽर् िवा ॥ गृह्यपादा गृहस्तंभाः समाः शस्ताश्च न समाः ॥ ५५॥ पताका तथा बडे भाईका घर अपने घरसे पश्चिम तथा दक्षिण दिशामें कराना योग्यहै घरके पाद और स्तंभ समान होने चाहियें ऊँचे नीचे नहीं होने चाहियें ॥ ५५॥ नात्युच्छूितं नातिनीचं कुड्योत्सेधं यथारुचि । गृहोपरि गृहदीनामेवं सर्वत्र चिंतयेत् ॥ ५६ ॥ अतिकी उंचाई ज्यादै ऊँची नहीं और ज्यादै नीची नहीं करनी सुंदर करनी और घरके ऊपर उतनीही ऊंची भाति उसी जगह द्वार आदि नहीं करने ।। ५६ ।। गृहादीनां गृहे स्रव्यं क्रमशो विविधं स्मृतम् । पंचालमानं वैदेहं कौरवं चैव कन्यकाम् ॥ ४७ ॥ घर आदिकोंमें जल गिरनेके पतनाल अनेक विधिसे करने शुभहैं और पंचाळ, वैदेह, कुरु, कान्यकुब्ज़ इन देशोंका मान हस्तादिक कहा हुआ परिमाण ठीक है ॥ ५७ ॥ मागधं शूरसेनं च वंगमेवं क्रमः स्मृतः ॥ तं चतुर्भागविस्तारं संशोधय तदुच्यते ॥ ५८ ॥ मागध, शूरसेन, वंगाला इन्होंके मानसे अपने ( मध्यदेशका ) मानविस्तार चौगुना शुभहे ।। ५८ ।। 4A भाषाटीकास०-अ० ३१. (२०३ ). पंचालमानमतुलमुत्तरोत्तरवृद्धितः ॥ वैदेहादीनि शेषाणि मानानि स्युर्यथाक्रमात् ॥ ४९ ॥ पंचाल देश ( पंजाब ) का मान ठीक अन्यदेशोंके मानसे उत्तरोत्तर बढाकर मान ( तोळादिक ) लना चाहिये ।। ५९ ।। पंचालमानं सर्वेषाँ साधारणमतः परम् ॥ अवंतिमोनं विप्राणां गांधारं क्षत्रियस्य च ॥ ६० ॥ पांचालदेशका मान साधारणतासे सभी देशोंमें मानना योग्य है और अवंती (उज्बैन ) का मान बालणको शुभहै क्षत्रियको गांधार देशका ॥ । ६० ॥ । कौजन्यमानं वैश्यानां विप्रादीनां यथोत्तरम् ॥ यथोदितजलस्राव्यं द्वित्रिधूमिवेश्मनः ॥ ६१ ॥ वैश्योंको कैौजन्यदेशका मान ग्रहण करना । ब्राह्मण आदिोंने यथोत्तर वृद्धिभागसे परिमाण लेना जिस मकानमें दो तीन शाला होनें उसमें जल पडनेका स्थान यथायोग्य करना चाहिये ।। ६१॥ उष्ट्रकुंजरशालानां ध्वजायोऽप्यथवा गजे ॥ पशुशालाश्वशालानां ध्वजायोऽप्यथवा वृषे ॥ द्वारे शय्यासना मंत्रे ध्वजसिंह वृषाः शुभाः॥ ६२ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां वास्तुविधानाध्याय एकत्रिंशत्तमः ॥ ३१॥ ऊंट हाथि आदिकोंकी शाळमें पूवक ध्वज आय अथवा गज- संज्ञक आय रहना शु है और गौआदि पशुओंकी शाला तथा ( २०४ ) नारदसंहिता । अधकी शाळमें ध्वज अथवा वृष आय शुझहै और शय्या, आसन, मंत्र इन्होंकी शाळाके द्वारमें ध्वजसिंह,वृष ये आय शुभ कहे हैं६२ इति श्रीनारदीयसं० भाषा० वास्तुविधानाध्याय एकत्रिंशत्तमः ॥ ३१ ॥ वास्तुपूज़ामहं वक्ष्ये नववेश्मप्रवेशने । हस्तमात्रा लिखेद्रेख दशपूर्वा दशोत्तराः ॥ १ ॥ अब नवीन घरमें प्रवेश होनेके समय वास्तुपूजाको कहतेहैं । एक हस्तप्रमाण वेदीपर दश रेखा पूर्वको ओर दश रेखा उत्तरको खींचें ॥ १ ॥ गृहमध्ये तण्डुलोपय्यैकाशीतिपदं भवेत् ॥ पंचोत्तरान्वक्ष्यमाणांश्चत्वारिंशत्सु वा न्यसेत् ॥ २॥ फिर तिन कोष्ठोंमें चावल रखकर ८१ कोष्टक वनावे तह पांच और चौतालीस अथीव ४९ देवता भीतरके अलग हैं।२॥ द्वात्रिंशद्वाह्यतः पूज्या स्तत्रांतःस्थास्त्रयोदश । तेषां स्थानानि नामानि वक्ष्यामि क्रमशोऽधुना ।। ३ ।। और बीस देवता बाहिर पूजने चाहियें तिनके भीतर की के तेरह देवता अलगहैं अब क्रमसे तिनके नामोंको कहेंगे ।। ३ ।। ईशानकोणते बाह्या द्वात्रिंशत्रिदशा अमी । कृपीटयोनिः पर्जन्यो जयंतः पाकशासनः ।। ४ ।। ईशानकोणमें ये बत्तीस ३२ बाह्यसंज्ञक देवताहैं कि अमि, जेन्य, जयंत, पाठशासन ।। ४ ।। आषाढीकास०-अ० ३२. ( २०५) भूर्यसत्यौ भृशाकाशं वायुः पूषा च नैतः ॥ गृहश्नतो दंडधरो गांधवों मृगराजकः ॥ ९॥ सूर्य, सत्य, भृश, आकाशवायु, पूषा, नैजीत, गृहक्षत, दंडधर, गांधर्व, मृगराजक ।। ५ ।। मृगपितृगणाधीशस्ततो दैौवारिकाह्वयः । सुग्रीवः पुष्पदंतश्च जलाधीशस्तथासुरः ॥ ६ ॥ मृग, पितरगणाधीश, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदंतक, जलाधीश असुर ।। ६ ॥ शेषश्च पापरोगश्च भोगी सुख्यो निशाकरः ।। सोमः सूर्योऽदितिदिती द्वात्रिंशत्रिदशा अमी ॥ ७॥ शेष; पापरोग, भोगी, मुख्य, निशाकर, सोम, सूर्य, अदिति, दिति ये बत्तीस देवता हैं । ७ ।। अथेशान्यादिकोणस्थाश्चत्वारस्तत्समीपगाः ॥ आपः सवितृसंज्ञश्च जयो रुद्रः क्रमादमी ॥ ८॥ और ईशानआदि कोणोंमें स्थित तिनके समीपके चर देवता ये हैं कि आपसविता, ज्य, रुद्र ये क्रमते ४ दिशाओंमें जानने ॥ ८ ॥ मध्ये नव पदो ब्रह्म तस्याष्टों च समीपगाः॥ एकांतराः स्युः प्रागायाः परितो ब्रह्मणः स्मृतः ॥ ९ ॥ मध्यमें नव कोष्ठमें बना और तिसके समीप ८ हैं वे पूर्वआदि दिशाओंमें एक २ के अंतरसे बढ़ाके चारोंत स्थितहैं ।। ९ ।। ( २०६) नारदसंहिता । अर्यमा सविता चैव विवस्वान्विबुधाधिपः। मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधराह्वयः ॥ १० हैं। अर्यमा, सवित, विधस्थान, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष, शृथ्वीधर ॥ १० ॥ आपवत्सोद्यमः पंचचत्वारिंशत्सुरा अमी । आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निदितिः क्रमात् ॥ ३६ पदिकानां च वर्गीयमेवं कोणेष्वशेषतः । तन्मध्ये विंशतिबंह्या द्विपदास्तेषु सर्वदा ॥ १२ ॥ आपवत्स ये आठ हैं ऐसे ये सब मिलकर ४९ होतेहैं औछ। आपआपवत्स, पर्जन्य, अभि, दिति चे क्रमसे चारोंकोज़ेमें रहते हैं ऐसे यह पदिकोंका वर्ग कहतहै तिनके मध्यमें बीस देवता ६. हैं। ये सदा द्विपद कहैं । ११ ।। १२ ।। अर्यमा च विवस्वांश्च मित्रः पृथ्वीधराह्वयः ।। अह्मणः पारितो दिक्षु चत्वारस्त्रिदशाः स्मृताः ।। १३ ।। अर्यम, विवस्वाल्, मित्र, पृथ्वीधर ये ब्रह्मसे चारोंतर विश्व संज्ञक कहे; ।। १३ ३ ॥ ब्रह्माणं च तथैकद्वित्रिपदानर्चयेत्सुरान् । वास्तुमंत्रेण वास्तुज्ञो दूर्वादध्यक्षतादिभिः ॥ १४ ॥ स यह बने और एकपदिक, द्विपदिक, त्रिषदिक, है ऑको पूजै वस्तुको जाननेवाला द्विज वास्तुमंत्र से दूर्वा,अक्षतः । आदिकोंसे वास्तुका पूजन करें ॥ १४॥ आषाढीकस ०-अ० ३२. (२०७ ) ब्रह्मंत्रेण वां श्वेतवस्त्रयुग्मं प्रदापयेत् ॥ तांबूलं च ततो दत्वा प्रार्थयेद्वास्तुपूरुषम् ॥ १५ ॥ बलाके मंत्रसे दो सफेद वस्त्र चढावे और तांबूल चढाकर वास्तुपुरुषकी प्रार्थना करें ॥ १५ ॥ आवाहनादिसर्वोपचारांश्च क्रमशस्तथा ॥ नैवेयं विविधान्नेन व्याधैश्च समर्पयेत् ॥ १६॥ आवाहन आदि सम्पूर्ण उपचार क्रमसे करने चाहियें । नैवेद्य अनेकप्रकारके शेजन चढाकर अनेक प्रकारको बाजे बजवाकर समपर्ण करौ ।। १६ ।। वास्तुपुरुष नमस्तेस्तु भूशय्याभिरत प्रभो॥ मद्वहं धनधान्यादिसमृदं कुरु सर्वदा ॥ १७॥ भूमिी शय्यापर अक्षिरत रहनेवाळे हे प्रभो ! तुमको नमस्कार है । मेरे घरको सदा धनधान्यसे भरपूर करो ॥ १७ ॥ इति प्रार्थे यथाशक्त्या दक्षिणामर्चकाय च ॥ दद्यात्तने विप्रेभ्यो भोजनं च स्वशक्तितः ॥ १८ ॥ ऐसी प्रार्थना कर शक्तिके अनुसार पजन करानेवाले बालणको दक्षिणा देवे और तिन देवतोंके सन्भु व बिठाकर श्रद्धाके अनुसार बाह्मणोंको भोजन करावे ॥ १८ ॥ अनेन विधिना सम्यग्घास्तुजां करोति यः । आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धान्यं लभेत सः ॥ १९॥ इस विधिसे अच्छे प्रकारसे जो पुरुक्ष वास्तुपूजा करता है वह आरोग्य, पुत्र, धन धान्य, इन्हें को प्राप्त होता है । १९ ।।

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( २०८ ) नारदसंहिता । अकपाष्टमनाच्छन्नमदत्तबलिभोजनम् ॥ गृहं न प्रविशेदेव विपदामाकरं हि तत् ।। २० ।। इति श्रीनारदीयसांहितायां वास्तुलक्षणाध्यायो द्वात्रिंशत्तमः ॥ ३२ ॥ बिना किवाड़ोंवाल, बिना ढका हुआ, और जिसमें बलिदान तथा ब्रह्मभोज्य नहीं हुआ हो ऐसे स्थानमें | प्रवेश नहीं करना। चाहिये क्योंकि वह विपत्तियोंक खजाना है ।। २० ।। इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां वास्तुलक्षणाध्याय द्वात्रिंशत्तमः ।। ३२ ।। ॥ अथ यात्राप्रकरणम् ॥ अथ यात्रा यथा नृणामभीष्टफलसिद्धये । स्यात्तथा ता प्रवक्ष्यामि सम्यग्विज्ञातजन्मनाम् ॥१॥ जिस प्रकार मनुष्योंको अभीष्ट फलदायी यात्रा होती है तिसको ज्ञानवान् द्विजातियोंकेवास्ते अच्छे प्रकार कहते हैं ।। १ ।। अज्ञातजून्नांनृणां फलाप्तिर्गुणव्र्णवत् ॥ प्रश्नोद्यनिमित्तायैस्तेषामाप फलोदयः ।। २ ॥ और जो अज्ञातजन्मवाले मूखी जनहैं तिनको घुणाक्षरन्यायसे भी सुखकी प्राप्ति होती है (घुणाक्षरन्याय यह है कि जैसे खूण लकड़ीको खाता है वहां चिह्न होता है तो कभी दैवयोगसे राम ऐसे अक्षर भी लिखे जाते हैं यह घणाक्षर न्याय हे ) तिन म/टीकरु ०-अ० ३३ . (२०९ } मूखको भी प्रश्नोदय निमित्तआदिकोंसे ही फलको उदय होता है ॥ २ ॥ षष्टयष्टमी द्वादशी च रिक्तामा पूर्णिमासु च । यात्रा शुक्ळप्रतिपदि निधनायाधनाय च ॥ ३ ॥ षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, रिक्तातिथि, अमावस्था, पूर्णिम्, शुक्लपक्षकी प्रतिपदा इन्होंने यात्रा करनी मृत्युके बास्ते और निर्धनता के वास्ते की है । ३ । पौष्णेकंद्धधिमित्राग्निरितिष्यव सूडुषु । नव सप्त पंचायेषु यात्राभीष्टफलप्रदा ॥ ९ ॥ रेवती, हस्त, मृगशिर, अश्विनी, अनुराधा, कत्तिका, श्रवण पुष्य, धनिष्ठाइन नक्षत्रोंमें यात्रा करना शु है नवमां, पांचर्चां सातवां, ग्यारहवां चंद्रमा शुभ है । । ४ ।। न मेऽन्दुदिने प्राचीं न व्रजेद्दक्षिणां गुरौ ॥ सितार्कयोर्न प्रतीचीं नोदीचीं ज्ञारयोर्दिने ॥९॥ सोम तथा शनिवारक पूर्वदिशामें गमन नहीं करना, बृहस्पति वारको दक्षिणमें गमन नहीं करना, शुक तथा रविवारको पश्चिमको गमन नहीं करता, बुध और मंगलवारको उत्तर दिशामें गमन नहीं करना ।। ५ इन्द्रोजपादचतुरास्यार्यमर्षाणि पूर्वतः । शूलानि सर्वद्वाराणि मैत्रार्केज्याधिभानि च ॥ ६ ॥ 4A १४ ( २१ % } नारदसंहिता । ज्येष्ठा ३, पूर्वाषाढ २, रोहिणी ३, उत्तराफाल्गुनी ४ ये नक्षत्र यथाक्रमसे पूर्व आदि दिशमें थ्रूप हैं और अनुराधा, हस्त, पुष्य, अश्विनी ये नक्षत्र सब दिशाओंमें शुभ हैं ॥ । ६ ॥ क्रमाद्दिग्द्वारभानि स्युः सप्तसप्ताग्निधिष्ण्यतः । वाय्वानिदिग्गतं दंडं परिघं तु न लंघयेत् ॥ ७ ॥ और कृत्तिकां आदि सात २नक्षत्र पूर्वआदि दिशाओंमें यथाक्रमसे दिग्दर नक्षत्र कहे हैं। और वायु तथा अभिकोणमें रेखदंड है। अर्थात् पूर्वंदिग्द्वारि नक्षत्रोंमें उत्तरको गमन करना और दक्षिण पश्चिमकी एकता करनी परंतु इस वायव्य अत्रिकोणकी रेखाको उल्लंघन नहीं करना इस परिघमें गमन नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥ आग्नेय्यां पूर्वदिग्धिष्ण्यैर्विदिशश्चैवमेव हि॥ दिग्राशयस्तु क्रमशो मेषाद्याश्च पुनःपुनः॥ ८ ॥ और कोणोंमें गमनकरना हो तो यह व्यवस्था है कि पूर्वदिग्द्वारि नक्षत्रोंमें अलिकोणमें गमन करना फिर इसी क्रमसे दक्षिणदिशाके नक्षत्रोंमें नैनमें गमन करना । वायव्यके नक्षत्रोंमें पश्चिमके नक्षत्रोंमें गमन करना और मेषादिक राशि तीन बर आवृत्ति होकर पूर्वादिदिशाओंमें रहती हैं जैसे १।५।९ पूर्वमें २। ६ १ ०दक्षिण ० ३ । ७ । ११ पथि ० ४ ।८ । १२ उनमें यही चंद्मका वास है ।। ८ ।। अथ दिकूस्वामिनः लालाटियोगश्च । दिगीशाः सूर्यशुक्रराट्ठकन्दुसूरयः ॥ दिगीश्वरे ललाटस्थे यातुर्न पुनरागमः ॥ ९॥ भाषाटीकास०-अ० ३३. (२१ ३ ) सूर्य १८ शुनः २, मंगळ ३१ रहु ४, शनि ५, चंद्रमा ६, बुध ७, वृहस्पति ८ ये पूर्व आदि दिशाओंके स्वामी हैं। दिगीश्वर यह लालट ( मस्तक ) पर होय तव गमन करनेवालोंका फिर सट्टा आगमन नहीं हो । ९ ।। लग्नस्थ भास्करः प्राच्यां दिशि यातुर्ललाटगः । द्वादशैकादशः शुक्र आग्नेय्यां तु ललाटगः ॥ १० ॥ जैसे कि लनमें सूर्य होवे तब पूर्वदिशमें जानेवालेको ललाट योग है और १* । १३ बर शुक्र हो तब अभिकोणमें ललाट योग है ॥ ३० ॥ दशमस्थ कुजो लग्नाथाम्यायां तु ललाटगः ॥ नवमोऽष्टमगो राहुर्नेत्रैर्हन्यां तु ललाटगः ॥ ११ ॥ लग्नसे १० घर मंगल हो तब दक्षिण(शामें और लालसे नवमें तथा आठवें राहु हो तब नंफेत कोणमें ललाटग योग है ।। ११॥ लग्नसप्तमगः सौरिः प्रतीच्यां तु ललाटगः ॥ षष्टपंचमगधंद्रो वाय्व्यां तु ललाटगः ॥ १२ ॥ उनसे ७ शनि हो तत्र पश्चिमदिशमें ललाटग योग है छठे और पांचवें चंद्रमा हो तब वायव्य कोणमें ललाटग है ।। १२ ॥ । चतुर्थस्थानगः सौम्य उत्तरस्यां ललाटगः॥ द्वित्रिस्थानगतो जीव ईशान्यां तु ललाटगः ॥ १३ ॥ चौथे स्थान बुध हो तब उत्तर दिशामें ललाटयोग है, लग्नसे २ । ३ धेरै वृङ्क्षति हो तव ईशान कोणमें जानेवालेके मस्तकपर दिगीश्वर है ।३३ ॥ । (२१२) नारदसंहिता । ललाटगं तु संत्यज्य जीवितेच्छूद्रजेन्नरः । विलोमगो ग्रहो यस्य यात्रास्नोषो यदि ॥ १४ ॥ जीवनेकी इच्छायाळ मनुष्य इस ललाटग योग्को याग अमल करै राजाको जो ग्रह जमलझमें नेष्टहे वह यह यात्रछन्नभं हो तो उस छनमें ॥ १४ ॥ तस्य भंगप्रदो राज्ञस्तद्वगपि विलग्नभः । रवींद्यनयोयनमनुकूलं शुभप्रदम् ॥ ३४ ॥ राजा गमन करे त मनोरथ भंग है और उस अहंकी राशि नवांशक भी अशुभ है । और सूर्य चंद्रमाकी अयनके अनुकूळ गमनझरना शुभ है जैसे सूर्य उत्तराय हो चंद्रमभी उत्तरायण हो तब उत्सर पृषेमें मूमन करना और सूर्य चंद्रन } दक्षिणायन होवे तब दक्षिण पश्चिमें गमन करना ॥ १५ ॥ तदभावे दिवा रात्रौ यात्रा यातुर्वधोऽन्यथा॥ मूढे चुके कार्यहानिः प्रतिशुक्रे पराजयः ॥ १६ ॥ और जो सूर्य चंद्रमा भिन्न २ अयनमें होवें तो सूर्यकी अयनों तो दिनमें गमन करना और चंद्रमाके अयनमें रात्रिमें गमन करना। इससे अन्यथा गमन करनेवालेका वध होता है । शुक्रस्तमें गमनकरे तो कार्यकी हानि हो शुक्रकी सन्मुख गमन करे तोते परजय हार ) होवे ॥ १६ ॥ प्रतिशुक्रकृतं दोषं हंति शुक्रो ग्रहा न हि । वसिद्धेः काश्यपेयोनिर्भरञ्जः सगौतमः।। १७ }} भाषाढीस०-० ३३. (२१३ ) शुक्रके मन्मुख गमन दोषको शुइही दूर करसकता है अश्यग्रह नहीं करसते । और वसिष्ठ, कश्यg,अत्रि,भरद्वाज गौतम॥ १७॥ । एतेषां पंचगोत्रणां प्रतिज्ञा न विद्यते । एकग्रामे विवाहे च दुर्भिक्षे राजविप्लवे ॥ १८ ॥ इन पांच गोत्रवालेंगे शुरुके सम्मुख जानेका दोष नहीं है । और एक ग्राम, विवाहदुर्भिक्ष, राजभंग ॥ १८ ॥ द्विजशेभे नृपक्षोभे प्रतिशुक्रो न विद्यते ॥ नीचगोऽरिग्रहस्थ व वझगो वा पराजितः १९ ।। बालषश्सप, राजाओं नेथ इन कामोंमें शुक्रके समुभ्रु जानेका दोष नहीं है। नचिराशिपर स्थित, शत्रुके वरमें स्थित, वक्रीअथवा यूपग्रहोंसे आकन ! । १९ ॥ यातुर्भप्रदः शुक्रः स्वशस्थे च जयप्रदः । स्वेष्टदलेष्टरांशं वा शङभषष्ठगोपि वा ॥ २० ॥ ऐसा शुक्र गमनरनेवाले के भनोरथके नष्ट करता है और अपनी राशिने नवांशकमें स्थित होय तो विजय करताहै स्वेष्टय् भमें अथवा दलले. आठवीं शशिधर अथवा शत्रुकी रंशिसे छठी राशिप्र उ ह ह ॥ २० ॥ तेपमीशस्य राशे वा यातुधृत्युर्न संशयः । जन्मेशाष्टमल्नेशौ मिथो मित्रव्यस्थितौ ॥ २१ ॥ अथवा शत्रुओंकी राशि लभने राम्रके घरमें हो तय गमन करनेवलेकी मृत्यु होती है और जन्मलन तथा जन्मासे आठवें बरका पति इन दोनोंकी आपसमें मित्रता होये ।। २१ ॥ 4A ( २३४) नारदसंहिता में जन्मराश्यष्टमर्तेषु दोषा नश्यति भावतः ॥ क्रूरग्रहेक्षितो युक्ते द्विस्वभावोपि भंगदः ॥ २२ ॥ फ़िर वे जन्मळमें तथा आठवें वरमें स्थित हो।ों तो स्वभावः ही । सब दोष नष्ट होते हैं और नूरजहसे यु तथा इट् पापग्रह कार्यको भंग करताहै । २२ ॥ याने शुभैर्दृष्टश्च शुभयुक्तेक्षितः शुभः । वस्वंत्याददिपंचवें संग्रहे तृणकाष्टयोः ॥ याम्यदिग्गमनं शय्या कुर्यान्नो गृहगोपनम् ॥ २३ ॥ गमनसमय वह पापग्रह शुभग्रहोंसे दृष्ट नहीं है तो अशु है औरं शुभमहोंसे युक्त तथा दृष्ट हो ते शुभ जानना।और धनिष्ठक अर्ध उत्तरभाग आदि, रेवतीपर्यंत पांच नक्षत्र पंचक कहलातेहैं। तिनमें तृण काष्ठ आदिका संग्रह नहीं कर और दक्षिण- दिशामें गमन नहीं करना, शश्या नहीं बननी, घर नहीं छायुना ॥ २३ ॥ जन्मोदये लग्नगते ग्लिने लग्नगोपि वा ॥ शुभे चतुर्थी केंद्रेषु यातेशत्रुक्षयो भवेत् ॥ २४ ॥ जन्मळ शुभग्रहोंसे युक्तहो तिस लझमें अथवा दिवार छश्नमें तथा शुभग्रह चारों केंद्रामं प्राप्त होनेके समय गमन करे में शत्रु नष्ट होवै ।। २४ ।। शीषदुये लग्नगते दिग्लने लग्नतोपि वा । शुभवर्गे वा लग्ने यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥ २४॥ ९ ५* भाषाटीकास०-अ७ ३ ३ (२१५) भीषदद्य कहिये ५। ६ । ७ । ८ । ११ ये लग्न होवें अथवा दिग्वारः लक्ष हो अथवा शुभभट्टकी राशि छझ हो तब गमन करनेवालेको शुभफल होता है । २५ ।। शीर्षोदये जन्मराशौ लग्नं शुभयुतं तथा ॥ तयो राशिस्थिते राशौ यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥ २६ ॥ शीषोदय लग्न विषे जन्मकी राशि हो अथवा शुभ ग्रहसे युक्त जन्मलन हो तब उसी राशिके लविषे गमन करे तो शत्रु नष्ट हो ।। २६ ११ । ऋजन्मोदये जन्म राशिश्च निधनं तयोः । यो राशिस्तत्र वै राशं यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥ २७ ॥ शत्रुका जन्मलग्न और जन्मराशीसे आठवीं राशिके लझमें गमन करे तो गमन करनेवालेका शत्रु नष्ट हो । २७ ।। व तथ मीनलग्ने यातुमीनांशकेऽपि वा । नैिवं निखिलयात्रासु घटली घटांशकः ॥ २८॥ मीन लनमें तथा मीनके नवांशकमें गमन करना अशुभ है। और कुंजळग तथा कुंभके नवांशकमें सब तर्फकी यात्रा करनी अशुभ है । २८ ॥ जलोदये जलांशे वा जलजातेः शुभावहः ॥ मूर्तिकोशोथ धानुष्कं वाहनं मंत्रसंज्ञकम् ॥ २९ ॥ शत्रुमार्गस्तथायुश्च भाग्यं व्यापारसंज्ञितः । प्राप्तिरप्राप्तिरुदयाद्भावाः स्युर्दादशैव तु ॥ । ३० ॥ ( २३६ } नारदसंहिता । ५५ जलचर राशिके लझमें तथा नवांशकमें जलजाति कार्य करने शुभदायक हैं । अब स्थानसंज्ञा कहतेहैं मूर्ति १, श २, धानुष्क ३, वाहन ४, मंत्र ५, शत्रु ६ , मामें ७१ आयु ८, भाग्य ९, व्यापF१ ३०, शाप्ति १३ , व्यय १२ ये प्रथम आदि बारह आइके नाम हैं ।। २९ ॥ ३० ॥ इति पापस्त्वायवॐ भावात्सूर्यमहीसुतौ । न निहंतोऽरिगेहं च सैौम्याः पुष्पैत्यरिं विना॥ ३३ ॥ पाषबह यूरहूर्वं घरविना अन्य घरको नष्ट कैरता है और सूर्य संश्लि छठे घरमै अशुभ नहीं हैं और शुभ ग्रह ऋके घरचना अन्य दमें शुभदायक हैं । । ३१ ॥ शुक्रस्तं चापि पुष्टोपि मूर्तिधृत्युश्च चंद्रमाः । याम्यदिगमनं रिक्ता सर्वकाष्ठासु यायिनाम् ॥ ३२ ॥ शुत्र सातवें अशुभ है और बली भी चंद्रमा छशुमें तथा आठवें दर अशुभ है विशेषकरके दक्षिण दिशामें अशुभ है और रिक्कातिथि संव दिशामें वर्जित हैं ॥ ३२ ॥ अभिजित्क्षणयोगोयमभीष्टफलसिद्धिदः ॥ पंचांगशुद्धिरहिते दिवसेऽपि फलप्रदः॥ ३३ ॥ ऐसे मुहूर्लमें अभिजित् क्षषयेग होता है तिसमें गमन करनेसे मनोरथ सिद्ध होता है पचांगशुशुद्ध रहित दिनमें भी यह ये संपूर्ण शुभदायक है ।। ३३ ।। यत्र योगे विचित्रास्तान्येन वक्ष्ये इतस्ततः॥ फलसिद्धिर्योगलग्नाद्राज्ञो विप्रस्य धिष्ण्यतः ॥ ३४ ॥ आषाढीकास०-अ० ३३. (२१७) अच्छे ग्रहयोग होनेमें यात्रा अनेक प्रकार फळ देनेवाली होतीहै इसलिये तिन योगोंको कहतेहैं । राजाओंकी योग लग्नमें सिद्धि होती है, बाह्मणोंकी शुजा नक्षत्रमें गमन करनेने सिद्धि होती है ।। ३४ ।। मूर्तितः शक्तितोन्येषां शकुनैस्तस्करस्य च । केंद्रत्रिकोणेष्वेकेन योगः शुक्रेण सूरिणा ॥ ३५ ॥ अतियोगो भवेद्दाभ्यां त्रिभिर्योगोधियोगकः ॥ योगे यियासतां क्षेममतियोगे जयो भवेत् ॥ ३६ ॥ अन्य वैश्य आदिकोंकी लालसे तथा अच्छे शुभ मुहूर्तसे सिद्ध होती है, चोर गमन करे तब अच्छा शुभ शकुन होनेसे ही सिद्धि होती है । केंद्रमें अथवा त्रिकोणगें अकैल शुक्र अथवा अकेला बृहस्पति होय तो एक अच्छा योग होता है और दोनों होवें तो अतियोग होता है, तीन ग्रहोंका अच्छा योग हो तो अधियोग होताहै एक अच्छा योगमें गमन करें तो होम कुशल रहे। अतियोगमें जय हो ॥ ३५ ॥ ५ ३६ ॥ योगातियोगे क्षेमं च विजयाय विभूतयः ॥ ३७ ॥ अधियोगमें गमन करे तो क्षेम विजय विभूति होती है ॥ ३७ ॥ व्यापारशङधूर्तिस्थैर्युद्धमंदद्वािकरैः॥ रणे गतस्य भूपस्य जयलक्ष्मीप्रमाणता ॥ ३८ ॥ दशवां तथा छठा घरमें वा लभमें चंद्रमा, शनि, सूर्य हो हों तो रणमें प्राप्तहुए ( गमनकरनेवाले ) राजाको विजयलक्ष्मीकी प्राप्ति होती है । ३८ ॥ A ( २३८ ) नारदसंहिता १ अथान्ययोगं चित्रपदमाह । वित्तगतः शशिपुत्रो भ्रातरि वासरनाथः । लग्नगते भृगुपुत्रे स्युः शलभा इव सर्वे ॥ ३९ ॥ अव चित्रपदा छंदसे अन्य योगको कहते हैं । बुध धनधर्में ही, सूर्य तीसरे घर हो, छनमें शुन हो तब गंमनकरनेवाले राजके आगे सब टीडीकी तरह नष्ट होजावें ॥ ३९ ।। लशस्थे त्रिदशाचार्ये धनायस्थे परे ग्रहे । गतस्य राज्ञोऽरिसेना नियते यममंदिरे ॥ ४० ॥ बृहस्पति लशमें स्थित हो और अन्य ग्रह धनस्थान तथ। ग्यारहवें स्थानमें होवें तो गमनकरनेवाले रजाकं शत्रुकी सेन धर्मराज के स्थानमें पहुँचती है । ४० ।। लले शुक्रे रवैौ लाभे चंद्रे बंधुस्थिते तदा ॥ निहंति यातुः पृतनां केशवः पूतनामिव ॥ ४१ ॥ लनमें शुक्र हो, सूर्य ११ घर हो, चौथे घर चंद्रमा हो, ऐसे योगमें गमन करनेवाला राजा शत्रुकी सेनाको इस प्रकार नष्टकर देता है कि जैसे श्रीकृष्णे भगवान्ने पूतना नष्ट करदी थी ।। ४१ ।। । त्रिकोणकेंद्रगाः सौम्याः क्रूराख्यायगता यदि । यस्य यातुश्च लक्ष्मीच्छास्तमुपैत्यभिसारिका ।४२ ॥ शुग्रह नवमें पांचवें घर हों और क्रूरग्रह तीसरे तथा ग्यारहवें वर होवें तत्र गमन करनेवाले राजाके शत्रुकी लक्ष्मी व्यभिचारिणी होकर अस्त होजाती है ॥ ४२ ॥ K आषाढीस -अ९ ३ ३. (२१९ -- k जीवार्कचंद्रलग्नारिरंध्रगा यदि गच्छतः । तस्याने स्वल्पमैत्री च न स्थिरा रिपुवाहिनी ॥ ४३ ॥ वृहपति, सूर्य , चंद्रम, ये लनमें कुछ बर व सातवां घरमें यथाक्रमसे स्थित होवें तब गमनकरनेवाले राजकी सेना इख प्रकाश नष्ट होजातीहै कि जैसे स्वल्फ् मित्रता शीघ्र ही नष्ट होजाती है ॥ ४३ ॥ स्वोच्चस्थे लग्नगे जीवे चंद्रे लाभगते यदि । त्रिषडायेषु सौरारौ बलवांश्च शुभो यदि । यात्रायां नृपतेस्तस्य हस्ते स्याच्छत्रुमेदिनी ॥ ४४ ॥ बृहस्पति उच्च होकर उनमें स्थितहो और चंद्रमा ११ बरं हो और ३१६ । ११ वरमें शनि मंगल होतें, शुभग्रह बुछवान् होनें तत्र गमन करनेवाला राजा शत्रुकी भूमिको ग्रहण करलेताहै । ४४ ।। स्वोच्चस्थे लग्नगे जीवे चंद्रे लाभगते यदि । गतो राजा रिपून्हंति पिनाकी त्रिपुरं यथा ॥ ४५ ॥ उच्चका वृहस्पति ललमें और चंद्रमा १३ हो ऐसे इस योगमें गमनकरनेवाल राजा, जैसे शिवजीने त्रिपुर नष्ट किया ऐसे शत्रुओंको नष्ट करता है ।। ४५ ।। मस्तकोदयगे झुके लग्नस्थे लाभगे गुरौ ॥ गतो राजा रिपून् हंति कुमारस्तारकं यथा ॥ ४६ ॥ शुक्र शीर्षोदय कहिये५।६।७। ८। ११ इन लभोंपर स्थि तहो और ३१ स्थान गुरु होवे तत्र गमनकरनेवाला राजा शत्रु नारदसंहिता । ९ ओंको ऐसे नष्टकरताहै कि जैसे स्वामिकार्तिकजीने तारकासुर नष्ट किया था । ४६ ॥ जीवे लग्नगते शुक्रे केंद्रे वापि त्रिकोणगे | गतो जयत्यरीन् राजा कृष्णवत्यां यथा व्रणम् ॥४७ ।। बृहस्पति छनमें हो और शुक्र केंद्रमें अथवा त्रिकोण (९५ वर हो तब गमनकरनेवाला राजा शत्रुको ऐसे नष्टकरदेवे कि जैसे लष्ण्वती नदीमें व्रण (बाव ) नष्ट होजाताहै । ४७ ।। लग्नगे ज्ञे शुभे केंद्र धिष्ण्ये चोपकुले गते । नृपा सुष्णंत्यरीन्ग्रीष्मे ह्नदानीवार्करश्मयः ॥ ४८ ॥ बुध लनमें हो, अन्य शुभग्रह में होतें, बृहस्पति चैौथे बर्में होये तब गमनकरनेवाले राजे शत्रुओंको ऐसे नष्ट करते हैं कि जैसे सूर्यकी किरण सरोवरोंको ( जोहडोंको ) नष्ट करतीहै । ४८ ।। । शुशुभे त्रिकोणकेंद्रस्थे लाभे चंद्रेऽथवा रवौ । शहून्हंति गतो राजा त्वंधकरं यथा रविः ॥ १९ ॥ नवमं पचवें घर अथवा केंद्रमें शुमह हों, ग्यारहवें घर चंद्रमा अथवा सूर्य हो तय गमनकरनेवाला राजाशझुओंको ऐसे नष्ट करताहै कि जैसे सूर्य अंधकारको नष्ट करताहै ।। ४९ ।। स्वक्षेत्रज्ञे शुभे चंद्रे त्रिकोणायगते गतः ॥ विनाशयत्यरीन् राजा तूलराशिमिवानलः ॥ ६० ॥ भूतग्रह अपने क्षेत्रमें हों और चंद्रमा त्रिकोणमें अथवा ग्यारहवें घ. हों तब गमनकरनेवाला राज शत्रुओंको ऐसे नष्ट करताहे कि जैमे रुईके समूहको अभि भस्म करदेताहै । ५० ॥ । भाषाटीकास ०-अ० ३३. ( २२१ )

इन्दौ खस्थे गुरौ केढ़े मंत्री सप्तमगे गतः । नृपो हंति रिपून्सर्वान्पापं पंचाक्षरी यथा ॥ ५१ ॥ चंद्रमा दशौं घर हो, बृहस्पति केंद्रमें हो, शुक्र सातवें हो तब गमनकरनेवाला राजा शत्रुओंको ऐसे नष्ट करताहै कि जैसे पंचाक्षरी मंत्र सब पोंको नष्ट करदेवे ।। ५१ ।। वर्गोत्तमगते शुक्रेष्येकस्मिन्नेव लग्नगे ॥ हरिस्मृतिर्यथ पापान्हंति शतृन् गतो नृपः ॥ ९२॥ उच्चका अकेली शुक्र ळनमें हो तो गमन करनेवाला राज शत्रुओंको ऐसे नष्ट करें कि जैसे हारिस्मरणसे पाप नष्ट होजात्रै५२ शुभे केंद्रत्रिकोणस्थे चंद्रे वगोत्तमे गते । सगोत्रान्हि रिपून् हंति यथा गोत्रांश्च गोत्रभित् ।।६३ ॥ शुभमह केंद्रों हो अथवा त्रिकोणमें हो चंद्रमा उच्चका हो तव गमनकरनेवाला राजा कुटुंबसहित शत्रुओंको ऐसे नष्ट करताहै कि जैसे इंद्र पर्वतोंको नष्ट करताभया ॥ ५३ ॥ मित्रभस्थे गुरौ केंद्रे त्रिकोणस्थेऽथवासिते। शशून् हंति गतो राजा भुजंगं गरुडो यथा ॥ ५४ ॥ मित्रग्रहके वरमें प्राप्तहुआ बृहति कॅमें हो अथवा शुक नॅकोणम इ तब गमलकरनेवाला राज शङआक ऐसे नष्ट करदेवे जैसे सर्पको गरुड नंष्ट करेदेताहै । । ५४ ॥ शुभे केंद्रत्रिकोणस्थे वर्गोत्तमगते गतः । विनाशयत्बीरजा पापान् भागीरथी यथा ॥ ४४ ॥ अ ( २२२ ) नारदसंहिता । शुभ्रह केंद्रमें अथवा त्रिकोणमें हो अथवा उच्चराशिप्र हो तत्र गमन करनेवाला राजा शत्रुओंको ऐसे नष्ट करदेवे कि जैसे गंगाजी पापोंको नष्ट करती है ॥ ५५ ॥ ये नृपा यान्त्यरीजेतुं तत्र योगौ नृपाययौ ॥ उपैति शांतिं कोपाग्निः शत्रुयोषाश्रुबिंदुभिः ॥ ६६ ॥ ऐसे ये दो पेग नृपनामक हैं इनमें गमन करनेवाले राजाकी क्रोधानि, शत्रुओंके खियोंकी भूसुवोंके पड़नेसे शांत होती है ॥ ५६ ॥ बलक्षयप्रदर्श्वदः पूर्णः क्षीणप्रभवतः । विजयस्तत्र यातृणां संधिः सर्वान् पराक्रमः ॥ ४७ ॥ पूर्ण चंद्रमा बळदायीहै और क्षीणचंद्रमा क्षयकारक है तहां वली चंद्रमाहो तिन तिथियोंमें गमन करनेवाले राजाकी विजय, मिलाप और सर्वप्रकार पराक्रमसे वृद्धि होती है । ५७ ।। निमित्तशकुनादिभ्यः प्रधानेनोदयः स्मृतः ॥ तस्मात्प्रसवनायुः स्यात्फलहेतुर्मनोदयः ॥ ९८ ॥ निमित ( मुहूर्न ) और शकुनआदिकोंसे भाग्योदय होना यह मुख्य बात नहीं है किंतु यत्राआदि संपूर्ण मंगलोंमें मनक्री प्रसन्नता रहनी यह फळझा हेतु है ।। ५८ ।। उत्सवोपनयोदाहशवस्य मृतकेषु च ॥ ग्रहणे च न कुर्वीत यात्रां मयैः सदा बुधः ॥ ४९ ॥ उत्सव, उपनयन, विवाह, भुरदका सूतक, यह इतविषे बुद्धिमान जन यात्रा नहीं करे ।। ५९ ।। भाषटकस०-अ० ३३. (१२३ ) s महिषीमेषयोर्युद्धे कलत्रकलहांतरे ।। वस्रादेरवलिते क्रोधे दुरुक्ते न व्रजेत्श्रुतौ ॥ ६० ॥ गैसोंका और भीखोंका युद्ध होने, खियोंका युद्ध होनेसमय, वत्रादिक उतरषडना, क्रोध होना, खराब बचन कहना, छींकना ऐसे वक्षर गमन नहीं करना ॥ । ६० ॥ घृतान्नं तिलपिष्टान्नं मत्स्यान्नं घृतपायसम् ॥ प्रागादिक्रमशो भुका याति राजा जयपुरीन् ॥ ६१ ॥ घी अन्न, तिल पीठी, मत्स्य अन्न, वी खीर इन चार पदा- पैको खाकर यथाक्रमसे पूर्वआदि दिशाओंमें राज गमन करे तो शत्रुओंको नष्ट करे ॥ । ६१ ॥ । मार्जितापरमान्नं च कांजिकं च पयो दधि । । क्षौरं तिलोदनं भुक्वा भानुवारादिषु क्रमात् ।। ६२ ।। शिखरणि १ खीर २ कांजी ३ पकायादूध ४ दही ५ कचादूध ६ तिलओदन ७ इन पदार्थोंको रहिआदि धारोंमें यथाक्रमसे ओजन करके गभन करना शुभ है ।। ६२ ।। कुरुमाषांश्च तिलान्नं च दधि ॐ घृतं पयः । मृगमांसं च तत्सारं पायसं चाधुकं मृगम् ॥ ६३ ॥ शशमांसं च षष्टिक्यं प्रियंशुकमपूपकम् । चित्रांडजं फलं कूर्म सारीं गोधां च शङ्ककम् ॥ ६४ ॥ हविष्यं कृसरान्नं च मुद्रान्नं यवपिष्टकम् । मत्स्यान्नं चित्रितान्नं च ध्यैनं दस्रभात्क्रमात् ॥ ३५ ॥ ( २२४ } नारदसंहिता । और बाकी १ तिलपीठी २ दही ३ शहद ४ वी ५ दूध६ मृगमांस७ मृगक रक८ खीर . ९ पपैयाका मांस १० मृग ११ सूकर मांस ३२ सांठी चवल १३ माळकांगनी१४ पूडे १५ बिचत्र अलोंसे उत्पन्न हुए पक्षियक मांस १६ फळ १७ कछुवाछ मांस १८ सारिकपक्षीक मांस १९ गोहक मांस २० सेहका मांस २१ हविष्यान्न २२ खिचडी २३ मॅग २४ जबकी पीठी २५ मल्याक्ष २६ विचित्रितअन २७ दहीभात २८ इन पदार्थोंको खाकर अविनी आदि २८ नक्षत्रोंमें यथाक्रमसे यात्रा करनी शु है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ भुक्वा यावज्जयेच्छुट्ट भूमिनाथो जयत्यरीन् ॥ हुताशनं तिलैर्युवा पूजयेतु दिगीश्वरम् ॥ ६६॥ इसप्रकार इन अश्विनी आदि नक्षत्रोंमें इन वस्तुओंको खाकर जो विजयकी इच्छश्न करनेवाला राजा गमन करताहै वह शत्रु ओंको जीतता है गमनसमय तिखोंसे अभिमें हवन कर जिस दिशामें गमन करना उस दिगीश्वरका पूजन करे ।। ६६ ।। प्रणम्य देवदेवानाशीर्वादैर्धेपो वदेत् ॥ कृत्वा इमं दारुणं च तन्मंत्रेण कृतं व्रजेत् ॥ ६७ ॥ देवता तथा बालोंको प्रणाम कर आशीर्वाद पाकर दिगीश्वर के मंत्रसे अच्छे प्रकरसे होमकरके गमन करना ।। ६७ ।। वस्त्रं तद्गेधावैरेवं भतथा दिगीश्वरम् । इंद्रमैरावतारूढं शच्या सह विराजितम् ॥ ६८ ॥ भाषाटीस ०-अ० ३३. ( २२५) दगधिके वर्णका वस्त्र चढावे भाक्तिसे गंध आदिको करके पूजन करना ऐशवत हस्तीपर सवाहुए इंद्राणीसे युक्तहुए इंजेको पूजें ॥ ६८ ॥ वत्रपाणिं स्वर्णवर्णा दिव्याभरणभूषितम् ॥ सप्तहस्तं सप्तजिहुँ षडक्षी मेषवाहनम् ॥ ६९ ॥ हाथमें बज धारण किये हुए सुवर्णसरीखे वर्णवले दिव्य आ भूषणोंसे विभूषित ऐसे इंद्रका ध्यान करना और सात हाथोंवाला, सात जिह्वाला, छह आखोंवाला, मीढाकी सवारी ॥ ६९ ॥ स्वाहाप्रियं रक्तवर्णे खुक्खुवायुधधारिणम् ॥ ७० ॥ स्वाहाको प्रियमाननेवाला, लावणी, भुक् और खुधा आयुधको धारण करनेवाला ऐसे अग्निको पूजै ७० ।। दंडायुधं लोहिताओं यमं महिषवाहनम् । श्यामलासहितं रक्तवर्णसूङ्मुखं शुभम् । खङ्गचर्मधरं नीलं निति नरवाहनम् ॥ ७३ ॥ दंडआयुधवाला, रक्तनेत्र, मैसाी सवारी करनेवाला, श्यामल दूतसहित ऊपरको मुख किये हुए शु, ऐसे धर्मराजका दक्षिणदि शमें ध्यान करना, खज़ और ढाडको धारण किये हुए नीच्यर्षे मनुष्यकी सवारी किये हुए ॥ ७१ ॥ उद्भकेशं विरूपाक्षी दीर्घग्रीवायुतं विभुम् ॥ नागपा१धरं पीतवर्णं मकरवाहनम् ॥ ७२ ॥ • १५ ( २२६ ) नारदसंहिता । ऊपरको बाल उठाये हुए विकराल नेत्र, दीर्घग्रीवा, ऐसे समर्थ नैर्वीत ( राक्षस ) को पूजे । नागफ़ांशधारी, पीलावर्ण, मग रमच्छी सुचारी ॥ ७२ ।। । वरुणं कालिनाथं च रत्नाभरणभूषितम् । आणीिनां प्राणरूपं च द्विबाहुं दंडपाणिनम् ॥ ७३ ॥ कालिनाथ, रनोंके आभूषणोंसे विभूषित ऐसे वरुणदेखेका ध्यान करना । प्राणधारियोंका आण, दोभुजावळ हाथमें दंड लिये हुए । ७३ ॥ वायं कृष्णमृगासीनं पूजयेदंजनापतिम् ।। अश्वसीनं कुंतपाणिं द्विबाहुं स्वर्णसंनिभम् ॥ ७४ ॥ काले मृगपर सवार हुआ अंजनाके स्वामी, ऐसे वायुदेझ्का पूजन करना । घोडापर सवार हुआ, हाथमें आळा शत्र और दोभुजाओवाळा सुवर्णसमान् कांतिवळा ॥ ७४ ॥ कुबेरं चित्रलेखेशं यक्षगंधर्वनायकम् ॥ पिनाकिनं वृषारूढं गौरीपतिमनुत्तमम् ॥ ७९ ॥ चित्रलेखका स्वामी, यक्ष गंधर्वां स्त्रमी ऐसे कुबेरका पूजन करना और पिनाक धनुषवाले बैलपर सवार हुए, पार्वतीके पति, परमोत्तम ॥ ७५ ॥ श्वेतवर्ण चंद्रमौलि नागयज्ञोपवीतिनम् । अप्रयाणे स्वयं कार्याऽपेक्षया पूजनं तथा ॥ ७६ ॥ श्वेतवर्ण, चंद्रमाको मतक्रमें धारण करनेवाले सर्पक यज्ञोप वीत धारण किये हुए ऐसे महादेवका ध्यान करना यह ईशान आषाढीकस ०-अर्ब ३३. ( २२७) कोणके स्वामीका पूजन है । गमनसमयमें तो पूजन करना योग्य ही है और कहीं गमन नहीं करना हो तो भी कार्यकी अपेक्षासे इन दिक्षायैका इसी प्रकार पूजा करना ॥ ७६ ॥ कार्यं निर्गमनं छत्रध्वजाश्चक्षतवाहनैः ॥ स्वस्थानान्निर्गमस्थानं धनुषां च शतद्वयम् ॥ ७७ ॥ ध्वजा, छत्र, अध, निर्विकार वाहन, इन्होंसे युक्त होकर गमन करना चाहिये और अपने बर दोसै २०० धनुष प्रमाण अर्थात् ८०१ हाथ प्रमाणे अंतरमें प्रस्थान करना योग्य है ७७॥ चत्वारिंशद्दशैव प्रस्थितो हि स्वगेहतः । दिनान्येकम न वसेत्सप्त भूपः परो जनः ॥ ७८ ॥ अथवा चालीस धनुष प्रमाण वा वरद्दधनुष प्रमाण अंतर प्रमाणमें प्रस्थान करना अथवा अपने घरसे दूसरे घरमें प्रस्थान करना यही गमनहै गमन करके दूसरे घरमें राजाने एकजगह सातदिनसे अधिक नहीं ठहरना और अन्य जल ॥ ७८ ॥ पंचरात्रं च परतः धूनीसँतरं व्रजेत् ॥ अकालजेषु नृपतिर्विद्युद्भर्जितवृष्टिषु ॥ ७९ ॥ अथानकी जगह पाँचदिनसे अधिक नहीं ठहरे जो अधिक स्थिति होजाय तो दूसरे लनमें गमन करना और बिना कालमें बिजली कड़कना, तथा वर्षा होना ॥ ७९ ॥ उत्पातेषु त्रिविधेषु सप्तरात्रं तु न व्रजेत् । गमने तु शिवकाककपोतानां गिरः शुभाः ॥ ८९ ॥ ( २२८ ) नारदसंहिता.। इत्यादि उस्पातहीन तथा भीष आदि तीन प्रकारके उत्पात होनेमें राजा तीन दिनतक गमन नहीं करे। और गमनसमय गीदडी, काग, कपोती इन्होंकी वाणी शुभहै । ८० ।। वामांगे कोकिला पल्ली पोतकी सूकरी रला ॥ वानरः काकहरुः श्व भासः स्युर्दक्षिणोः शुभाः। ८१॥ और कोयल, छिपकली, पोतकी ( दुगपक्षी ) सूकरी, खाती चिड़ा, ये बायाँतर्फ आवें तो शुभहैं। और वानर, काग, रीछ, कुत्ता, भासपक्षी (पटवीजना ) ये दहिनीतर्फ शु हैं ॥ ८१ ॥ चापं त्यक्वा चतुष्पातु शुभदो वामतो गमः ॥ कृष्णं त्यका प्रयाते तु कृकलाशो न वीक्षितः ॥ ८२ ॥ पपैया बिना चतुष्पादपक्षी बायाँतर्फ गमन करे तो शुभहै कला पूपैया विना चतुष्पाद पक्षी बायाँतर्फ गमन करे तो शुभहे काला बिना अन्यतरहका किरलकांट दीखना शुभ नहीं हैं । ८२ ॥ वराहशशगोधानां सर्पाणां कीर्तनं शुभम् । दृष्टमात्रेण यात्रायां व्यस्तं सर्वे प्रवेशने ॥ ८३ ॥ सूकर, शशा, गोह, सांप इन्होंका उच्चारण करना शुमहै यह यात्राका शकुन है और प्रवेशसमयमें शकुन विपरीत जानने अर्थाव इन सर्पदिीका दीखना अच्छा है और उच्चारण अच्छा । नहीं ॥ . ८३ ॥ यात्रासिद्धिर्भवेद्दष्टे शवे रोदनवर्जिते । प्रवेशो रोदनयुते शवे स्याच शिवप्रदः ॥ ८४ ॥ ९ भाषटीकास०-अ० ३३. ( १२९) रोनासे रहित मुरदाका दर्शन हो तो गमनकी सिद्धि होतीहै । और रोनासहित मुरदका दीखना प्रवेशसमय सुखदायी है ।। ८४ । पतितीवजटिलोन्मत्तवांतौषधादिभिः । अभ्यक्तकाष्ठान्यस्थीनि चमगारतुषालिभिः ।। ८४॥ ओर जातिपतित, इंजडा, जटाधारी, बावला, शमन करता हुआ, औषधि, मांलिश तेल आदि लगाना, कष्ट, इडी, चांम, भंगार, तुष, धूमाकी अभि ।। ८५ ।। गुडकार्पासलवणसागैलनृणोरगैः ।। वंध्या व्यथितकाणौ च मुक्तकेशो बुभुक्षितः ॥ ८६ ॥ गुइ, कपास, लवणचरवी, तेल, तृण, सर्प, वंध्यानं, रोगीपुरुष, काण, खुलेकेशोंवाला, भूखा ॥ ८६ ॥ प्रयाणसमये लग्ने दृष्टे सिद्धिर्न जायते ॥ प्रज्वलाभिः शुभं वाक्यं कुसुमेक्षुसुरागणाः ॥ ८७ ॥ ये सब गमनसमयके लक्षविषे दीखजयें तो कार्यसिद्धि नहीं हो । और जलतीहुई अनि शुभदायक वचन, पुष्प, ईख, मदिरा १८७tt गंधपुष्पाक्षतच्छञ्चमादोलूका नृपाः । भक्ष्यं शुभफलं चैवेभोऽश्वा दक्षिणे वृषः ॥ ८८ ॥ गंधू, पुष्प, अक्षत, छत्र, चाँमरडोली, पिन्नस, राज, ऑक्ष्यप- दार्थशुभफल, हस्ती अञ्च, दहिनीतर्फ, आयाहुआ वृष ॥ ८८ ॥ मत्स्यमांसं सुधौतं च वनं वेतवृषध्वजः । । पुण्यस्त्री पूर्णकलशरत्नश्रृंगारगोद्विजाः॥ ८९॥ ( २३° } नारदसंवृता । मत्स्यमांस,धोयाहुआ वस्त्रसफेद बैल, धजा, सौभाग्यवती जी, अछका कलश, रनश्रृंगार, गै, ब्राह्मण ॥ ८९ ॥ भेरीमृदंगपट्टशंखरागादिनिस्वनाः ॥ वेदमंगलघोषः स्युर्यायिनां कार्यसिद्धिदाः ॥ ९० ॥ भेरी, मृदंग, ढोल, शंख, राग, गीतं, गाना, वेदमंगळकी ध्वनि ये सत्र शकुन गमनकरनेवालोको सिद्धिदायक हैं ॥ ९० ॥ आदौ विरुद्धशकुनं दृझा यायीष्टदेवतम् ॥ स्मृत्वा द्वितीये विप्राणां कृत्वा पूजां निवर्तयेत् ॥ ९१ ॥ गमनकरनेवाला जन प्रथम अपशकुन देखे तो इष्टदेवका ध्यान करके गमन करे फिर. दूसराभी अपशकुन दीखे तो ब्राह्मणोंक यूजन कर उलटा चला आये फिर गमेनकरना ।। ९१ ॥ सर्वदिक्षु क्षुतं नेष्टं गोक्षुतं निधनप्रदम् । अफलं यद्वलवृद्धोगिपीनसवत्कृतम् ॥ ९२ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां यात्राध्यायस्त्रयस्त्रिंशत्तमः॥३३॥ संब दिशाओंमें छींकहोना अशुभ है और शौकी छींक मृत्युदायक है वाळक, वृद्ध, रोगी, शरीरोगकी छींक कपटसे उईहुई क इनका दोष नहींहै ॥ ९२ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां यत्राध्याय त्रयस्त्रिंशचमंः ॥ ३३ ।। आदौ सौम्यायने कार्यं नववास्तुप्रवेशनम् । राज्ञा याचा निवृत्तौ च यद्वां ह्रदप्रवेशनम् ॥ १ ॥ भाषणटीकास ०-अ० ३४. (२३१ ) उत्तरायण सूर्य होवे तव नवीन घरमें प्रवेश करना चाहिये राजा यात्रासे निवृत्त होकर घरमें प्रवेश हो अथवा वरवधूका प्रवेशक वह भी इसीप्रक़ार मुझमें होना चाहिये ॥ १ ॥ विधाय पूर्वदिवसे वास्तुपूजां बलिक्रियाम् । माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासेषु शेभनः ॥ २॥ पहिलेदिन वास्तुपूजा बलिदान करके माघफाल्गुन, वैशाख ज्येष्ठ, इनमहीनोमें प्रवेशकरना शुभहै ।। २ ।। प्रवेशो मध्यमो ज्ञेयः सौम्यकार्तिकमासयोः ॥ वस्वज्यिस्येंदुवरुणत्वाष्ट्रमित्रास्थिरोडुषु ॥ ३ ॥ और मार्गशिर तथा पौषमासमें प्रवेशकरना मध्यम है । और धनिष्ठा, पुष्य, रेखती, मृगशिरशतभिषा, चित्रा, अनुराधा इन नक्ष त्रोंमें और स्थिर संज्ञक नक्षत्रोंमें प्रवेश करना ॥ ३ ।। शुभः प्रवेश देवेज्यशुक्रयोर्दश्यमानयोः ॥ व्यक़रवारतिथिषु रिक्तामावर्जितेषु च ॥ ४ ॥ बृहस्पति तथा शुक्रके उदयमें प्रवेश करना शुभहै मंगल तथा शनिवारके बिना और रिक्त तथा अमावस्या तिथिके विन अन्य दिनमें प्रवेश करना शुभदायक कह्वहै ॥ ४ ॥ दिवा वा यदि वा रात्रौ प्रवेशे मंगलप्रदः । चंद्रताराबलोपेते पूर्वोक्तवर्जितेषु च ॥९॥ दिनमें अथवा रात्रिमें भी प्रवेश करना शुभहै परंतु पूर्वोक्त अशु तिथ्यादिकोंको वर्जकर चंद्रताराका बल देखलेना चाहिये ॥ ५॥ ( २३२) नारदसंहिता । स्थिरलग्ने स्थिरांशे च नैधने शुद्धिसंयुते । त्रिकोणे केंद्रखयाये सौम्यैख्यायारिगैः खलैः ॥ ६ ॥ स्थिरटन, स्थिरराशिका नवांशक हो और आठवें पर कई ग्रह नहींह नवमें पांचवें घर, व केंद्रमें और ३ तथा दशौं घर शुभग्रह होर्मे पापग्रह ३।११।६ घर होवें ॥ ६ ॥ लग्नपश्चाष्टम्स्थेन वर्जितेन हिम्ना ॥ कर्तुर्वो जन्मभे लग्ने ताभ्यामुपचयेऽपि वा ॥ ७ ॥ लग्नसे छठे आठवें घर चंद्रमा नहीं हो अथवा कत्र्ताका जन्मळन हो तथा जन्मलग्नसे ३।४।१०१११ लाग्नहो तब प्रवेश करना॥ ७॥ जुवार्क वामतो विद्वाञ्शृङ्गारं चाग्रतो विशेत् ॥ ८॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां प्रवेशाध्यायश्चतुस्त्रिंशत्तमः ३४ बिद्दल पुरुष वामार्क सूर्य देखकर श्रृंगार मंगलसे युक्त हो घरमें प्रवेश ह | ॥ ८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषीकायां प्रवेशाध्याय श्श्चतुर्विंशचमः ॥ ३४ ॥ speakease

अथ वधोप्रश्न । वर्षाप्रने वारेभेऽजे पूर्णे वै लग्नगेपि वा । केंद्रगे वा शुक्ळपक्षे चातिवृष्टिः शुभेक्षिते ॥ १ ॥ वर्षके प्रश्नमें जठराशिपर पूर्णचंद्रमा हो अथवा लपमें चंद्रमा हो अथवा शुक्लपक्षमें केंद्रमें चंद्रमा हो तथा शुभग्रहोंसे इष्ट हो तो अत्यंत वर्षा होवे ।। १ ।। भघाटीकास०-अ० ३५. (२३३ ) अल्पदृष्टिः पापदृष्टे प्रावृट्काले चिराद्भवेत् ॥ चंद्रवद्भार्गवे सर्वमेवंविधगुणान्विते ॥ २ ॥ और वर्षाकालमें चंद्रमा पापमहसे दृष्ट होतो अल्पवर्षी बताना चंद्रमाक्री तरह शुक्रसेभी सब शुङ्ग अशुभ फल कहना ।। २ ।। प्रावृषीं सितात्सप्तराशिगः शुभवीक्षितः । मंदात्रिकोणसप्तस्थो यदि वा दृष्टिकृद्भवेत् ॥ ३ ॥ वर्षाकालमें शुचसे सातवीं राशिपर चंद्रमाहो और शुभग्रहोंसे दृष्ट्हो अथवा शनिसे नवमें, पांचवें घर तथा सातौं घर चंद्रमाहो तो वृषी होये ।। ३ ।।। सद्यो वृष्टिकरः शुक्रो यदा बुधसमीपगः ॥ तयोर्मध्यगते भाना तदा वृष्टिविनाशनम् ॥ ४ ॥ शुक्र जो बुधके समीप होय तो शीघही वर्षा करे तिन्होंने मध्यमें सूर्य आजाय तो वर्षाको नष्ट करौ ॥ ४ ॥ मघादिपंचधिष्ण्यस्थः पूर्वं स्वाती त्रये परे ॥ प्रवर्षणं भृगुः कुर्याद्विपरीते न वर्षति ॥ ४ ॥ मघा आदि पांच नक्षत्र तीनों पूर्वा, स्वाती आदि तीन नक्षत्र इन नक्षत्रेपर शुरु होय तो वर्षाकरे इनसे विपरीत होय तो नहीं वयं ।। ५ ।। पुरतः पृष्ठतो भानोर्गुहा यदि समीपगाः ॥ तदा वृष्टिं प्रकुर्वंति न चैते प्रतिलोमगाः॥ ६ ॥ सौम्यमार्गगतः शुक्रो वृष्टिकृन्न तु याम्यगः॥ उदयास्तेषु वृष्टिः स्याद्भानोराद्रीप्रवेशने ॥ ७ ॥ ( २३४) नारदसंहिता । चंद्रमा आदि ग्रह पीछेसे अथवा आगते सूर्यके समीप होवें तो वर्षा करते हैं और बक्री होकर सूर्यसे दूर होवें तो वर्षा नहीं करें शुक्र उत्तरचारी होय तो वर्षा करता है और दक्षिणचारी होय तो वर्षा नहीं करे शुक्रके उदय अस्त होनेके समय वर्षा होतीहै और सूर्य आीपर आये उसदिनका फल कहते हैं । ६ ।। ७ ॥ । विपत्तिः सस्यहानिः स्यादह्न्याह्नप्रवेशने । संध्ययोः सस्यवृद्धिः स्यात्सर्वसंपन्नृणां निरी ८॥ दिनमें आङ्गप्रवेश होय तो प्रजामें दुःख और खेतीका नाश हो दोनों संधियोंमें आर्द्धप्रवेश हो वो खेतीकी वृद्धि है रात्रिमें आद्री प्रवेश हो तो मनुष्योंकी संपूर्ण समृद्दि बडे ॥ ८ ॥ स्तोकवृष्टिरनर्घः स्याद्वृष्टिः सस्यसंपदः ॥ आद्रुदये प्रभिन्ने चेद्भवेदीतिर्न संशयः ॥ ९॥ आप्रवेश समय थोडीसी वर्षा हो तो अन्नादि महंगे हों और वर्षा नहीं हो तो खेतियोंकी वृदोि पवन चडे तो टीडी आदिका भूय हो ॥ ९ ॥ चंद्रज्येनेथचा शुक्रे केंद्रे वीतिर्विनश्यति ॥ पर्वाषाढगतोभानुजीमूतैः परिवेष्टितः ॥ १० ॥ आह्नप्रवेश लभसमय चंद्रमा वृहस्पति, बुध, शुक ये केंद्में ‘होंतो वीडी आदि उपद्रव नष्ट होज़र्वं पूर्वापाड नक्षत्रषर सूर्य आवे तब ( धनुकीसंक्रांतिमें ) सूर्य बादलोंसे आच्छादित रहे तो ॥ १० ॥ आषाटकस०-अ० ३५ ( २३५ } ' वर्षत्यार्दादिमूलांतं प्रत्यक्ष प्रत्यहं तथा ॥ वृष्टिश्च पौष्णभे तस्मादशज्ञेषु न वर्षति ॥ ११ ॥ आर्दैआदि मूलनक्षत्रतक सूर्य रहे तवतक यथाकालमें सुंदर वर्षा होती है और रेवती नक्षत्रपर सूर्य होनेके समय वर्षा होजाय तो रेवती आदि दश नक्षत्रोंतक सूर्य वष नहीं करता है ॥१ १ ॥ सिंदो भिन्ने कुतो वृष्टिरभिन्ने कर्कटे कुतः ॥ कन्योदये प्रभिन्ने चेत्सर्वथा वृष्टिरुत्तमा ॥ १२ ॥ सिंही संक्रांतिके दिन वर्षों बादल हो और कर्की संक्रांतिके दिन वर्षा वाल नहीं हो तो वर्षा संवत् अच्छा नहीं हो ॥ १२ ॥ अहिर्मुश्य पूर्वसस्यं परसस्यं च रेवती ॥ भरणी सर्वसस्यं च सर्वनाशाय चाश्विनी ॥ १३ ॥ उत्तराभाद्रपदपर सूर्य हो तब बादलगर्भ रहे पूर्व सस्य अर्थात सामQखेती नहीं हो रेवतीमें गर्भहो तो परसस्य कहिये सा दूकी सेती नहीं हो अश्विनी भरणी पर सूर्य हो तब बादल वर्षे होजाय तो संपूर्ण खेतियां नष्ट होवें ॥ १३ ॥ गुरोः सप्तमराशिस्थः प्रत्यक्षो भृगुजो यदा । तदातिवर्षणं भूरि प्रावृट्काले बोज्झिते ॥ १६ ॥ बृहस्पतिसे आगे सातवीं राशिंपर शुक्र स्थित होय तो वर्षाकालमें वर्षा होनेके बादभी बहुत अच्छी वर्षा होनेलगे ।१४।। आसन्नमर्कशशिनोः परिवेषगतोत्तरा । विद्युअपूर्ण मंडूकास्त्वनावृष्टिर्भवेत्तदा ॥ १५ ॥

( २३६) नारदसंहिता । का सूर्य और चंद्रमाके समीप उत्तरदिशमें मैडळ होय अथवा बिजली चमके और उत्तरदिशामें ही भीडक बोले तो बर्षा नहीं हो ॥१५॥ यदा प्रत्यंगता भेकाः स्वसङ्कोपरि संस्थिताः॥ पतंति दक्षिणस्था वा भवेदृष्टिस्तदाचिरात् ॥ १६ ॥ जो पश्चिमदिशामें अथवा दक्षिणदिशामें अपने स्थानपर बैठे हुए मीडक उछलके पडनेल्गे तो वर्षा शीघही होगी ऐसे जाने ॥१६॥ नखैर्लिखंतो मार्जाराचैव निलभसंस्थिताः ॥ सेतुबंधपरा बालाः सद्यो वै वृष्टिहेतवः ॥ १७ ॥ और विलाच नखोंकरके भूमिको खोदें तथा निलं हुए स्थित रहें तथा बाळक पुल बांधकर खेलने ळगें तो वर्षा होगी ऐस जानना ॥ १७ ॥ पिपीलिका शिरश्छिंना व्यवायः सर्पयोस्तथा ॥ ङमाधिरोहः सर्पाणां प्रतींदुचूंष्टिसूचकाः ॥ १८ ।। कीडीपर कीडी चढं अथवा कीडी अंड लेकर चलें सर्प सर्पिणी एकजगह स्थित दीखें सर्प वृक्षपर चडाहुआ दीखे - बदलेमें चंद्रमाके सम्मुख दूसरा चंद्रमा दीखे ये सब वर्षा होनेके लक्षण जान्ने । १८ ।। उदयास्तमये काले विवर्णाकऽथ वा शशी ॥ मधुवर्णातिवायुश्चेदतिवृष्टिर्भवेत्तदा ॥ १९ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां सद्योवृष्टिलक्षणाध्यायः पंचत्रिंशत्तमः ॥ ३८ ॥ भाषाटीकास ०-अ० ३६. (२३७) उद्य तथा अस्त होनेके समय सूर्य वा चंद्रमाका वर्ण बुरा ( गाधळा) दीखे अथवा शहदसरीखा वर्ण दीखे अथवा अत्यंत पवन चले तो वर्षा बहुत होतीहै । १९॥ इति श्रीनारदीयसंहिताशषाटीकायां सद्योवृष्टिलक्षणाध्यायः पंचत्रिंशतमः ।। ३५॥ प्राङ्मुखस्य तु कूर्मस्य नवांगेषु धरामिमाम् ॥ विभज्य नवधा खंडमंडलानि प्रदक्षिणम् । अंतर्वेदी च पांचालं तस्येदं नाभिमंडलम् ॥ १॥ पूर्वकी तॐहै मुख जिसका ऐसे कूर्मक नव अंगविषे इस पृथ्वीका विभाग करना अर्थात् पूर्वाभिमुख कूर्मचक्र बनाकर एक खंडके नव विभाग बनाकर प्रदक्षिणक्रमसे मंडल बनावे तिस कूर्मका नाभि- मैडल, ( मध्यभाग, ) अंतर्वेदी अर्थात् गंगा यमुनाका मध्यभाग और पांचाळ, पंजाब देश कूर्मचक्रका नाभिमण्डळहै ।। १ ॥ प्राचां मागधलट्टादिदेशास्तन्मुखमंडलम् । स्त्रीकलेयकिराताख्यादेशास्तत्राहुमंडलम् ॥ २ ॥ तहां पूर्वके मध्यमें मागधलाट आदिदेश तिसका मुखमंडल हैं स्त्रकिलेय, किरात ये देश तिसके बाहुमंडलहैं ॥ २ ॥ अवंतिद्राविडा भिल्लदेशास्तपाश्र्वमंडलम् । गौडकोंकणशारवेष्टपुण्ड्रास्तत्पार्श्वमंडलम् ॥ ३ ॥ अवंती, उज्जैन प्रांतदेश, द्राविड, मिळ्देश ये तिसके पार्श्व ( २३८) नारदसंहिता । ( पांश्च ) मंडळहैं और गौड़, कोंकण, शास्वदेश, पुंड्रदेश ये भी अतिसके पार्श्वमंडल हैं ॥ ३ ॥ सिंधुकशीमहाराष्ट्रसौराष्ट्राः पुच्छमंडलम् । पुलिंदभीष्मयवनगुर्जराः पादमंडलम् ॥ ४ ॥ सिंधुदेश, काशी, महाराष्ट्रसौराष्ट्र ये देश तिसके पुच्छमंडल हैं पुलिंद, भीष्म, यधन, गुर्जर ये देश पादमंडळ हैं ॥ ४ ॥ कुरुकाश्मीरमाद्भयमत्स्यास्तत्पार्श्वमंडलम् । खशाङ्गवंगबाहीककांबोजाः पाणिमंडलम् ॥ ९ ॥ कुरु, काश्मीरमात्रेय,मत्स्यदेश ये तिसके पार्श्वमैडल्हैं खश, अंग, यंगवाहीककोज ये देश तिसके हाथंकी जगह समझने चाहियें कृत्तिकादीनि धिष्ण्यानि त्रीणिनीणि क्रमाद्यसेत् ।। नाभेर्दिक्षु नयमेषु पापैर्मुटुं कुमैः शुभम् ॥ ६ ॥ इति श्रीनारदीयसं०कूर्मविभागाध्यः षट्त्रंशत्तमः३६॥ इसप्रकार तिस कूर्मेके नव विभाग कर यथाक्रमसे कृत्तिका आदि तीन २ नक्षत्र रखने । पहले ३ नक्षत्र मध्यंमें नाभिमंडलपर रखके मगध लाटादि देशों तमसे इक ९ अंगोंपर रखने फिर जिस अंगपरके नक्षत्रैपर पाएश्ह होवें उसी अंगके देशोंमें अशुभ फल हो और जिप्त देशके नक्षत्रपर शुभग्रह आरहेकों उस देशमें शुफळ हो ऐसे जाने ॥ ६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाढीक्यां कूर्मविभागाध्यायः धर्मेिशतः ३६ ॥ भाषाटीकास०-अ० ३७. ( २३९ ) अथ उपाध्यायः । देवता यत्र नृत्यंति पतंति प्रज्वलति च । सुहू रुदेति गायंति प्रस्विद्यति हजंति च ॥ १ ॥ जहां देवता नृत्य करतेहैं, पड़ते हैं अथ देवताओंकी मूर्ति जल उठती हैं, रोती हैं, कभी गाती हैं, मूर्रयोंके पसीना I आताहै । कभी इंसती हैं ।। १ ॥ वसंत्यागें तथा धूमं स्नेहं रक्तं पयो जलम् ॥ अधोमुखश्च तिष्ठेति स्थानात्स्थानं व्रजंति च ॥ । २ ॥ । मूर्तियोंके मुख से अत्रि, धूप, स्नेह ( हैखादिक ) रक्त, दूध जल ये निकलते हैं अथवा मुख नीचे जाताहै, एक जगह दूसरी जगहसे मूत्रं प्राप्त होती है । २ ।। एवमाया हि दृश्यंते विकाराः प्रतिमासु च । गंधर्वनगरं चैव दिवा नक्षत्रदर्शनम् ॥ ३ ॥ इत्यादिक विकर देवताओंकी मूर्सियों दीखतहैं और आकाशमें गंधर्वनगर ( मकानात ) दीखना, दिनमें तारे दीखने ॥ ३ ॥ महोल्कापतनं काष्ठतृणरक्तप्रवर्षणम् । गंधर्वगेहे दिग्धूमं धूमिकंपं दिव निशि ॥ ९ ॥ तारे टूटने, कष्ठ तृण रतइन्हों। वर्षा ,होनी, अकाशमें व दिशा ओमें धूमां दीखन इयादि उसात दिनों तथा रात्रिमें भूकंप ( भाँचाल ) होना ही ४ ॥ (२४०) नारदसंहिता । अनग्नौ च स्फुलिंगाश्च ज्वलनं च विनेंधनम् ॥ निशीन्द्रचापमंडूकशिखरं वेतवायसः ॥ ४ ॥ ईंधन विना अभि जल उठे, अत्रिमेंसे किणके उडने लगे, रात्रिमें इंद्रधनुष दीखेमडिक दीखें शिखर दीखे सफेद काग दीखे ॥५॥ दृश्यंते विस्फुलिंगाश्च गोगजाश्वोष्ट्रगात्रतः । जंतवो द्वित्रिशिरसो जायंते वा वियोनिषु ॥ ६ ॥ गौ, हस्ती, अध, ऊँट इन्होंने शरीरसे अभिके किनके निकलते दीखें अथवा दो तीन शिरवाले बालकका जन्म होना, दूसरी योनिमें दूसरा बाळक जन्मना ॥ ६ ॥ प्रतिसूर्याश्वतसृषुस्युर्दिक्षु युगपद्रवैः ॥ जंबुकश्रामसंवासः केतूनां च प्रदर्शनम् ॥ ७॥ सूर्यके सम्मुख दूसरा सूर्य दखिना एक ही बार चारों दिशा- ऑमें इंद्रधनुष दीखने, यमके समीप बहुतसे गीदड़ इकडे होना, पूंछवाले तारे दीखें ऐसे उत्पात दीडं ।। ७ ।। काकानामाकुलं रात्रौ कपोतानां दिवा यदि । अकाले पुष्पिता वृक्षा दृश्यंते फलिता यदि ॥ ८ ॥ कार्यं तच्छेदनं तत्र ततः शांतिर्मनीषिभिः । एवमाश्वा महोत्पाता बहवःस्थाननाशदः ॥ ९ ॥ र रात्रिमें कौओंका शब्द सुनें, दिनमें कपोतोंका शब्द सुनें, कालमें वृक्षोंके फूल तथा फल दीखें तब ऐसे वृक्षोंका छेद न करना और पंडित जनोंने इन उत्पातोंको दूरकरनेके वास्ते इन्होंकी शांति भाषाटीकास०-अ० ३७. (२४१ ) AAA करनी चाहिये इत्यादि बहुत से महान् उत्पात स्थानको नष्ट करने वाले कहे हैं ॥ ८ ॥ ९॥ केचिन्मृत्युप्रदाः केचिच्छष्टभ्यश्व भयप्रदः ॥ मध्याद्यं पशोधैत्युः क्षयेऽकीर्तिः सुखासुखम् ॥ १० ॥ कितेक उवात मृत्युदायक हैं, कितेक उपात शत्रुओंसे भय करते-हैं तथा उदासीन पुरुषसे भय करते हैं, पशुकी मृत्यु, क्षय, कीर्तिनाश, सुखमें दुःख ।। १० ।। अथ होमः । अनैश्वर्यं चान्नहानिरुत्पातभयमादिशेत् । देवालये स्वगेहे वा ईशान्यां पूर्वतोऽपि वा ॥ ११॥ ऐश्वर्यका नाश, अन्नको हानेि, इत्यादिक ये सब उत्पातोंके भय जानने । देवताके मंदिरमें अथवा अपने घरमें ईशानकोणमें अथवा पूर्वेमें ।। ११ ॥ कुंडं लक्षणसंयुक्तं कल्पयेन्मेखलायुतम् ॥ गृह्योक्तविधिना तत्र स्थापयित्वा हुताशनम् ॥ १२ ॥ बहुत उत्तम अभिकुंड बनावे कुंडपर मेखला बनावे फिर अपने कुलके अनुसार विवाहादि मंगरोक्तविधिते अग्नि स्थापन करना १२ जुहुयादाज्यभागते पृथगष्टोत्तरं शतम् ॥ यत इंद्रभयामहे स्वस्तिदाघोरमंत्रकैः ॥ १३ ॥ समिदाज्यं चरॉनीहितिलैर्याहृतिभिस्तथा॥ कोटीहोमं तदर्थं च लक्षहोममथापि वा ॥ १४ ॥ १६ (२४२ ) नारदसंहिता । ६२१ घृतसे आज्यभागसंज्ञक मंत्रोंसे १०८आहुति देना फिर "यत- इंद्रभयामहे स्वस्तिदा "और अघोर, इन मंत्रोंसे आहुति देवे समिध, वृत, चरु, चावळ, तिल इन्होंसे व्याहृतियोंके मंत्रसे आहुति देना कोटि होम कराना अथवा तिससे आधा अथवा लक्ष होम कराना ।। १३ ॥ १४ ॥ - ४ यथा वित्तानुसारेण तन्न्यूनाधिककल्पना ॥ एकविंशतिरात्रं वा पक्षी पक्षार्द्धमेव वा ॥ १४॥ जैस अपना वित्तहो उसके अनुसार होम कराना इक्कीस दिनों तक अथवा १५दिनोंतक अथवा आथे पक्षवक होम कराना ॥१५ पंचरात्रं त्रिरात्रं वा होमकर्म समाचरेत् ॥ दक्षिणां च ततो दद्यदाचर्याय कुटुंबिने ॥ १६ ॥ पांचरात्रितक वा तीनरात्रितक होमकर्म कराना योग्य है फिर कुटुंबवाले आचार्यके वास्ते दक्षिणा देवे ॥ १६ ॥ गणेशक्षेत्रपालार्कदुर्गाझण्यंगदेवताः । तासां प्रीत्यै जपः कार्यः शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥ १७॥ गणेश, क्षेत्रपाळसूर्यदुर्गा, चौंसठयोगिन, अंगदेवता इन्होंकी मीतिके वास्ते इनमंत्रोंसे ज करावे अन्य होमादिकर्म पूर्वोक्तविधिसे । करना ॥ १७ ॥ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यात्षोडशभ्यः स्वशक्तितः॥१८॥ इति श्रीनारदीयसंहितायामुत्पाताध्यायः सप्तत्रिंशत्तमः ॥ ३७॥ भाषाटकास ०-अ० ३८. (२४३ ) सेव्ह कीत्विजोंके वास्ते अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा देखे ॥ १८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिता भाषाटीकायामुत्पाताध्यायः सप्तत्रिंशत्तमः ॥ ३७ ॥ उत्पातास्त्रिविधा लोके दिवि भौमांतरिक्षजाः ॥ तेषां नामानि शांतिं च सम्यग्वक्ष्ये पृथक्पृथक् ॥ १ ॥ संसारमें तीन प्रकारके उस्पात हैं स्वर्ग, भूमि, आकाश इन तीन जगह होनेवाले उत्पात हैं तिनके नामोंको और शांतिको अलग २ कहते हैं ॥ १ ॥ दिवा वा यदि वा रात्रौ यः पश्येत्काकमैथुनम् ॥ स नरो मृत्युमाप्नोति यदि वा स्थाननाशनम् ॥ २॥ दिनमें अथवा रात्रिमें जो पुरुष काकके मैथुनको देखता है उस पुरुषकी मृत्युह अथवा स्थान नष्ट होवे ॥ २ ॥ काकघातस्रतं चैव विदधीताथ वत्सरम् । पितृदेवद्विजान्भक्त्या प्रत्यहं चाभिवादनम् ॥ ३ ॥ तिस पुरुषने वर्षदिनतक काकघात नामक व्रत करना और पितर देवता बालण इन्होंको भक्तिसे दिन २ प्रति प्रणाम करना ॥ ३ ॥ जितेंद्रियः शुद्धमनाः सत्यधर्मपरायणः । तदोषशमनायेत्थं शांतिकर्म समाचरेत् ॥ ४ ॥ जितेंद्रिय शुद्धमनाळा रहे, सत्यधर्ममें तत्पर रहै तिस दोष शांत करनेके वास्ते इसप्रकार शांवि करे कि ॥ ४ ॥ ( २४४ ) नारदसंहिता। गृहस्येशानकोणे तु होमस्थानं प्रकरुपयेत् ॥ स्वगृह्योक्तविधानेन तत्र स्थाप्य हुताशनम् ॥ ४ ॥ वरमें ईशानकोणकी तर्फ अभिस्थान कल्पितकर तहां अपने गृह्योक्त विधिसे अग्निस्थापन करना ।। ५ ।। मुखांते समिदाज्यानैदमश्चऽष्टोत्तरं शतम् । प्रतिमंत्रं त्र्यंबकेन चाथ मृत्यंजयेन वा ॥ ६ ॥ व्याहृतिभिहितिलैर्जपाद्येतं प्रकल्पयेत् ॥ पूर्णाहुतिं च जुहुयात्कर्ता शुचिरलंकृतः ॥ ७ ॥ फिर समिधघृत, तिलादिक अन्न इन्होंसे ‘ऽयंबकं यजामहे’ इस मंत्रसे अथवा महामृत्यंजयमंत्रसे अर्थात् ‘भूभुवःस्वः' इत्यादिक व्याहृतियोंसहित यंबकमंत्रसे चावलतिलोंसे जपकी संख्याके अनुसार होम कर और पवित्र विभूषितहुआ कर्ता यजमान होमके अंतमें पूर्णाहुति करें ॥ ६ ॥ ७ ॥ स्वर्णश्रृंगीं रौप्यखुरां कृष्णां धेरै पयस्विनीम् । वस्त्रालंकारसहितां निष्कद्वादशसंयुताम् ॥ ८॥ और सुवर्णकी सींगडी तथा चांदीके खुरोंसे विभूषतईका अच्छे दुधवली कालीगको वस्त्र आभूषणोंसे विभूषितकर बारह निष्क अर्थात् ४८ तोले सुवर्णसे युक्त ॥ ८ ॥ तदर्धेन तदर्धेन तदर्धेनाथ वा पुनः । यथा वित्तानुसारेण तन्यूनाधिककल्पना ॥ ९ ॥ अथवा तप्तसे आधा अथवा तिससे भी आधा अथवा तिससे भी आधा सुवर्ण वा चांदी अपने वित्तके अनुसार कमज्यादैदेना ॥९ ।। भाषाटीकास०-अ० ३९. ( २४५) आचार्याय श्रोत्रियाय गां च दद्यात्कुटुंबिने । ब्राह्मणेभ्यो विशिष्टेभ्यो यथाशक्त्या च दक्षिणाम् ॥ १०॥ वेदशाठी कुटुंब आचार्यके वास्ते इस गौको दान देवे और श्रेष्ठ बालगोंके वास्ते शक्तिके अनुसार दक्षिणा देनी ॥ १० ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥ एवं यः कुरुते सम्यक्प्त तदोषात्प्रमुच्यते ॥ ११ ॥ इति श्रीनारीयसंहितायां वायसमैथुनलक्षणा ध्यायोऽष्टत्रिंशत्तमः ॥ ३८ ॥ फिर स्वस्तिवाचनपूर्वक ब्राह्मणको ओजन करवुधे ऐसे जो अच्छेप्रकारसे करता है वह तिसदोषसे ( काकमैथुनादिदोपसे ) छट जाता है ॥ ११ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाटीयां वायसमैथुनलक्षणा- ध्यायेऽष्टत्रिंशत्तमः। ३८ ।। यस्याः प्रपतने पूर्वे फलमुक्तं शुभाशुभम् । शीर्षे राज्यं श्रियं प्राप्तिर्भारौ वैश्वर्यवर्धनम् ॥ १ ॥ छिपकली शरीरंपर पडनेका फल पूर्वाचार्यांने कहा है। शिरपर पड़े तो राज्य तथा लक्ष्मीकी प्राप्ति हो मस्तकपर पड़े तो ऐश्वर्यकी वृद्धि हो ।। १ ।। पस्याः प्रपतने चैव सरटस्य प्ररोहणे ॥ शुभाशुभं विजानीयात्तत्तत्स्थाने विशेषतः ॥ २ ॥ शरीरपर छिपकनेि पडनेक और किरकाटके चढनेका तिस २ स्थानका शुभाशुभ फछ विशेषतासे जानना ।। २ ।। (२४६) नारदसंहिता । सव्ये भुजे जयः प्रोक्तो ह्यपसव्ये महद्भयम् । कुक्षौ दक्षिणभागस्य धनलाभस्तथैव च ॥ ३ ॥ दहिनी भुजापर पड़े तो ज्यप्राप्ति और बांयीं भुजापर महान भय हो दहिनी कुक्षिपर धनका लामहे ।। ३ ।। वामकुक्षौ तु निधनं गदितं पूर्वसूरिभिः । सव्यहस्ते मित्रलभो वामहस्ते तु निस्वता ॥ ४ ॥ बांयकुक्षिपर मृत्यु, दहिने हाथपर मित्रका लाभ और बर्षे हाथपर दरिद्रताहो ऐसे पुरातन पंडितोंने कहा है ।। ४ ।। उदरे सव्यभागे तु सुपुत्रावाप्तिरुच्यते ॥ वामभागे महारोगः कक्ष्यां सव्ये महद्यशः ॥ ५॥ उदके दहिने आगपर पड़े तो पुत्रकी प्राप्ति और उदरपर बायाँतर्फ पडे तो मंहन् रोग हो दहिनस्किटिपर पड़े तो महान् यश मिलै ॥ ५ ॥ वामकट्यां तु निधनं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ जान्वोरेवं विजानीयात्सव्यपादे शुभावहम् ॥ ६ ॥ बांयीं कटिपर तत्वदर्शींमुनियोंने मृत्यु कही है और दोनों ग्रेडोंपर भी मृत्यु जानना, दहिने पांवघर शुभ फल जानना ।। ६ ।। वांमपादे तु गमनमिति प्राहुर्महर्षयः । स्त्रीणां तु सरटश्चैव व्यस्तमेतत्फलं वदेत् ॥ ७ ॥ वायें पैरपर पड़े तो गमन हो ऐसे महर्षि जनोंने कहा है इसीप्र कर किरलकाँटका फल जानना और खियोंको यह फल विपरीत भाषाटीकास ०-अ० ३९. (२४७ ) होता है अर्थात् पुरुषके जिस अंगपर शुभफल कहाहै वहां अशुद्ध फूल होता है ॥ ७ ॥ फलं प्ररोहणे चैव सरष्टस्य प्रचारतः ॥ सवौगेषु शुभं विद्यच्छांतिं कुर्यात्स्वशक्तितः ॥८॥ किरडकटं सब अंगोंमें जहां चढजाय उसी जगहके शुभफलके विचारे जो अशुभफल होय तो शक्तिके अनुसार शांति करखान चहिये ॥ ८ ॥ शुभस्थाने शुभावाप्तिरशुभे दोषशांतये ॥ तत्स्वरूपं सुवर्णेन रुद्ररूपं तथैव च ॥ ९ ॥ शुभ स्थानमें चढे तो शुभफलकी प्राप्ति हो और अशुभस्थान पर चढे तो शांति करनी चाहिये तिस्र किरलकाँटको सुवर्णक बनवाके रुद्ररूप जानकर पूजनकरे ।। ९ ॥ मृर्जयेन मंत्रेण वस्त्रादिभिरथार्चयेत् ॥ अग्निं तत्र प्रतिष्ठाप्य जुहुयात्तिलपायसैः ॥ १० ॥ मत्कुंजयमंत्र वनुआदि समर्पणकरके पूजनरै अभिस्थापन करके तिल और खीरसे होम करौ ॥ १० ॥ आचार्यो वरुणैः सूक्तैः कुर्यात्तत्राभिषेचनम् ॥ आज्यावलोकनं कृत्वा शक्त्या ब्राह्मणभोजनम् ॥११॥ वरुणदेवताके मंत्रोंसे आचर्यं तहां अभिषेक, करै यजमान घृतमें मुख देखके (छायादान कर ) शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको आोजन करवावे ॥ ११ ॥ (२४८) नारदसंहिता । गणेशक्षेत्रपालार्कदुर्गाक्षण्यंगदेवताः । तासां प्रीत्यै जषः कार्यः शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥ १२ ॥ गणेश, क्षेत्रपाल, भुये,दुग, चौसठयोगिनी, अंगदेवता इन्होंकी श्रीतिके वास्ते इनके मंत्रोंकज जप करै अन्य सच विधि पहिछी तरह करनी ॥ १२ ॥ हविग्भ्यो दक्षिणां दद्यात्षोडशभ्यः स्वशक्तितः॥१३॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां पल्लीसरष्टाशुभस्थानशांति प्रकरणाध्याय एकोनचत्वारिंशत्तमः॥३९॥ अपनी शक्तिको अनुसार सोलह कविजेके अर्थ दक्षिणा देनी १३ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाढीकियां पल्लीसराशुङ्गस्थानशांति प्रकरणाध्याय एकोनचत्वारिंशत्तमः ।। ३९॥ आरोहेत गृहं यस्य कपोतो वा प्रवेशयेत् ॥ स्थानहानिर्भवेत्तस्य यद्वानर्थपरंपरा ॥ १ ॥ जिसके घंमें कपोत ( बाजपक्षी ) प्रवेश होजाय अथवा घरके ऊपर बैठजाय उसके स्थानकी हानि हो अथवा कोई दुःख होवे ।। १ ॥ दोष(य धनिनां गेहे दरिद्राणां शिवाय च ॥ तच्छांतिस्तु प्रकर्तव्या जपहोमविधानतः॥ २॥ धनीपुरुषोंके घरमें प्रवेश होना यह अशुभफल है और दरिद्री पुरुषके घरमें तथा शून्यघरमें शुझफल जानना तिसकी शांति जप होम विधिसे करनी चाहिये ।। २ ।।

  • भाषाटीकास०-अ० ४०. (२४९ )

आह्मणान्वरयेत्तत्र स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥ षोडशद्वादशार्थं वा रौतस्मार्तक्रियापरान् ॥ ३ ॥ श्रुति श्रुतिकी क्रियामें तत्पर रहनेवाले सोलह वा आठ ब्रह णोंको स्वस्तिवाचनपूर्वक वरणकरौ ।। ३ ॥ देवाः कपोत इत्यादि इग्भिः स्यात्पंचभिर्जपः । कुंडं कृत्वा प्रयत्नेन स्वपृष्ठोक्तविधानतः ॥ ४ ॥ देवः कपोत, इत्यादि पांचहचाओसे जप कराना और अपने वेदशाखाके अनुकूळ अमिकुंड बनवावे ।। ४ ॥ ईशान्यां स्थापयेद्धर्हि सुखांतेऽष्टोत्तरं शतम् । प्रत्येकं समिदाज्यानैः प्रतिप्रणवपूर्वकम् ॥९॥ ईशानकोणमें अग्निस्थापन कर समिध, घृत, अन इन्हों करके ओंकारपूर्वक अष्टोत्तर शत १०८ आहुति अग्निके मुखमें करे ।।५।। यत इंद्रभयामहस्वस्ति तेनेति त्र्यंबकैः । त्रिभिर्मत्रैश्च जुहुयात्तिलान्व्याहृतिभिः सह ॥ ६ ॥ £थत इंद्रयामहे इस मंत्रसे अथवा वस्तिन इन्द्रो वा ऽयंवकं” इन तीनमंत्रोंसे व्याहृतिपूर्वक तिलसे होमकरौ ।। ६ ।। कुर्यादेव ततो भक्त्या कर्ता पूर्णाहुतिं स्वयम् ॥ विप्रेभ्यो दक्षिणां दद्याद्दोषशांतिं ततो जपेत् ॥ ७॥ फिर यजमान आष भक्तिपूर्वक पूर्णाहुति करें और बालणके चास्ते दक्षिण घंॉटैि ऐसे करनेसे तिसदोषकी शांति होवे ॥ ७ ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्स्वयं भुजीत बंधुभिः ॥ एवं यः कुरुत भक्त्या तस्मादोषात्प्रमुच्यते ॥ ८ ॥ १ १ ६ (२५० ) नारदसंहिता । फिर ब्राह्मणोंको भोजन करके आप अपने बंधुजनों सहित भोजन करें ऐसे जो भक्तिसे करता है वह तिसदोषसे छूटजाताहै ॥८॥ पिंगलायाः स्वरेष्येवं मधुवाल्मीकयोरपि । संपूर्णमंगले हानिः शून्यसमानि मंगलम्॥ ९॥ पिंगला (कोतरी ) के बोलनेमें तथा मधु वाल्मीक पक्षके बोलेनमें भी ऐसे ही शांति कराना। संपूर्ण मंगळकी जगह इनका प्रचार होवे तो हानिह और शून्यमकानमें बोलें तो शुभफ़ल हे ॥ ९ ॥ प्राकारेषु पुरद्वारे प्रासादाधेषु वीथिषु ॥ तत्फलं ग्रामपस्यैव सीमा सीमाधिपस्य च ।। १० ॥ किला, कोटपुरका दरवाजा, मंदिर, राजभवन, गली इन्होंपर बोले तो वह फळ ग्रामके अधिपतिको ही होता है सीमापर बोले तो सीमाके मालिकको फल होता है ।। १० ।। शांतिकर्माखिलं कार्यं पूर्वोक्तेन क्रमेण तु ॥ ११ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां कपोतपंगलादिश तिरध्यायश्चत्वारिंशत्तमः ॥ ४० ॥ इन कोतरी आदिकोंके बोलनेमें पृचोंत क्रमकरके संपूर्ण शांति । कर्म कराना चहिये ।। ११ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषांटीकायां कपोतापिंगळादि शांतिरध्यायश्चत्वारिंशत्तमः ।। ४० ।।

उत्पाता ह्यखिलानृणामगम्याः शुभसूचकाः ॥ तथापि सद्यः फलदं शिथिलीजननं महत् ॥ १ ॥ भाषाटीकास ०-अ० ४ १. ( २५१ ) शुभसूचक संपूर्ण उत्पात, मनुष्योंको प्राप्त होने दुर्लभ हैं। परंतु शिथिलीजनन अर्थात् अचानकसे शिथिल होकर किसी वस्तुका गिरना उछडना आदि उत्पात तत्काल महान फल करते हैं ॥१॥ शिथिलीज़ननं ग्रामे सेतौ वा देवतालये । तत्फलं ग्रामपस्यैव सीम्नि सीमाधिपस्य च ॥ २॥ श्रममें अथवा पुलपर वा देवताके मंदिरमें जो यह पूर्वोक्त उत्पात होय तो ग्रामके स्वामीको अशुभ फल होता हैसीमापर हो तो सीमाके" माळिकको अशुभ फल होता है ॥ २ ॥ शिथिलीजनने हानिः सर्वस्थानेषु दिक्षु च ॥ तदोषशमनायैव शांतिकर्म समाचरेत् ॥ ३ ॥ सबस्थानोंमें सव दिशाओंमें जहां शिथिलजनन उत्पात (किसी-- स्तुका रूपबिगडना अचानकसे ढीलाहोना) होता है वहां हानि ती है तिस दोषको शमन करनेके वास्ते शांति करनी चाहिये।।३॥ स्वर्णान् मृत्युप्रतिमां कृत्वा वित्तानुसारतः ॥ रक्तवर्णं चर्मदंडधरं महिषवाहनम् ॥ ४ ॥ सुवर्णकरके वित्तके अनुसार मृत्युकी मूर्ति बनवावे लालवर्ण, अळ तथा दंडको धारण किये, गैस की सवारी ऐसी मूर्ति बनवानी वाहिये ।। ४ ।। नववस्त्रं च संवेष्टय तंदुलोपरि पूजयेत् ॥ तलिंगेन च मंत्रेण नैवेद्य तु यथाविधि॥ ९ ( २५२) नारदसंहिता । तिस मूर्तिको नवीन वस्रसे लपेटकर चावालघर स्थापितकर तिसका पूजनकरै तिस धर्मराजके मंत्रका उच्चारणकर यथार्थविधिसे नैवेद्य चढावे ॥ । ५ ।। पूर्णकुंभं तदीशान्यां रक्तवस्त्रेण वेष्टितम् । पंचत्वक्पटवैर्युक्तं जलं मंत्रैः समर्पयेत् ॥ ६ ॥ जळका पूर्णकलश ईशानकोणमें स्थापितकर तिसपर छालवत्र उढावे पंचपटव, पंचवल्कल, आम्रआदिकोंसे युक्लकर मंत्रों करके तिस कलशमें जल घालै ।। ६ ।। । अग्निसंस्थापनं प्राच्यां स्वझोक्तविधानतः । प्रत्येकमष्टोत्तरशतमघोरेणैव होमयेत्।। ७ ॥ अपने कुलकी संप्रदायके अनुसार पूर्वदिशामें अनि स्थापनहरे अघोरमंत्र अष्टोत्तरशत १०८ होम करौ ।। ७ ।। मंत्रेण समिदाज्यानैः शेषं पूर्ववदाचरेत् ।। द्विजाय प्रतिमां दद्यात्सर्वदोषापनुत्तये ॥ ८॥ समिध, घृत, तिळदिक अन्न इन्होंस होम करना अन्य सवविधि पहिलेकी तरह करना और संपूर्ण दोष मूर होनेके वास्ते उस सुवर्णकी मूर्तिको ब्राह्मणके अर्थ देवे ।। ८ ॥ जलमंत्रेण संप्रोक्ष्य तत्स्थानं तीर्थवारिभिः ॥ एवं यः कुरुते सम्यक्स तु दोषात्प्रमुच्यते ॥ ९ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां शिथिलीजननशांति रध्याय एकचत्वारिंशत्तमः ॥ ४१ ॥ अषाढीकाप्त०--अ० ४२. ( २५३ } वरुण मंत्र उच्चारणकर तिसउरपातवाले स्थानको गंगा आदि तीर्थके जउसे छिडकदेवे इस प्रकार जो पुरुष करता है वह उत्पादि दोषसे छूट जाताहे । । ९ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितामाषाटीकायां शिथिलीजननशांति रक्ष्याय एकचत्वारिंशत्तमः ॥ ४१ ॥ श्रीराग्निर्बधुनाशश्च वित्तहानिर्महद्यशः। बंधुलाभः पुत्रहानिः स्त्रीचिंता महतो गदः ॥ १ ॥ पूर्वादीनि फलान्येषामिंद्रलुप्तं च मस्तके । पंचवक्पछवैश्चैव पंचामृतफलोदकैः ॥ २॥ अभ्यंगमंत्रितैर्मत्रैः स्रानदोषं विमुंचति ॥ एवमेवाग्निदाहेपि मस्तके मध्यदूषिते ॥ ३ ॥ दंतच्छेदे काकहते सरष्टापत्तनेपि च ॥ आशिषो वाचनं कृत्वा ब्राह्मणान्भोजयेच्छुचिः ॥ ४ ॥ किसीके शिरपर इंद्रलुप्त होजाय अर्थात् शिरपरसे किसी जग हके बाल उडजावें तो मस्तकमें पूर्वआदि दिशा कल्पित करके लक्ष्मीप्राप्ति १, अनिभय २, बंधनाश ३, द्रव्यकी हानि ४, महान यश ५, बंधुलाख ६, पुत्रहानि७, डॅचिंता८,महान रोग९ यह फल पूर्वआदिदिशाओंका जानना और नवमां फल मस्तकमें मध्यभागका जानना।तहां इसकी शांतिके वास्ते पंचवल्कल, पंचपल्लव, पंचामृत, फलोदक इन्होंकरके स्नान करावे और अभिषेकके मंत्रोंका उच्चारण करे तब शुद्धि होती है । इसी प्रकार अग्निदाहादिसे मस्तकमध्यसे मी = (२५४ ) नारदसंहिता । दूषित होजाय तथा दांत आदि कटजाय, काक चोंचमरदेवे तथा क्रिरलकांट चढजय तो उसस्थानका की शुजाऽशुत फल विचारकर स्थास्तिवाचन करखाके ब्राह्मण जिमनैं पवित्र रहे।१ ॥२॥३।४। लाभदः स्त्रीजनानां वशुभदो व्यत्ययो व्ययः ॥ दक्षिणे स्फुरणं लाभं वामे स्फुरणमन्यथा ।। ९ ।। इति श्रीनारदीयसंहितायां निमित्तशांति- रथाय द्विचत्वारिंशत्तमः ।। ४२ ॥ जो शकुन पुरुषको लाभदायक हैं बह नियोंको अशुल विपरीत तथा हानिदायक जानना । पुरुषका दहिना अंग स्फुरणा शुभ है चय अंग स्फुरणा अशुभ हें ॥ ५ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितामाषाढीच्यां निमित्रशांतिरध्यायो द्विचत्वारिंशत्तमः ॥ ४२ ।। स्वर्गच्युतानां रूपाणी यान्युल्कास्तानि वै भुवि । धिष्ण्योकाविषीदशनिताराः पंचविधः स्मृताः ॥ ३॥ स्वर्गसे पतितहुई उल्काओंके जो रूप पृथ्वी पर होते हैं तिनको कहते हैं । धिष्ण्या, उल्का, विद्युत, अशनि, तारा ऐसे पांच श्रकारका उल्कापात जानना ।। १ ।। सम्यक्पञ्चविधानं च वक्ष्यते लक्षणं फलम् ॥ पाचयंति त्रिभिः पझेर्धिष्ण्योल्काशनिसंज्ञिताः ॥ २ ॥ छे प्रकारसे इनपांचोंका विधान लक्षण फल कहते हैं। ज, उल्का, अशनि इन संज्ञाओंवाली उल्का ४५ दिनमें करती हैं । । २ ॥ । भाषाटीक स०-अ० ४३. ( २५५ ) विद्युषद्भिरहभिश्च तारस्तद्वत्फलप्रदः । फलपाककरी तारा धिष्ण्याख्याद् फलप्रदा ॥ ३ ॥ विद्युत् छः दिनत्रे फलकरे, तारापात भी ६ दिनमें फळकरे तारापात पूराफळ करता है । धिष्ण्य आधाफल करती है।। ३ ॥ उल्का विद्युदशन्याख्याः संपूर्णफलदा नृणाम् ॥ अभोष्ट्रपशुनूषु वृक्षक्षोणीषु च क्रमात् ॥ ४ ॥ विदारयंति पतितं स्वनेन महता ऽनिः ॥ जनयित्री च संत्रासं विद्युयोनिं विव स्फुटम् ॥५॥ उल्का, अशनि, वियत् ये मनुष्योंको पूराफळ देती हैं । अझ, हाथी, ऊं, पशु, मनुष्य, वृक्षोंकी पंक्ति इन सबोंपर यथाक्रम पडती हैं और तोड फोड डालती हैं वडाभरी कडकना शब्द करती हैं यह अशनिका लक्षण है । और बिजली आकाशमें बहुत चिमकती है बडा भय दिखाती है यह विध्रुवका ळक्षण है॥४॥५॥ चक्रा विशालज्वलिता पतती वनराजषु ॥ धिष्ण्यान्यपुच्छा पतति ज्वलितांगारसन्निभा ॥ ६॥ चक्राकार विशाल ज्वलिता, वनमें बहुतदूरतक पडतीहुई जले हुए अगारसदृश, अंतमें पूंछसे आकारवाली ऐसी धिष्ण्या जाननी।।६।। हस्तद्वयप्रमाणा सा दृश्यते च समीपतः ॥ ताराब्जतनुवच्छुक्का हस्तदीर्घबुजारुणा ॥ ७ ॥ वह दो हाथप्रमाणी समीपमें ही दीखती है चंद्रमासरीखी सफेद दीखतीहै ऐसी तारा जाननी और एक हाथ लंबी लालकमल सरीखी लाल ।। ७ ॥ । K ( २५६ ) नारदसांहिता ! ऊर्धे वाप्यथवा तिर्यगधो वा गगनांतरे ॥ उल्काशिरो विशाला तु पतंती वर्द्धते तनुम् ॥ ८ ॥ आकाशमें ऊषरको अथवा नीचेको तिरछी होती है पडती हुईका विस्तार होता है जिसका मस्तक चौडा होता है ऐसी उल्का जाननी चाहिये ।। ८ ।। दीर्घपुच्छ| भवेत्तस्या भेदाः स्युर्बहवस्तथा ॥ पीडाश्चोष्ट्राहिगोमायुखरोगजदंष्ट्रिकाः ॥ ९॥ वह उल्का लंबी पूंछवाली होती है तिसके बहुतसे लक्षण हैं। वह ऊँट, सर्प, गीदड़, गधा, गौ, हाथी, कीजिड इन्होंके समान आकारखाली उनका इन सबोंको पीडा करती है ॥ ९ ॥ | कपिगोधाधूमनिभा विविधा पापदा नृणाम् ॥ अथेभचंद्ररजतवृषहंसध्वजोपमाः ॥ १० ॥ बंदर, गोह, धूमा इन्होंके समान अनेक आकाखाली होय तो मनुष्योंको पाप (अशु ) फळ करती है और, घोडा, हाथी चंद्रमा, चांदी, चैल, हंस, ध्वजा इन्होंके समान ।। १० ।। वङ्गशंखशुक्तिकाब्जरूपाः शिवमुखप्रदाः॥ पतंतीह स्वरा वह्नौ राजराष्ट्रक्षयाय च ॥ ११॥ अथवा हीरा, शंख, सीपी, कमल इन्होंके सदृश उल्का पडे त मंगल मुख दायक जननी । अभिमें उल्कापात होजाय तो राजाक ओर देशका नाश हो ।। ११ ॥ यद्यबरे निपतति लोकस्याप्यतिविभ्रमः । यद्यछंदू संस्पृशति तत्र भूपप्रकंपनम् ॥ १२ ॥ A = A भाषाटीकास०-अ० ४३. ( २५७ ।। । और जो आक्रशमें ही रहे तो लोगोंको अत्यंत अमकरे जो सूर्य चंद्रमाको स्पर्श करे तो राजाओंको कंपना हो ॥ १२ ॥ a परचक्रागमभयं जनानां भृज्जलाद्भयम् ॥ अर्केन्द्वोरपसव्योल्का पौरेतरविनाशदा ॥ १३ ॥ दूसरे राजाके आनेका भयह मनुष्यको दुर्भिक्षका तथा जठक. यहो, सूर्यचंद्रमाके दहिनीतर्फ होकर पडे तो शहरसे अलग तुच्छं बाहरगात्रोंमें रहनेवाले जनों को पीडा करतीं है ॥ १३ ॥ उदयास्तमयेकेंद्धोः परतोल्का शुभप्रदा ॥ सितरक्ता पीतसिता सोल्का नेष्ट द्विजातिभिः॥१४ ॥ सितोदितोभये पावें पुच्छे दिक्षु विदिक्षु च ॥ विप्रादीनामनिष्टानि पतितोल्कादिभान्यपि ॥ १९॥ सूर्यचंद्रमा के उदय अस्त होनेके बाद संधिमें पड़े तो शुभदायकं जानना और सफेदलाळ, तथा पीलीसफेद उल्का पडे तो द्विजातियों को अच्छी नहीं है दोनों बराबरोंमें सफेद वर्णहों उल्काका पुच्छ भाग दिशाओंमें रहे अथवा अग्निकोणआदि विदिशाओंमें रहे तब पृथ्वीपर पड़े तो ऐसे टूटे हुए तारे ब्राह्मण आदि वर्णको अशुभ हैं तिनको कहते हैं ॥ १४ ॥ १५ ।। तारा छेदनिभा निग्धा भूभुजां तु शुभप्रदा । नलाि श्यामारुणा चाग्निवर्णाक्ता साशुभप्रदा ॥ १६ ॥ • १७ (२५८.) नारदसंहृिता । कुंदपुष्प समान सफेद चिकना तारा टूटे त राजाओंको शुभदायक है, नील, श्याम, लाळ, अभिसमान वर्णवाला तारा टूटे त अशुभदायक जानना ॥ १६ ॥ संध्यायां वह्निपीडा च दलिता राजनाशिनी ।। नक्षत्रग्रहणे देवस्तद्वर्णानामनिदा ॥ १७ ॥ संध्यासमयमें तारा टूटे तो अगिकी पीडा करे खंडितहुआ तारा दीखे तो राजाको नष्टकरे और जिनके नक्षत्रका देवता गणहो पुरुषोंको अशुफल जानना ।। १७ ।। स्थिरधिष्ण्येषु पतिता नृणां चोक्ता भयप्रदा । क्षिप्रभेषु विशां पीडा भूपतीनां चरेषु च ॥ १८ ॥ स्थिरसंज्ञक नक्षत्रोंमें पड़े तो त्रियोंको अशुभ जनना, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रोंमें पडी ई तारा वैश्योंको पीडाकरे चरसंज्ञक नक्षत्रोंमें पड़े तो राजाओंको पीडाकरे ॥ १८॥ मृदुभेषु द्विजातीनां दारुणं दारुणेषु च ॥ उग्रभेषु च शूद्राणां परेषां मिश्रभेषु च ॥ १९ ॥ मृदुसंज्ञक नक्षत्रोंमें पड़े तो ब्राह्मणोंको पीडा करे, दारुण तीक्ष्ण नक्षत्रोंमें पड़े तो दारुण दुष्टपुरुषोंको पीड़ा करें, उपॅसेंज्ञक नक्षत्रोंमें पडे तो खूबँको पीडा करें, मिथुन नक्षत्रोंमें नीचजानियों को पीडा करें ॥ १९ ॥ राजराष्ट्रस्वनाशाय प्रासादप्रतिमासु च । गृहेषु स्वामिनां पीडा नृपाणां पर्वतेषु च ॥ २० ॥ । भाषाटीकास०-अ० ४३ (२५९) राजाके भवनमें अथवा देवताओंकी मूर्त्तियोंपर बिजली पडे लो राज्यको नष्ट करे, घरमें पड़े तो घरके मालिकको पीड़ा करें पर्वतोंपर पडेतो राजाओंको पीडाकरे ॥ २० ॥ दीक्षितानां दिगीशानां कर्षकाणां स्थलेषु च ॥ प्राकारे परिखयां वा द्वारि तत्परमध्यमे ॥ २१ ॥ स्थलमें पड़े तो दीक्षित ( ब्रह्मचारी आदि ) दिशाओंके स्वामी किसानलोग इन्होंको पीडाकरे और किला, कोट, खाही, शहरका दरवाजा, शहरक मध्यभाग ।। २१ ॥ परचक्रागमभयं राज्यं पौरजनक्षयः ॥ गोष्ठे गोस्वामिनां पीडा शिल्पकानां जलेषु च ॥२२॥ इन्होंमें पड़े तो दूसरा राज्य आनेका भय हो और शहरके लोगों का नाशहे, गोशालामें पड़े तो गौओंके स्वामियोंको पीडा हो, जलमें पडे तो ( शिल्पी ) कारीगरोंको पीडा हो । २२ ॥ राजहंत्री तंतुनिभा चंद्रध्वजसमाथ वा ॥ प्रतीपगा राजपत्नीं तिर्यगा च चमूपतिम् ॥ २३ ॥ तंतुसमान आकारखाली पड़े तो राजाको नष्ट करे, इंद्रधनुष समान पडे तो भी राजको नष्ट करे और उलटी होकर पडे तो राजाकी रानीको नष्ट करै, तिरछी पडे तो सेनापतिको नष्टकरं ।। २३ ।। अधोमुखी नृपं इति ब्राह्मणानूगा तथा ॥ वृक्षप्मा पुच्छेनिभा जनसंक्षोभकारिणी ॥ २९ ॥ नचेको मुखवाली उल्का राजाको नष्टकरें, ऊपरको मुखवाली बाह्मणोंको नष्टकरे, वृक्षसमान तथा पूंछसमान आकारखाली उल्क मनुष्योंको त्रास देती है ॥ २४ ॥ 4A ( २६० ) नारदसंहिता। प्रसर्पिणी या सप्र्पवत्सा गणानामनिष्टदा ।। वर्तुलोल्का सर्पकी तरफ पुरं फैरती हंति हुई च्छत्राकारा उल्का ( बिजली पुरोहितम् ) पडे ॥ तो २९ किसी " भी चाकर लोगोंको अशुभ है। गोल उल्का पड़े तो पुरको नष्ट करे छत्राकार पड़े तो सजाके पुरोहितको नष्ट करौ ।। २५ ।। वंशगुल्मलताकारा राष्ट्रविद्राविणी तथा ॥ सकरव्यालसदृशा खंडाकारा च पापदा ॥ २६ ॥ बांस, गुल्म, लता इनके समान आकाखाली पड़े तो राज्यको नष्ट करें और सूकर सर्प तथा खंडित आकारखाली उल्का पडे तो पापदायक (अशुभदायक ) है ।। २६ ॥ इंद्रचापनिभा राज्यं मूर्धिता इति तोयदम् ॥ २७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायामुल्कालक्षणा ध्यायत्रिचत्वारिंशत्तमः ॥ ४३ ॥ इंद्रधनुष समान आकारखाली पड़े तो राज्यको नष्ट करें और मूर्थिछता अर्थात कांतिहीन उल्का ( बिजली ) पडे तो जलका कामकरनेवाले जनोंको पीडा करें ॥ २७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटी० उल्काळक्षणाध्याय त्रिचत्वारिंशत्तमः ।। ४३ ।। किरणा वायुनिकता उच्छूिता मंडलीकृताः ॥ नानावर्णाकृतयस्ते परिखषः शशीनयोः ॥ १ ॥ भापाटीकास०-अ० ४४. ( २६१ ) चायुसे निहतहुई सूर्य व चंद्रमाकी किरण ऊपरको होके मंडलाकार होती हैं उनके अनेक वर्ण और अनेक आकार होते हैं तिनको सूर्यचंद्रमाके परिखेष ( मंडल ) कहते हैं ॥ १ ॥ ते रक्तनीलपांडूरकपोताभाश्च कापिलाः ॥ सपीतशुकवृणध प्रागादूिविक्षु वृष्टिः ॥ २ ॥ मुहुर्मुहुः प्रलीयंते न संपूर्णफलप्रदाः ॥ । शुभास्तु कपिलाः स्रिग्धाः क्षीरतैलांबुसन्निभाः॥ ३॥ वे मंडल लालनीलपांडुरवर्ण (गुलाबी) कपोतसरीखे तथा बदल सरीखे वर्णघटे तथा कपिल वर्णवाले पीछे तथा हेरे इनदोंके होते हैं ।ये वर्ण यथा क्रमसे पूर्वादि दिशाओंमें होर्वे ते वृषंहोवे और जो मंडलके वर्ण बारंबार हो होकर नष्ट होजावें तो पूरा फल नहीं करतेहैं कपिलवर्ण, चिकने दूध तथा तेल व जलसरीखी कांतिवाले। २॥३॥ चापधृगाटकरथ्क्षतजाभारुणः शुभाः । अनेकवृक्षवर्णाश्च परिवेषा नृपांतकृत् ॥ ४ ॥ धनुष, चौपट, रथ इनके आकार तथा रक्तसमान लाल ऐसे कुंडल शुद्भदायक कहे हैं अनेक दरख़तोंके समान आकार हरेकुंडळ राजाओंको नष्ट करतेहैं ॥ ४ ॥ अहर्निशं प्रतिदिनं चंद्रार्कवरुणो यदा । परिविष्टो नृपवधं कुरुतो लोहितो यदा ॥ ४॥ जो दिनरात नियम करके अर्थात् दिनमें सूर्यके और रात्रिमें चंद्रमाके इस प्रकार सूर्यचंद्रमाके लाळवर्ण मैडल बना रहे तो राजाकी मृत्यु हो ॥ ५ ॥ ( २६२ ) नारदसंहिता । द्विमंडलञ्चमूनाथं नृपनोऽथ त्रिमंडलम् । परिवेषगतः सौरिः शुद्धान्यविनाशकृत् ॥ ६ ॥ दो मंडळ होवें तो सेनापतिको नष्टकरें, तीममंडळ होवें तो राजाको नष्टकरै, मंडलके मध्यमें शनि प्राप्त हो तो तुच्छधान्यों क नाशहो ॥ ६ ॥ रणकृङ्गमिजो जीवः सर्वेषामभयप्रदः । ज्ञः सस्यहानिदः शुक्रो दुर्भिक्षकलहप्रदः ॥ ७॥ मंगल पैडलमें आजाय तो युद्ध करावे बृहस्पति हो तो सबको अभय करै, बुध हो तो खेतीका नाशकर, शुक मंडळमें प्राप्तहे तो दुर्भिक्ष तथा कळह करे ॥ ७ ॥ परिवेषगतः केतुचूंभिक्षकलहप्रदः ॥ पीडां नृपवधं राहुर्गर्भच्छेदं करोति च ॥ ८॥ केतु सूर्यमंडलमें आजाय तो दुर्भिक्ष, तथा कलह करे, राहु मंडळमें आजाय तो पीड़ा, राजाकी मृत्यु, गर्भच्छेद यह फ़ल करता है । ८ ।। द्वौ अहै परिवेषस्थौ क्षितीशकलहप्रदं । कुर्वंति कलहानवं परिवेषगतास्त्रयः ॥ ९ ॥ दो ग्रह मंलडमें प्राप्तहोमैं तां राजाओंका युद्धहो, तीन ग्रह होवें तो कलह तथा अनक भाव महँगा करे ॥ ९ ॥ चत्वारः परिवेषस्था नृपस्य मरणप्रदः ॥ परिवेषगताः पंच बलप्रबलदा ग्रहाः ॥ १० ॥ १७ ० १ भाषाटीकास०-अ० ४४ . ( २६३) चारग्रह होवें तो राजाकी मृत्यु करें और मंडळमें पांचग्रह होवें तो बलदायक (शुभफळदायक ) जानने ॥ १० ॥ एवं वग्रहास्तेषामेवं फलनिरूपणम्॥ नृपहानिः कुजादीनां परिवेषे पृथकू पृथक् ॥ ११॥ इसी प्रकार दो चार वक्रीग्रह हों उनका भी फल जानन मंगल आदि पृथक् २ ग्रह चंद्रमंडळमें होवें तो राजाकी । हानि हो । १३ ॥ परिवेषोपि धिष्ण्यानां फलमेवं द्वयोस्त्रिषु ॥ पारिवेषो द्विजातीनां नेष्टः प्रतिपदादिषु ॥ १२ ॥ इसीतरह अन्य भी दो वा तीन तारे चंद्रगडलमें होतें तो उनका फ़छ जानना और प्रतिपदा आदि चारतिथियोंमें सूर्यके वा चंद्रमाके मंडळमें होय तो बाह्मणको अशुभ फल जानना ॥१२॥ पंचम्यादिषु तिसृषु ह्यशुभो नृपतेस्तथा ॥ अष्टम्यां युवराजस्य परिवेषोष्यभीष्टदः ॥ १३ ॥ पंचमी आदि तीनतिथियोंमें मंडल होय तो राजाको अशुभ जानना अष्टमीके दिन मंडल हो तो युवराजक शुदायक जानन ॥ १३ ॥ ततस्तिसृषु तिथिषु नृपाणामशुभप्रदः ॥ पुरोहितस्य द्वादश्यां विनाशाय भवेदसौ ॥ १४ ॥ सैन्यक्षोभस्त्रयोदश्यां नृपरोधमथापि वा । राजपत्न्यश्चतुर्दश्यां परिवेषो गदप्रदः ॥ १९ ॥ ( २६४ ) नारदसंहिता । नम्रमीआदि तीनतिथियोंमें राजाओंको अशु जानना । द्वादशीको मंडळ होय तो राजा पुरोहितका नाश हो, त्रयोदशीके दिन हो तो सेनाका कोप हो अथवा राजाका अवरोध हो चतुर्दशीके दिन हो तो रानीके रोग होवे ॥ १४ ॥ १५ ॥ परिखेषः पंचदश्यां क्षितीशानामनिष्टदः ॥ थरिवेषस्य मध्ये वा बड़ी रेखा भवेद्यदि ।। १६ ।। स्थायिनां मध्यमा नेष्टा यायिनां पार्श्वसंस्थिता । प्रावृट्टतौ च शरदि परिपोजलप्रदः ॥ १७ ॥ पूर्णिमाको मंडल होय तो राजाओंको अशुभ है मंडलके मध्यमें अथवा बाहिरी तर्फ रेखा होय तो स्थायी ( अपने किलामें स्थितरनेवाले ) राजाओंको मध्यम जानना और बराबरोंमें रेखा होय तो गमन करनेवाले राजाओंको अशुभ जानना, प्रवृद् तुमें तथा शरदऋतुमें मंडळ होय तो वधु करे ॥ १६ ॥ । १७ ।। । प्रायेणान्येषु ऋतुषु तदुक्तफलदायिनः ॥ १८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां परिवेषलक्षणाध्याय- श्चतुश्चत्वारिंशत्तमः॥ ४४ ॥ और विशेषकरके अन्य ऊतुओंमें सूर्य वा चंद्र के मंडल होय तो जैसा पूर्व कहाहै वही फल जानना ॥ ३८ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषादीकायां परिवेषलक्षणाध्याय श्चतुश्चत्वारिंशत्तमः ॥ ४४ ॥ भाषीकस ०-अ० ४७ . (२६५ }

नानावर्णाशवो भानोः साभ्रवायुविघट्टिताः । ययोनि चापसंस्थानमिंद्रचापं प्रदृश्यते ॥ १ ॥ सूर्यकी किरण बादल और बायुके संयोगले अनेक प्रकारले रंगवाली होकर आकाशमें धनुषके आकार होजाती हैं वह इंद्रधनष कहलाता है । १ । अथवा शेषनरेंद्रदीर्घनिश्वससंभवम् । विदिक्षुजं दिक्षुजं च तद्दिङ्नृपविनाशनम् ॥ २ ॥ अथवा सर्पराज शेषनागके उच्च क्षप्त लेनेसे इंद्रधनुष होजाता है वह जिस दिशामें अथवा जिसकोणमें होय तितीदंशके स्वामी राजाको नष्ट करे ॥ २ ॥ पीतपालनीलैश्च वह्निशस्त्रास्त्रभीतिदम् ॥ वृक्षजं व्याधिदं चापं भूमिजं सस्यनाशदम् ॥ ३ ॥ अवृष्टिदं जलोद्धृतं वर्मीके युद्धभीतिदम् ॥ अवृथै वृष्टिदं चैद्यां दिशि वृष्यामवृष्टिदम् ॥ ९ ॥ पीला, पाडळवणे, नीलावर्ण इंद्रधनुष होय तो अग्नि तथा युद्धका भय करे वृक्षके ऊपर किरणोंकी क्रांति पड़के धनुषाकार दीखे ता प्रजामें रोग हो तथा भूमिपर दीखे तो खेतीको नष्टकरे जठमें क्रांति पडके धनुष दीरखे तो वर्षा नहीं हो । बमधेयं मिलमें धनुषी क्रांति पडे तो प्रजामें युद्धका भयहो, पूर्वोदिशामें इंद्रधेनुष होय तो वर्षा नहीं हो तो वर्षा होने लगे और वर्षा होतेहुए पूर्वदिशामें इन्द्रधनुष दीखे तो वहनी बंद होजाय ॥ ३॥४॥ सदैव वृष्टिदं पश्चाद्दिशोरितरयोस्तथा ॥ राज्यामिंद्रधनुः प्राच्यां नृपहानिर्भवेद्यदि ॥ ५॥ के ( २६६ ) नारदसंहिता । पश्चिमदिशामें इंद्रधनुष दीखे तो सदा वर्षी करताहै अन्यदिशा- ऑमें ( उत्तरदक्षिणमें ) हो तो भी वर्षाकरे, रात्रिमें पूर्वदिशामें इंद्रधनुष दीखे तो राजाकी हानि करे ।। ५ ।। याम्यां सेनापतिं इति पश्चिमे नायकोत्तमम् ॥ मंत्रिणं सौम्यदिग्भागे सचिवं कोणसंभवम् ॥६॥ दक्षिणदिशामें दीखे तो सेनापतिको नष्ट करे पश्चिममें हो तो बडे हाकिम सरदारको नष्ट करे, उत्तर तथा ईशान आदि कोणोंमें दीखे तो राजाके मंत्रीको नष्ट करे ।। ६ ।। राज्यामिंद्रधनुः शुऋवर्णब्यं विप्रपूर्वकम् ॥ होति यद्दिग्भवं स्पष्टं तद्दिगीशिनृपोत्तमम् ॥ ७ ॥ रात्रिमें पूर्वदिशामें सफेदवणे इंद्रधनुष दीखे तो बालणोंको नष्ट कर और जिस दिशामें सष्ट इंद्रधनुष दीखे उसी दिशाकां राजा नष्ट होताहै ॥ ७ ॥ अवनीगाढमाच्छिन्नं प्रतिकूलं धनुर्जेयम् ॥ नृपांतकृद्यदि भवेदानुकूल्यं न तच्छुभम् ॥ ८॥ इति श्रीनारदीयसंहितायामिंद्रचापलक्षणाध्यायः पंचचत्वारिंशत्तमः ॥ ४४ ॥ विना कटाहुआ धनुष पृथ्वीपरशुभफल करताहै दो धनुष अशुभफल करतेहैं, राजाको नष्ट करतेहैं अनुकूल शुभफल नहीं करते ॥८॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायामिंद्रचापलक्षणाध्यायः पंचचत्वार्रिशत्रुमः ॥ ४५ ॥ भाषांटीकास ०-अ० ४६. ( २६७) गंधर्वनगरं दिक्षु दृश्यतेऽनिष्टदं क्रमात् ॥ भूभुजां वा चमूनाथसेनापतिपुरोधसाम् ॥ १ ॥ दिशाओंमें गंधर्वनगर दीखना यथाक्रमसे राज, सेनापति,मंत्री पुरोहित इन्होंको अशुभफल करताहै ।। १ ॥ सितरक्तपीतकृष्णं विप्रादीनामनिष्टदम् ॥ रात्रौ गंधर्वनगरं धराधीशविनाशनम् ॥ २॥ और सफेद, लाल, पीला, काला, ये वर्ण दीखने यथाक्रमसे बालणआदिकोंको अशुभ है रात्रिमें गंधर्वनगर दीखे तो राजाको नष्ट कुरे ॥ ३२ ।। इंद्रचापान्निधूमाभं सर्वेषामशुभप्रदम् ॥ चित्रवर्णं चित्ररूपं प्राकारध्वजतोरणम् ॥ ३ ॥ इंद्रधनुष, अगि,धूमा इन्होंके सदृश गंधर्वनगर दीखे तो सभी को अशुभफलदायकहै विचित्रवर्ण, विचित्ररूप, कोटका आकार,

  • र्जा, तोरण ॥ ३ ॥

दृश्यते चेन्महायुद्धमन्योन्यं धरणीभुजाम् ॥ ४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां गंधर्वनगरदर्शनाध्यायः षट्चत्वारिंशत्तमः ॥ ४६ ॥ इन्हके आकार दीखें तो राजाओंका "आपसमें महान युद्ध हो ॥ ४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां गंधर्वनगरदर्शनाध्यायः षट्चत्वारिंशत्तमः ।। ४६ ।। (२६८ ) नारदसंहिता । प्रतिसूर्यनिभः स्निग्धः सूर्यः पात्रं शुभप्रदः ॥ वैडूर्यसदृशस्वच्छः शुक्लो वापि सुभिक्षकृत् ॥ ३ ॥ सूर्यके तेजसे बादलमें दूसरा सूर्य दीखजाताहै वह स्निग्धवर्ण तथा बराबरमें दखेि तो शुभहै वैडूर्यं मणिके समान स्वच्छ सफेद दीखेतो सुजिक्ष करता है ।। १ ।। पीताभो व्याधिदः कृष्णो मृत्यु युद्धदारुणः । माला चेत्प्रतिसूर्याणां शश्वच्चौरभयप्रदा ॥ २ ॥ पीळावर्ण प्रतिसूर्य दीखे तो प्रजामें बीमारी हो, कोलावणे होय तो मृत्युदायक तथा दारुण युद्ध होता है, बादलमें प्रतिसूर्यादी माळा दीखे तो निरंतर चोरोंका भयकं ।। २ ।। जलदोदञ्प्रतयों भानोर्याम्येनिलप्रदः । उभयस्थोंबुभयदो नृपदोपर्यधो नृढ़ ॥ ३ ॥ उत्तरदिशा में प्रतिसूर्यं दीखे तो वर्षा होवे, दक्षिणदिशामें दीखे तो वायु चले, दोनोंतर्फ बराबरौमें प्रतिसूर्य दीखे तो वर्षाको बंद करे, सूर्यके ऊपर प्रतिसूर्य दीखे तो राजाको नष्ट करे, सूर्यके नीचे अतिसूर्य दीखे तो प्रजाको नष्ट करे ।। ३ ॥ पराभवंति तीक्ष्णांशोः प्रसूिर्याः समंततः ॥ जगद्विनाशमाप्नोति तथा शीतद्युतेरपि ॥ ४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां प्रतिसूर्यलक्षणाध्यायः सप्तचत्वारिंशत्तमः ॥ ४७ ॥ भघाटीकास०-अ० ४८. (.२६९ ) सूर्यके चारों तर्फ प्रतिसूर्य होकर साक्षात् सूर्यकी क्रांतिको ही, नकर दे तो जगत्का नाशहो इसी प्रकार चंद्रमाका भी फळ नना ॥ ४ ॥ इति श्रीनारदीयसंहि० आषाढी० प्रतिसूर्यलक्षणा । ध्यायः सप्तचत्वारिंशत्तमः ॥ ४७ ॥ s अथ निघीतलक्षणम् । वायुनाभिहितो वायुगेगनात्पतति क्षिते ॥ यदा दीप्तिः खगुरुतः स निर्घातोतिदोषकृत् ॥ १ ॥ वायुसे प्रतिहत हुआ वायु आकाशते पृथ्वीपर पडता है । और अपने भारापनसे प्रदीप्त होता है वह निर्धात अत्यंत दोषदायकहै । यह विजी पडनेका लक्षण जानना ।। १ ॥ निर्घातोऽकदये नेष्टः क्षितीशानां विनाशदः ॥ आयामात्प्राक्पौरजनशूद्राणां चैव हानिदः ॥ २ ॥ सूर्य उदयसमय निर्धात होय तो राजाओंको अशुभ है नष्टकरने वाला है, पहरदिन चढे पाहिले हो तो शहरमें रहनेवाले द्रोंको हानिदायक है ।। २ ।। आमध्याहे तु विप्राणां नेष्टो राजोपजीविनाम् ॥ तृतीययामे वैश्यानां जलजानामनिष्टदः ॥ ३ ॥ चतुर्थे चार्थनाशाय संध्यायां इति संकरान् ॥ आचे यामे सस्यहानिर्दीितीये तु पिशाचकान् ॥ ४ ॥ (२७० ) नारदसंहिता । मयाझतक निघंत होय तो बालणको तथा राजद्वारमें नौकर रहनेवाले जनोंको अशुभ है, तीसरे प्रहरमें होयतो वैश्योंको तथा जलचरजीवोंको अशुभ है दिनके चैौथे प्रहरमें धनका नाश करे सायंकाळमें नीचजातियोंको अशुभ है रात्रिके प्रथम प्रहरमें खेतीकी हानि हो दूसरे प्रहरमें पिशाचोंको नष्ट करें ॥ ३ ॥ ४ ॥ हंस्यर्द्धरात्रे तुरगांस्तृतीये शिल्पिलेखकान् ॥ चतुर्थयामे निर्वीतः पतन् हंति तदा जनान् ॥५॥ आधीरात समय घोडोंको नष्ट करै, रात्रिके तीसरे प्रहरमें शिल्पी तथा लेखक जनको नष्ट करै, रात्रिके चौथे अहमें पडाहुआ निषत ( बिजली ) सब जनोंको नष्ट करता है । ५॥ भीषज़र्जरशब्दः स तत्रतत्र दिगीश्वरम् ॥ ६ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां निघतलक्षणाध्या योऽष्टचत्वारिंशत्तमः ॥ ४८ ॥ वह निर्धात अर्थव चिजीका पड़ना जो भयंकर जर्जरशब्द करे तो जिस दिशामें पडे उसीदिशाके राजाको नष्ट करे ।। ६ ।। इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां निर्घातलक्षणा ध्यायोऽष्टचत्वारिंशचमः।। ४८ ।। दिग्दाहः पीतवर्णश्चेक्षितीशानां भयप्रदः ॥ देशनाशायाग्निवर्णाऽरुणवर्णाऽनिलप्रदः ॥ १ ॥ पीतवर्णा दिग्दाह होवे तो राजाओंको भय करे, अग्निसमान वर्ण हो तो देशका नाश करे, ळालवर्ण हो तो वायु चलावे ऐसे यह दि आषाढीस०-अ० ४९. (२७१ ) दाह अर्थात् सूर्यके उदय. वा अस्त होनेके समय दिशाओंपर यज्ञ आदि रंग दीखजाते हैं ॥ १ ॥ धूमः सस्यविनाशाय कृष्णः शस्त्रभयप्रदः ॥ प्राग्दाहः क्षत्रियाणां च नरेशानामनिष्टदः ॥ २ ॥ धूमवर्ण हो तो खेतीको नष्ट करे, काला वर्ण हो तो शस्रका य हो, पूर्वदिशमें दिग्दाह दीखे तो क्षत्रियोंको और राजाओंको अशुभ फळ करे ।। २ ।। आग्नेय्यां युवराजस्य शिल्पिनामशुभप्रदः॥ पीडां व्रजंति याम्यायां सूकवैश्यनराधमाः ॥ ३ ॥ अभिकोणमें हो तो युवराज तथा शिल्पीजनोंको अशुभ फल करे, दक्षिणदिशामें हो तो मढजन, वैश्य अधमजन इन्होंने पीडा हो ।। ३ ।। नैनीत्यां दिशि चैौराश्च पुनर्द्धप्रमदा नृणाम् ॥ प्रतीच्यां कृषिक्तरो वायव्यां पशुजातयः ॥ ४ ॥ नैतकोणमें हो तो चोर, दूसरे विवाह करानेवाले जन, स्त्री इन्होंके पडा हो, पश्चिमदिशमें हो तो किसन लोग और वायुकोणमें हो तो पशुजाति नष्ट होवें ॥ ४ ॥ सैौम्ये विप्रादि चैशान्यां वैश्यानां खंडिनोखिलः ॥ दिग्दाहः स्वर्णवर्णाभो लोकानां मंगलप्रदः ।। इति श्रीनारदीयसंहितायां दिग्दाहलक्षणाध्याय एकोनपंचाशत्तमः।। ४९ ॥ (२७२) नारदसंहिता । उत्तरमें हो तो ब्राह्मण आदि और ईशानकोणमें हो तो वैश्योंको तथा संपूर्ण लोगोंको पीडा हो और सुवर्णसमान प्रदीप्त कांतिवाला दिग्दाह हो तो संपूर्ण लोगोंको शुभदायक है ॥ ५॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां दिग्दाहलक्षणाध्याय एकोनपंचाशत्तमः ।। ४९ ।। • अथ रजोलक्षणाध्यायः। सितेन रजसा छिन्नदिग्ग्रामवनपर्वताः । यथा तथा भवंत्यंते निधनं यांति भूमिपाः॥ १३ ।। दिशा, ग्राम, वन, पर्वत ये सफेदवायुसे आच्छादित होजायें अर्थात् अंधी चलकर आकाशमें सफेद गरम चढजाय तो राजा लोग मृत्युको प्राप्त होवें ॥ १ ॥ रजःसमुद्भवो यस्यां दिशि तस्यां विनाशनम् । तत्रतत्रापि जंतूनां हानिदः शस्त्रकोपतः ।। २ ॥ और जिस दिशामें रज ( अंधी ) उड़कर चलके आवे उसी दिशाके प्राणियोंके शस्त्रकोपसे हानि करे ।। २ ।। मंत्रीजनपदानां च व्याधिदं चासितं रजः । अर्कोदये विचुंभंति गगनं स्थगयंति च ॥ ३ ॥ दिनद्वयं च त्रिदिनमत्युग्रभयदं रजः॥ रजो भवेदेकरात्रं नृपं हंति निरंतम् ॥ ४॥ कालवर्णकी रज ( अंधी ) राजमंत्रीको व देशंको हानि करे सूयर्देयके समय अंधीचलकर आकाशको आच्छादित करदे दोदिन भाषाटीकास ०-अ० ५०. ( २७३ )

तथा तीनदिन तक अत्यंत उग्रवायु चले और एकरात्रितेक निरंतर धूलची रहे तो राजको नष्ट करे ।। ३ ॥ ४ ॥ परचक्रागमं न स्याद्विरात्रं सततं यदि । क्षमडामरमातंकत्रिरात्रं सततं यदि ॥ ४ ॥ दो रात्रितक निरंतर धूळ चढी रहे तो परचक्रागमन नहीं होता और तीन रात्रितक धूल बनी रहेको दुष्ट डाकू जनोंका प्रजामें भय हो, रोग हो ॥ ५ ।। ईतिदुर्भिक्षमतुलं यदि रात्रचतुष्टयम् ॥ निरंतरं पंचरात्रं महराजविनाशनम् ॥ ६ ॥ चार रात्रिक रहेको टीडी आदि ईंति तथा दुर्भिक्षक अर्यंत भय हो निरंतर पांचरात्रितक हो तो महाराजाको नष्टकरे ॥ ६ ॥ तावन्यत्र शिशिरात्संपूर्णफलदं रजः ॥ ७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां रजोलक्षणाध्यायः पंचाशत्तमः ॥ ६० ॥ शिशिरर्तुके बिनां अन्यततुकी रज (अंधी) चलना पूराफल करती अर्थव शिशिरऋतुमें अंधी चळनेका (ज्यादेपवनचलनेका ) कुछ दोष नहीं ॥ ७ ॥ इति श्रीनारदीयसहिताभाषाटीकायां रजोलक्षणाध्यायः पंचशत्तमः ।। ५० ॥ Ra भूभारखिन्ननागेंद्रदीर्घनिःश्वससंभवः । भूकंपः सोपि जगतामशुभाय भवेत्तदा ॥ १ ॥ १८ ( २७४ ) नारदसंहिता। पृथ्वीके आरसे खिन्नहुए शेषनागके ऊंचे श्वास लेनेसे भूकंप अर्थाब भूमिकांपना भौंचाळ होता है वह संसारको अशुभ फलदायी है ॥ १ ॥ यामक्रमेण भूकंपो द्विजातीनाभनिष्टदः ॥ अनिष्टदे क्षितीशानां संध्ययोरुभयोरपि ॥ २॥ प्रहरके क्रमसे भूकंप, द्विजातियोंको अशुभफल देता है जैसे दिनके प्रथमप्रहरमें ब्राह्मणोंको अशुभ, २ प्रहरमें क्षत्रियोंको, ३ में वैश्यको और चौथे प्रहरमें शूद्रोंके अशुभ जानना और दोनों संधियोंमें भूकंप होय तो राजाओंको अभुत है ॥ २ ॥ अर्यमायानि चत्वारि दर्वेद्वदितिभानि च । वायव्यमंडलं वेतदस्मिन्कंपो भवेद्यदि ॥ ३ ॥ और उत्तराफल्गुनी आदि चानक्षत्र, अश्विनी, मृगशिर, पुनर्वसु इन नक्षत्रकी वायव्यमंडल संज्ञाहै इसमें भूकंप होय तो ॥३॥ नृपसस्यवाणिग्वेश्याशिल्पवृष्टिविनाशदः ॥ पुष्यद्विदैवभरणी पितृभाग्यानामऽजयेत् ॥ ४॥ खेती राजा, वैश्य, वेश्या, कारीगर, वर्षा इहोंका नाश ह। और पुष्य, विशाखा, भरणी,मघा, पूर्वफाल्गुनी, कत्तिका, पूर्वा- भाद्रपद ॥ ४ ।। आग्नेयमंड्लं त्वेतदस्मिन्कृपो भवेद्यदि ॥ नृपवृष्टयर्चनाशाय इतिशबरटंकणान् ॥ ५॥ यह इन नक्षत्रका अभिमंडल कहाताहै इसमें भूकंप हो तो राजाका नाश हो वर्षा नहीं हो भाव महँगा रहे शांभरनमक, सुहाग इत्यादि वस्तु महँगी र ।। ५ ॥ आषाटीकास०-अ० ५१.. (२७५) अभिजिद्धतृवैश्वेंद्रवसुवैष्णवमैत्रभम् । वासवं मंडलं वेतदस्मिन् कंपो भवेद्यदि ॥ ६॥ अभिजित, रोहिणी, उत्तराषाढज्येष्ठा,धनिष्ठा, श्रवण, अनुराधा इन्होंका वासवमंडल कहाताहै इसमें भूकंप होवे तो ।। ६ ॥ । राजनाशाय कोपाय हंति माहेयद&रान्॥ मूलाहिर्मुश्यवरुणाः पौष्णमादहिभानि च ॥ ७ ॥ राजाका नाश हो और राजाओंका वैर हो माहेय तथा दर्दूर देशोंका नाश हो । मूल, उनराजाऽषद, शतभिषा, पूर्वाषाढ रेवती, आर्द्र, आश्लेषा ॥ ७ ॥ वारुणं मंडलं तस्मिन् कंधो भवेद्यदि । राजनाशकरो हंति पृौण्ड्रचीनपुलिंदकान् ॥ ८ ॥ यह वारुणमंडल कहा है इसमें भूकंप होय तो राजाको नष्ट करे और पौण्ड्र, चीन, पुलिंद इन देशोंको नष्ट करे ॥ ८ ॥ प्रायेण निखिलोत्पताः क्षितीशानामनिष्टदः ॥ षद्भिर्मासैश्च भूकंपो द्वाभ्यां दाहफलप्रदः ॥ ९ ॥ विशेष करके संपूर्ण उपात राजाओंको अशु कहे हैं भूकंपका फल छःमहीनेमें होता है दोमहीनोंमें दिग्दाहका फल होताहै ॥ ९ ॥ अनुक्तः पंचभिर्मासैस्तदानीं फलदं रजः ॥ १० ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां भूकंपलक्षणाध्याय एकपंचाशत्तमः ॥९१॥ (२७६ ) नारदसंहिता । ' और रज अर्थात् अंधी चलने तथा अन्यवस्तुका उत्पात पांचमहीनोंमें फळ करताहै ॥ १० ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकयां भूकंपलक्षणा ध्याय एकपंचाशत्तमः ॥ ५१ ॥ अथ नक्षत्रजातफलम्। सुरूपः सुभगो रूक्षो मतिमान्भूषणप्रियः ॥ अंगनावद्भः शूरो यो जातश्चाश्विभे नरः ॥ १ ॥ संदरूपवान, सुंदरऐश्वर्यवान्, रूक्षवर्ण, बुद्धिमान्, आभूषण प्रिय, स्त्रियोंका प्रिय, शूरवीर, ऐसा मनुष्य अश्विनीनक्षत्रमें जन्मनेसे होता है । १ ।। कामोपचारकुशलः सत्यवादी दृढव्रतः॥ अरोगः सुभगो जातो भरण्यां लघुभुक्मुखी ॥ २॥ कामशास्त्रमें निपुण, सत्यबोलने वाला, दृढ़नियमवाळा, रोग हित, सुंदर ऐश्वर्यवन्, हलका ओजन करनेवाला, सुखी ऐसा मनुष्य भरणीमें जन्मनेसे होता है ॥ २ ॥ तेजस्वी मतिमान्दाता बहुभुक्प्रमदाप्रियः । गंभीरः कुशलो मनी वह्निक्षत्रजः शुचिः ॥ ३ ॥ तेजस्वी, बुद्धिमान्, दात, बहुत भोजन करनेवाला, स्रियोंसे प्यार रखनेवाळा, गंभीर, चतुर, मानी, ऐसा पुरुष ऋतिका नक्षत्रमें जन्मनेसे होता है ॥ ३ ॥ भाषाटीकास ०-अ० ५२.’ ( २७७ ) सुरूपः स्थिरधीर्मानी भोगवान्सुरतप्रियः । प्रियवाक्चतुरो दक्षस्तेजस्वी ब्रह्मधिष्ण्यजः ॥ ४ ॥ और सुंदररूपवान्, स्थिरबुद्धिवाळामानी, ओगवान्, मैथुन प्रिय, प्रियबोलनेमें चतुर, सबकामेंमें निपुण, तेजस्वी ऐसा पुरुष रोहिणीमें जन्मनेसे होता है ॥ ४ ॥ उत्साही चपलो भीरुर्धनी सामप्रियः शुचिः । आगमज्ञः प्रभुर्विद्वानिंदुनक्षत्रजः सदा ॥९॥ और मृगशिरमें जन्मनेवाला मनुष्य चपळ, उत्साहवाला, डर पोक, धनी, साम ( समझना ) में प्रिय, पवित्र, शाखको जानने बाळाप्रभु, विद्वान् होता है ॥ ५ ॥ अविचारपरः कूरः क्रयविक्रयनैपुणः॥ गवि हिंस्रखंडकोपी कृतन्नः शिवधिष्ण्यजः ॥ ६ ॥ और आर्द्र नक्षत्रमें जन्मनेवाला पुरुष विचारवान् नहीं होता कूर तथा खरीदने बेचनेके व्यवहारमें निपुण, हिंसा करनेवाला, प्रचंड कोपवालाछतन्न पुरुष होता है ॥ ६ ॥ दुर्मेधा वा दर्शनीयः परस्त्रीकार्थेनैपुणः । सहिष्णुरत्यसंतुष्टः शीघ्रगोदितिधिष्ण्यजः॥ ७ ॥ पुनर्वसुमें जन्मनेवाला जन खराब बुद्धिवाळादर्शनीय, परीके कार्यंमें निपुण, सहनेवाळा, संतोष रहित, शीघगमन करने बाला होता है ॥ ७ ॥ पंडितः सुभगः शूरः कृपालुवुर्भिको धनी ॥ कलाभिज्ञः सत्यवादी कामी पुष्यर्कीजो लघुः ॥ ८ ॥ ( २७८ ) नारदसंहिता । और पुष्यनक्षत्रमें जन्म होय तो पंडित, सुंदरऐश्वर्यवान्, शूरवीर आपलु, धार्मिक, धनी, कलाओंको जाननेवाला, सत्यवादी, सरल ऐसा मनुष्य होता है । ८ । श्रेष्ठो धूर्तः क्रूरशूरौ परदाररतः शठः ॥ अवक्रो व्यसनी दांतः सार्षीनक्षत्रजो नरः ॥ ९ ॥ आश्लेषा नक्षत्रमें जन्मनेवाला मनुष्य श्रेष्ठ, धनं, क्रूर, शूरवीर परस्त्रीगामी, मूर्व, कुटिलतारहित, व्यसनी, जितेंद्रिय होता है।९।। शूरः स्थूलहूनुः कुक्षे कोपवक्तास्रहः प्रभुः । गुरुदेवार्चने सक्तस्तेजस्वी पितृधिष्ण्यजः ॥ १० ॥ मघानक्षत्रमें जन्मनेवाला मनुष्य शुरखीरभारीठोडीवाळ, स्थूल- कटिवाला, क्रोधके वचन बोलनेवला, नहीं सहनेवाळा, समर्थ, गुरु तथा देवताके पजनमें आसक्त, तेजस्वी होता है । १० ॥ द्युतिमानटनो दाता नृपशास्त्रविशारदः । कार्याकार्यविचारज्ञो भाग्यनक्षत्रजः पटुः ॥ ११ ।। पूर्वफाल्गुनी नक्षत्रमें जन्मनेवाला पुरुष विचरनेवाळा, दाता, नृशान्में निपुण, कार्यं अकार्यके विचारमें निपुण तथा चतुर होता है ।। ११ ।। जितशत्रुः सुखी भोगी प्रमदामर्दने कविः । कलाभिज्ञः सत्यरतः शुचिः स्यादर्यमर्द्धजः ॥ १२ ॥ उत्तराफाल्गुनीमें जन्मनेवाला जन शत्रुओंको जीतता है सुखी तथा भोगी स्रियोंसे क्रीड करने॥ चतुर, कळओंको जाननेवाला, सत्यरत और पवित्र होता है । १२ । भाषाटीकास ०-अ० ५२. (२७९ ) मेधावी तस्करोत्साही परकार्यरतो भटः॥ परदेशस्थितः शूरः स्त्रीलाभः सूर्यधिष्ण्यजः ।। १३॥ हस्तनक्षत्रमें जन्मनेवाला पुरुष बुद्धिमान्, चोरीमें उत्साहवाळा, परकार्यमें रत, शूरवीरपरदेशमें रहनेवाला, पराक्रमी, स्त्रीसे लाभ करनेवाला होता है ॥ १३ ॥ चित्रमाल्यांबरधरः कामशास्त्रविशारदः ॥ द्युतिमान्धनवान्भोगी पंडितस्त्वष्टुधिष्ण्यजः ॥ १४ ॥ जो चित्रानक्षत्रमें जन्मे बह विचित्रमाला तथा विचित्र सुंदर वस्त्रोंको पहिननेवाला और कमश्वस्रमें निपुण होता है कांतिमान् धनवान्, भोगी, तथा पंडित होता है ॥ १४ ॥ धार्मिकः प्रियवक्छूरः क्रयविक्रयनैपुणः । कामी बहुमुतो दांतो विद्यावान्मारुतीजः ॥ १४॥ स्वातिनक्षत्रमें जन्मनेवाला जन, धार्मिक, प्रियबोलनेवाला शूरवीरखरीदने बेचनेके व्यवहारमें निपुण, कामी, बहुतपुत्रवाळा, जितेंद्रिय, विद्यावान् होता है ॥ १५ ॥ अन्यायोपरतः श्लक्ष्ण मायापटुरनुद्यमः ॥ जितेंद्वियोर्थवाँलुब्धो विशाखीसमुद्भवः ॥ १६ ॥ अन्यायमें तत्सर्, चतुर, मायाचनेमें चतुर, उद्यम्हित, जितेंद्रिय, धनवान, लोभी ऐसा पुरुष विशाखानक्षत्रमें जन्मनेवाला होता है ।। १६ ॥ नृपकार्यरतः शूरो विदेशस्थांगनापतिः ॥ सुरूपच्छन्नपापश्च पिंगलो मैत्रधिष्ण्यजः ॥ १७ ॥ ( २८० ) नारदसंहिता । सु राजाके कार्यमें तत्पर, थरखीरविदेशमें रहनेवाळा, वियोंक माळिक, दररूपवान्, गुप्त पापकरनेवाला, पिंगळवर्ण ऐसा पुरुष अनुराधा नक्षत्रमें जन्मनेवाला होता है ॥ १७ ॥ बहुव्ययपरः केशसहः कामी दुरासदः ॥ कूरचेष्टो मृषाभाषी धनवानिंद्रधिष्ण्यजः ॥ १८ ॥ बहुतखर्चनेवाला क्लेशको सहनेवाला कामी मुशकिलसे प्राप्त होनेवाला, भूरचेष्टावाळ, झूठबोलनेवाळा, धनवान् ऐसा पुरुव थे ऋनक्षत्रमें जन्मनेवाला होता है ।। १८ ।। हिंस्रो मानी च भोगी च परकार्यप्रकाशकः ॥ मिथ्योपचारस्त्रीलोलः श्लक्ष्णे नैनैतधिष्ण्यजः॥ १९॥ जो मूलनक्षत्रमें जन्मे वह हिंसक, अभिमानी, कोणी, पाये काम प्रकटकरनेवाला, मिथ्या उपचारकरनेवाला श्रीविषे चंचळ, चतुर होता है ।। १९ ।। सुकलघः कामचारः कुशलो दृढसौहृदः ॥ क्लेशभाग्वीर्यवान्मानी जलनक्षत्रसंभवः ॥ २० ॥ पूर्वाषाढमें जन्मनेवाला पुरुष सुंदर स्त्रवाळा, कामी, चतुर, दृढमीतिवाळाक्लेश सहनेवाळ, बलवानअभिमानी होता है।।२०।। नीतिज्ञ धार्मिकः शूरो बहुमित्रो विनीतवान् । सुकलत्रः सुपुत्रव्योत्तराषाढसंभवः ॥ २१ ॥ जो उत्तराषाढमें जन्मे वह नीतिशास्त्रको जाननेवाल, धार्मिक, शूरवीरबहुत मित्रोंवाला, नीतिशास्त्रको जाननेवाला, सुंदर श्री और सुंदर पुत्रोंसे युक्त होता है ।। २१ ।। भाषादीनप्त ०-अ० ५२. ( २८१ ) उदरे च दृढः श्रीमान्बहुवक्ता धनान्वितः॥ काव्योक्तसुरताभिन्न धार्मिकः श्रवणश्चैजः ॥ २२ ॥ श्रवणमें जन्मनेवाला पुरुष दृढ उदरखाल, श्रीमान्, बहुत कहने वाळा, धनाव्य, कयोंके अलंकारोंको जाननेवाला धार्मिक होत है ।। २२ ।। धार्मिको व्यस्नी लुब्धो नृत्यगीतांगनाप्रियः ॥ सामैकसाध्यस्तेजस्वी वीर्यवान्वसुधिष्ण्यजः॥ २३ ।। धनिष्ठा नक्षत्रमें जन्मनेवाला नर धार्मिक, व्यसनी, लोभी, नाचना, गाना स्त्री इन्होंमें प्यार रखनेवाला, समझानेसे कार्य सिद्धकरनेवाला, तेजस्वी तथा बलवान् होता है ॥ २३ ॥ दुर्गेधो व्यसनी क्रूरः क्षयवृद्धियुतः शठः ।। परदाररतः शूरः शततार्श्वसंभवः ॥ २३ ॥ शतभिषानक्षत्रमें जन्म हो तो दुगंधवालाव्यसनी, क्रूर, क्षयवृद्धि रोगवाळा, मूखी, परस्त्रीमें रत, शूरवीर नर होता है।२४॥ । उद्विग्नः स्त्रीजितः सौम्यः परनिक्षपरायणः ॥ दांभिको दुःसहः शूरश्वजयाद्धिष्ण्यसंभवः ॥ २९ ॥ पूर्वाभाद्रमें जन्म हो तो उद्विश्रमनवाला, त्रीजित, सौम्य, पराई निंदा करनेवाला, पाखंडी, दुस्सह, शूरवीर होता है ॥ २५ ॥ प्रजावान्धार्मिको वक्ता जितशEः सुखी विभुः । दृढव्रतः सदा कामी वाहिब्रूभ्यद्भसंभवः ॥ २६ ॥ उत्तराभाद्रपदमें जन्मे तो संतानवालाधार्मिक,वक्ता, शत्रुओंको जीतनेवाळा, सुखी, समर्थ, दृढनियमथाल,सदा कमी होता है२६॥ ( २८२) नारदसां । रूपवान्धनवान्भोगी पंडितश्च जलार्थभुक् । कामी च दुर्घतः शूरः पौष्णजः परदेशगः ॥ २७ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां नक्षत्रगुणाध्यायो द्विपंचाशत्तमः ॥ ४२ ॥ रेवती नक्षत्रमें जन्मनेवाला पुरुष रूपवान, धनवान्, भोगी, पंडित, जळके कममें द्रव्यकमानेवालाकामी, दुष्ट आचरणाला, शूखीर और परदेशमें रहनेवाला होता है ।। २७ ।। इति श्रीनारदीयसंहिताआषाटीकायां नक्षत्रगुणध्यायो द्विपंचशचमः ॥ ५२ ।। अथ मिश्रप्रकरणम्। असंक्रांतिर्दिसंक्रांतिः संसर्पहस्पती सेमौ । मासौ तु बहवश्चांद्वास्त्वधिमासः परः क्षयः ॥ १ ॥ विना संक्रांतिवाला तथा दोसंक्रांतिवाळा ऐसे ये दोमहीने क्रममे संसर्ष तथा अहस्क्षतिनामधले कहाते हैं और अधिमास तथा क्षयमास भी होता है ऐसे ये सब भेद चांद्रमासके जानने ॥ १ ॥ हिमाद्विभागयोर्मध्ये सुरार्चितवसुंधरा ॥ गोदावरी कृष्णवेण्योर्मध्ये काव्यवसुंधरा ॥ २॥ हिमालय और गंगाजले मध्यमें वृहस्पतिकी भूमि जानना गोदा- वरी और कृष्णावेणी नदीके मध्यमें शुक्रकी भूमि जानना ॥२॥ विंध्यगोदावरीमध्ये भूमिः सूर्यसुतस्य च । विंध्याद्विगंगयोर्मध्ये या भूमिः सा बुधस्य च ॥ ३ ॥ भाषाटीकास ०.-अ० ५३ . (२८३ ) विंध्याचल और गोदावरीके मध्यमें शनिकी भमि जानना विंध्या चल और गंगाजीके मध्यमें जो भूमि है वह बुधकी जाननी ॥३॥ या वेण्यालंकयोर्मध्ये धरात्मजवसुंधरा ॥ समुद्भयंत्रितक्षोणीनाथौ सूर्यहिमद्युती ॥ ४ ॥ और वेणी नदी तथा टंकाके मध्यमें मंगलकी भूमि जानना और समुद्रके पास की भूमिके मालिक सूय चंद्रमा कहे हैं ।। ४ ॥ इषमास चतुर्दश्यामिंदुक्षयतिथावापि । ऊर्जादै स्वातिसंयुक्ते तदा दीपावली भवेत् ॥ ५॥ अधिन वदि चतुर्दशी अथवा अमावास्याको और काफैिककी चतुर्दशी तथा दीपमालिकाको ।। ५॥ तैले लक्ष्मीर्जले गंगा दीपावल्यां तिथौ भवेत् ॥ अलक्ष्मीपरिहारार्थमभ्यंगस्नानमाचरेत् ॥ ६ ॥ तैठमें ळक्ष्मी और जलमें गंगाजी रहती है इसलिये दीपमालि काके दिन अछदमी ( दरिद्र ) दूरहोनेके वास्ते तेल ळगाकर स्नान करना चाहिये ॥ ६ ॥ इंदुक्षये च संक्रांतौ वारे पाते दिनक्षये ॥ तत्राभ्यंगे ह्यदोषाय प्रातः पापापनुत्तये ॥ ७ ॥ अमावास्या तथा संक्रांतिके दिन व्यतीपातके दिन तिथि क्षयके दिन प्रातःकाल तेढळगाकर स्नानकरे तो संपूर्ण पाप दूर होवें ।। ७॥ {२८४ ) नारदसंहिता । मासि भाद्रपदे कृष्णे रोर्हिणीसहिताष्टमी ॥ जयंती नाम सा तत्र रात्रौ जातो जनार्दनः ॥ ८॥ भाद्रपद कृष्णा अष्टमीको रोहिणी नक्षत्रहे तब वह जयंतीनाम अष्टमी है उसदिन श्रीकृष्णभगवान्का जन्म भया है। ८ ।। उपोष्य जन्मचिह्नानि कुर्याज्जागरणं च यः ॥ अर्द्धरामयुताष्टम्यां सर्वमेधफलं लभेत् ॥ ९ ॥ उसदिन व्रतकर जन्मके चिह्नकर अर्धरात्रियुक् अष्टमीमें जो जागरण करता है वह अश्वमेध यज्ञके फळको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ रोहिणीसहिताष्टम्यां श्रावणे मासि वा तयोः ॥ श्रावणे मासि वा कुर्याद्रोहिणीसहिता तयोः ॥ १० ॥ रोहिणी सहित अष्टमी श्रवणमें मिलजाय तो रोहिणीके योग होनेसे वह भी जयंती अष्टमी जाननी उसीदिन बतकरना ।१०।। मासि भाद्रपद शुक्ले पक्षे ज्येष्ठर्कसंयुते । रात्रौ तस्मिन्दिने कुयज्येष्ठायाः परिपूजनम् ॥ ११ ॥ भाद्रपद शुक्ल अष्टमीको ज्येष्ठा नक्षत्र होय तो उस रात्रिमें अथवा दिनमें ज्येष्ठा नक्षत्रका पूजन करना चाहिये ॥ ११ ॥ अर्धरात्रयुता यत्र माघकृष्णचतुर्दशी । शिवरात्रिव्रतं तत्र सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ १२ ॥ और माघकृष्णा चतुर्दशी अर्धरात्रयुक्त हो उसदिन शिव- रात्रि व्रत होता है वह अश्वमेधयज्ञको फल देती है ॥ १२ ।। आषाढीकाप्त ०-अ० ५३. ( २८) नक्तत्रतेषु सा ग्राह्या प्रदोषव्यापिनी तिथिः ॥ पूजाव्रतेषु सर्वेषु मध्याह्नव्यापिनी स्मृता ॥ १३ ॥ वह तिथि रात्रिके व्रतोंमें मदोषव्यापिनी ग्रहण की है और संपूर्ण पूजा बतोंमें तो मध्याह्नव्यापिनी कही है ॥ १३ ॥ एकभुक्तोपवासेषु या विंशघटिकामिका ॥ पिष्टान्नप्राशनेष्वेव लवणाम्लविवर्जिता ॥ १४॥ एक भुक्तोषवास अर्थात् एकवार भोजन करनेके व्रतोंमें वीस २० वडीतक रहनेवाली तिथि गृहीत है पीठीके पदार्थ खानेमें नमक खटाईका त्याग करनेमें भी बीसघडी इष्टतक रहनेवाली तिथि ग्राह्य है। १४ ॥ आषाढसितपंचम्यामसंप्राश्य उपोषितः ॥ अर्चयेत्षण्मुखं देवसृणरोगविमुक्तये ॥ १९ ॥ आषाढ सुदी पंचमीको भोजन नहीं करना, उपवास व्रतकरके षण्मुखदेख स्वामिकालुिकका पूजन करनेसे ऋण और रोग दूर होता है ॥ १५ ॥ तथैव श्रावणे शुक्पंचम्यां नागपूजनम् ॥ पयःप्रदानं सपेभ्यो भयरोगविमुक्तये ॥ १६ ॥ तैसेही श्रावणशुक्ल पंचमीको नागपूजन होता है उसदिन रोग । दूर होनेके वास्ते सषको दूध पिलाना चाहिये ॥ १६ ॥ मासि भाद्रपदे चुञ्चतुर्यो गणनायकम् ॥ पूजयेन्मोदकाहारैः सर्वविघ्नोपशांतये ॥ १७ ॥ ( २८६) नारदसंहिता । भाद्रपद शुक्Jा चतुर्थीको गणेशजीका पूजन करना और छड्डुवोमे पूजन करना तथा लड्डुयें ओोजन करना ऐसे करनेसे संपूर्णविनोंकी शांति होती है ।। १७ ।। माघशुकं च सप्तम्यां योर्चयेद्भास्करं नरः ॥ आरोग्यं श्रियमाप्नोति घृतपायसभक्षणैः ॥ १८॥ माघशुक्ला सप्तमीको जो पुरुष सूर्यका पूजन करता है और वृत तथा खीरका भोजन करता है वह आरोग्य ( खुशी ) रहता है १८॥ व्यंजनोपानहौ छत्रं दध्यमन्नकपात्रिकाम्॥ वैशाखे विप्रमुख्येभ्यो धर्मप्रीत्यै प्रयच्छति ॥ १९ ॥ कनकांदोलिकाछत्रचामैरैः स्वर्णभूषितैः॥ सह दिव्यान्नपानाभ्यां दत्वा स्वर्गमवाप्नुयात् ॥ २० ॥ और जो पुरुष धर्महेतु वैशाखमहीनेमें बीजना ती जोडा छत्री, दही, अन्न, थाली इन्होंका दान श्रेष्ठब्राह्मणके वास्ते देता है और सुवर्णपाली, छत्र, चमार, सुवर्णके आभूषण, दिव्य अन्नपानदान करता है वह स्वर्गमें प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ २० ॥ आश्वयुपासि शुश्छायां नवम्यां भक्तोिर्चयेत् ॥ लक्ष्मीं सरस्वतीं शस्त्रान्विजयी धनवान्भवेत् ॥ २१ ॥ आश्विनशुक्ल नवमीको भक्तिसे लक्ष्मी, सरस्वती, शत्र इन्होंका पूजनकरनेवाला पुरुष विजयी तथा धनवान होता है । २१ ।। कार्तिक्यमथ वैशाख्यामुपोष्य वृषमुत्सृजेत् ॥ शिवप्रीत्यै भक्तियुतः स नरः स्वर्गभाग्भवेत् ॥२२॥ भाषाटीकास०-अ० ५३. (२८७) कार्तिकशुक्ल पूर्णिमाको अथवा वैशाखशुक्ला पूर्णिमाको उपवासव्रतकरके बैछ छोडे (ऑकिछ छोडे ) हिसे युक्रुहोकर शिवजीकी प्रीतिके वास्ते ऐसे करनेवाला पुरुष स्वर्गमें प्राप्त होता है ।। २२ ।। घटत्यक्षे नृयुग्मेषु कन्या कीटतुलाधनुः॥ कुलीरमृगासिंहश्च चैत्राद्यः शून्यराशयः २३ ॥ और छैन, मीन, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, तुळ, धनु, कर्क, मकर, सिंह ये राशि यथाक्रमसे चैत्र आदि महीनोंमें शून्य जाननी जैसे चैत्रमें कुंभं ; वैशाखमें मीन इत्यादि ॥ । २३ ॥ अथ तिथिशन्यलग्नानि। तुलामृगौ प्रतिपदि तृतीयायां हरिश्रृंगः ॥ पंचम्यां मिथुनं कन्या सप्तम्यां चापचांद्रभे ॥२४॥ प्रतिपदा तिथिविषे तुला और मकर लग्न छून्य है तृतीयाविषे सिंह और मकर, पंचमीविषे मिथुनकन्या, सप्तमीविषे धन की लग्न शून्य है ।। २४ ।। नवम्यां हरिकीर्टौ द्वावेकादश्यां गुरोर्वे । त्रयोदश्यां झषवृषौ दिनदग्धाश्च राशयः ॥ २५ ॥ नवमीविषे सिंह वृश्चिक, एकदशीविषे धन मीनत्रयोदशीविषे मीन वृष लग शून्य (दग्ध ) कहे हैं ॥ २५ ॥ मासदग्धाह्वयात्राशीन्दिनदग्धांश्च वर्जयेत् ॥ २६ ॥ इसप्रकार मासदग्ध राशियोंको और दिनदध राशियोंको वर्ज देवे ॥ २६ ॥ ( २८८) नारदसंहिता । अथ मासशून्यतिथयः। अष्टमी नवमी चैत्रे पक्षयोरुभयोरपि । वैशाखे द्वादशी शून्या पक्षयोरुभयोरपि ॥ २७॥ चैत्रके दोनों पक्षेमें अष्टमी नवमी तिथि शून्य जाननी और वैशाखमें दोनोंपक्षोंमें द्वादशी शून्य जाननी ॥ २७ ॥ ज्येष्ठे त्रयोदशी शुक्ला कृष्णपक्षे चतुर्दशी । आषाढ कृष्णपक्षेपि षष्ठ शुक्रेऽथ सप्तमी ॥ २८॥ ज्येष्ठमें शुक्लपक्षमें त्रयोदशी, कृष्णपक्षमें चतुर्दशी और आषाढमें कृष्णपक्षमें षष्ठी, शुक्ळपक्षमें सप्तमी शून्यतिथि जाननी ।। २८ ।। श्रावणेपि द्वितीया च तृतीया पक्षयोर्दयोः ॥ प्रौष्ठपदे सिते कृष्णे द्वितीया प्रथमा तथा ॥ २९॥ श्रवणमें दोनों पक्षोंमें द्वितीया, तृतीया, शून्य जाननी भाषद शुक्लपक्षमें वा कृष्णमें प्रथमा द्वितीया शून्य तिथि जाननी ।। २९ ।। । सिते कृष्णेष्याश्वयुजि दशम्यैकादशी तथा ॥ कार्तिके च सिते पक्षे चतुर्दशी शराऽसिते ॥ ३० ॥ अश्विनमें दोनों पक्षोंमें दशमी एकादशी शून्य तिथि जाननी कार्तिकमें शुक्कुपक्षमें चतुर्दशी और कृष्णपक्षमें पंचमी तिथि शून्य जाननी ॥ ३० ॥ मार्गेऽद्रिनागसंज्ञेऽपि पक्षयोरुभयोरपि । पौषे पक्षद्वये चैव चतुर्थी पंचमी तथा ॥ ३१॥ मार्गशीर्षमें दोनों पक्षोंमें सप्तमी अष्टमी शून्य जाननी पौषमें नों पक्षोंमें चर्थ पंचमी शून्य जाननी ॥ ३१ ॥ भाषाटीकाक्ष०-अ० ५३. ( २८९ ) माघे तु पंचमी षष्ठ शुक्रे कृष्णे यथाक्रमम् । तृतीया च चतुर्थी च फाल्गुने सितकृष्णयोः ॥ ३२ ॥ माघमें शुक्लपक्ष में पंचमी कृष्णमें षठी शून्य तिथि जाननी और फाल्गुनमें शुक्ळ्पक्षमें तृतीया कृष्णमें चतुर्थं शून्यतिथि जाननी३२ इति शून्यतिथयः ।। अथ गंडांतविचारः। AN अभुक्तमूलजं पुत्रं पुत्री वापि परित्यजेत् ॥ अथवाष्टाब्दकं तातस्तन्मुखं नावलोकयेत् ॥ ३३ ॥ अभुक्त मूळज पुत्रको अथवा पुत्रीको यागदेवे अथवा आठ वर्षकांबाळकहो तबतक पिता उसके मुख को नहीं देखें ॥ ३३ ॥ मूलाद्यपादजो हंति पितरं तु द्वितीयजः ॥ मातरं तु तृतीयोथै सर्वस्वं तु चतुर्थजः ॥ ३४ ॥ मूळनक्षत्रके प्रथम प्रहरमें बाळक जन्मे तो पिताको नष्ट करै और दूसरे चरणमें जन्मे तो माताको, तीसरेमें धनको, चौथे चरणमें संपूर्णवस्तुको नष्ट करता है । ३४ ।। दिवा जातस्तु पितरं रात्रैौ तु जननीं तथा ॥ आत्मानसंध्ययोर्हन्ति नास्ति गंडो निरामयः ॥ ३५ ॥ दिनमें बालक जन्मे तो पिताको नष्टकरे और रात्रिमें जन्मे तो १९ ( २९० ) नारदसंहिता। माताको, दोनों संधियोंमें अपने आमाको नष्ट करे ऐसे गंडांत नक्षत्रमें जमाहुआ बालक निदोष नहीं है ॥ ३५॥ यो ज्येष्ठामूलयोरंतरालप्रहरजः शिशुः ॥ अभुक्तमूलजः सार्पमघानक्षत्रयोरपि ॥ ३६ ॥ जो बाछक ज्येष्ठा और मूळनक्षत्रके मध्यके प्रहरोंमें जन्मता है। और जो आश्लेषा तथा मघाके मध्यके प्रहरमें जन्मता है वह अभुक्त मूळज कहा है ॥ ३६ ॥ विधेयं शतिकं तत्र गंडे दोषापनुत्तये । अरिष्टं शतधा याति सुकृते शतिकर्मणि ॥ ३७ ॥ तहां गंडांत नक्षत्रमें जन्मनेकी शांति करनी चाहिये शांतिकर्म सुकृतकरनेसे आरिष्ट ( पीडा ) सैंकडों प्रकारसे दूर होता है।।३७ तस्माच्छांतिं प्रकुर्वीत प्रयत्नाद्विधिपूर्वकम् ॥ वसरात्पितरं हंति मातरं तु त्रिवर्षतः ॥ ३८ ॥ इसलिये यत्नसे विधिपूर्वक शांति करखानी चाहिये और शांति नहीं की जाय तो गंडांत नक्षत्र पिताको एकवर्षमें नष्टकरे और माताको तीनवर्षमें नष्टकरे ।। ३८ ।। धनं वर्षद्वये चैव श्वशुरं नववर्षके । जातं बालं वत्सरेण वयैः पंचभिरग्रजम् ॥ ३९ ॥ धनको दोवर्षमें, श्वशुरको नववर्षमें नष्टकरे और जन्मे हुए उस बालकको एकवर्षमें औरं बालकके बडेभाईको पांचवर्षमें iष्टकरं ३९ ।। आभाटीकास ०-अ० ५४. ( १९१ ) श्यालकं चाष्टभिर्वर्षेरनुक्तान्हंति सप्तभिः ॥ ४० ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां मलमासाद्यनेकलक्षणाध्याय स्त्रिपंचाशत्तमः॥ ९३ ॥ सालाको आठवर्षमें नष्टकरे ऐसे वह बालक जिसको अशुभ हो तिसकी शवधि कही और बिना कहे हुए कुटुंबके जनोंको सातव ऍमें नष्टकरे ॥ ४० ॥ इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां मलमासाद्यनेकठक्षणा ध्यायत्रिपंचशत्तमः ।। ५३ ।। । अथाश्वशांतिः। अश्वशांतिं प्रवक्ष्यामि तेषां दोषापनुत्तये । भानुवारे च संक्रांतावयने विषुवद्वये॥ १ ॥ अष अधोंके दोष दूरहोंनेके वास्ते अश्वशांतिको कहते हैं रविवार तथा संक्रांति विषे तथा उत्तरायण दक्षिणायन होनेके समय अथवा दिन रात्रि समान होवे उस दिन ॥ १ ॥ दिनक्षये व्यतीपाते द्वादश्यामधिभेपि वा । अथ वा भास्करे स्वातिसंयुक्ते च विशेषतः ॥ २॥ तिथिक्षयमें व्यतीपात योग वा द्वादशी के दिन अश्विनी नक्षत्रविषे अथवा स्वातिनक्षत्रयुक्तः रविवारविषे ॥ २ ॥ ( २९२) नारदसंहिता। ईशान्या त्वष्टभिर्हस्तैश्चतुर्भिर्वाथ मंडपम् ॥ चतुर्दूरवितानमुक्तोरणावैरलंकृतम् ॥ ३ ॥ ईशान कोणमें आठ हाथ प्रमाणका अथवा चारहाथ प्रमांणक मंडप बनावे तिसको चारद्वार बंदनवालमाल, तोरण इत्यादिकोंसे शोभित करे ॥ ३ ॥ तन्मध्ये वेदिका तस्य पंचविंशशमानतः ॥ मंडपस्य बहिः कुंडं प्राच्यां हस्तप्रमाणतः॥ ४ ॥ तिसमंपडके पच्चीसवें अंश ( भाग ) प्रमाण तिसके मध्यमें बेदी बनावे और मंडपसे बाहिर पूर्वदिशामें एकहाथ प्रमाण अभिकुंड बनावे ॥ ४ ॥ वरयेच्छोत्रियान् विप्रान् स्वस्तिवाचनपूर्वकम् । सूर्यपुत्रं हयारूढं पंचवी त्रियंबकम् ॥ ५ ॥ फिर स्वस्तिवाचन पूर्वक वेदपाठी ब्राह्मणोंका वरणकरे और सूर्यके पुत्र, अश्वपर चढे हुए, पांचमुख और तीननेत्रोंवाले ।। ५॥ शुकुवर्णवसाखी श्रृंखंतं द्विभुजं स्मरेत् ॥ सूर्यपुत्र नमस्तेस्तु नमस्ते पंचवक्त्रक ॥६ ॥ शुक्लवर्ण ढाल तलवार धारणकिये हुए दो भुजाओंवाले ऐसे खंत देवका स्मरणकरे हे सूर्यपुत्र ! हे पंचमुखवाले देव तुमको नमस्कार है ।। ६ ।। भघाटीकस०-अ० ५४. (२९३ ) नमो गंधर्वदेवाय रैवंताय नमोनमः ॥ मंत्रेणानेन रैवंतं वस्रगंधाक्षतादिभिः । विधिवद्वेदिकामध्ये तंडुलोपरि पूजयेत् ॥ ७ ॥ गंधर्चदेव चैतको नमस्कार है ऐसे इसमंत्रसे वस्त्र, गंध, अक्षत आदिकोंसे रैवंतको विधिपूर्वक तिस वेदीपर चावलोंपर स्थापितकर पूजनकरे ॥ ७ ॥ कार्यास्तत्र गणाः पंच रौद्रशाक्राश्च वैष्णवाः ॥ सगाणपतिसौरश्व रैवंतस्य समंततः ॥ ८ ॥ तहां पांच प्रकारके गण स्थापित करने रौद्रगण, इंद्रके गण, वैष्णवगण, गणेशजीके गण और सूर्यके गण ऐसे रैवतके चारोंतर्फ स्थापितकरने ॥ ८॥ ऋग्वेदादिचतुर्वेदान्यजेद्वारेषु पूर्वतः ॥ ९ ॥ और अग्वेद आदिंचारोंवेदको पूर्व आदिद्वारों विषे पूजे ॥९॥ रक्तवर्णान्पूर्णकुंभान्वत्रगंधाद्यलंकृतान् ॥ पंचत्वक्पछवोपेतान्पंचामृतसमन्वितान् ॥ १० ॥ और लाळवर्णवाले पूर्णकळशोंको वस्र गंध आदिकोंसे विभूषि- तकर पंचवल्कछ, पंचपळुव, पंचामृत इन्होंसे पूरितकर ॥ ३० ॥ द्वारेषु स्थाप्य तातृगैर्मन्त्रैर्विप्रान्प्रपूजयेत् ॥ एवं तु पूजामाचार्यः कृत्वा गृह्यविधानतः ॥ ११ ॥ (२९४ ) नारदसंहिता। तिन चरवारोंमें स्थापित कर तिसी २ वेदके मंत्रोंकरके तहां चार बालणोंका पृथक् २ पूजन करे आचार्य इसप्रकर कुलकी मर्यादाके अनुसार पूजा कर ॥ ११ ॥ स्थापयेतु व्याहृतिभिस्तस्मिन्कुंडे हुताशनम् ॥ ततस्तदाज्यभागांते मुख्याहुतिमतंद्रितः ॥ १२ ॥ फिर व्याहृतियोंकरके तिसकुंडमें अत्रि स्थापन करे । फिर साव धान होकर आज्य भाग आहुति देकर मुख्य आहुति देना ।।१२। अग्नये स्वाहेति हुत्वा घृतेनादैौ प्रयत्नतः । एवं तु पूजामंत्रेण ह्याघं तु प्रणवेन च ॥ १३ ॥ पलाशसमिदाज्यनैिः शतमष्टोत्तरं हुनेत् ॥ प्रत्येकं जुहुयाद्भक्त्या तिलान्व्याहृतिभिस्ततः ॥ १४॥ अग्नये स्वाहा' इसमंत्रसे पहले यनसे घृतकरके होम करे ऐसे पूजाके मंत्रसे आयंतमें ऊँकार कहके पलाशकी समिध, वृत, तिळादि अन्न इन्ह करके अष्टोत्तरशतं १०८ आहुति होमना फिर प्रत्येक मंत्रमें भूभुवः इत्यादि व्याहृति लगाकर तिखोंसे होम करना ।। १ ३ । १४ ।। एकरात्रं त्रिरात्रं वा नवरात्रमथापि वा । अनेन विधिना कुर्याद्यथाशक्त्या जितेंद्रियः ॥ १६॥ एक रात्रितक वा तीन रात्रिक वा नव रात्रितक इसविधिसे । शक्केि अनुसार जितेंद्रिय होकर हवन करे ।। १५॥ भाषाटीकोलस ०-अ० ५४. (२९५ ) जपादिपूर्वकं सम्यकर्ता पूर्णाहुतिं हुनेत् ।। ततो मंगलघोपैश्च नैवेधं च समर्पयेत् ॥ १६ ॥ यजमान जपादि पूर्वक अर्थात् सब जपोंकी दशांश आहुति राके फिर पूर्णहूति करे फिर मंगळ शब्दोंकरके नैवेश मर्षणकरे ॥ १६ ।। ततस्ते हुतशेषेण सम्यकुंभोदकैर्दिजाः ॥ प्रादक्षिण्यत्रीतोऽश्व-यंतबलिमुत्तमम् ॥ १७॥ फिर वे चार बालण तिन चार कळशकी धारा अयोंके दहिर्न भर्फ " गमन करते हुए छोडकर हुतशेष पदार्थसे उत्तम जयंत बलिदेवे ॥ १७ ॥ जीमूतस्येयवाकाञ्चतुर्दिक्षु विनिःक्षिपेत् ॥ आचार्याय ततो दद्याद्दक्षिणां निष्क्रपंचकम् ॥ १८ ॥ और ‘जीमूतस्य ' ऐसे अनुवाक मंत्रपदकर चारों दिशाओंमें बलि छोडना फिर पांच पल (२०)सुवर्ण आचार्यको देवे१८ तदर्धे वा तदर्धे वा यथाशक्त्यनुसारतः ॥ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्याद्धनं वस्त्रं धनादिकम् ॥ १९ ॥ तिससे आधी अथवा तिससे भी आधी दक्षिणा अपनी शतके अनुसार देनी चाहिये और गौ, वस्त्र धन इन्होंकी दक्षिणा कीत्विजों के अर्थ देनी चाहिये ॥ १९ ॥ {२९६ ) नारदसंहिता । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छतिवाचनपूर्वकम् । एवं यः कुरुते सम्यशश्वशांतिमनुत्तमाम् ॥ २० ॥ फिर स्वस्तिवाचनपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन करवावे ऐसे अच्छे प्रकारसे जो पुरुष उत्तम अश्वशांतिको करताहै ।। २० ।। । सोश्वाभिबृद्दि लभते वीरलक्ष्मीं न संशयः । यज्ञेनानेन संतुष्टा धातृविष्णुमहेश्वराः ॥ २१ ॥ वह अट्ठकी समृद्धिको प्राप्त होजाताहै और शूरवीरेंकी लक्ष्मी को प्राप्त होताहै इसमें संदेह नहीं और इस यज्ञसे बल्ला, विष्णु, महादेव प्रसन्न होते हैं ।। २१ ॥ आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे प्रीताः स्युः पितरो गणाः ॥ लोकपालाश्च संतुष्टाः पिशाचा डाकिनीगणाः ॥ २२॥ और सूर्य आदि सबग्रह, पितरगण,लोकपालपिशाच,डाकिनी गण ये सब प्रसन्न होजाते हैं ।। २२ ॥ भूतप्रेताश्च गंधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ २३ ॥ इति श्रीनारदीयसंहितायां मिश्रकाध्याय वतुःपंचाशत्तमः ॥ ९४ ॥ भूत, प्रेत, गंधर्वगण, राक्षस, पन्नग ये भी * सब प्रसन्न होजाते । हैं ॥ । २३ ॥ इति अश्वशांतिः । इति श्रीनारदीयसंहिताभाषाटीकायां मिश्रकाध्याय चतुःपंचाशत्तमः ॥ ५४ ॥ LE: भाषाटीकास ०-अ० ५५. (२९७ ) अथ श्राद्धलक्षणाध्यायः । चतुर्दशी तिथिनैदा भद्र शुक्रवासरौ ॥ सितेज्ययोरस्तमयं वंत्रिंभं विषमांत्रिभम् ॥ १ ॥ चतुर्दशी और नंदातिथि व भद्रातिथिविषे शुक्र और मंगळ, गुरु, शुक्रक अस्त दोचर”का नक्षत्र और विषम चरणवाला नक्षत्र जैसे कृत्तिकाका १ पाद मेषमें है यह विषमांत्रि है और मृगशिर आधा वृषमें है यह दोचरणवाला है ऐसे सब जगह जानों ॥ १ ॥ शुकपत्रं च संत्यज्य पुनर्दहनमुत्तमम् ॥ वसूत्तरार्द्धतः पंच नक्षत्रेषु त्रिजन्मसु ॥ २॥ पौष्णब्रह्मज्ञेयोः पौनर्दहनं कुलनाशनम् ॥ दिनोत्तरार्द्ध तत्कर्तुधंद्रताराबलान्विते ॥ ३॥ और शुक्लपक्षको त्यागकर पुरळविधान आदिसे प्रेत दाहकरना श्रेष्ठ है और धनिष्ठाका उत्तरार्द्ध आदि पांच पंचकोंमें तथा त्रिपुष्करयोगमें और रेवती तथा रोहिणीमें पुलविधान आदि दाहकर्म कियाजाय तो कुलका नाश हो किन्तु मध्याह्न पीछे और क्रिया करनेवालेको चंद्र ताराका बछ होनेके दिन ।। २॥३॥ पापग्रहे बलयुते शुक्रलमशवर्जिते । तत्पुनर्दहनं चोक्तं श्राद्धकालमथोच्यते ॥ ४॥ तथा पापग्रह बळवंतह शुक्र चुममें नहीं हो ऐसे मुहूत्तमें दाह कर्म करना शुभ है । अब आद्धकाळको कहते हैं । ४ ।। (२९८ ) नारदसंहिता। सपिंडीकरणं कार्यं वत्सरे वाईंवत्सरे ॥ त्रिमासे वा त्रिपक्षे वा मासि वा द्वादशेद् िवा ॥ ९॥ सपिंडीकर्म वर्षदिनमें अथवा छह महीनोंमें करना तीन महीनोंमें अथवा डेढमहीनोंमें वा दाहकर्मसे बारहवें दिन सपिंडीकर्म करना शुभ है ॥ ५ ॥ । एष्वेव कालेष्वेतानि ब्रेकोद्दिष्टानि षोडश ॥ कृत्तिकासु च नंदायां भृगोर्वारे त्रिजन्मसु ॥ ६॥ इनही समयमें एकेद्दिष्ट षोडशश्राद्ध करने चाहियें और कृत्तिक नक्षत्र और नंदातिथि शुक्रवार, त्रिपुष्करयोग इन्होंमें ॥ ६ ॥ पिंडदानं न कर्तव्यं कुलक्षयकरं यतः ॥ त्रिजन्मसु त्रिपादंषु नंदायां भृगुवासरे ॥ ७ ॥ पिंडदान नहीं करना चाहिये क्योंकि पिंडदान करनेवालेके कुळका नाश होता है त्रिषुष्करयोग तीनचरणोंवाला नक्षत्र जैसे पुनर्वसु ( पादत्रयं मिथुन-तह पुनर्वसु तीनचरणोंवाला जानना ) और शुक्रबार ।। ७ ।। धातृपौष्णभयोः श्राद्धे न कर्तव्यं कुलक्षयात् ॥ नंदासु च भृगोवीरे कृत्तिकायां त्रिजन्मसु ॥ ८ ॥ रोहिण्यां च मघायां च कुर्यान्नापरपाक्षिकम् । सकृन्महालये काम्यं न्यूनश्राद्धेऽखिलेषु च ॥ ९ ॥ रोहिणी रेखती, इनचिषे श्रद्ध नहीं करना चाहिये आद्ध करनेसे कुछका नाश होताहै । और नैदातिथि शुक्रवार कृतिका भाषाटीकास०-अ० ५५.. (२९९ ) नक्षत्रत्रिपुष्करयोग, रोहिणी व मघा नक्षत्रमें सारेंडी आदि आद्ध नहीं करना चाहिये परंतु महालय आद्ध अर्थात् कनागतोंमें पार्वण आद्ध तो करदेना चाहिये अन्यसम्पूर्ण न्यूनश्राद्धोंमें । ८॥ ९॥ अतीतविषये चैव द्वैतत्सर्वं विचिंतयेत् ॥ नभस्यमासे संप्राप्ते कृष्णपक्षे समागते ॥ १० ॥ साधरण कामनावाचे आद्धोंमें यह पूर्वोक्त मुहूर्तविषय विचार लेना चाहिये भाद्रपद महीनेमें कृष्णपक्षमे ।। १० ।। । तत्र श्राद्धं प्रकुर्वीत सकृद्ध चेदशक्तिमान् । विशिश्वदिवसे कर्तुधंद्रताराबलान्विते ॥ ११ ॥ एकवार तो निर्धन पुरुषने भी श्राद्ध करना चाहिये और अन्य शुभमुहूर्तके दिन करनेवालेको चंद्रेमा तथा ताराका पूर्ण बल होय तब श्राद्ध करना चाहिये ।। ११ ॥ नंदश्च तिथयो निंद्य भूतायां शस्त्रघातिनाम् ॥ द्वितीया मध्यमा ज्ञेया तृतीया भरणीयुता ॥ १२॥ नैदातिथियोंको वर्जदेवे और चतुर्दशीके शस्त्रघातसे मरने बालोंका अद्ध करना चाहिये । द्वितीया मध्यम तिथि है और भरणीनक्षत्र युक्त तृतीया ।। १२॥ पूज्या यदि चतुर्थी वा श्रीप्रदा पितृकर्मणि । आनंदयोगः पंचम्यां याम्यद्भस्थे निशाकरे ॥ १३ ॥ अथवा चतुर्थ श्रेष्ठ है पितृकर्ममें लक्ष्मीदेनेवाली है पंच मको चंद्रमा भरणीनक्षत्रपर हो तो पितृकर्ममें आनंदयोग जानना १३ ( ३० ० ) नारदसंहिता । भोजयेद्यः पितृस्तत्र पुत्रपौत्रधनं लभेत् ॥ यशस्करी सप्तमी स्यादष्टमी भोगदायिनी ॥ १४ ॥ तहाँ जो पुरुष पितरोंको ओजन कराता है वह पुत्र पौत्र व धन- को प्राप्त होता है सप्तमी तिथि श्रद्धकर्ममें यशकरनेवाली है और अष्टमी भाभोगदेनेवी है ।। १४ ॥ श्रदकर्तुश्च नवमी सर्वकामफलप्रदा । मूर्षे कन्यागते चंद्रे रौद्रनक्षत्रगे यदा ॥ १५॥ और नवमी तिथि आद्धकरनेघालेके संपूर्ण मनोरथोंको सिदकर तीहे कन्याराशिपर सूर्य हो तब चंद्रमा आङ्नक्षत्रपर आवे उसदिन ॥ । १५ ॥ । सप्तम्यां च तथाष्टम्यां नवम्यां च तिथौ तथा । योगोऽयं पितृकल्याणः पितृन्यस्मिन्प्रपूजयेत् ॥ । १६॥ सप्तमी, अष्टमी, नवमी तिथि होय तो यह पितृकल्याणनामक योग कहा है इस योगविषे पितरोंका पूजन करना चाहिये ।। १६॥ इंइ संपदनामोति पश्चात्स्वर्गे ह्यवाप्यते ॥ दशम्यां पुष्यनक्षत्रे सुयोगोऽमृतसंज्ञकः ॥ १७ ॥ इसपूर्वोक्ते योगमें पितरोंका पूजन करनेवाला मनुष्य इस लोकमें संपत्तेि ( लक्ष्मी ) को प्राप्त होता है और परछेकमें स्वर्गको प्राप्त होताहै । दशमी तिथिको घुष्यनक्षत्र आजाय तो सुंदर अमृतसंज्ञक योग होताहै ॥ १७ ॥ आषाढीकास ०–अ० ५५. ( ३०१ ) अर्चयेद्यः पितृस्तत्र नित्यं तृप्तास्तु तस्य ते । सर्वसंपत्प्रदाःकर्नूद्दशी तिथरुत्तमा ॥ १८॥ इस योगमें जो पितरोंका पूजन करताहैं उसके पितर नित्य तृप्त रहतेहैं। और कर्ता यजमानको संपूर्ण संपत्ति देनेवाली उत्तम द्वादशी तिथि कहीहै ।।१८।। त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां हानिर्धनकलत्रयोः ॥ अनंतपुण्यफलदा गजच्छाया त्रयोदशी ॥ १९ ॥ त्रयोदशी वा चतुर्दशीको आद्ध करे तो धन नकी हानि हो परंतु गजच्छाया योगवादी त्रयोदशी अनंत पुण्यफल देनेवाली है ।। १९ ।। श्राद्धकर्मण्यमावास्या पक्षश्राद्धफलप्रदा ॥ २० ॥ आद्धकर्ममें अमावस्या तिथि पक्षका फल देती है अर्थात् १५ दिनतक शुद्ध करनेका पुण्य होता है ॥ २० ॥ पौष्णद्वये पुष्यचतुष्टये च हस्तत्रये मैत्रचतुष्टये च॥ सम्यद्ये च श्रवणत्रये च श्राद्धप्रदाता बहुपुत्रवान्स्यात्२१ इति श्रीनारदीयसंहितायां श्राद्धलक्षणाध्यायः पंचपंचाशत्तमः ॥ ३६ ॥ और रेवती, अश्विनी, पुष्प, आदि चार नक्षत्र हत आदि ३ नक्षत्र अनुराधा आदि चार नक्षत्र, और मृगशिर आदि दो नक्षत्र ( ३०२ ) नारदसंहिता । अवण आदि ३ नक्षत्र इनमें श्राद्ध करनेवाला जन बहुत पुत्रवाला होता है अर्थात् इन नक्षत्रोंके दिन श्राइकरना श्रेष्ठ है ।। २१ ।। इति श्रीनारदीयसंहितामाषाढीकायां आद्धलक्षणाध्यायः पंचपंचाशत्तमः ।। ५५ ।। इति श्रीइंद्रप्रस्थशान्तर्वातवेरीनगरनिवासिद्विजशालियामा मजबुधवसतिरामविरचितसरळानामथाषाटीकायां नारदसंहिता समाप्त ।। शुभं भूयात् । श्रीरस्तु । श्लो०–वेदबाणाङ्गभूवषं तैषशुक्ले तथा।। पूर्णिमायां कवेर्घत्रे टीकेयं पूर्णतामगात् ॥ १॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः।। पुस्तक मिलनेका ठिकाना खेमराज श्रीकृष्णदास ‘‘श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-मुंबई. क्रय्यपुस्तकें (ज्योतिष-ग्रंथ ) --- - नम - की. a = a ५ २ – सूर्यसिद्धान्त–संस्कृत गूढार्थदीपिका सहित और बलदे- बप्रसाद मिश्रक्रुत भाषाटीकासहित इसमें कालविभा गादि ग्रहगतिका कारणादि, पूर्व पश्चिमादिरेखानिर्णय स्पष्टचंद्र सूर्यादि ‘छायाज्ञान चंद्र लम्बन सूर्यग्रहण पार्लेख अह्रदर्शन नक्षत्रस्थान उदयास्त कालनिर्णय चन्द्रोदय पाताधिकार अध्यात्मविया गोलयंत्रादि कोलनिर्णयादि बहुत विषयहैं २ ) सिद्धान्तदैवज्ञविनोद-पंडित मणिरामविरचित संस्क्ते और आषाटीकासमेत इसमें मुहूर्तनिर्णय अमूर्त कायमीमांसा भूगोल खगेछवर्णन सृष्टादिअहर्गण मध्यमग्रहानयन विधिः ग्रहाणां मन्दोचतानयन भौमादीनां पातानयन ग्रहाणां क्रमेण स्फुटीकरण भौमादिकोंकेषात स्पष्ट करने- कीविधि चंद्रसूर्यग्रहणलनेकीविधि ग्रहयुद्धोदाहरण ह और नक्षत्रके योग बहउदयास्तविधि पंचांगबला नेकी विधि प्रतिवर्षे उपकरणसारिणी महके नक्षत्र और राशिचार करनेकी विधि व्यमुभुज आगाक्षर सारिणी रसजस्यजन्मपत्री पंचांग लेखनक्रम व्रतादि निर्णय आदि दरसायाहैज्योतिषीके लेनेयोग्य है । ... २) जाहिरात । ३ ४ ३ 6 p। १ = B २ की ३ 9 - ४ - ५ १ ३ ५ २ ८ २

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Q = परमसिद्धान्तज्योतिष-प्रेमचढभविरचित गणितभाग गोल ज्ञान मध्यमाधिकर जीवनयक दृष्टस्पष्ट बालप मानयन उदयास्त त्रिप्रक्षष्टगोन्नय ग्रहणाधिकर पातयेग यंत्राधिकार निवाधिकार देशज्ञानादिविषय हैं ... .२) ग्रहलाघव-सान्वयभाषाटीका-गणेशदैवज्ञकत मूळ और पंडितरामस्वरूपकत अन्वय आषाढीका और उदाहरण सहित यह ग्रंथ गणितक अपूर्वहे सर्वभारतवासी विशेष मानते हैं १U लीलावती-भास्कराचार्यकृतमूळ औरं रामस्वरूपकृत भाषा टीकासहित व्यक्तगणितमें अपूर्व है इससे सबप्रकारका गणित करसहैं छेज • १U ? तथा रफ ... ... ... ... ... १U कर्णकुतूहलम्-सटीकं उदाहरण सहितम्-बलपक्षीय गणितग्रंथ ।। सिद्धान्तशिरोमणिः( अर्थात् गोलाध्याय भाषाटीका सहित ) इस ग्रंथमें गोलाध्यायकी विवृति गोलप्रशंसा | गोलस्वरूप प्रश्न, भुवनकोश, मध्यगति वासना, स्फुट- गतिवासना, गोळबंधत्रिप्रभवासना, ग्रह्णवासन, उदयास्तदृक्कर्म, श्रृंगोनतिवासना, यंत्राध्याय, अतु वर्णन, प्रश्नविचार, ज्योत्पत्तिःऔर ज्योत्पत्ति विवरण इत्यादि इतने विषय भली प्रकारसे दिखलाये गयेहैं १J खेमराज श्रीकृष्णदास, “श्रीवेङ्कटेश्वर’ स्टीम प्रेस-चुंबई

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