पृष्ठम्:धम्मपद (पाली-संस्कृतम्-हिन्दी).djvu/१३२

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१९५७ ॥ धम्मङवगो [ १२१ (स्पृशामि नैष्कर्म्युसुखें अपृथग्जनसेवितम् । भिक्षा । विश्वालं मा पादी अप्राप्त आस्ववक्षयम् ।१ ) अनुवाद--केवळ श्रीछ और तसे, यहुश्रुत होने ( मात्र से, या ( केवल ) समाधिलाभसे, या एकान्तमें लायन करने, पृथग्वन (=अझ ) जिसे नहीं सेवन कर सञ्जते, यस नैष्कर्ये (=निर्वाण )सुबक मैं अनुभव नहीं कर रहा हैं; हे भिक्षुओं ! जब तक आस्रवों (विखमलो )का क्षय व हो जाये, अब हाक खुप न बैठे रहो। १६-धर्मस्थवर्ग समाप्त