पृष्ठम्:धम्मपद (पाली-संस्कृतम्-हिन्दी).djvu/५७

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४६] धम्मपदं [ ©l° ( विषय-) भोगको चममकर दिया जो भर , बही इस पुरुष है। जतवन (खदिरखनी ) वत (वर) ६८-गामे वा यद्रि वीरंख्ने निन्ने वा यदि वा थले । यत्याग्रहतो विहरन्ति तं भूमिं रामणेय्यकं ॥६॥ (प्रमेवा यदि वाऽरण्येनिभ्ने वा यदि वा स्थले । यत्राद्दन्तो विहरन्ति सा भूमी रमणीया ॥ ९ ॥ अनुवाद-वमें या अंगझमें, निम्न या ( ऊँचे ) स्थछमें बाँ ( क ) अहंद ( लोग ) विहार करते हैं, वही रसणीय सूत्रि है। आरण्यक भिश्च ४६-मणीयानि अरण्यानि यत्य न रमते बनो। वीतरागा रमिस्सन्ति न ते कामगबेसिनो ॥१०॥ (मणीयन्यारण्यानि यत्र न रमते जनः। वीतरागा स्यन्ते न ते कामगवेषिणः ॥ १० ॥ अनुवाद--( वह ) रमणीय थन, जहाँ (साधारण ) जन मण नहीं करते, कामभागों)के पीछे म भटकनेवाले वीतराग (वर्दी) रमण करें। ७-अर्हबर्ग समाप्त