पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः भागः २.djvu/३६३

एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति

३४६ यदि भुज>ज्या ४५ तब कोणशङ्कू का मान ऋणात्मक होता है, इसलिये भुज=ज्या ४५ स्वीकार कर यदि अग्रा का मान लाते हैं तो उससे अल्प अग्रा में उत्तरगोल में भास्करोक्त प्रकार का व्यभिचार होता है, यथा भास्करोक्ति । से vत्रि-२ अ*=कोएशङ्कं, इससे शङ्कुतलः सूत्र२म' इससे भुज-मा A/ त्रि' -२9-अ=ज्या४५' चेदगम आदि से, पभ/fत्र -२अ =१२.ज्या ४५+प्र-१२=१२ ( अ+ज्या४५ ) वर्ग करने से पभाई. त्रि –-प्रभा-२४ '= १४४ (म'+२स्रग्ज्य४५+ज्य ४५ ) दोनों पक्षों को दो से भाग देने से २ २ पभा, १-प्रभा'अ' = ७२फ़्' +१२'अ-ज्या४५+७२•ज्या ४५=पभ .य'४५ -प्रभ-भ समशोधन करने से पभाज्य४५-७२ ज्या°४५=पभा'.*' + १२२.प्र.ज्या४५+७२ अ तुल्यगुणका को अलग करने से ज्या*४५ (पक्ष '-७२)=ओ' (पभा'+७२)+१२म-ज्या ४५ ज्य४५ (पभा' -७२) १२२-अ-ज्या४५ =अ + वर्ग पार करने से एभा'७२ "' ७२ पभा+

५१ + ='

ज्या ’५(पभा’-७२ )+(७२.ज्या ४५ ) =+१२.सच्या४५,( 7७२ज्या४५६ः पभा'+७२ ' प'+७२ पभr+७२ प्रथम पक्ष में समन्वेदादि करने से ज्या५नपभा”=-म' + २•७२प्र-ज्य४५ (पभा’+७२) पभा'+७२ ज्या ५४पम=9+ +(७२-)'. +c)लेने से प्रभा' + ७२ ७२-ज्या४५ पभा'+७२ _ ख्या४४ -या४५ प्र= पभा'~- ~७२__ज्या४५ (पभा'-७२) - " इससे युग्मारुषोना प्रभा' +७२ पो'+७२ प्रभा'+७२ शभावनॅनिष्” इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित म. म. पण्डितसुधाकरद्विवेदी का सूत्र पन्न हुआ । दक्षिसगोत्र में व्यभिचार सिद्धान्तशिरोमष्टि की टिप्पणी में 'पद श्रवास्तबिीन' इत्यादि से संशोधन किया जया है । खि बेत हि श्व में घर कोख होते हैं उसके बिने विचार करते हैं