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प्रथमोऽध्यायः

सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पृथिव्याश्चाप्यशेषतः । प्रमाणं योजनाग्रेण । सांप्रतैरभिमानिभिः ||६१
महेन्द्राद्यः सभाः पुण्या मानसोत्तरमूर्धनि । अत ऊध्र्वे गतिश्चोका स्वर्गस्यालातचक्रवत् ॥२
नागवीथ्यजवीथ्योश्च लक्षणं परिकीर्यते । काष्ठयोर्लखयोश्चैव मण्डलानां च योजनैः ।।६३
लोकालोकस्य संध्याया अहो विषुवतस्तथा । लोकपालाः स्थिताश्चोर्च कीर्यन्ते ये चतुर्दिशम् ।
पितृण देवतानां च पन्थानौ दक्षिणोत्तरौ । गृहिणां न्यासिनां चोक्तौ रजःसत्वसमाश्रयात् n५
कीर्यते च पदं विष्णोर्धारींद्या यत्र धिष्ठिताः । सूर्याचन्द्रमसोश्वारो ग्रहाणां ज्योतिषां तथा ।४६
कीर्यते ध्रुवसामथ्र्योत्प्रजानां च शुभाशुभम् । ब्रह्मणा निर्मितः सौरः स्यन्दनोऽर्थचशात्स्वयम् । ६७
कीर्यते भगवान्येन प्रसर्पति दिवि स्वयम् । स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्दूषिभिस्तथा ।।६८
(* गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः । अपां सारमयश्चेन्दोः कीर्यते च रथस्तथा) &&
वृद्धिक्षयौ च सोमस्य कीत्यैते सूर्यकारितौ । सूर्यादीनां स्यन्दनानां ध्रुवादेव प्रकीर्तनम् ।।१००
कीर्यते शिशुमारश्च यस्य पुच्छे ध्रुचः स्थितः। तारारूपाणि सर्वाणि नक्षत्राणि ग्रहैः सह ।१०१
निवासा यत्र कीर्यन्ते देवानां पुण्यकारिणाम् । सूर्यरश्मिसहस्र च वर्यशीतोष्णनिःस्रवः॥१०२


चन्द्रमा एवं पृथ्वी का भी मानयोजन आदि में एतत्कलीन मनप्रमाण के साथ दिया है। मानस के उत्तर शिखर पर महेन्द्र आदि की पुण्य सभाएँ तथा उसके पश्चात् आलातचक्र की भाँति स्वर्ग की गति बताई गई है।९१-९२। नागवीथी तथा अजवीथी का लक्षण बता कर योजनों में मंडलों की काष्ठ और लेखाओं का मान बताया है ।e३। लोकालोक, सन्ध्या, दिन और विषुवत् का भी वर्णन है एवं पुनः चारों दिशाओं में लोकपालों के रहने की बात है |९४पितरों और देवताओं के दक्षिण और उत्तर मार्गरजोगुण और सत्त्वगुण के आश्रय से गृहस्यों तथा संन्यासियों के कर्म बताये गये हैं । वि6ण का ख़म जहाँ धर्म आदि रहते हैं एवं सूर्य और चन्द्रमा तथा ग्रह और नक्षत्रों की चाल बताई गई है । ध्रुव के सामथ्र्यों से प्रजाओं का शुभ अशुभ तया प्रयोजन वश ब्रह्मा के बनाये हुए सूर्य के रथ का वर्णन है ।९५-९७॥ जिस रथ से स्वयं भगवान् आकाश में चलते और जिस पर देवता, ऋषि, गन्धर्व, अप्सराओं, ग्रामणी, साँप और राक्षस आदि सवार रहते है उसका वर्णन है । और गधर्व अप्सरागण तथा ग्रामणी साँप और राक्षसों के साथ जल के सार रूप चन्द्रमा के रथ का वर्णन किया गया है ।e८-६८। सूर्य के कारण चन्द्रमा की वृद्धि और क्षय का होना तथा ध्रुव के साथ सूर्य आदि के रथों फा वर्णन है ।१००। फिर उस शिशुमार का वर्णन है जिसकी पूंछ में ध्रुव की स्थिति है, फिर ग्रहों के साथ तारा रूप समस्त नक्षत्रों का वर्णन है १०१। सूर्य की सहस्रों किरणों से वर्षा, शीत तथा धूप का झरना एवं उनमें पुण्यामा देवों के निवास स्थान बताए गये हैं ।१०२। नाम, कमैं तथा अर्थी के आश्रय से किरणों का


धनुश्चिह्नान्तर्गतग्रन्थः ख . घ. पुस्तकयोर्नास्ति । फा०-८२