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वायुपुराणम्

आयुरारोग्यमत्युग्रं तस्मिन्स नरसत्तमः । सान्त्वयित्वा च राजानं ततो ब्रह्मविदां वराः ।२५
सत्रमारेभिरे कतु यथावद्धर्मभूतये । बभूव सत्रं तप्तेषां यहूश्चर्यं महात्मनाम् ।।२६
विश्वं सिसृक्षमाणानां पुरा विश्वसृजमिच। वैखानसैः प्रियसबैचलखिल्यैर्मचिकैः ।२७
अन्यैश्च सुनमैजुष्टं सूर्यवैश्वानरप्रमैः । पेतुर्देवप्सरःसद्धगन्धवोरगचरणंः ॥२८
संभारैस्तु शुभैर्जुष्टं तैरेवेन्द्रसदो यथा । स्तोत्रसत्रग्रहैर्देवान्पितृभिपत्र्यैश्च कर्मभिः ॥२€
आनर्चश्च यथाजाति गन्धर्वान्यथाविधि । आराधयितुमिच्छन्तस्ततः कर्मान्तरेष्वथ ॥३
जगुः सामानि गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणः । व्याजहुर्मुनयो वाचं चित्राकारपदां शुभाम् ॥३१
मन्त्रदितस्वविद्वांसो जगद्वश्च परस्परम् । वितण्डावचनाश्चैके निजघ्नुः प्रतिवादिनः ॥३२
ऋषयस्तत्र विद्वांसः सांख्यार्थन्यायकोविदः । न तत्र दुरितं किचिद्विदधुर्बह्मराक्षसाः ॥३३
न च यज्ञहनो दैत्या न च यज्ञमुषोऽसुराः । प्रायश्चित्तं दुरिष्टं वा न तत्र समजायत ॥३४
शकिप्रचाक्रियायोगैर्विधिरासीत्स्वनुष्ठितः। एवं वितेनिरे सत्रं द्वादशाब्दं मनीषिणः ।। ३५
भृग्वाद्या ऋषयो धीरा ज्योतिष्टोमान्पृथक्पृथक् । चक्रिरे पृष्ठगमनान्सर्वानयुतदढिणन ॥३६
समाप्तयज्ञास्ते सर्वे वयमेव महाधिपम् । पप्रच्छुरमितात्मानं भवद्भिर्यदहं द्विजाः ॥३२७
प्रणोदितश्च वंशार्थं स च तानब्रवीत्प्रभुः । शिष्युः स्वयंभुवो देवः सर्वप्रत्यक्षदृग्वशी ।३८


स्वास्थ्य बहुत उत्तम था । वह स्वयं बड़ा ही सज्जन था । उस राजा को प्रसन्न कर ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ उन मुनियों ने धर्म की वृद्धि के लिये विधिवत् सश्र को प्रारम्भ किया । उन महात्माओं का वह यज्ञ बड़ा ही आश्चर्यजनक हुआ ।२३-२६ पूर्वकाल में विश्व की सृष्टि की इच्छा से विश्वस्रष्टाओं की भाँति उस यज्ञ मे वैखानस, प्रिय मित्र बालखिल्य, मरीचि तथा अन्य सूर्य और अग्नि जैसी कान्ति वाले मुनिगण एवं पितर, देवता, अप्सराएँ, गन्धर्व, नाग तथा चारणगण वहाँ उपस्थित हुए। उस यज्ञ में इन्द्रपुरी की भाँति उत्तमोत्तम सामग्रियाँ भरी थीं एवं स्तोत्र, सत्र तथा ग्रहों से देवताओं की, पिय कर्मी से पितरों की एवं जाति के अनुसार गन्धर्व आदि की पूजा उन आराधना के प्रेमी ऋषियों ने की ।२७३० ॥ उस यज्ञ में गन्ववं साम गान करते थे, अप्सराएँ नृत्य करतो थी तथा मुनिगण चित्र विचित्र अक्षरों और पदो वाली वाणी का उच्चारण कर रहे थे । मन्त्र आदि तत्त्वों के विद्वान् आपस में वार्तालाप करते तथा कुछ वितण्डा से हो अपने प्रतिवादियों को परास्त कर रहे थे। वहाँ पर सांख्य तथा न्याय-शास्त्र के विद्वान् ऋषिगण एकत्र थे । ब्रह्मराक्षसों ने किसी प्रकार का उपद्रव वहाँ नही किया ।३१-३३। यज्ञघातक दैत्य या यज्ञचोर असुर नहीं पहुंचे और न वहाँ कोई प्रायश्चित या दुर्ज्ञ ही हुआ । शक्ति, बुद्धि और क्रिया के योग से सारी विघि उत्तम रीति से हुई । इस प्रकार मनीषियों ने वहाँ नरहं वर्ष पर्यन्त यज्ञ किया । भृगु आदि धीर ऋषियों ने वह पृथकृपृथक् ज्योतिष्टोम किए एवं पर्याप्त दक्षिणा देकर सब को बिदा किया ।३४-३६ ‘ब्राह्मणो ! यज्ञ के समाप्त होने पर सब ने महाराज शक्ति शाली वायु से वही बात पूछे जो बात आप लोगों ने हमसे आज पूछी है । वंश वर्णन के लिए प्रेरणा पाकर उस प्रभु ने उन ऋषियों से सब