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वैशेषिक दर्शन प्रथम अध्याय, प्रथमआह्निक सैसगति-शास्त्रारम्भ की प्रतिज्ञा अथातो धर्म व्याख्यास्यामः ॥१॥ अर्थ-अव, यहां से, हम धर्म का व्याख्यान करेंगे । व्याख्यान-‘अथ’ आरम्भ का द्योतक होता है, जैसा कि ‘इति' समाप्ति का, इसलिए ग्रन्थारम्भ में 'अथ? देते हैं। ‘अतः’ यहाँ से। इस से आगे, अर्थात् अगले ग्रन्थ में। यद्यपि , इस शास्त्र में निरूपण तो वाहुल्य से पदार्थो का ही है, तथापि पदार्थो का तत्त्वज्ञान धर्म से ही उत्पन्न होता है, (देखों सूत्र ४) इस लिए धर्म की ही प्रधानता से, उसी के निरूपण की प्रतिज्ञा की है ? सङ्गति-धर्म कहते किसको है, और उससे फल क्या मिलता है? यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः । २ । अर्थ-जिस से यथार्थ उन्नति और परम कल्याण की सिद्धि होती है, वह घर्म है ।

  • अभ्युदय=तत्त्वज्ञान, उस के द्वारा मोक्ष की सिद्धि जिस से

होती है, वह धर्म है (उद्यनाचार्य)