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अ. १ आ. १ सू. ३

अ०१ आ०१ सू० ३ ॥ .' 'व्या०-आत्मवल यथार्थ उन्नाति है, और मोक्ष परम कल्याण है, धर्म के ये दोनों फल होते हैं, धर्म से आत्मबल वढ़ता है । आत्मबल से लोक परलोक दोनों सुखदायी बन जाते हैं। आत्म चल के साथ सम्पदाएं भार्गी चली आती हैं, और यदि कोई विपद् भी आ जाती है, तो आत्मवल उस को भी सम्पद ही वनालता है, क्योंकि आत्मबल वाला विपद्में भी सम्पद के समान इी सन्तुष्टरहता है,प्रत्युत विपद् उमके आत्मवल को और बढ़ादेती है। अतएव आत्मवल ही मनुष्य की यथार्थ उन्नति है। और यही परलोक में साथ जाकर उच्च जन्म और स्वर्ग का हेतु इोताहै। और फिर यह धर्म ही है, जो हृदय को शुद्ध बनाता है, जिससे आत्म का तत्त्वज्ञान हो कर मोक्ष मिलता है।

इस प्रकार धर्म अभ्युदय का तो साक्षात् कारण है, और मोक्ष का तत्त्वज्ञान द्वारा कारण है ।

सङ्गति-ऐसे धर्म का प्रतिपादक शास्त्र और उस की प्रमाणता ' ' तद्वचनादास्रायस्य प्रमण्यम् ॥ ३॥

अर्थ- उस के प्रतिपादन से वेद की प्रमाणता (है) *:


'ततू'शब्दपूर्व कापरामर्शक होता है, पर प्रसिद्ध (=प्रसिद्धि सिद्ध) अपूर्वोक्त का भी परामर्शक होता है, जैसे ‘तदप्रामाण्यमनृत व्याघात पुनरुक्तदोपम्यः' (न्या) में “तत' शब्द पूर्व न कहे भी वेद का परामर्शक है। इसी प्रकार यहां 'तत्' शब्द अपूर्वोक्त भी ईश्वर का परामर्शक है। तब अर्थ यह होगा-उस जगत्प्रसिद्ध ईश्वर ने प्रतिपादन किया है, इस लिए वेद का प्रामाण्य है । सो ईश्वर का वचन होने से वेद का प्रामाण्य निर्याध सिद्ध होते हुए वेदप्रमा ... णक धर्म व्याख्यान के योग्य है, यह भाव है (उदनाचार्य, और कई अन्य व्याख्याकार)