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'वैशेषिक-दर्शन ।

वैशेषिक दर्शन ।

संस-चौथा अत्यन्ताभाव बतलाते है

यच्चान्यदसदतस्तदसत् ॥ ५ ॥

और जो इस से ( पूर्वोक्त तीनों प्रकार के अभाव से ) भिन्न अभाव है, (जैसे मनुष्य के सींग नहीं है) एक यह अभाव है (जो अत्यन्ताभाव कहलाता है)

स-चारों अभावों का निरूपण करके ध्वैस के प्रत्यक्ष का निरूपण

असदिति भूतप्रत्यक्षाभावाद् भूतस्मृतेर्विरो धिप्रत्यक्षवत् ॥ ६ ॥

  • नहीं है? यह प्रत्यक्ष, हो चुके हुए के प्रत्यक्ष न होने से

और हो चुके हुए की स्मृति से विरोधि के प्रत्यक्ष की नाई होता है।

च्या-जिस का अभाव है, वह उस का प्रतियोगी वा विरोधी कहलाता है, जैसे घटाभाव का प्रतियोगी वा विरोधि घट है । जब घट विद्यमान है, तो 'यह घड़ा है? ऐसा प्रत्यक्ष होता है। अव जब घड़ा असत् हो गया है, तो ‘अव घड़ा नहीं है ? इस प्रकार उस के अभाव का प्रत्यक्ष'भी ठीक वैसा ही होता है, जैसे उस के विरोधी का (घट का ) होता था । इस ध्चैम के प्रत्यक्ष का कारण यह है, कि भूत घट का अव प्रत्यक्ष नहीं है, और स्मृति उस की वनी है, कि था। यदि वह होता, तो प्रत्यक्ष होता, नहीं रहा है, इस लिए प्रत्यक्ष नहीं होता है, ऐसे ज्ञानं की महायता. से घट के नाशं का वैसा ही'मंत्यक्ष होता है, जैसे घट का । ।