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'वैशेषिक-दर्शन ।

दशम अध्याय-द्वितीय आह्निक ।

सगति-अव प्रसंग से तीनों कारणों की विवचना करते है

कारणमिति द्रव्ये कार्यसमवायात् ॥ १ ॥

कारण यह द्रव्य मे भतीति होती है, कार्य के समवाय से व्या-कार्य रूप द्रव्य. गुण और कर्म तीनों समवायसम्बन्धसे द्रव्य में रहते हैं। वस्त्र कार्य रूप द्रव्य है, वह तन्तुओं में सम वेत है, तन्तु द्रव्यं , हैं। तन्तुओं के गुण और कर्म तन्तुओं के कार्य हैं, वे भी तन्तुओं में समवत है ।

संयोगाद् वां-॥ २

अथवा सयांग सें ॥

व्या-जिस संयोग से द्रव्य की उत्पत्ति होती है ( जैसे तन्तु संपोग से वस्त्र की उत्पत्ति है ) वह संयोग भी द्रव्य के आश्रय रहता है, इस लिए द्रव्य समवायिकारण है ।

कारण समवायात् कर्माणि ॥ ३ ॥

कारण में समवाय से कर्म ( कारण हैं) ।

व्या-द्रव्य कारण कहा है, उसमें सम्वत होने से कर्मसंयोग विभाग और वेग के असमवायि कारण होते हैं। तोप से छूटेहुए गोले का किले की दीवार सेजो संयोगहुआ यह संयोग गोले का हुआ है, इस लिए गोला कारण है । गोले के कर्म से हुआ है, इस लिए कर्म कारण है । गोला द्रव्य है, वह समवायि कारण है, कर्मइसं समवायि कारण मे समवाय से रहता है, इसलिए वह