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अ. १ आ. १ सू. ३

परीक्ष्य कहते हैं, और जव परीक्षा में पूरा उतर जाय, तो उस को परीक्षित कहते हैं। उद्देशा.के क्रम में शिक्षा का सरल मार्ग अवलम्वन किया जाता है, आगे लक्षण का क्रम उद्देशा के क्रम से होता है, और परीक्षा का क्रम लक्षण के क्रम से होता है। कभी २ शिक्षा की सरलता के लिए आगा पीछा भी कर दिया जाता है।

यहां पदार्थो के उद्देशक्रम में सब से पहले द्रव्य इसलिए कहे, कि वे ही मुख्य धर्म हैं। उन से पीछे गुण, क्योंकि गुण । सव द्रव्यों में पाए जाते हैं। उन से पीछे कर्म, क्योंकि कर्म भी द्रव्यों में ही रहते हैं।पीछे उन में समान विशष प्रतीति के निया मक सामान्य विशष । पीछे समवाय, अथ धर्म धर्म का सम्वन्धं, क्योंकि यह सव का धर्म है ।

‘पदार्थ’ यह यौगिकनाम है,'पदस्य अर्थः,पदार्थः,'पद का अर्थ पदार्थ, अर्थात् जिस का कोई नाम है, सो 'अभिधेयत्व । किसी पदका वाच्य होना यही पदार्थका सामान्यलक्षण हुआ। सङ्कति-उद्देश क्रम के अनुसार क्रमशः द्रव्य गुण कर्म का विभाग * कहते हैं - ।

पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ॥ ५ ॥


  • विभाग भी उद्देश ही है। क्योंकि विभाग' में भी नाम ही

गिनाए जाते हैं। पहले पदार्थो का उद्देश था, अब ये पदार्थों में आएदेव्य का विशेष उद्देश है। इसी प्रकार आगे गुण कर्मका ।