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अ. १ आ. १ सू. ८

ननु कार्याभावात् कारणाभावः ॥२॥

पर कार्य के अभाव से कारण का अभाव नहीं होता।

ध्पा०-जो दृष्टि आदि का कदाचैिव होना है, यह विना कारण के नीं घट सकता, अन्यथा सदा ही होती रहती, अथवा सदैव न होती, न कि कदाचित होती। इसरे सिद्ध है, कि कादाचित्क वस्तुएँ का होती हैं, और कार्य किसी कारण मेtी होता है, इसलिए इस विश्व में कार्यकारणभाव है ।

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१--कार्य विना कारण के नहीं होता। उदाहरण-मेघ न डो, तो दृष्टि.कभी नहीं होगी, वीज न हो, तो अंकुर कभी नहीं होगा । ।

२-कार्ण विना:कार्य-के-भी होता है-उदाहरण-मेप वेिन वरसे भी होता है. बीज विन-अंकुर भी होता है ।

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३--हरएक 'कार्य अपेनी कारणसामग्री से होता है, अकळे कारण से नहीं । उदाहरण-वस्र; तन्तु, ताने वाने के रूप में तन्तुओं केःसंयोगं, जुलाहे और तुरी आदि से होता है। इन में से अकेली -तन्तुएं एा अकेला जुलाहा वा अकेली तुरी वस्त्रको उत्पन्न नहीं कर सकते। सारे मिल कर ही करते हैं, अतएव सव

--४-कारणसामग्री के मिलने पर कार्य अवश्यमेव' होता है । उदाहरण-तन्तुएं जुलाहा, तुरी आदि और तन्तुओं का तान चाने के रूप में मेल, इस कारणसामग्री के जुटने पर हो