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अ. १ आ. १ सू. ८

क्योंकि संज्ञा कर्म प्रत्यक्ष से भदृत्त होता है ।

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व्या-यद्द'नियम नहीं है, की संज्ञा कर्म प्राप्त से ही प्रकृत्त होता हो, तथापि जिस को. प्रत्यक्षसदृशा निश्चयात्मक अनुभव होता है, वहीं संज्ञा करने में मदृश होता है। अतएव इस विलक्षण स्पर्श वाळे द्रव्य का वायु यह विशेष नाम, जो उसके मुख्य धर्म का भातिपादक है, यह हम से व का चिन्ह है ।

इन दोनों सूत्रों को शैकरमिश्र और जयनारायण ने ईश्वरसिद्धि पर कलगाया है, पर ‘अस्म द्विशिष्टानां’ इस बहुवचन के स्वारस्य से मुनिका अभिप्रेत अर्थ यहीं निश्चित मतीत होता है। --

संगति-अब क्रमप्राप्त आकाश का प्रकरण आरम्भ करते दुए जाकाश की सिद्धि में पहले एक देशिमत दिखलाते हैं

निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाश स्य लिंगम्॥२०॥

, • निकळना और प्रवेशा करना यह आकाशा कां लिङ्ग (है) व्या-विना अवकाशा के किसी द्रव्य का निकलना और प्रवेवा.करना नहीं बनसकता, इस से सिद्ध है, कि निकलने और प्रवेश करन में अवकाशा देने वाला द्रव्य कोई अंवश्य है, वहीं भाकावा है ।

संगति-इस एकदोशिमतं में त्रुटि दिखलाते है |

तंद लिंगमेकद्रव्यत्वात् कर्मणः ॥२१॥

वह अलिङ्ग है, क्योंकि कर्म एकके आश्रय होता है । .. व्या-निष्क्रमण और भवेन आकाशा काळिङ्ग वन नहीं सकता । क्योंकि निष्क्रमण और प्रवेशान को कार्य मान, कार्य . • ४७ •