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अ. १ आ. १ सू. ८

अ०२ अा०१ ०२६ ४९ कारण गुणपूर्वकः कार्यगुणो दृष्टः ॥२४॥

कारणगुणपूर्वक कार्य गुण देखा गया है।

व्या-कार्य का जो विशेषगुण होता है। वह कारणगुणपूर्वक होता है। जैसा रूप तन्तुओं का होता है, तत्सजातीय ही रूप वस्त्र का होता हैं ।

कार्यान्तराप्रादुर्भावात् शब्दः स्पर्शवतामं गुणः ॥ २५ ॥

कार्यान्तर के प्रकट न होने से शब्द स्पर्श घाठों का गुण नहीं है।

व्या-स्पर्श वाले चार द्रव्य जौ पृथिवी, जल, तैज, वायु हैं। शाब्द यदि इन में से किसी का गुण होता, तो जैसें मृदङ्ग आदि में उत्पन्न होने वाले रूपादे के सजातीय रूपादे उन के अवयवों में अनुभव होते हैं, वैसे पदङ्ग आदि में उत्पन्न होने वाले शब्द के सजातीय शाब्द भी उनके अवयवों में अनुभव होता, पर ऐसा होता नहीं, किन्तु निःशब्द अवयवों से ही मृदङ्ग आदि की उत्पत्ति होती है। इस से सिद्ध है, कि शाब्द मृदङ्ग भाद का गुण ही नहीं।

दूसरा-पर्श वालों के विशेष गुण, जब तक वस्तु बनी रहे, तव तक, उस में प्रकट रहते हैं, पर शाब्द सदा नहीं बना रहता। इस से भी सिद्ध है, कि शब्द इन का गुण नहीं, किसी ' आभार का हाँ हैं । परत्र समवायात् प्रत्यक्षत्वाच नात्मगुणो न मनोगुणः ॥२६॥