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'वैशेषिक-दर्शन ।

वैशेषिक दर्शन ।

कारण में ज्ञान का अभाव होने से-।

व्या-शरीर कार्य है, अतएव उस में जो विशेष गुण हैं, चे कारणगुणपूर्वक (२ । १ । २४) ही हो सकते हैं, पर शारीर के कारण जो सूक्ष्मभृत हैं, ज्ञान उन में नहीं पाया जाता रुरूपादि पाये जाते हैं । सो रूपादे तो कारणगुणपूर्वक होने से शरीर के निज धर्म हैं। और ज्ञान वस्त्र में पुष्प गन्ध की नाई किसी अन्य का ध प्रतीत होता है ।

सैगति-(प्रश्न) शरीर के कारणों में सूक्ष्म ज्ञान मानकर शरीर में उसी का स्फुट होना मान लें, तो क्या हानि है? इस आशंका का उत्तर देते है

कार्येषु ज्ञानात् ॥ ५॥

'कायों में ज्ञान से ।

व्या-यदि शरीर के कारणों में सूक्ष्म ज्ञान हो, तो उन के सारे कार्यों में ज्ञान होना चाहिये, फिर यह नहीं हो सकता, कि शरीर में तो ज्ञान हो, और घट आदि में न हो ।

संगति-(प्रश्र) घट आदि में भी सूक्ष्म ज्ञान मान लें, तो क्या हानि है? इस का उत्तर देते है

अज्ञानाच ॥ ६ ॥

अनुपलब्धि सें ।

व्या-घटादि में किसी भी प्रमाण से ज्ञान की उपलब्धि नहीं होती, इस लिए उनमें ज्ञान मानना अयुक्त है । गति-तौ भी ज्ञान ज्ञानर्धारा का साधक हो सकता है- जिस का कि वह स्वरूप है, आत्मा जो कि ज्ञान से भिन्न वस्तु है, उस का साधक कैसे हो, इस आशंका का उत्तर देते हैं