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अ. १ आ. १ सू. ८

प्रवृत्ति और िनवृत्ति अपने आत्मा में देखे हुए दूसरे में लिङ्ग हैं।

व्या-हम जिस वस्तु को अपने अनुकूल जानत हैं, उस की ओर प्रवृत्त होते हैं, जैसे सेव की ओर मवृत्त होते हैं। और जिस को प्रतिकूल देखते हैं, उस से निवृत्त होते हैं, जैसे सर्पसे निवृत्त होते हैं। इसी तरह दूसरे भी अपने अनुकूल में प्रवृत्त और प्रतिकूल से निवृत्त होते हैं, यहां तक कि कीड़ी भी मीठे की ओर जाती है, और आग से हट आती है। ठीक हमारी तरह ही उन में भी अनुकूल और प्रतिकूल में ही प्रवृत्ति निवृत्ति, उन में ज्ञान को सिद्ध करती है, और उस ज्ञान का आश्रय उन में भी आत्मा सिद्ध होता है।

तृतीय अध्याय, द्वितीय आह्निक ।

सै-आत्मपरीक्षा को पूरा करने के लिए आत्मा के साधक और भी बहुत से हेतु देने हैं, उन में'मन की गति'भी हेतुत्वेन कहनी है, पर जब मन ही सिद्ध नहीं है, तो मन की गति कैसे हेतु बन सके, इस लिए उद्देशक्रम को उलांघ कर मध्य में ही मन की परीक्षा आरम्भ करते हैं

आत्मन्द्रियार्थसन्निकर्षेज्ञानस्यभावोऽभावश्च मनसो लिंगम् ॥ १ ॥

आत्मा इन्द्रिय और अर्थ के सम्बन्ध होते हुए ज्ञान का होना और न होना मन का लिङ्ग हैं।

व्या-आंत्मा का इन्द्रियों के साथ और इन्द्रियों का अपने १ विषयों के साथ सम्बन्ध होने पर भी सारे ज्ञान इकडे नहीं उत्पन्न होते, एक के पीछे दूसरा होता है, यह अनुभवसिद्ध है । रसानुभव के समय गन्धानुभव नहीं होता; दोनों का अनु-'