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'वैशेषिक-दर्शन ।


भव एक होता, तो वह अनुभव शुद्धरसानुभव औरशुद्धगन्धानुभव सेविलक्षण ही कोई अनुभव होता, पर ऐसा कभी नहीं होता । इस स निश्चित है, कि एक अनुभव के हो चुकने पर ही दृसरा अनुभव हाता हैं । एक अनुभव का विपय ता अनक हात हैं जैसे बहुत से शब्दइकट्टे ने जाते हैं, वहुत से रूपइकडेदेखेजाते हैं, पर अनुभव दो इकट्ट नहीं होते, रसानुभव के अन्दर गन्धा नुभव नहीं घुसता, न गन्धानुभव रसानुभव के अन्दर घुसता है। रसानुभव अलग अपने क्षण में, और गन्धानुभव अपने क्षण में होता है ।

प्रश्न-लंबी पपड़ी के खाने में एक ही काल में रसना से उस का रस, त्वचा से स्पर्श, कानों से मुरक २ शाब्द, नेत्रों से रूप और घ्राण से गन्ध अनुभव होता है। इस प्रकार पांचों अनुभव इकट्टे होते हैं, फिर यह कैसे कह सकते हो, कि अनेक अनुभव एक साथ नहीं होतें ?

उत्तर-यहां भी जव रस आदि के अनुभव अलग २ हो रहे है, तो यह निश्चत है, कि वे हो भी अलग २ रहे हैं, एक साथ नहीं हो रहे । किन्तु अतीव सूक्ष्म काल का.भेद होने से भेद प्रतीत नही होता । जैसे पान के सौ पत्तों की तह जमा कर एक सूआ क्षुभो दें, तो ऐसा प्रतीत होगा,कि मारे पत्ते एक काळ में विध गए हैं, पर वस्तुतः एक के विध जाने के पीछे. ही दूसरा विधा है, और सवां निनावें विध जाने के पीछे विधा है, तौ भी एक काल में ही विधे प्रतीत होते हैं, क्योंकि अतीव सूक्ष्म काळ निनावे-वार भी इतना अत्यल्प वीता है, कि ध्यान में भी नहीं आता । इसी प्रकार,वहाँ भी अतींव सूक्ष्म काल में