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अ. १ आ. १ सू. ८

सूप रहितों में वाक्षुष नहीं होते हैं।

एतेन गुणत्वेभावे च सर्वेन्द्रियं ज्ञानं व्याख्या तम् ॥ १३ ॥

इस से गुणत्व और सत्ता--सर्वेन्द्रिय ज्ञान व्याख्या किया गया है ।

व्या-जिस इन्द्रिय से जो व्यक्ति जानी जाती है, उसी से उस की जातिभी जानी जाती है। सो रूप, रस, गन्ध, स्पर्श रहने चाली गुणत्व जाति और सत्ताजांति भी मवेन्द्रिय ग्राह्य है।

चतुर्थ अध्याय-द्वितीय आह्निक ।

संगति-कारण द्रव्य की परीक्षा की गई, अब कार्य द्रव्यं की परीक्षा करते है- .

तत्पुनः-कार्यद्रव्यं त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञ

वह (पृथिवी अंदि) कार्य द्रव्य तीन प्रकार का है, शरीर इन्द्रियऔर विषय नाम वांला (मनुष्य आदि शरीर हैं, नेत्र आदि इन्द्रिय हैं; इन दोनों से भिन्न हरऐक वस्तु विषय'कह लांती है। विषय सव'भेॉग्य हैं, इन्द्रिय'भोगं का साधन हैं, और शारीर वह हैं, जिस में वैठा हुआ आत्मा भोगता है) । । ।

सं५सधकार्यद्रव्य-को क्यामेिलकर पांचोंभूत' आरम्भं करते हैं; वा’अलगं २? इस की विवेचना करते हैं

प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाणां संयोगस्या प्रत्यक्षत्वात् पञ्चां त्मकं न विद्यते ॥ २ ॥ ।