पृष्ठम्:शिवस्तोत्रावली (उत्पलदेवस्य).djvu/२३३

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भाव = ( भक्त के ) भावरूपी उपायन- = उपहार को ग्रहण करने के लिए अयस्तोत्रनाम चतुर्दशं स्तोत्रम् भक्त- भक्तों के वाक् - = वच नृत्त = और नृत्य से ( अर्थात् गाते, बजाते और नाचते हुए उन से की गई अपनी स्तुतियों से) = लम्पट = लालायित बने रहने वाले ( भक्तवत्सल ) ! जय = आप की जय हो । • भक्ति की भक्ति- = मद- मस्ती से उद्दाम = मतवाले (अर्थात् मस्त ) बने हुए जय भक्तिरसेन आर्द्रार्द्रः - सरसो गलितो यो भावः - आशयः, स एवो- पायनं - ढोकनिका, तत्र लम्पट - झंटित्यात्मसात्कारिन् । भक्तिमदेनो- द्दामा – ऊंजिता ये भक्ताः, तदीयेन वाङ्नुत्तेन - स्फूर्जतूस्तुतिमाला- भिस्तोषित ॥ १० ॥ - प्रभव = उत्पन्न व्यय = ब्रह्मा = ब्रह्मा, आदि = विष्णु श्रादि - देवेश = देवदेवों ( अर्थात् बड़े देवताओं ) के प्रभाव = प्रभाव ( अर्थात् जगत् की सृष्टि आदि करने की शक्ति ) को जयलोकेश्वरश्रेणीशिरोविधृतशासन ब्रह्मादिदेवेशप्रभावप्रभवव्यय । - तोषित = प्रसन्न होने वाले ( नृत्य - प्रिय ) ! जय = आप की जय हो ॥ १० ॥ और नष्ट करने वाले, ( देवाधिदेव ) ! जय = आप की जय हो ॥ ११ ॥ लोकेश्वर = ( इन्द्र श्रादि दस ) लं कपालों की श्रेणी- जय ॥ ११ ॥ = पंक्ति से ( अर्थात् सब = लोकपालों से ) शिर:- - = (अपने ) सिरों पर विधृत = धारण की जाती है शासन = श्रज्ञा जिस की, ऐसे ( परमेश्वर ) | = आप की जय हो ॥ ११ ॥ १ ख० पु० मटित्यात्मसाक्षात्कारिन् – इति पाठः । २ घ० पु० गर्जिताः - इति पाठः ।