पृष्ठम्:श्रीपाञ्चरात्ररक्षा.djvu/२६१

पुटमेतत् सुपुष्टितम्

==== प्रमाणवचनादीनां वर्णानुक्रमणिका ====196 आराधनविधिः कीदृक् ४६. पा. सं. (च.) 1-2 इज्यामेवाभिसन्दध्यात् १३८. इत ऊर्ध्वनहं तावत् ५३, ९१. . 33 आराधयन् हरिं भक्त्या ५३, ९१. वं. 36 इति ततुल्यनृपति ५. सं. सि. 20

इति निर्विद्य तदनु ९०. वं. 29

आराधयेयं ध्यायेयं ९२. ना. मु इति मत्वा विरक्तस्य ६४. श्री. भा.11-119-18 आराधितुमथेच्छेन्मां १२०. व. पु. 45 आरोपितं प्रदीपं ये १२०. व. पु 45 इति विज्ञाप्य तान् पश्चात् १५७. वं.495 आरोहन्त्वनवद्य १. पा. र. इति विज्ञाप्य पुरतः १५८. वं. 500 आर्जयित्वार्चनद्रयं १२७. वं. 89 इति संप्रार्थ्य तत्सिद्धयै ९४. वं. 40 आलोड्य सर्वशास्त्राणि ७२, १६८. म. भा. (आनु.) 186-11 इतिहासपुराणाभ्यां वेदं ६७, १४७. व्या

स्मृ. २. (अन्तिम श्लोक) म. भा. (आदि.) 1-293

आवर्तयेद्वा प्रणवं ६३. व्या. स्मृ. 2-22 आवां तवाङ्गसंभूतौ ९७. ह. वं 8-47 इतिहासपुराणाभ्यां षष्ठं ७४, १४७. द. स्मृ.2-57 आविद्यः प्राकृतः प्रोक्तः ७५ इत्येतत् कथितं सर्वं ४९. ज. सं.22-80 आविद्येन न केनापि ७५. इत्येतदखिलेनोक्तं ६८. व्या. स्मृ.2(अन्ते) इत्येष कथितो ब्रह्मन् १६५. पा. सं. (च)13-78 आसनारोहणं चैव १२३. आसित्वा सुचिरं तस्य १५६. वं. 481 इदमेकं सुनिष्पन्नं ७२. म. भा. (आनु.)186-11 आसीनयोस्तथा देव्योः १५६. वं. 488 आसीनेषु यथाभागं १५६. वं. 488 इदं गुरुभ्यः सर्वेभ्यः १५३. वं. 458 आस्थानस्थः सदा १५२. बो. पु इदं महोपनिषदं २. म. भा. (शा.)348-63 आहारो यस्त्वनाहारः १४३. व. पु. आहारं चैव कर्मण्यं १४३. व. पु. इदं श्रीकरसंज्ञाख्यं ३१ आहृत्य याच्ञया १३०. पा. सं. (च.) 13-33

ईदृशः परमात्मायं ५९, १५८. शा. स्मृ, 4-219, 5-17

इज्या च पश्चात् स्वाध्यायः ५०. पा सं. (च.) 13-3 ईश्वरो भगवान् विष्णुः १४१. क्र.

ईश्वरो विक्रमी धन्वी ६१. वि. स.