पृष्ठम्:श्रीपाञ्चरात्ररक्षा.djvu/२६२

पुटमेतत् सुपुष्टितम्

प्रमाणवचनादीनां वर्णानुक्रमणिका १९७ ईषदोष्ठपुटौ लग्नौ ८४ मा म 6-200 उपचारानिमान् कुर्वन् १७४ अ ब्र (ना ) 2-39 उपचारापदेशेन १५५ वं 477

उग्रगन्धास्त्वकर्मण्यां १२८ मा स 21-26 उपपत्तिमवस्था च ९९ बो स्मृ

उपपातकयुक्तोऽपि १६२ उच्चाच्छतगुणा ज्ञेय १०८ बा अ उपवीत कर्णदेशे ९८ पा स (च)13-10 उच्चैर्जपादुपाशु स्यात् १०९ ॐ ब्र (ना) उच्चैर्भाषा वृथाजल्प १२२ उपस्थाय स्वकैर्मन्त्रैः ११२ व 78 उच्छिष्ठ चैव चाशौचे १२२ उपस्थाय स्वशास्त्रोक्तै १११ पा स (च)13-27 उत्तमानुपदशाश्व १२८ ना मु उत्तमे शिखरे १०९, तै उ 29 उपादद्यात्तथा पूजा १२९ पा स्म (च)13-31 उत्तिष्ठश्चिन्तय हरि ८८ वि ध 1-60 उत्तीर्य भगवत्प्राप्ति ५३ भ नि उपाशु स्याच्छतगुण १०९ अ व्र (ना ) उत्थानादिक्रमादेतत् ५०, १२६ पा स (च) 13-4 उपाशोर्मानस प्रोक्त १०८ बो अ

उपायता परित्यज्य ८० गी स 31 उत्थाय च ततो योगात् १५४ व 469 उपेतो मङ्गलैरन्यै १२६ पा स (च)13-20 उत्थाय तत्र शयने ५४, ८९ ना मु उत्थाय शयने तस्मिन् ९० व 3 उपेयादीश्वर चापि ६२ व्या स्मृ 2-8 उत्थायासीत शयने ५० पा स (च) 13-6 उपोषित पोषितो वा १७४ वि ध 4-33 उत्पत्त्यसभवात् २ शा मी 2-2-39 उभाभ्यां तोयमादाय १०६ पि उत्सवे वासुदेवस्य १२२ व पु अ 45 उभे सन्ध्येऽधितिष्ठामि १०७ म भा (आश्व) 98-68 उदकेनाप्यलाभे तु १७४ उदयास्तमयं यावत् ६९ द स्मृ 2-2 उभे सन्ध्ये भगवानभिगन्तव्य १५०, र आ उदानाय तत कुर्यात् ६६ व्या स्मृ 2-75 उरसा शिरसा वाचा, ११५ उष काले तु संप्राप्ते ७० द स्मृ 2-6 उदीची प्रागुदीची वा ९९ पि उद्यतामपि गृह्णीयात् १३४ शा स्मृ 3-18

ऊरुमध्यप्रदेशे तु ८४ सा स 6-200 उपचारशतेनापि १२३

ऊहापोहविधानेन २० का