पृष्ठम्:श्रीपाञ्चरात्ररक्षा.djvu/२९३

एतत् पृष्ठम् परिष्कृतम् अस्ति

228 प्रमाणवचनादीना वर्णानुक्रमणिका समावाय बहिर्देव १६४, सा म 6-192 संहरिष्यसि चाप्यन्ते १५७ व 496 समाधायात्मनात्मान ८४ सा स 6-204 स यश्चाय पुरुषे १०९ तै उ समाधायात्मनात्मान तत्र ८५ सा स 8-5 6-213 स याति गृहपालाना ११८ व पु 45 समाधौ योगमेवैक १५९ म भा स याति नरक घोरं ११९ व पु 45 समानशीलै सहवास ७४ फ़ स याति नरकान् धोरान् काक ६८ व्या माराधयतस्त्वेवं १७६, अहेि 28-81 स्मृ 2 समासीत शयानश्च ८७ सा स 6-215 स याति नरकान् घोरान् ११९ व पु 45 सभि.पुष्पकुशादीना ७१ द 2-32 सर्प दृष्टा यथा काय १७५ समिदाज्यादिभिर्दव्यै १२४ च 84 सर्वतन्त्रप्रतितृन्त्राभ्युपगम ११ न्या वि समीपे मन्दिरस्यापि १२० व पु अ 45 सर्वत्र पौरुषे वाक्ये ४३ पार स समुत्याय ततस्तस्मै १५६ व 482 10-330 समुत्यायार्धरात्रेऽथ ८२ सा सं 6-193, सर्वभूतदया पुष्प 179

 ई 6-85                       सर्वमावेद्य तेनैव १५८ व 501

स मूत्रगर्तनरके ११९ व पु 45 सर्वस्य प्रभवा यस्मात् १०८, १४८ सम्यगाचमनाशक्तौ ८३ बो स्मृ सकोच्यापानदेशात्तु ८४ सा सं 6-202 सर्व सप्रणवो जप्य १०८ अ ब्र सपीड्य तीरे तद्वस्र ११३ ना मु सर्वातिशायि षाड्गुण्य १६३ वि स सप्रदानं तु तन्नाम ४९ ज स 22-79 सर्वानुश्रवसारदर्शि १ पा र सप्रबुद्ध प्रभाते तु ९५ पार स 2-5 सर्वान्नानुमतिश्च १४२ शा मी 3-4-28 संप्रोक्ष्य मन्त्राचमनं ११२ ना मु सर्वे च्यवनधर्माण १३९ म भा (शा ) संभाषणादि पूजा तु १०८, १४८ बो स्मृ 350-35 सविभाग तत कृत्वा ७३ द 2-56 सर्वे भवन्त सगणा १५७ व 492 सवृता परिवारेण ७ पौ 38-301 सर्वेषणाविनिर्मुक्त १४० बार्ह सवृता परिवारै स्वै ११ पा स (च) सर्वेषामेव धर्माणा ४९, १७३ व्या स्मृ 19-121 सर्वेषामेव पुष्पाणा ४९ म भा (आश्व) संशोद्धय च करौ जघे ९८ पा स (च) 104-73 13-15 सर्वेषामेव योगाना ६८ व्या स्मृ 2-79 सस्थितस्रीणि जन्मानेि ११९ व पु सर्वेषामेव सामान्य १०० पार स 2-55 अ, 45 सर्वेषा च तत कर्म १४३. व. पु