फलकम्:Ramayana

१८० ॥
कामरूप जानहिं सब माया ।
सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया ॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा ।
देखि अमित आपन परिवारा ॥
सुत समूह जन परिजन नाती ।
गे को पार निसाचर जाती ॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी ।
बोला बचन क्रोध मद सानी ॥
सुनहु सकल रजनीचर जूथा ।
हमरे बैरी बिबुध बरूथा ॥
ते सनमुख नहिं करही लराई ।
देखि सबल रिपु जाहिं पराई ॥
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई ।
कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई ॥
द्विजभोजन मख होम सराधा ॥
सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा ॥
दो॰ छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ ।
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ ॥
१८१ ॥
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा ।
दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा ॥
जे सुर समर धीर बलवाना ।
जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना ॥
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी ।
उठि सुत पितु अनुसासन काँधी ॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही ।
आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही ॥
चलत दसानन डोलति अवनी ।
गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी ॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा ।
देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा ॥
दिगपालन्ह के लोक सुहाए ।
सूने सकल दसानन पाए ॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी ।
देइ देवतन्ह गारि पचारी ॥
रन मद मत्त फिरइ जग धावा ।
प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा ॥
रबि ससि पवन बरुन धनधारी ।
अगिनि काल जम सब अधिकारी ॥
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा ।
हठि सबही के पंथहिं लागा ॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी ।
दसमुख बसबर्ती नर नारी ॥
आयसु करहिं सकल भयभीता ।
नवहिं आइ नित चरन बिनीता ॥
दो॰ भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र ।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र ॥
१८२(ख) ॥
देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि ।
जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि ॥
१८२ख ॥
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ ।
सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ ॥
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा ।
तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा ॥
देखत भीमरूप सब पापी ।
निसिचर निकर देव परितापी ॥
करहि उपद्रव असुर निकाया ।
नाना रूप धरहिं करि माया ॥
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला ।
सो सब करहिं बेद प्रतिकूला ॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं ।
नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं ॥
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई ।
देव बिप्र गुरू मान न कोई ॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना ।
सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना ॥
छं॰ जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा ।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना ।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना ॥
सो॰ बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं ।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति ॥
१८३ ॥
मासपारायण, छठा विश्राम बाढ़े खल बहु चोर जुआरा ।
जे लंपट परधन परदारा ॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा ।
साधुन्ह सन करवावहिं सेवा ॥
जिन्ह के यह आचरन भवानी ।
ते जानेहु निसिचर सब प्रानी ॥
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी ।
परम सभीत धरा अकुलानी ॥
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही ।
जस मोहि गरुअ एक परद्रोही ॥
सकल धर्म देखइ बिपरीता ।
कहि न सकइ रावन भय भीता ॥
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी ।
गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी ॥
निज संताप सुनाएसि रोई ।
काहू तें कछु काज न होई ॥
छं॰ सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका ।
सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका ॥
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई ।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई ॥
सो॰ धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु ।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति ॥
१८४ ॥
बैठे सुर सब करहिं बिचारा ।
कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा ॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई ।
कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई ॥
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति ।
प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती ॥
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ ।
अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ ॥
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना ।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं ।
कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥
अग जगमय सब रहित बिरागी ।
प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥
मोर बचन सब के मन माना ।
साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥
दो॰ सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर ।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर ॥
१८५ ॥
छं॰ जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता ।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता ॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई ।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा ।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा ।
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा ।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा ॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा ।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा ॥
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना ।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना ॥
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा ।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा ॥
दो॰ जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह ।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह ॥
१८६ ॥
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा ।
तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा ॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा ।
लेहउँ दिनकर बंस उदारा ॥
कस्यप अदिति महातप कीन्हा ।
तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा ॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा ।
कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा ॥
तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई ।
रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई ॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ ।
परम सक्ति समेत अवतरिहउँ ॥
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई ।
निर्भय होहु देव समुदाई ॥
गगन ब्रह्मबानी सुनी काना ।
तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना ॥
तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा ।
अभय भई भरोस जियँ आवा ॥
दो॰ निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ ।
बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ ॥
१८७ ॥
गए देव सब निज निज धामा ।
भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा  ।
जो कछु आयसु
ब्रह्माँ दीन्हा ।
हरषे देव बिलंब न कीन्हा ॥
बनचर देह धरि छिति माहीं ।
अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं ॥
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा ।
हरि मारग चितवहिं मतिधीरा ॥
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी ।
रहे निज निज अनीक रचि रूरी ॥
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा ।
अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा ॥
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ ।
बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी ।
हृदयँ भगति मति सारँगपानी ॥
दो॰ कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत ।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत ॥
१८८ ॥
एक बार भूपति मन माहीं ।
भै गलानि मोरें सुत नाहीं ॥
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला ।
चरन लागि करि बिनय बिसाला ॥
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ ।
कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी ।
त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी ॥
सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा ।
पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें ।
प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें ॥
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा ।
सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा ॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई ।
जथा जोग जेहि भाग बनाई ॥
दो॰ तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ ॥
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ ॥
१८९ ॥
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं ।
कौसल्यादि तहाँ चलि आई ॥
अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा ।
उभय भाग आधे कर कीन्हा ॥
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ ।
रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ ॥
कौसल्या कैकेई हाथ धरि ।
दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि ॥
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी ।
भईं हृदयँ हरषित सुख भारी ॥
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए ।
सकल लोक सुख संपति छाए ॥
मंदिर महँ सब राजहिं रानी ।
सोभा सील तेज की खानीं ॥
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ ।
जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ ॥
दो॰ जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल ।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल ॥
"https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=बालकाण्ड_११&oldid=1112" इत्यस्माद् पुनः प्राप्तिः