फलकम्:Ramayana

दो॰ प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग ।
दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ॥ १०(क) ॥
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥ १०(ख) ॥
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी ।
अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ॥
नृप किरीट तरुनी तनु पाई ।
लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं ।
उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई ।
सुमिरत सारद आवति धाई ॥
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ ।
सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ॥
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी ।
गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना ।
सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥
हृदय सिंधु मति सीप समाना ।
स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥
जौं बरषइ बर बारि बिचारू ।
होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥

दो॰ जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग ।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥ ११ ॥
जे जनमे कलिकाल कराला ।
करतब बायस बेष मराला ॥
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े ।
कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें ॥
बंचक भगत कहाइ राम के ।
किंकर कंचन कोह काम के ॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी ।
धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ ।
बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥
ताते मैं अति अलप बखाने ।
थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी ।
कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका ।
मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ ।
मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा ।
कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं ।
कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥
समुझत अमित राम प्रभुताई ।
करत कथा मन अति कदराई ॥

दो॰ सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान ।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ॥ १२ ॥
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई ।
तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥
तहाँ बेद अस कारन राखा ।
भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा ॥
एक अनीह अरूप अनामा ।
अज सच्चिदानंद पर धामा ॥
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना ।
तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ॥
सो केवल भगतन हित लागी ।
परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू ।
जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥
गई बहोर गरीब नेवाजू ।
सरल सबल साहिब रघुराजू ॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी ।
करहि पुनीत सुफल निज बानी ॥
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा ।
कहिहउँ नाइ राम पद माथा ॥
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई ।
तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ॥

दो॰ अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं ।
चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥ १३ ॥
एहि प्रकार बल मनहि देखाई ।
करिहउँ रघुपति कथा सुहाई ॥
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना ।
जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ॥
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे ।
पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे ॥
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा ।
जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ॥
जे प्राकृत कबि परम सयाने ।
भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने ॥
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें ।
प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें ॥
होहु प्रसन्न देहु बरदानू ।
साधु समाज भनिति सनमानू ॥
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं ।
सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ॥
कीरति भनिति भूति भलि सोई ।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा ।
असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥
तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे ।
सिअनि सुहावनि टाट पटोरे ॥

दो॰ सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान ।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान ॥ १४(क) ॥
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर ।
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर ॥ १४(ख) ॥
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल ।
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल ॥ १४(ग) ॥
सो॰ बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित ॥ १४(घ) ॥
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस ।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु ॥ १४(ङ) ॥
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी ॥ १४(च) ॥
दो॰ बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि ।
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि ॥ १४(छ) ॥
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता ।
जुगल पुनीत मनोहर चरिता ॥
मज्जन पान पाप हर एका ।
कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥
गुर पितु मातु महेस भवानी ।
प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ॥
सेवक स्वामि सखा सिय पी के ।
हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके ॥
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा ।
साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥
अनमिल आखर अरथ न जापू ।
प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥
सो उमेस मोहि पर अनुकूला ।
करिहिं कथा मुद मंगल मूला ॥
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ ।
बरनउँ रामचरित चित चाऊ ॥
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती ।
ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥
जे एहि कथहि सनेह समेता ।
कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥
होइहहिं राम चरन अनुरागी ।
कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥

दो॰ सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ॥ १५ ॥
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि ।
सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ॥
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी ।
ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी ॥
सिय निंदक अघ ओघ नसाए ।
लोक बिसोक बनाइ बसाए ॥
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची ।
कीरति जासु सकल जग माची ॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू ।
बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ॥
दसरथ राउ सहित सब रानी ।
सुकृत सुमंगल मूरति मानी ॥
करउँ प्रनाम करम मन बानी ।
करहु कृपा सुत सेवक जानी ॥
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता ।
महिमा अवधि राम पितु माता ॥

सो॰ बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद ।
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ ॥ १६ ॥
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू ।
जाहि राम पद गूढ़ सनेहू ॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई ।
राम बिलोकत प्रगटेउ सोई ॥
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना ।
जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ॥
राम चरन पंकज मन जासू ।
लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥
बंदउँ लछिमन पद जलजाता ।
सीतल सुभग भगत सुख दाता ॥
रघुपति कीरति बिमल पताका ।
दंड समान भयउ जस जाका ॥
सेष सहस्त्रसीस जग कारन ।
जो अवतरेउ भूमि भय टारन ॥
सदा सो सानुकूल रह मो पर ।
कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर ॥
रिपुसूदन पद कमल नमामी ।
सूर सुसील भरत अनुगामी ॥
महावीर बिनवउँ हनुमाना ।
राम जासु जस आप बखाना ॥

सो॰ प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन ।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ॥ १७ ॥
कपिपति रीछ निसाचर राजा ।
अंगदादि जे कीस समाजा ॥
बंदउँ सब के चरन सुहाए ।
अधम सरीर राम जिन्ह पाए ॥
रघुपति चरन उपासक जेते ।
खग मृग सुर नर असुर समेते ॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे ।
जे बिनु काम राम के चेरे ॥
सुक सनकादि भगत मुनि नारद ।
जे मुनिबर बिग्यान बिसारद ॥
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा ।
करहु कृपा जन जानि मुनीसा ॥
जनकसुता जग जननि जानकी ।
अतिसय प्रिय करुना निधान की ॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ ।
जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ ॥
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक ।
चरन कमल बंदउँ सब लायक ॥
राजिवनयन धरें धनु सायक ।
भगत बिपति भंजन सुख दायक ॥

दो॰ गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न ।
बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥ १८ ॥
बंदउँ नाम राम रघुवर को ।
हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो ।
अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥
महामंत्र जोइ जपत महेसू ।
कासीं मुकुति हेतु उपदेसू ॥
महिमा जासु जान गनराउ ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥
जान आदिकबि नाम प्रतापू ।
भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी ।
जपि जेई पिय संग भवानी ॥
हरषे हेतु हेरि हर ही को ।
किय भूषन तिय भूषन ती को ॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको ।
कालकूट फलु दीन्ह अमी को ॥

दो॰ बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥ १९ ॥
आखर मधुर मनोहर दोऊ ।
बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ॥
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू ।
लोक लाहु परलोक निबाहू ॥
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके ।
राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती ।
ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती ॥
नर नारायन सरिस सुभ्राता ।
जग पालक बिसेषि जन त्राता ॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन ।
जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन .
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के ।
कमठ सेष सम धर बसुधा के ॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से ।
जीह जसोमति हरि हलधर से ॥
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