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अध्यायः १
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, जालस्थलीय-संस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः १

जनयत्यै त्वेत्यस्यर्षिः पूर्वोक्तः। प्रथतामितिपर्य्यन्तस्य यज्ञो देवता। स्वराट्त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः। अन्त्यस्याग्निसवितारौ देवते। गायत्री छन्दः। षड्जः स्वरः॥

स यज्ञः कस्मै प्रयोजनाय संपादनीय इत्युपदिश्यते॥

उक्त यज्ञ किस प्रयोजन के लिये करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है॥


जन॑यत्यै त्वा॒ संयौ॑मी॒दम॒ग्नेरि॒दम॒ग्नीषोम॑योरि॒षे त्वा॑ घ॒र्मो᳖ऽसि वि॒श्वायु॑रु॒रुप्र॑थाऽउ॒रु प्र॑थस्वो॒रु ते॑ य॒ज्ञप॑तिः प्रथताम॒ग्निष्टे॒ त्वचं॒ मा हि॑ꣳसीद् दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता श्र॑पयतु॒ वर्षि॒ष्ठेऽधि॒ नाके॑॥ २२॥

पदपाठः— जन॑यत्यै। त्वा॒। सम्। यौ॒मि॒। इ॒दम्। अ॒ग्नेः। इ॒दम्। अ॒ग्नीषोम॑योः। इ॒षे। त्वा॒। घ॒र्मः। अ॒सि॒। वि॒श्वायु॒रिति॑ वि॒श्वऽआ॑युः। उ॒रुप्र॑था॒ इत्यु॒रुऽप्र॑थाः। उ॒रु। प्र॒थ॒स्व॒। उ॒रु। ते॒। य॒ज्ञप॑ति॒रिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिः। प्र॒थ॒ता॒म्। अ॒ग्निः। ते॒। त्वच॑म्। मा। हि॒ꣳसी॒त्। दे॒वः। त्वा॒। स॒वि॒ता। श्र॒प॒य॒तु॒। वर्षि॑ष्ठे। अधि॑। नाके॑॥२२॥

पदार्थः— (जनयत्यै) सर्वसुखोत्पादिकायै राज्यलक्ष्म्यै (त्वा) तं त्रिविधं यज्ञम् (सम्) सम्यक् (यौमि) मिश्रयामि। अग्नौ प्रक्षिप्य वियोजयामि वा (इदम्) संस्कृतं हविः (अग्नेः) अग्नेर्मध्ये (इदम्) यद्धुतं तत् (अग्नीषोमयोः) अग्निश्च सोमश्च तयोर्मध्ये (इषे) अन्नाद्याय (त्वा) तं वृष्टिशुद्धिहेतुम् (घर्मः) यज्ञः। घर्म इति यज्ञनामसु पठितम्। (निघं॰३।१७) (असि) भवति। अत्र व्यत्ययः (विश्वायुः) विश्वं पूर्णमायुर्यस्मात् सः (उरुप्रथाः) बहु प्रथः सुखस्य विस्तारो यस्मात् सः। उर्विति बहुनामसु पठितम्। (निघं॰३।१) (उरु प्रथस्व) बहु विस्तारय (उरु) बहु (ते) तुभ्यम् (यज्ञपतिः) यज्ञस्य स्वामी पालकः (प्रथताम्) विस्तारयतु (अग्निः) भौतिको यज्ञसम्बन्धी शरीरस्थो वा (ते) तव तस्य वा। युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्तः पादम्। (अष्टा॰८।३।१०३) अनेन मूर्द्धन्यादेशः (त्वचम्) कञ्चिदपि शरीरायवं सुखहेतुम् (मा) निषेधार्थे (हिंसीत्) हिनस्तु। अत्र लोडर्थे लुङ् (देवः) सर्वप्रकाशकः परमेश्वरः सूर्य्यलोको वा (त्वा) त्वां तं वा (सविता) अन्तःप्रेरको वृष्टिहेतुर्वा (श्रपयतु) श्रपयति पाचयति। अत्र लडर्थे लोट् (वर्षिष्ठे) अतिशयेन वृद्धो वर्षिष्ठस्तस्मिन् विशाले सुखस्वरूपे (अधि) अधीत्युपरिभावमैश्वर्य्यं वा प्राह। (निरु॰१।३) (नाके) अकं दुःखं न विद्यते यस्मिन्नसौ नाकस्तस्मिन्॥ अयं मन्त्रः (शत॰१।१।२।३-१४) व्याख्यातः॥२२॥

अन्वयः— हे मनुष्या! यथाऽहं जनयत्यै यं यज्ञं संयौमि तथैव स भवद्भिरपि संयूयताम्। अस्माभिर्यदिदं संस्कृतं हविरग्नेर्मध्ये प्रक्षिप्यते, तदिदं विस्तीर्णं भूत्वाऽग्नीषोमयोर्मध्ये स्थित्वेषे भवति। यो विश्वायुरुरुप्रथा घर्मो यज्ञोऽ(स्य) स्ति यथाऽयं मया उरु प्रथ्यते तथैव प्रतिजनं त्वं [त्वा] तमेतमुरु प्रथस्व। एवं कृतवते ते तुभ्यमयं यज्ञपतिरग्निः सविता देवो जगदीश्वरश्चोरु सुखं प्रथताम्। ते तव त्वचं मा हिंसीत् नैव हिनस्ति। स खलु त्वां वर्षिष्ठेऽधिनाके [त्वां तं श्रपयतु] सुखयुक्तं करोतु॥ इत्येकः॥

हे मनुष्य! यथाऽहं मनुष्यो यो विश्वायुरुरुप्रथा घर्मो यज्ञोस्यस्ति, त्वा तं जनयत्या इषे संयौमि तत्सिध्यर्थमिदमग्नेर्मध्ये इदमग्नीषोमयोर्मध्ये संस्कृतं हविः संवपामि प्रक्षिपामि तथा त्वमप्येतमुरुप्रथस्व बहु विस्तारय यतोऽयमग्निस्ते तव त्वचं मा हिंसीत् न हिंस्यात्। यथा च देवः सविता वर्षिष्ठेऽधिनाके यं यज्ञं श्रपयेत्।  तथा भवानपि त्वा तं संयौतु श्रपयतु। ते तव यज्ञपतिश्च तमुरु प्रथतामिति द्वितीयः॥२२॥

भावार्थः— अत्र लुप्तोपमालङ्कारो वेद्यः। मनुष्यैरेवंभूतो यज्ञः सदैव कार्य्यः, यः पूर्णां श्रियं सकलमायुरन्नादिपदार्थान् रोगनाशं सर्वाणि सुखानि च प्रथयति। स केनापि कदाचिन्नैव त्याज्यः। कुतः? नैवैतेन वायुवृष्टिजलौषधिशुद्धिकारकेण विना कस्यापि प्राणिनः सम्यक् सुखानि सिध्यन्तीत्यतः। एवं स जगदीश्वरः सर्वान् प्रत्याज्ञापयति॥२२॥

पदार्थः— हे मनुष्यो! जैसे मैं (जनयत्यै) सर्व सुख उत्पन्न करने वाली राज्यलक्ष्मी के लिये (त्वा) उस यज्ञ को (संयौमि) अग्नि के बीच में पदार्थों को छोड़कर युक्त करता हूँ, वैसे ही तुम लोगों को भी अग्नि के संयोग से सिद्ध करना चाहिये। जो हम लोगों का (इदम्) यह संस्कार किया हुआ हवि (अग्नेः) अग्नि के बीच में छोड़ा जाता है, (इदम्) वह विस्तार को प्राप्त होकर (अग्नीषोमयोः) अग्नि और सोम के बीच पहुंच कर (इषे) अन्न आदि पदार्थों के उत्पन्न करने के लिये होता है और जो (विश्वायुः) पूर्ण आयु और (उरुप्रथाः) बहुत सुख का देने वाला (घर्मः) यज्ञ (असि) है, उसका जैसे मैं अनेक प्रकार विस्तार करता हूँ, वैसे (त्वा) उसको हे पुरुषो! तुम भी (उरु प्रथस्व) विस्तृत करो। इस प्रकार विस्तार करने वाले (ते) तुम्हारे लिये (यज्ञपतिः) यज्ञ का स्वामी (अग्निः) यज्ञ सम्बन्धी अग्नि (सविता) अन्तर्यामी (देवः) जगदीश्वर (उरु प्रथताम्) अनेक प्रकार सुख को बढ़ावे [(ते त्वचम्) तुम्हारे शरीर को] (मा हिंसीत्) कभी नष्ट न करे तथा वह परमेश्वर (वर्षिष्ठे) अतिशय करके वृद्धि को प्राप्त हुआ (अधिनाके) जो अत्युत्तम सुख है, उसमें (त्वा) तुम को (श्रपयतु) सुख से युक्त करे॥ यह इस मन्त्र का प्रथम अर्थ हुआ॥

अब दूसरा कहते हैं॥ हे मनुष्यो! जैसे मैं जो (विश्वायुः) पूर्ण आयु तथा (उरुप्रथाः) बहुत सुख का देने वाला (घर्मः) यज्ञ (असि) है, (त्वा) उस यज्ञ को (जनयत्यै) राज्यलक्ष्मी तथा (इषे) अन्न आदि पदार्थों के उत्पन्न करने के लिये (संयौमि) संयुक्त करता हूँ तथा उसकी सिद्धि के लिये (इदम्) यह (अग्नेः) अग्नि के बीच में और (इदम्) यह (अग्नीषोमयोः) अग्नि और सोम के बीच में संस्कार किया हुआ हवि [संवपामि] छोड़ता हूँ, वैसे तुम भी उस यज्ञ को (उरु प्रथस्व) विस्तार को प्राप्त करो, जिस कारण यह (अग्निः) भौतिक अग्नि (ते) तुम्हारे (त्वचम्) शरीर को (मा हिंसीत्) रोगों से नष्ट न करे और जैसे (देवः) जगदीश्वर (सविता) अन्तर्यामी (वर्षिष्ठे) अतिशय करके वृद्धि को प्राप्त हुआ, जो (अधिनाके) अत्युत्तम सुख है, उस में (त्वा) उस यज्ञ को अग्नि के बीच में परिपक्व करता है, वैसे तुम भी उस यज्ञ को (श्रपयतु) परिपक्व करो और (ते) तुम्हारे (यज्ञपतिः) यज्ञ का स्वामी भी उस यज्ञ को (उरु प्रथताम्) विस्तारयुक्त करे॥ २२॥

भावार्थः— इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार जानना चाहिये। मनुष्यों को इस प्रकार का यज्ञ करना चाहिये कि जिससे पूर्ण लक्ष्मी, सकल आयु, अन्न आदि पदार्थ, रोगनाश और सब सुखों का विस्तार हो, उसको कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि उसके बिना वायु और वृष्टि जल तथा ओषधियों की शुद्धि नहीं हो सकती और शुद्धि के बिना किसी प्राणी को अच्छी प्रकार सुख नहीं हो सकता, इसलिए ईश्वर ने उक्त यज्ञ करने की आज्ञा सब मनुष्यों को दी है॥२२॥