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एकादश परिच्छेद
अन्य शुभ-कर्मेर सहित नामके तुल्य-ज्ञान
धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्व-
शुभ-क्रिया-साम्यं अपि प्रमादः ।
जय जय गौरचन्द्र नाम अवतार ।
जय जय हरिनाम सर्व-तत्त्व-सार ।। ११.१ ।।

नामेर उपायत्व सत्त्वेओ उपेयत्व
कृष्ण-नाम हय प्रभु पूर्णानन्द तत्त्व ।
उपेय वा सिद्धि बलि याहार महत्त्व ।। ११.२६ ।।

उपाय ह-इया आविर्भूत धरातले ।
उपेय उपाय ऐक्य सर्व शास्त्रे बले ।। ११.२७ ।।

अधिकार-भेदे यिनि उपाय स्वरूप ।
तिनि-इ उपेय अन्ये बड अपरूप ।। ११.२८ ।।

शुभ-कर्म गौणोपाय नाम मुख्योपाय
अतएव उपाय द्विविध गुण धाम ।
गौणोपाय शुभ कर्म मुख्योपाय नाम ।। ११.२९ ।।

नामेर अतीन्द्रियत्व
अतएव शास्त्रे यत अन्य शुभ कर्म ।
नाम सह नहे एइ सर्व शास्त्र मर्म ।। ११.३० ।।

सरल हृदये यबे कृष्ण-नाम गाय ।
अतीन्द्रिय-सुख आसि चित्तके नाचाय ।। ११.३१ ।।

सेइ सुख कृष्ण-नाम-स्वभाव तत्पर ।
आत्म-रति आत्म-क्रीडा नाहि यार पर ।। ११.३२ ।।

सायुज्य कैवल्य सुख आनन्द सुखेर छाया मात्र
ब्रह्म ज्ञाने योगे ये आनन्द वैभव ।
जडेर विच्छेद सुख छाया अनुभव ।। ११.३३ ।।

अभेद्य कैवल्य सुख स्वल्प बलिऽ जानि ।
कृष्ण-नामानन्द-सुख भूमा बलिऽ मानि ।। ११.३४ ।।

अन्य शुभ कर्म ह-इते नामेर वैलक्षण्य
साधन-कालेते नाम उपाय स्वरूप ।
सिद्धि-काले उपेय से एइ अपरूप ।। ११.३५ ।।

उपाय स्वरूप नामे उपेयत्व सिद्ध ।
अन्य शुभ कर्मे ऐछे नहे त प्रसिद्ध ।। ११.३६ ।।

अन्य शुभ कर्म यत सब जडाश्रित ।
नाम त चिन्मय सदा स्वतः सिद्धोदित ।। ११.३७ ।।

साधन कालेओ नाम शुद्ध सुनिर्मल ।
साधकेर अनर्थेते देखाय स-मल ।। ११.३८ ।।

साधु-सङ्गे नाम लैते जड-बुद्धि याय ।
अनर्थ निःशेष हैले शुद्ध नाम भाय ।। ११.३९ ।।

अन्य शुभ कर्मी करे त्यजिया उपाय ।
उपेय परम भाव चरमे आश्रय ।। ११.४० ।।

किन्तु नामाश्रयी जन नाम नाहि त्यजे ।
नामेर शुद्धता मात्र सिद्धि-काले भजे ।। ११.४१ ।।

अन्य शुभ कर्म हैते अति विलक्षण ।
नामेर स्वरूप हय अपूर्व लक्षण ।। ११.४२ ।।

साधन दशाय एइ विलक्षण ज्ञान ।
गुरु कृपा हैते हय वेदेर प्रमाण ।। ११.४३ ।।

साधन दशाय यिनि एइ ज्ञान हीन ।
नाम अपराधी तिंह अति अर्वाचीन ।। ११.४४ ।।

नाम सर्वोपरि नाम-तुल्य किछु नय ।
ए दृढ विश्वास करि येइ नाम लय ।। ११.४५ ।।

अचिरे ताङ्हाते हय शुद्ध-नामोदय ।
पूर्णानन्द नाम-रस करेन आश्रय ।। ११.४६ ।।

एइ अपराधेर प्रतिकार
काहारो यद्यपि अन्य शुभ कर्म सने ।
नामे सम बुद्धि हय दुष्कृति बन्धने ।। ११.४७ ।।

से दुष्कृति क्षय लागि करिबे यतन ।
नामे शुद्ध बुद्धि पाबे प्रेम धन ।। ११.४८ ।।

अन्त्यज गृहस्थ शुद्ध नाम परायण ।
ताङ्र पद धूलि देहे करिबे मृक्षण ।। ११.४९ ।।

खाइबे अधरामृत पिबे पद-जल ।
तबे शुद्ध नामे मति ह-इबे निर्मल ।। ११.५० ।।

कालि दासे एइ रूपे दुष्कृति खण्डन ।
पुनः तव कृपा-प्राप्ति गाय जगज्-जन ।। ११.५१ ।।

आमि जड बुद्धि नाथ एक मात्र गाइ ।
नाम-चिन्तामणि-तत्त्व कभु नाहि पाइ ।। ११.५२ ।।

हरिदास ठाकुरेर नाम-विषये निष्ठा
कृपा करिऽ नाम-रूपे आमार जिह्वाय ।
निरन्तर नाच प्रभु धरि तव पाय ।। ११.५३ ।।

राख इङ्हा लओ ताङ्हा तव इच्छा मत ।
याङ्हा राख देह मोरे कृष्ण-नामामृत ।। ११.५४ ।।

जगज्जने नाम दिते तव अवतार ।
जगज्जन-माझे मोरे कर अङ्गीकार ।। ११.५५ ।।

आमि त अधम तुमि अधम तारण ।
उभये सम्बन्ध एइ पतित पावन ।। ११.५६ ।।

अच्छेद्य सम्बन्ध एइ तोमाय आमाय ।
यार बले नामामृत ए अधम चाय ।। ११.५७ ।।

कलि-युगे नामे केन युग-धर्म ह-इलेन
कलि-युगे सुदुःसाध्य अन्य शुभ कर्म ।
अतएव नाम आसिऽ ह-इल युग धर्म ।। ११.५८ ।।

हरिदास-दास भक्तिविनोद से जन ।
हरि-नाम-चिन्तामणि गाय अकिञ्चन ।। ११.५९ ।।