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हरिभक्तिविलास
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श्री-नाम-माहात्म्य-सूचना
गदाइ गौराङ्ग जय जाह्नवा जीवन ।
सीताद्वैत जय श्रीवासादि भक्त गण ।। १.१ ।।

लवण जलधि तीरे नीलाचले श्री मन्दिरे
दारु ब्रह्म पुरुष प्रधान ।
जीवे निस्तारिते हरि अर्चा रूपे अवतरि
भोग मोक्ष करेन प्रदान ।। १.२ ।।

सेइ धामे श्री चैतन्य मानवे करिते धन्य
सन्न्यासी रूपेते भगवान् ।
कलिते ये युग धर्म बुझाइते तार मर्म
काशी मिश्र घरे अधिष्ठान ।। १.३ ।।

निज भक्त वृन्द लये निजे कल्प तरु हये
कृष्ण प्रेम देन सर्व जने ।
नाना मते भक्त मुखे भक्त कथ शुनि सुखे
जीव शिक्षा देन सुयतने ।। १.४ ।।

एक दिन भगवान् समुद्रे करिया स्नान
श्री सिद्ध बकुले हरि दासे ।
मिलि आनन्दित मने जिज्ञासिला स-यतने
किसे जीव तरे अनायासे ।। १.५ ।।

प्रभुर चरण धरिऽ अनेक विनय करिऽ
गलद्-अश्रु पुलक शरीर ।
हरि-दास महाशय काङ्दिते काङ्दिते कय
प्रभु तव लीला सुगभीर ।। १.६ ।।

आमि अति अकिञ्चन नाहि मोर विद्या धन
तव पद आमार सम्बल ।
ए हेन अयोग्य जने प्रश्न करिऽ अकारणे
बल प्रभु हबे किबा फल ।। १.७ ।।

तुमि कृष्ण स्वयं प्रभो जीव उद्धारिते विभो
नवद्वीप धामे अवतार ।
कृपा करिऽ राङ्गा पाय राख मोरे गौर राय
तबे चित्त प्रफुल्ल आमार ।। १.८ ।।

तोमार अनन्त नाम तवानन्त गुण ग्राम
तव रूप सुखेर सागर ।
अनन्त तोमार लीला कृपा करिऽ प्रकाशिला
ताइ आस्वादये ए पामर ।। १.९ ।।

चिन्मय भास्कर तुमि किरणेर कण आमि
तुमि प्रभु, आमि नित्य दास ।
चरण पीयूष तव मम सुख सुवैभव
तव नामामृते मोर आश ।। १.१० ।।

ए मत अधम आमि कि बलिते जानि स्वामी
तबु आज्ञा करिब पालन ।
या बलाबे मोर मुखे तोमारे बलिब सुखे
दोष गुण ना करि गणन ।। १.११ ।।

कृष्ण-तत्त्व
एक-मात्र इच्छामय कृष्ण सर्वेश्वर ।
नित्य शक्ति-योगे कृष्ण विभु परात्पर ।। १.१२ ।।

कृष्ण कृष्ण-शक्ति
कृष्ण-शक्ति कृष्ण हैते ना हय स्वतन्त्र ।
येइ शक्ति सेइ कृष्ण कहे वेद-मन्त्र ।। १.१३ ।।

कृष्ण विभु, शक्ति ताङ्र वैभव स्वरूप ।
अनन्त वैभवे कृष्ण हय एक रूप ।। १.१४ ।।

त्रिविध वैभव
शक्तिर प्रकाश येइ सेइ त वैभव ।
विभुर वैभव मात्र हय अनुभव ।। १.१५ ।।

वैभव त्रिविध तव गौराङ्ग सुन्दर
चिदचित्जीव तिन शास्त्रेर गोचर ।। १.१६ ।।

चिद्-वैभव
अनन्त वैकुण्ठ आदि यत कृष्ण धाम ।
गोविन्द श्री-कृष्ण हरि आदि यत नाम ।। १.१७ ।।

द्विभुज मुरलीधर आदि यत रूप ।
भक्तानन्द-प्रद आदि गुण अपरूप ।। १.१८ ।।

व्रज रस-लीला नवद्वीपे सङ्कीर्तन ।
एइ रूप कृष्ण लीला विचित्र गणन ।। १.१९ ।।

ए समस्त चिद्-वैभव अप्राकृत हय ।
आसिया-ओ ए प्रपञ्चे प्रापञ्चिक नय ।। १.२० ।।

चिद्-व्यापार समुदय विष्णु-तत्त्व-सार ।
विष्णु-पद बलि वेदे गाय बार बार ।। १.२१ ।।

कृष्णेर चिद्-विभुता-इ विष्णु-तत्त्व शुद्ध-तत्त्व
नाहि ताहे जड-धर्म मायार विकार ।
जडातीत विष्णु-तत्त्व शुद्ध-सत्त्व-सार ।। १.२२ ।।

शुद्ध-सत्त्व रजस्-तमो-गन्ध-विरहित ।
रजस्-तमो-मिश्र मिश्र-सत्त्व सुविदित ।। १.२३ ।।

गोविन्द वैकुण्ठ-नाथ कारणोदशायी ।
गर्भोदशायी आर क्षीर-सिन्धु-शायी ।। १.२४ ।।

आर यत स्वांश परिचित अवतार ।
सेइ सब शुद्ध-सत्त्व विष्णु-तत्त्व-सार ।। १.२५ ।।

गोलोके वैकुण्ठे आर कारण-सागरे ।
अथवा ए जडे थाके, विष्णु-नाम धरे ।। १.२६ ।।

प्रवेशि ए जड विश्व मायार अधीश ।
विष्णु-नाम प्राप्त विभु सर्व-देव ईश ।। १.२७ ।।

मायार ईश्वर मायी शुद्ध-सत्त्व-मय ।
मिश्र-सत्त्व
मिश्र-सत्त्व ब्रह्मा शिव आदि सब हय ।। १.२८ ।।

चिद्-वैभवेर विस्तृति
ए समस्त विष्णु-तत्त्व आर विष्णु-धाम ।
तव चिद्-वैभव नाथ तव लीला-ग्राम ।। १.२९ ।।

अचिद्-वैभव माय-तत्त्व
विरजार एइ पारे यत वस्तु हय ।
अचित्वैभव तव चौद्द-लोक-मय ।। १.३० ।।

मायार वैभव बलि बले देवी-धाम ।
पञ्च-भूत मनो बुद्धि अहङ्कार नाम ।। १.३१ ।।

ए भूर्लोक, भुवर्लोक आर स्वर्ग-लोक ।
महर्लोक, जन-तप-सत्य-ब्रह्मलोक ।। १.३२ ।।

अतल-सुतल-आदि निम्न लोक सात ।
मायिक वैभव तव शुन जगन्नाथ ।। १.३३ ।।

चिद्-वैभव पूर्ण-तत्त्व माया छाया तार ।
जीव-वैभव
चिद्-अणु-स्वरूप जीव वैभव प्रकार ।। १.३४ ।।

चिद्-धर्म-वशतः जीव स्वतन्त्र गठन ।
सङ्ख्याय अनन्त सुख तार प्रयोजन ।। १.३५ ।।

मुक्त जीव
सेइ सुख हेतु यारा कृष्णेरे बरिल ।
कृष्ण-पारिषद मुक्त-रूपेते रहिल ।। १.३६ ।।

बद्ध वा बहिर्मुख जीव
यारा पुनः निज-सुख करिया भावना ।
पार्श्व-स्थिता माया प्रति करिल कामना ।। १.३७ ।।

सेइ सब नित्य-कृष्ण-बहिर्मुख हैल ।
देवी-धामे माया-कृत शरीर पाइल ।। १.३८ ।।

पुण्य पाप कर्म चक्रे पडिया एखन ।
स्थूल लिङ्ग देहे सदा करेन भ्रमण ।। १.३९ ।।

कभु स्वर्गे उठे, कभु निरये पडिया ।
चौराशि लक्ष योनि भोगे भ्रमिया भ्रमिया ।। १.४० ।।

तथापि कृष्ण-दया
तुमि विभु, तोमार वैभव जीव हय ।
दासेर मङ्गल चिन्ता तोमार निश्चय ।। १.४१ ।।

दास याहा सुख मानि करे अन्वेषण ।
तुमि ताहा कृपा करि कर वितरण ।। १.४२ ।।

प्राकृत शुभ-कर्म कर्म-काण्ड
मायार वैभवे ये अनित्य सुख चाय
तोमार कृपाय से अनायासे पाय ।। १.४३ ।।

सेइ सुख प्राप्त्य्-उपाय शुभ-कर्म यत ।
निरमिले धर्म-यज्ञ-योग-होम-व्रत ।। १.४४ ।।

सेइ सब शुभ-कर्म सदा जड-मय ।
चिन्मयी प्रवृत्ति ताहे कभु ना मिलय ।। १.४५ ।।

ताहार साधने साध्य जडमय फल ।
उच्च-लोक भोग सुख ताहाते प्रबल ।। १.४६ ।।

सेइ सब कर्म-भोग नाहि आत्म-शान्ति ।
ताहाते प्रयास करा अतिशय भ्रान्ति ।। १.४७ ।।

सेइ सब शुभ कर्म उपाय हैया ।
अनित्य उपेय साधे लोक सुख दिया ।। १.४८ ।।

सेइ अवस्था हैते उद्धारेर उपाय
कभु यदि साधु सङ्गे जानिते से पारे ।
आमि जीव कृष्ण-दास, याय माया पारे ।। १.४९ ।।

से विरल फल मात्र सुकृति-जनित ।
तुच्छ कर्म-काण्ड नाहि करिले विहित ।। १.५० ।।

ज्ञान-काण्ड, ब्रह्म-लय सुख
आर यिनि मायार यन्त्रणा मात्र जानि ।
मुक्ति लाभे यत्नवान्तिनि हन ज्ञानी ।। १.५१ ।।

से सब लोकेर जन्य तुमि दयामय ।
ज्ञान-काण्ड ब्रह्म-विद्या दियाछ निश्चय ।। १.५२ ।।

सेइ विद्या मायावाद करिया आश्रय ।
जड मुक्त हये ब्रह्मे जीव हय लय ।। १.५३ ।।

ब्रह्म-वस्तु कि?
सेइ ब्रह्म तव अङ्ग-कान्ति ज्योतिर्मय ।
विरजार पारे स्थित ताते हय लय ।। १.५४ ।।

ये सब असुरे विष्णु करेन संहार ।
ताहारा-ओ सेइ ब्रह्मे याय माया-पार ।। १.५५ ।।

कृष्ण-बहिर्मुख
कर्मी ज्ञानी उभये-इ कृष्ण-बहिर्मुख ।
कभु नाहि आस्वादय कृष्ण-दास्य-सुख ।। १.५६ ।।

भक्त्य्-उन्मुखी सुकृति
भक्तिर उन्मुखी सेइ सुकृति प्रधान ।
तार फले जीव भक्त-साधु-सङ्ग पान ।। १.५७ ।।

श्रद्धावान्हये कृष्ण-भक्त-सङ्ग करे ।
नामे रुचि, जीवे दया, भक्ति-पथ धरे ।। १.५८ ।।

कर्मी ओ ज्ञानीर प्रति कृपाय गौण-पथ विधान
दयार सागर तुमि जीवेर ईश्वर ।
कर्मी ज्ञानी बहिर्मुख उद्धारे तत्पर ।। १.५९ ।।

कर्म-पथे ज्ञान-पथे पथिक ये जन ।
ताहार उद्धार लागि तोमार यतन ।। १.६० ।।

सेइ सेइ पथिकेर मङ्गल चिन्तिया ।
गौण-भक्ति पथ एक राखिल करिया ।। १.६१ ।।

कर्मीर पक्षे कर्मेर गौण-भक्ति पथ
कर्मी वर्णाश्रमे थाकि साधु-सङ्ग करि ।
कर्म माझे भक्ति करे गौण-पथ धरि ।। १.६२ ।।

तार कृत कर्म सब हृदय शोधिया ।
तिरोहित हय श्रद्धा बीजे स्थान दिया ।। १.६३ ।।

ज्ञानीर गौण-पथ
ज्ञानी सुकृतिर बले भक्तेर कृपाय ।
अनन्य भक्तिते श्रद्धा बीजे स्थान दिया ।। १.६४ ।।

तुमि बल मोर दास मायार विपाके ।
चाहे अन्य तुच्छ फल छाडिया आमाके ।। १.६५ ।।

आमि जानि तार याते हय सुमङ्गल ।
भुक्ति मुक्ति छाडाइया दि-इ भक्ति फल ।। १.६६ ।।

गौण-पथेर प्रक्रिया
तार काम अनुसारे चालाञा ताहारे
गौण-पथ भक्ति-मार्गे श्रद्धा दि-इ तारे ।। १.६७ ।।

ए तोमार कृपा प्रभु तुमि कृपामय ।
कृपा ना करिले किसे जीव शुद्ध हय ।। १.६८ ।।

कलिते गौण-पथेर दुर्दशा
सत्य-युगे ध्यान-योगे कत ऋषि-गणे ।
शुद्ध करिऽ दिले प्रभु निज-भक्ति-धने ।। १.६९ ।।

त्रेता-युगे यज्ञ-कर्मे अनेक शोधिले ।
द्वापरे अर्चन-मार्गे भक्ति बिलाइले ।। १.७० ।।

कलि आगमने नाथ जीवेर दुर्दशा ।
देखि ज्ञान कर्म योग छाडिल भरसा ।। १.७१ ।।

अल्प आयु, बहु पीडा, बल-बुद्धि-ह्रास ।
एइ सब उपद्रव जीवे कैल ग्रास ।। १.७२ ।।

वर्णाश्रम धर्म आर साङ्ख्य योग ज्ञान ।
कलि-जीवे उद्धारिते नहे बलवान् ।। १.७३ ।।

ज्ञान-कर्म-गत ये भक्तिर गौण-पथ ।
कण्टके सङ्कीर्ण हञा हैल विपथ ।। १.७४ ।।

पृथकुपाय धरि उपेय साधने ।
विघ्न बहुतर हैल जीवेर जीवने ।। १.७५ ।।

नामालोचनार मुख्य-पथ
प्रभु तुमि जीवेर मङ्गल चिन्ता करि ।
कलि युगे नाम सङ्गे स्वयं अवतरि ।। १.७६ ।।

युग धर्म प्रचारिले नाम सङ्कीर्तन ।
मुख्य पथे जीव पाय कृष्ण प्रेम धन ।। १.७७ ।।

नामेर स्मरणे आर नाम-सङ्कीर्तन ।
एइ मात्र धर्म जीव करिबे पालन ।। १.७८ ।।

साध्य-साधन ओ उपाय उपेयेर अभेदता-क्रमे नामेर मुख्यता
येइ त साधन सेइ साध्य यबे हैल ।
उपाय उपेय मध्ये भेद ना रहिल ।। १.७९ ।।

साध्येर साधने आर नाहि अन्तराय ।
अनायासे तरे जीव तोमार कृपाय ।। १.८० ।।

आमि त अधम अति मजिया विषये ।
ना भजिनु नाम तव अति मूढ हये ।। १.८१ ।।

दर दर धारा चक्षे ब्रह्म-हरिदास ।
पडिल प्रभुर पदे छाडिया निःश्वास ।। १.८२ ।।

हरि भक्त भक्ति मात्रे विनोद याहार ।
हरिनाम चिन्तामणि जीवन ताहार ।। १.८३ ।।

इति श्री-हरि-नाम-चिन्तामणौ नाम-माहात्म-सूचनं नाम प्रथमः परिच्छेदः ।