प्रमुखा विकल्पसूचिः उद्घाट्यताम्
← पञ्चमः परिच्छेदः हरिभक्तिविलास
षष्ठः परिच्छेदः
[[लेखकः :|]]
सप्तमः परिच्छेदः →

षष्ठ परिच्छेद
गुर्व्-अवज्ञा
गुरोरवज्ञा
पञ्च-तत्त्व जय जय श्री-राधा-माधव ।
जय नवद्वीप व्रज यमुना वैष्णव ।। ६.१ ।।

हरि-दास बले प्रभु करि निवेदन ।
तृतीयापराध नामे ये रूपे घटन ।। ६.२ ।।

विस्तारि बलिब आमि तोमारि आज्ञाय ।
येइ सब अपराध गुरु अवज्ञाय ।। ६.३ ।।

बहु योनि भ्रमि मानव-शरीर
दुर्लभ शुभद अति ।
तथापि अनित्य पाइलेक येइ
यावत्जीवने स्थिति ।। ६.४ ।।

परम मङ्गल लभिबारे तरे
यदि ना यतन करे ।
पुनराय भवे अनित्य शरीर
लभिया आबार मरे ।। ६.५ ।।

सुबोध ये हय दुर्लभ नृ-देह
लभिया भव संसारे ।
संसारी जीव अवश्य सद्-गुरु आश्रय करिबे
गुरु कर्ण-धार समाश्रय करि
कृष्ण आनुकूल्ये तरे ।। ६.६ ।।

शान्त कृष्ण-भक्त लक्षण ये गुरु
स-दैन्य वचने ताङ्रे ।
सन्तोष करिया कृष्ण-दीक्सा लय
याय संसारेर पारे ।। ६.७ ।।

सहजे जीवेर आछे कृष्णे मति
वृथा तर्के ताहा याय ।
वितर्क छाडिया सुमति आश्रये
गुरु हते मन्त्र पाय ।। ६.८ ।।

गृही जीव-गण वर्णाश्रमे थाकि
सद्-गुरु आश्रय करे ।
ब्राह्मणादि उच्च-वर्णे सत्-पात्र थाकिले तिनि हैबार योग्य
ब्राह्मण आचार्य सर्व-वर्णे हय
यदि कृष्ण भक्ति धरे ।। ६.९ ।।

ब्राह्मण कुलेते सुपात्र अभावे
अन्य कुले दीक्षा पाय ।
उच्च वर्ण गुरु गृहीर उचित
गुरु शिष्य परीक्षाय ।। ६.१० ।।

वर्ण-विचार अपेक्षा सुपात्रेर विचार अधिक श्रेयः
कृष्ण तत्त्व वेत्ता प्रकृत ये हय
से ह-इते पारे गुरु ।
किबा विप्र शूद्र कि गृही सन्न्यासी
गुरु हन कल्प-तरु ।। ६.११ ।।

वर्णेर मर्यादा पात्रेर विचारे
परमार्थे लघु अति ।
सुपात्र मिलन प्रयोजन सदा
यदि चाइ शुद्धा रति ।। ६.१२ ।।

सुपात्रेर प्राप्ति मूल प्रयोजन
पवित्र सुवर्ण हेन ।
ताहे उच्च वर्ण लभिले संयोग
सोहागा सुवर्णे येन ।। ६.१३ ।।

गृह-त्यागी अगृहि-गुर्वाश्रय करिते पारेन्
ये कोन कारणे सेइ गृहि धर्म
छाडि अन्याश्रम लय ।
ताहे परमार्थ ना पाइया शेषे
साधु गुरु अन्वेषय ।। ६.१४ ।।

ताहार पक्षेते अगृही आचार्य
प्रशस्त सकल मते ।
ताङ्र दीक्षा शिक्षा पाइया से जन
भासे नाम-रसामृते ।। ६.१५ ।।

गृहि-भक्ति गृह-त्याग करिले-ओ पूर्व-गुरु त्याग करिते हय ना
गृही भक्त-जने विराग लभिले
छाडये संसार विधि ।
तबु पूर्व-गुरु चरण आश्रय
करिबे जीवनावधि ।। ६.१६ ।।

गृहि जन मध्ये गृहि गुरु शस्त
यदि शुद्ध भक्त हन ।
नतुवा अगृही सुयोग्य ह-इले
गुरु-योग्य सर्व-क्षण ।। ६.१७ ।।

सद्-गुरु पाइया भजिए भजिते
भावेर उदय यबे ।
संसार विरक्ति संसार छाडिया
वैरागी ह-इबे तबे ।। ६.१८ ।।

यिनि वैराग्य आश्रये ल-इबेन तिनि वैरागी गुरु करिबेन्
वैराग्य आश्रम ग्रहणेते त्यागी
पुरुष ह-इबे गुरु ।
ताङ्हार चरणे शिखिबे विराग
गुरु शिक्षा कल्प तरु ।। ६.१९ ।।

दीक्षा ओ शिक्षा गुरु उभयके-इ समान सम्मान करा आवश्यक
दीक्षा शिक्षा भेदे गुरु दुऽ प्रकार
उभये समान मान ।
अर्पिबे सुजन परमार्थ धन
अनायासे यदि चान् ।। ६.२० ।।

कृष्ण-नाम मन्त्र देन दीक्षा गुरु
शिक्षा गुरु तत्त्व दाता ।
वैष्णव सकल शिक्षा गुरु हन
सर्व शुभ जनयिता ।। ६.२१ ।।

सम्प्रदायेर आदि-गुरुर शिक्षा अवलम्बन करिया आचरण करिबे
साधु सम्प्रदाये आचार्य सकल
शिक्षा गुरु प्रतिष्ठित ।
आद्याचार्य यिनि गुरु शिरोमणि
पूजि ताङ्रे यथोचित ।। ६.२२ ।।

ताङ्र सुसिद्धान्त अनुगत हये
ना मानिब अन्य शिक्षा ।
ताङ्हार आदेश पालिब यतने
ना ल-इब अन्य दीक्षा ।। ६.२३ ।।

सम्प्रदाय गुरु वरण करा कर्तव्य
सम्प्रदाय गुरु-गणे शिक्षा गुरु जानि ।
अन्य-मत पण्डितेर शिक्षा नाहि मानि ।। ६.२४ ।।

सेइ मते सुशिक्षित साधु सुचरित ।
दीक्षा गुरु योग्य सदा जाने सुपण्डित ।। ६.२५ ।।

मायावादीर निकट कृष्ण-मन्त्र ल-इले परमार्थ हय ना
मायावादि-मते थाके कृष्ण मन्त्र लय ।
तार परमार्थ लाभ कभु नाहि हय ।। ६.२६ ।।

शुद्ध-भक्त व्यतीत अन्यके गुरु करिबे ना
ये अन्याय शिखे येइ शिक्षा देय आर ।
उभये नरके याय ना पाय उद्धार ।। ६.२७ ।।

शुद्ध भक्ति छाडि यिनि शिखिलेन बाद ।
ताङ्हार जीवन मात्र वाद विसंवाद ।। ६.२८ ।।

से केमने गुरु हबे उद्धारिबे जीवे ।
आपनि असिद्ध अन्ये किबा शुभ दिबे ।। ६.२९ ।।

अतएव शुद्ध भक्त ये से केने नय ।
उपयुक्त गुरु हय सर्व-शास्ते कय ।। ६.३० ।।

गुरु तत्त्व
दीक्षा गुरु शिक्षा गुरु दुङ्हे कृष्ण दास ।
दुङ्हे व्रज जन कृष्ण शक्तिर प्रकाश ।। ६.३१ ।।

गुरुके सामान्य जीव ना जानिबे कभु ।
गुरु कृष्ण शक्ति कृष्ण-प्रेष्ठ नित्य प्रभु ।। ६.३२ ।।

एइ बुद्धि सह सदा गुरु भक्ति करे ।
सेइ गुरु-भक्ति बले संसारेते तरे ।। ६.३३ ।।

गुरु पूजा
अग्रे गुरु पूजा परे श्री कृष्ण पूजन ।
गुरुदेवे श्री-कृष्ण प्रसाद समर्पण ।। ६.३४ ।।

गुरु आज्ञा लये कृष्ण पूजिबे यतने ।
श्री गुरु स्मरिया कृष्ण बलिबे वदने ।। ६.३५ ।।

गुरुते कि रूपे श्रद्धा करा उचित
गुरुते अवज्ञा यार तार अपराध ।
सेइ अपराधे तार हय भक्ति बाध ।। ६.३६ ।।

गुरु कृष्ण वैष्णवेते सम भक्ति करि ।
नामाश्रये शुद्ध भक्त शीघ्र याय तरि ।। ६.३७ ।।

गुरुते अचला श्रद्धा करे येइ जन ।
शुद्ध नाम बले सेइ पाय प्रेम धन ।। ६.३८ ।।

कोन्स्थाने गुरु त्याग करिते ह-इबे
तबे यदि ए रूप घटना कभु हय ।
असत्सङ्गे गुरुर योग्यता हय क्षय ।। ६.३९ ।।

प्रथमे छिलेन तिनि सद्गुरु प्रधान ।
परे नाम अपराधे हञा हत ज्ञान ।। ६.४० ।।

वैष्णवे विद्वेष करि छाडे नाम रस ।
क्रमे क्रमे हन अर्थ कामिनीर वश ।। ६.४१ ।।

सेइ गुरु छाडि शिष्य श्री-कृष्ण-कृपाय ।
सद्गुरु लभिया पुनः शुद्ध नाम गाय ।। ६.४२ ।।

गुरु शिष्य सम्बन्धेर पूर्वे-ई परस्परेर परीक्षा
अयोग्य शिष्येरे गुरु करिबेन्दण्ड ।
भजिया अयोग्य गुरु शिष्य हय पण्ड ।। ६.४३ ।।

दुङ्हेर योग्यता यत दिन स्थिर रय ।
परस्पर सम्बन्ध कखन त्यज्य नय ।। ६.४४ ।।

शुद्ध गुरु परीक्षा करिया वरण करिबे
सद्गुरुर प्रति येइ अवज्ञा आचरे ।
से पापिष्ठ अपराधी सर्वत्र संसारे ।। ६.४५ ।।

अतएव प्रथमे विशेष यत्न करि ।
शुद्ध भक्ते ल-इबेन गुरु-रूपे वरि ।। ६.४६ ।।

गुरु त्याग क्लेश येन कभु नाहि घटे ।
ए रूप चिन्तिले कभु ना पडे सङ्कटे ।। ६.४७ ।।

गुरु यथा भक्ति-हीन शिष्य तार प्राय ।
अतएव शुद्ध गुरु लबे परीक्षाय ।। ६.४८ ।।

सद्गुरु अवज्ञा अपराध भयङ्कर ।
एइ अपराधे नष्ट हय देव नर ।। ६.४९ ।।

गुरु सेवार प्रक्रिया
गुरु शय्यासन आर पादुकादि यान ।
पाद पीठ स्नानोदक छायार लङ्घन ।। ६.५० ।।

गुरुर अग्रेते अन्य पूजा द्वैत ज्ञान ।
दीक्षा व्याख्या प्रभुत्वादि करिबे वन्दन ।। ६.५१ ।।

यथा यथा गुरुर पाइबे दरशन ।
दण्डवत्पडि भूमे करिबे वन्दन ।। ६.५२ ।।

गुरु नाम भक्तिते करिबे उच्चारण ।
गुरु आज्ञा हेला ना करिबे कदाचन ।। ६.५३ ।।

गुरुर प्रसाद सेवा अवश्य करिबे ।
गुरुर अप्रिय वाक्य कभु ना कहिबे ।। ६.५४ ।।

गुरुर चरणे दैन्ये ल-इबे शरण ।
करिबे गुरुर सदा प्रिय आचरण ।। ६.५५ ।।

ए रूप आचारे कृष्ण नाम सङ्कीर्तने ।
सर्व सिद्धि हय प्रभो बले श्रुति गणे ।। ६.५६ ।।

नाम गुरु प्रति यदि अवज्ञा घटये ।
दुष्ट सङ्गे दुष्ट शास्त्र मत समाश्रये ।। ६.५७ ।।

तबे सेइ सङ्ग सेइ शास्त्र दूर करि ।
विलाप करिब सेइ गुरु पदे धरि ।। ६.५८ ।।

कृपा करि गुरुदेव ह-इबे सदय ।
नामे प्रेम दिबे से वैष्णव दयामय ।। ६.५९ ।।

हरि-दास पद रेणु भरसा याहार ।
नाम चिन्तामणि गाय तृणाधिक छार ।। ६.६० ।।

इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ गुर्व्-अवज्ञा-विचारो
नाम षष्ठः परिच्छेदः ।