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अध्यायः ३०
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, जालस्थलीय-संस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः ३०


ब्रह्मण इत्यस्य नारायण ऋषिः। परमेश्वरो देवता। स्वराडतिशक्वरी छन्दः। पञ्चमः स्वरः॥

ईश्वरवद्राज्ञापि कर्त्तव्यमित्याह॥

ईश्वर के तुल्य राजा को भी करना चाहिए, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

ब्रह्म॑णे ब्राह्म॒णं क्ष॒त्राय॑ राज॒न्यं᳖ म॒रुद्भ्यो॒ वैश्यं॒ तप॑से॒ शू॒द्रं तम॑से॒ तस्क॑रं नार॒काय॑ वीर॒हणं॑ पा॒प्मने॑ क्ली॒बमा॑क्र॒याया॑ऽअयो॒गूं कामा॑य पुँश्च॒लूमति॑क्रुष्टाय माग॒धम्॥५॥

पदपाठः—ब्रह्म॒णे। ब्रा॒ह्म॒णम्। क्ष॒त्राय॑। रा॒ज॒न्य᳖म्। म॒रुद्भ्य॒ इति॑ म॒रुद्ऽभ्यः॑। वैश्य॑म्। तप॑से। शू॒द्रम्। तम॑से। तस्क॑रम्। ना॒र॒काय॑। वी॒र॒हणाम्। वी॒र॒हन॒मिति॑ वीर॒ऽहन॑म्। पा॒प्मने॑। क्ली॒बम्। आ॒क्र॒याया॒ इत्या॑ऽऽक्र॒यायै॑। अ॒यो॒गूम्। कामा॑य। पुं॒श्च॒लूम्। अति॑क्रुष्टा॒येत्यति॑ऽक्रुष्टाय। मा॒ग॒धम्॥५॥

पदार्थः—(ब्रह्मणे) वेदेश्वरविज्ञानप्रचाराय (ब्राह्मणम्) वेदेश्वरविदम् (क्षत्राय) राज्याय पालनाय वा (राजन्यम्) राजपुत्रम् (मरुद्भ्यः) पश्वादिभ्यः (वैश्यम्) विक्षु प्रजासु भवम् (तपसे) सन्तापजन्याय सेवनाय (शूद्रम्) प्रीत्या सेवकं शुद्धिकरम् (तमसे) अन्धकाराय प्रवृत्तम् (तस्करम्) चोरम् (नारकाय) नरके दुःखबन्धने भवाय कारागाराय (वीरहणम्) यो वीरान् हन्ति तम् (पाप्मने) पापाचरणाय प्रवृत्तम् (क्लीबम्) नपुंसकम् (आक्रयायै) आक्रमन्ति प्राणिनो यस्यां तस्यै हिंसायै प्रवर्त्तमानम् (अयोगूम्) अयसा शस्त्रविशेषेण सह गन्तारम् (कामाय) विषयसेवनाय प्रवृत्ताम् (पुंश्चलूम्) पुंभिः सह चलितचित्तां व्यभिचारिणीम् (अतिक्रुष्टाय) अत्यन्तनिन्दनाय प्रवर्त्तकम् (मागधम्) नृशंसम्॥५॥

अन्वयः—हे परमेश्वर राजन्! वा त्वमत्र ब्रह्मणे ब्राह्मणं क्षत्राय राजन्यं मरुद्भ्यो वैश्यं तपसे शूद्रं सर्वतो जनय, तमसे तस्करं नारकाय वीरहणं पाप्मने क्लीबमाक्रयाया अयोगूं कामाय पुंश्चलूमतिक्रुष्टाय मागधञ्च दूरे यमय॥५॥

भावार्थः—हे राजन्! यथा जगदीश्वरो जगति परोपकाराय पदार्थान् जनयति, दोषान् निवारयति, तथा त्वमिह राज्ये सज्जनानुत्कर्षय दुष्टान् निःसारय दण्डय ताडय च, यतः शुभगुणानां प्रवृत्तिर्दुर्व्यसनानाञ्च निवृत्तिः स्यात्॥५॥

पदार्थः—हे परमेश्वर वा राजन्! आप इस जगत् में (ब्रह्मणे) वेद और ईश्वर के ज्ञान के प्रचार के अर्थ (ब्राह्मणम्) वेद ईश्वर के जानने वाले को (क्षत्राय) राज्य की रक्षा के लिए (राजन्यम्) राजपूत को (मरुद्भ्यः) पशु आदि प्रजा के लिए (वैश्यम्) प्रजाओं में प्रसिद्ध जन को (तपसे) दुःख से उत्पन्न होने वाले सेवन के अर्थ (शूद्रम्) प्रीति से सेवा करने तथा शुद्धि करनेहारे शूद्र को सब ओर से उत्पन्न कीजिए (तमसे) अन्धकार के लिए प्रवृत्त हुए (तस्करम्) चोर को (नारकाय) दुःख बन्धन में हुए कारागार के लिए (वीरहणम्) वीरों को मारनेहारे जन को (पाप्मने) पापाचरण के लिए प्रवृत्त हुए (क्लीबम्) नपुंसक को (आक्रयायै) प्राणियों की जिसमें भागाभूगी होती, उस हिंसा के अर्थ प्रवृत्त (अयोगूम्) लोहे के हथियार विशेष के साथ चलनेहारे जन को (कामाय) विषय सेवन के लिए प्रवृत्त हुई (पुंश्चलूम्) पुरुषों के साथ जिसका चित्त चलायमान उस व्यभिचारिणी स्त्री को और (अतिक्रुष्टाय) अत्यन्त निन्दा करने के लिए प्रवृत्त हुए (मागधम्) भाट को दूर पहुंचाइये॥५॥

भावार्थः—हे राजन्! जैसे जगदीश्वर जगत् में परोपकार के लिए पदार्थों को उत्पन्न करता और दोषों को निवृत्त करता है, वैसे आप राज्य में सज्जनों की उन्नति कीजिए, दुष्टों को निकालिए, दण्ड और ताड़ना भी दीजिए, जिससे शुभ गुणों की प्रवृत्ति और दुष्ट व्यसनों की निवृत्ति होवे॥५॥