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अष्टादशपर्व
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स्वर्गे कर्णादिबन्धुजनानपश्यता युधिष्ठिरेण देवान्प्रति यत्र कुत्रापि बन्धुजनैः सहैव स्वस्य निवासेच्छानिवेदनम्।। 1 ।।
देवैर्युधिष्ठिराय बन्धुजनप्रदर्शनं चोदितेन देवदूतेन तस्य नरकप्रदेशप्रापणम्।। 2 ।।
दुर्दर्शनरकदर्शनासहिष्णुतया सह दूतेन प्रतिनिवर्तमानेन युधिष्ठिरेण श्रुतपूर्वकण्ठध्वनिश्रवणम्।। 3 ।।
ततो युधिष्ठिरपृष्टैस्तैस्तं प्रित स्वेषां कर्मभीमादित्वकथनम्।। 4 ।।
ततस्तेन दूतंप्रति इन्द्रे स्वस्य तत्समीपं प्रत्यनागमनचोदना।। 5 ।।
दूतेनेन्द्रे युधिष्ठिरचिकीर्षितनिवेदनम्।। 6 ।।

  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
युधिष्ठिर उवाच। 18-2-1x
नेह पश्यामि विबुधा राधेयममितौजसम्।
भ्रातरौ च महात्मानौ युधामन्यूत्तमौजसौ।।
18-2-1a
18-2-1b
जुहुवुर्ये शरीराणि रणवह्नौ महारथाः।
राजानो राजपुत्राश्च ये मदर्थे हता रणे।।
18-2-2a
18-2-2b
क्व ते महारथाः सर्वे शार्दूलसमविक्रमाः।
तैरप्ययं जितो लोकः कच्चित्पुरुषसत्तमैः।।
18-2-3a
18-2-3b
यदि लोकानिमान्प्राप्तास्ते च सर्वे महारथाः।
स्थितं वित्त हि मां देवाः सहितं तैर्महात्मभिः।।
18-2-4a
18-2-4b
कच्चिन्न तैरवाप्तोऽयं नृपैर्लोकोऽक्षयः शुभः।
न तैरहं विना वत्स्ये भ्रातृभिर्ज्ञातिभिस्तथा।।
18-2-5a
18-2-5b
मातुर्हि वचनं श्रुत्वा तदा सलिलकर्मणि।
कर्णस्य क्रियतां तोयमिति तप्यामि तेन वै।।
18-2-6a
18-2-6b
इदं च परितप्यामि पुनःपुनरहं सुराः।
यन्मातुः सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मनः।।
18-2-7a
18-2-7b
दृष्ट्वैव तं नानुगतः कर्णं परबलार्दनम्।
न ह्यस्मान्कर्णसहिताञ्जयेच्छक्रोऽपि संयुगे।।
18-2-8a
18-2-8b
तमहं यत्रतत्रस्थं द्रष्टुमिच्छामि सूर्यजम्।
अविज्ञातो मया योसौ घातितः सव्यसाचिना।।
18-2-9a
18-2-9b
भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योऽपि प्रियं मम।
अर्जुनं चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ।।
18-2-10a
18-2-10b
द्रष्टुमिच्छामि तां चाहं पाञ्चालीं धर्मचारिणीम्।
न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि वः।।
18-2-11a
18-2-11b
किं मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः।
यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम।।
18-2-12a
18-2-12b
देवा ऊचुः। 18-2-13x
यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां तत्र माचिरम्।
प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात्।।
18-2-13a
18-2-13b
वैशम्पायन उवाच। 18-2-14x
इत्युक्त्वा तं ततो देवा देवदूतमुपादिशन्।
युधिष्ठिरस्य सुहृदो दर्शयेतदि परंतप।।
18-2-14a
18-2-14b
ततः कुन्तीसुतो राजा देवदूतश्च जग्मतुः।
सहितौ राजशार्दूल यत्र ते पुरुषर्षभाः।।
18-2-15a
18-2-15b
अग्रतो देवदूतश्च ययौ राजा च पृष्ठतः।
पन्थानमशुभं दुर्गं सेवितं पापकर्मभिः।।
18-2-16a
18-2-16b
तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम्।
युक्तं पापकृतां गन्धैर्मासशोणितकर्दमम्।।
18-2-17a
18-2-17b
दंशोत्पातकभल्लूकमक्षिकामशकावृतम्।
इतश्चेतश्च कुणपैः समन्तात्परिवारितम्।।
18-2-18a
18-2-18b
अस्थिकेशसमाकीर्णं कृमिकीटसमाकुलम्।
ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात्परिवेष्टितम्।।
18-2-19a
18-2-19b
अयोमुखैश्च काकाद्यैर्गृध्रैश्च समभिद्रुतम्।
सूचीमुखैस्तथा प्रेतैर्विन्ध्यशैलोपमैर्वृतम्।।
18-2-20a
18-2-20b
मेदोरुधिरयुक्तैश्च च्छिन्नबाहूरुपाणिभिः।
निकृत्तोदरपदैश्च तत्रतत्र प्रवेशितैः।।
18-2-21a
18-2-21b
स तत्कुणपदुर्गन्धमशिवं रोमहर्षणम्।
जगाम राजा धर्मान्मा मध्ये बहु विचिन्तयन्।।
18-2-22a
18-2-22b
ददर्शोष्णोदकैः पूर्णां नदीं चापि सुदुर्गमाम्।
असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम्।।
18-2-23a
18-2-23b
करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्चि शिलाः पृथक्।
लोहकुंभीश्च तैलस्य क्वाथ्यमानाः समन्ततः।।
18-2-24a
18-2-24b
कूटशाल्मलिकं तापि दुःस्पर्शं तीक्ष्णकण्टकम्।
ददर्शान्याश्च कौन्तेयो यातनाः पापकर्मिणाम्।।
18-2-25a
18-2-25b
स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह।
कियदध्वानमस्माभिर्गन्तव्यमिममीदृशम्।।
18-2-26a
18-2-26b
क्व च ते भ्रातरो मह्यं तन्ममाख्यातुमर्हसि।
देशोऽयं कश्च देवानामेतदिच्छामि वेदितुम्।।
18-2-27a
18-2-27b
स संनिववृते श्रुत्वा धर्मराजस्य भाषितम्।
देवदूतोऽब्रवीचैनमेतावद्गमनं तव।।
18-2-28a
18-2-28b
निवर्तितव्यो हि मया तताऽस्म्युक्तो दिवौकसैः।
यदि श्रान्तोसि राजेन्द्रि त्वमथागन्तुमर्हसि।।
18-2-29a
18-2-29b
युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेनि गन्धेन मूर्छितः।
निवर्तने धृतमनाः पर्यावर्तत भारत।।
18-2-30a
18-2-30b
सं संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमाहतः।
शुश्राव तत्र वदतां दीना वाचः समन्ततः।।
18-2-31a
18-2-31b
भोभो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्वन।
अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्।।
18-2-32a
18-2-32b
आयाति त्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्यः समीरणः।
तव गन्धानुगस्तात येनास्मान्सुखमागमत्।।
18-2-33a
18-2-33b
ते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ।
सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्ट्वा राजसत्तम।।
18-2-34a
18-2-34b
संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तमिह भारत।
त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातनाऽस्मान्न बाधते।।
18-2-35a
18-2-35b
एवं बहुविधा वाचः कृपणा वेदनावताम्।
तस्मिन्देशे स शुश्राव समन्ताद्वदतां नृप।।
18-2-36a
18-2-36b
तेषां तु वचनं श्रुत्वा दयावान्दीनभाषिणाम्।
अहो कृच्छ्रमिति प्राह तस्थौ स च युधिष्ठिरः।।
18-2-37a
18-2-37b
स ता गिरः पुरस्ताद्वै श्रुतपूर्वाः पुनःपुनः।
ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डवः।।
18-2-38a
18-2-38b
अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।
उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ।।
18-2-39a
18-2-39b
इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन्तादवभाषिरे।
कर्णोऽहं भीमसेनोऽहमर्जुनोऽहमिति प्रभो।।
18-2-40a
18-2-40b
नकुलः सहदेवोऽहं धृष्टद्युम्नोऽहमित्युत।
द्रौप्दी द्रौपदेयाश्चि इत्येवं ते विचुक्रुशुः।।
18-2-41a
18-2-41b
ता वाचः स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नृप।
ततो विममृशे राजा किंत्विदं दैवकारितम्।।
18-2-42a
18-2-42b
किन्तु तत्कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः।
कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया।।
18-2-43a
18-2-43b
य इमे पापगन्धेऽस्मिन्देशे सन्ति सुदारुणे।
नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम्।।
18-2-44a
18-2-44b
किं कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधनः।
तथा श्रिया युतः पापैः सहसर्वैः पदानुगैः।।
18-2-45a
18-2-45b
महेन्द्रि इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजितः।
कस्येदानीं विकारोऽयं य इमे नरकं गताः।।
18-2-46a
18-2-46b
सर्वे धर्मविदः शूराः सत्यागमपरायणाः।
क्षत्रधर्मरताः सन्तो यज्वानो भूरिदक्षिणाः।।
18-2-47a
18-2-47b
किंनु सुप्तोस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये।
अहो चित्तविकारोऽयं स्याद्वा मे चित्तविभ्रमः।।
18-2-48a
18-2-48b
एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिरः।
दुःखशोकसमाविष्टश्चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः।।
18-2-49a
18-2-49b
क्रोधमाहारयच्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृपः।
देवांश्च गर्हयामास धर्मं चैव युधिष्ठिरः।।
18-2-50a
18-2-50b
स तीव्रशोकसंतप्तो देवदूतमुवाच ह।
गम्यतां तत्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम्।।
18-2-51a
18-2-51b
न ह्यहं तत्र यास्यामि स्थितोस्मीति निवेद्यताम्।
मत्संश्रयादिमे दूनाः सुखिनो भ्रातरो हि मे।।
18-2-52a
18-2-52b
इत्युक्तः स तदा दूतः पाण्डुपुत्रेण धीमता।
जगामि तत्र यत्रास्ते देवराजः शतक्रतुःठ।।
18-2-53a
18-2-53b
निवेदयामास च तद्धर्मराजचिकीर्षितम्।
यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप।।
18-2-54a
18-2-54b
।। इति श्रीमन्महाभारते
स्वर्गारोहणपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः।। 2 ।।

सम्पाद्यताम्

18-2-24 करंभवालुकाः श्वेतसूक्ष्मवालुका भ्राष्ट्रवालुका इत्यर्थः।। 18-2-49 विममर्श विचारं कृतवान्।। 18-2-52 दूनाः खिन्नाः।।

स्वर्गारोहणपर्व-001 पुटाग्रे अल्लिखितम्। स्वर्गारोहणपर्व-003