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← मन्त्रः ५८ यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)
अध्यायः ३
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, जालस्थलीय-संस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः ३


भेषजमसीत्यस्य बन्धुर्ऋषिः। रुद्रो देवता। स्वराड् गायत्री छन्दः। षड्जः स्वरः॥

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है॥

भे॒ष॒जम॑सि भेष॒जं गवेऽश्वा॑य॒ पुरु॑षाय भेष॒जम्। सु॒खं मे॒षाय॑ मे॒ष्यै॥५९॥

पदपाठः—भे॒ष॒जम्। अ॒सि॒। भे॒ष॒जम्। गवे॑। अश्वा॑य। पुरु॑षाय। भे॒ष॒जम्। सु॒खमिति॑ सु॒ऽखम्। मे॒षाय॑। मे॒ष्यै॥५९॥

पदार्थः—(भेषजम्) शरीरान्तःकरणेन्द्रियात्मनां सर्वरोगाऽपहारकमौषधम् (असि) (भेषजम्) अविद्यादिक्लेशनिवारकम् (गवे) इन्द्रियधेनुसमूहाय (अश्वाय) तुरङ्गाद्याय (पुरुषाय) पुरुषप्रभृतये (भेषजम्) रोगनिवारकम् (सुखम्) सुखं कस्मात्? सुहितं खेभ्यः खं पुनः खनतेः (निरु॰ ३.१३) (मेषाय) अवये (मेष्यै) तत्स्त्रियै। अयं मन्त्रः (शत॰ २.६.२.११) व्याख्यातः॥५९॥

अन्वयः—हे रुद्र जगदीश्वर! यः शरीररोगनाशकत्वाद् भेषजमस्यात्मरोगदूरीकरणाद् भेषजमस्येवं सर्वेषां दुःखनिवारकत्वाद् भेषजमसि स त्वं नोऽस्मभ्यमस्माकं वा गवेऽश्वाय पुरुषाय मेषाय मेष्यै सुखं देहि॥५९॥

भावार्थः—नहि परमेश्वरोपासनेन विना शरीरात्मप्रजानां दुःखापनयो भूत्वा सुखं जायते। तस्मात् सर्वैर्मनुष्यैरीश्वरौषधसेवनेन शरीरात्मप्रजापशूनां प्रयत्नेन दुःखानि निवार्य्य सुखं जननीयमिति॥५९॥

पदार्थः—हे जगदीश्वर! जो आप (भेषजम्) शरीर, अन्तःकरण, इन्द्रिय और गाय आदि पशुओं के रोगनाश करने वाले (असि) हैं (भेषजम्) अविद्यादि क्लेशों को दूर करने वाले (असि) हैं सो आप (नः) हम लोगों के (गवे) गौ आदि (अश्वाय) घोड़ा आदि (पुरुषाय) सब मनुष्य (मेषाय) मेढ़ा और (मेष्यै) भेड़ आदि के लिये (सुखम्) उत्तम-उत्तम सुखों को अच्छी प्रकार दीजिये॥५९॥

भावार्थः—परमेश्वर की उपासना के विना किसी मनुष्य का शरीर, आत्मा और प्रजा का दुःख दूर होकर सुख नहीं हो सकता, इससे उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना आदि के करने और औषधियों के सेवन से शरीर, आत्मा, पुत्र, मित्र और पशु आदि के दुःखों को यत्न से निवृत्त करके सुखों को सिद्ध करना उचित है॥५९॥