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अध्यायः ४
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, जालस्थलीय-संस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः ४


पुनर्मन इत्यस्याङ्गिरस ऋषयः। अग्निर्देवता। ब्राह्मी बृहती छन्दः। मध्यमः स्वरः॥

जीवा अग्निवाय्वादिनिमित्तेन जागरणे पुनर्जन्मनि वा प्रसिद्धानि मनआदीनीन्द्रियाणि प्राप्नुवन्तीत्युपदिश्यते॥

जीव अग्नि, वायु आदि पदार्थों के निमित्त से जगने के समय वा दूसरे जन्म में प्रसिद्ध मन आदि इन्द्रियों को प्राप्त होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पुन॒र्मनः॒ पुन॒रायु॑र्म॒ऽआग॒न् पुनः॑ प्रा॒णः पुन॑रा॒त्मा म᳖ऽआग॒न् पुन॒श्चक्षुः॒ पुनः॒ श्रोत्रं॑ म॒ऽआग॑न्। वै॒श्वा॒न॒रोऽद॑ब्धस्तनू॒पाऽअ॒ग्निर्नः॑ पातु दुरि॒ताद॑व॒द्यात्॥१५॥

पदपाठः—पुनः॑। मनः॑। पुनः॑। आयुः॑। मे॒। आ। अ॒ग॒न्। पुन॒रिति॒ पुनः॑। प्रा॒णः। पुनः॑। आ॒त्मा। मे॒। आ। अ॒ग॒न्। पुन॒रिति॒ पुनः॑। चक्षुः॑। पुन॒रिति॒ पुनः॑। श्रोत्र॑म्। मे॒। आ। अ॒ग॒न्। वै॒श्वा॒न॒रः। अद॑ब्धः। त॒नू॒पा इति॑ तनू॒ऽपाः। अ॒ग्निः। नः॒ पा॒तु॒। दु॒रि॒तादिति॑ दुःइ॒तात्। अ॒व॒द्यात्॥१५॥

पदार्थः—(पुनः) शयनानन्तरं जागरणे, द्वितीये जन्मनि वा (मनः) विज्ञानसाधकम् (पुनः) पश्चाज्जन्मानन्तरम् (आयुः) येन जीवनम् (मे) मह्यम् (आ) समन्तात् (अगन्) प्राप्नोति। अत्र सर्वत्र लडर्थे लुङ्। मन्त्रे घस॰। [अष्टा॰२.४.८०] इति च्लेर्लुक्। मो नो धातोः। [अष्टा॰८.२.६४] इति मकारस्य नकारः (पुनः) वारंवारम् (प्राणः) शरीराधारकः (पुनः) पश्चात् मनुष्यदेहधारणानन्तरम् (आत्मा) अतति सर्वत्र व्याप्नोतीति सर्वान्तर्य्यामी परमात्मा, स्वस्वभावो वा (मे) मह्यम् (आ) अभितः (अगन्) प्राप्नोति (पुनः) पश्चात् (चक्षुः) चष्टे येन तद्रूपग्राहकमिन्द्रियम् (पुनः) अग्रे (श्रोत्रम्) शृणोति शब्दान् येन तच्छब्दग्राहकमिन्द्रियम् (मे) मह्यम् (आ) आभिमुख्ये (अगन्) प्राप्नोति (वैश्वानरः) शरीरनेता जाठराग्निः, सर्वस्य नेता परमेश्वरो वा (अदब्धः) हिंसितुमनर्हः (तनूपाः) यः शरीरमात्मानं च रक्षति (अग्निः) अन्तःस्थो विज्ञानस्वरूपो वा (नः) अस्मान् (पातु) पालयति पालयतु वा (दुरितात्) पापजन्यात् प्राप्तव्याद् दुःखाद् दुष्टकर्मणो वा (अवद्यात्) पापाचरणात्। अयं मन्त्रः (शत॰३.२.२.२३) व्याख्यातः॥१५॥

अन्वयः—यस्य सम्बन्धेन कृपया वा मे मह्यं जागरणे पुनर्जन्मनि वा मन आयुः पुनरागन्, मे मम प्राणः पुनरागन्, आत्मा पुनरागन्, मे मह्यं चक्षुः पुनरागन्, श्रोत्रं पुनरागन्। सोऽदब्धस्तनूपा वैश्वानरोऽग्निर्नोऽस्मानवद्याद् दुरितात् पातु पालयति पालयतु वा॥१५॥

भावार्थः—अत्र श्लेषालङ्कारः। यदा जीवाः शयनं मरणं च प्राप्नुवन्ति, तदा यानि कार्य्यसिद्धिसाधनानि मन आदीनीन्द्रियाणि प्रलीनानीव भूत्वा पुनः पुनर्जागरणे जन्मान्तरे वा प्राप्नुवन्ति, तानि यस्य विद्युदग्न्यादेः सम्बन्धेन परमेश्वरस्य सत्ता व्यवस्थाभ्यां वा सगोलकानि भूत्वा कार्य्यकरणसमर्थानि भवन्ति, स सम्यक् सेवितो जाठराग्निः सर्वं रक्षत्युपासितो जगदीश्वरः पापकर्मणः सकाशान्निवर्त्त्य धर्मे प्रवर्त्य पुनः पुनर्मनुष्यजन्मानि प्रापय्य दुष्टाचाराद् दुःखेभ्यश्च पृथक्कृत्वाऽऽभ्युदयिकं नैःश्रेयसिकं च सुखं प्रापयति॥१५॥

पदार्थः—जिसके सम्बन्ध वा कृपा से (मे) मुझ को जो (मनः) विज्ञानसाधक मन (आयुः) उमर (पुनः) फिर-फिर (आगन्) प्राप्त होता (मे) मुझ को (प्राणः) शरीर का आधार प्राण (पुनः) फिर (आगन्) प्राप्त होता (आत्मा) सब में व्यापक सब के भीतर की सब बातों को जानने वाले परमात्मा का विज्ञान (आगन्) प्राप्त होता (मे) मुझको (चक्षुः) देखने के लिये नेत्र (पुनः) फिर (आगन्) प्राप्त होते और (श्रोत्रम्) शब्द को ग्रहण करने वाले कान (आगन्) प्राप्त होते हैं, वह (अदब्धः) हिंसा करने अयोग्य (तनूपाः) शरीर वा आत्मा की रक्षा करने और (वैश्वानरः) शरीर को प्राप्त होने वाला (अग्निः) अग्नि वा विश्व को प्राप्त होने वाला परमेश्वर (नः) हम लोगों को (अवद्यात्) निन्दित (दुरितात्) पाप से उत्पन्न हुए दुःख वा दुष्ट कर्मों से (पातु) पालन करता है॥१५॥

भावार्थः—इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जब जीव सोने वा मरण आदि व्यवहार को प्राप्त होते हैं, तब जो-जो मन आदि इन्द्रिय नाश हुए के समान होकर फिर जगने वा जन्मान्तर में जिन कार्य्य करने के साधनों को प्राप्त होते हैं, वे इन्द्रिय जिस विद्युत् अग्नि आदि के सम्बन्ध परमेश्वर की सत्ता वा व्यवस्था से शरीर वाले होकर कार्य्य करने को समर्थ होते हैं, मनुष्यों को योग्य है कि (जो) वह अच्छे प्रकार सेवन किया हुआ जाठराग्नि सब की रक्षा करता और जो उपासना किया हुआ जगदीश्वर पापरूप कर्मों से अलग कर धर्म में प्रवृत्त कर बार-बार मनुष्यजन्म को प्राप्त कराकर दुष्टाचार वा दुःखों से पृथक् करके इस लोक वा परलोक के सुखों को प्राप्त कराता है॥१५॥