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अध्यायः ५
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, जालस्थलीय-संस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः ५


इरावतीत्यस्य वसिष्ठ ऋषिः। विष्णुर्देवता। स्वराडार्षी त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥

पुनरीश्वरसूर्यगुणा उपदिश्यन्ते॥

अगले मन्त्र में ईश्वर और सूर्य के गुणों का उपदेश किया है॥

इ॒रा॑वती धेनु॒मती॒ हि भू॒तꣳ सूय॑व॒सिनी॒ मन॑वे दश॒स्या।

व्य॑स्कभ्ना॒ रोद॑सी विष्णवे॒ते दा॒धर्त्थ॑ पृथि॒वीम॒भितो॑ म॒यूखैः॒ स्वाहा॑॥१६॥

पदपाठः—इरा॑वती॒ इतीरा॑ऽवती। धे॒नु॒मती॒ इति॑ धे॒नु॒ऽमती॑। हि। भू॒तम्। सू॒य॒व॒सिनी॑। सु॒य॒व॒सिनी॒ इति॑ सु॒ऽयव॒सिनी॑। मन॑वे। द॒श॒स्या। वि। अ॒स्क॒भ्नाः॒। रोद॑सी॒ इति॒ रोद॑सी। वि॒ष्णो॒ऽइति॑ विष्णो। ए॒तेऽइत्ये॒ते॑। दा॒धर्त्थ॑। पृ॒थि॒वीम्। अ॒भितः॑। म॒यूखैः॑। स्वाहा॑॥१६॥

पदार्थः—(इरावती) इराः प्रशस्तान्यन्नानि विद्यन्ते यस्यां सा। अत्र प्रशंसार्थे मतुप्। इरेत्यन्ननामसु पठितम्। (निघं२।७) (धेनुमती) प्रशस्ता बहवो धेनवो वाचः पशवो वा सन्त्यस्यां सा। अत्र प्रशंसार्थे भूम्यर्थे च मतुप्। (हि) किल (भूतम्) उत्पन्नं सर्व जगत् (सूयवसिनी) बहूनि शोभनानि मिश्रितान्यमिश्रितानि वस्तूनि विद्यन्ते यस्यां सा (मनवे) मन्यते येन ज्ञानेन तस्मै बोधाय (दशस्या) दशा इवाचरति तस्मै। अत्र बाहुलकादसुन्, स च कित्, तत आचारे क्यच्च। (वि) विशेषार्थे। (अस्कभ्नाः) प्रतिबध्नासि प्रतिबध्नाति वा। (रोदसी) प्रकाशपृथिवीलोकसमूहौ। (विष्णो) सर्वव्यापिन् जगदीश्वर! व्यापनशीलः प्राणो वा। (एते) विद्वांसः। (दाधर्थ) धरसि धरति वा। दाधर्ति। (अष्टा७।४।६५) अनेनायं यङ्लुगन्तो निपातितः। (पृथिवीम्) भूमिमन्तरिक्षं वा। पृथिवीत्यन्तरिक्षनामसु पठितम्। (निघं१।३) (अभितः) सर्वतः (मयूखैः) ज्ञानप्रकाशादिगुणैः रश्मिभिर्वा। मयूखा इति रश्मिनामसु पठितम्। (निघं१। ५) (स्वाहा) वेदवाणी चक्षुरिन्द्रियं वा। अयं मन्त्रः (शत३। ५। ३। १४) व्याख्यातः॥१६॥

अन्वयः—हे विष्णो जगदीश्वर! यस्त्वं येरावती धेनुमती सूयवसिनी भूमिं स्वाहा हि किल वाणीं भूतमुत्पन्नं सकलं जगच्च मयूरखैरभितो दाधर्थ धरसि रोदसी व्यस्कभ्नाः प्रतिबध्नासि तस्मै दशस्याय मनवे वयमेते च सर्वं जगन्निवेदयामो निवेदयन्तीत्येकः॥

यो विष्णुः प्राणो येरावती धेनुमती सूयवसिनी भूमिर्वाग्वास्ति तां पृथिवीं स्वाहा वागिन्द्रियं च मयूखैरभितो दाधर्थ धरति, रोदसी व्यस्कभ्नाः प्रतिबध्नाति, तस्मै दशस्याय मनवे प्राणाय भूतं हि किलोत्पन्नं सर्वं कार्यं जगत्प्रकाशितुं समर्थं प्राणं सर्वे विजानीतेति द्वितीयः॥१६॥

भावार्थः—अत्र श्लेषालङ्कारः। यथा सूर्यः स्वकिरणैः स्वकान्तिभिः सर्वं भूम्यादिकं जगत्संस्तभ्याकृष्य धरति, तथैव परमेश्वरः प्राणो वा स्वसामर्थ्येन सर्वं प्राणादिकं जगद्रचित्वा संधार्य व्यवस्थापयति॥१६॥

पदार्थः—हे (विष्णो) सर्वव्यापी जगदीश्वर! जो आप जिस (इरावती) उत्तम अन्नयुक्त (धेनुमती) प्रशंसनीय बहुत वाणीयुक्त प्रजा वा पशुयुक्त (सूयवसिनी) बहुत मिश्रित, अमिश्रित वस्तुओं से सहित भूमि वा वाणी (पृथिवीम्) भूमि (हि) निश्चय करके (स्वाहा) वेदवाणी वा (भूतम्) उत्पन्न हुए सब जगत् को (मयूखैः) ज्ञानप्रकाशकादि गुणों से (अभितः) सब ओर से (दाधर्थ) धारण और (रोदसी) प्रकाश वा पृथिवीलोक का (व्यस्कभ्नाः) सम्यक् स्तम्भन करते हो उन (मनवे) विज्ञानयुक्त (दशस्या) दंशन अर्थात् दांतों के बीच में स्थित जिह्वा के समान आचरण करने वाले आपके लिये (एते) ये हम लोग सब जगत् को निवेदन करते हैं॥१॥१६॥

जो (विष्णो) व्यापनशील प्राण जो (इरावती) उत्तम अन्नयुक्त (धेनुमती) पशुसहित (सूयवसिनी) बहुत मिश्रित, अमिश्रित पदार्थ वाली भूमि वा वाणी है, उस (पृथिवीम्) भूमि (स्वाहा) वा इन्द्रिय को (मयूखैः) किरणों, अपने बल आदि (अभितः) सब प्रकार (दाधर्थ) धारण करता वा (रोदसी) प्रकाश-भूमि को (व्यस्कभ्नाः) स्तम्भन करता है, उस (दशस्या) दशन और दांत के समान आचरण करने वा (मनवे) विज्ञापनयुक्त सूर्य के लिये (हि) निश्चय करके (भूतम्) सब जगत् को करने के लिये ईश्वर ने दिया है, ऐसा (एते) ये सब हम लोग जानते हैं॥२॥१६॥

भावार्थः—इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से सब भूमि आदि जगत् को प्रकाश आकर्षण और विभाग करके धारण करता है, वैसे ही परमेश्वर और प्राण ने अपने सामर्थ्य से सब सूर्य आदि जगत् को धारण करके अच्छे प्रकार स्थापन किया है॥१६॥