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अध्यायः ५
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, जालस्थलीय-संस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः ५


उद्दिवमित्यस्यौतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः। यज्ञो देवता। ब्राह्मी जगती छन्दः। निषादः स्वरः॥

सेवितः सभाध्यक्षोऽनुष्ठितो यज्ञश्च किं करोतीत्युपदिश्यते॥

अच्छे प्रकार सेवन किया हुआ सभापति और अनुष्ठान किया हुआ यज्ञ क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

उद्दिव॑ꣳ स्तभा॒नान्तरि॑क्षं पृण॒ दृꣳह॑स्व पृथि॒व्यां द्यु॑ता॒नस्त्वा॑ मारु॒तो मि॑नोतु मि॒त्रावरु॑णौ ध्रु॒वेण॒ धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनि॑ क्षत्र॒वनि॑ रायस्पोष॒वनि॒ पर्यू॑हामि। ब्रह्म॑ दृꣳह क्ष॒त्रं दृ॒ꣳहायु॑र्दृꣳह प्र॒जां दृ॑ꣳह॥२७॥

पदपाठः—उत्। दिव॑म्। स्त॒भा॒न॒। आ। अ॒न्तरि॑क्षम्। पृ॒ण॒। दृꣳह॑स्व। पृ॒थि॒व्याम्। द्यु॒ता॒नः। त्वा॒। मा॒रु॒तः। मि॒नो॒तु॒। मि॒त्राव॑रुणौ। ध्रु॒वेण॑। धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनीति॑ ब्रह्म॒ऽवनि॑। त्वा॒। क्ष॒त्र॒वनीति॑ क्षत्र॒ऽवनि॑। रा॒य॒स्पो॒ष॒वनीति॑ रायस्पोष॒ऽवनि॑। परि॑। ऊ॒हा॒मि॒। ब्रह्म॑। दृ॒ꣳह॒। क्ष॒त्रम्। दृ॒ꣳह॒। आयुः॑। दृ॒ꣳह॒। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। दृ॒ꣳह॒॑॥२७॥

पदार्थः—(उत्) उत्कृष्टे (दिवम्) प्रकाशम् (स्तभान) (अन्तरिक्षम्) आकाशं तत्रस्थप्राणिवर्गं च। अत्र तात्स्थ्योपाधिना प्राणिनामपि ग्रहणम्। (पृण) अत्रान्तर्भाविणिजर्थः (दृंहस्व) वर्धय (पृथिव्याम्) भूमौ (द्युतानः) यथा दिवं सद्विद्यागुणं विस्तारयति तथा (त्वा) त्वाम् (मारुतः) वायुः (मिनोतु) प्रक्षिपति (मित्रावरुणौ) यथा प्राणापानौ तथा। (ध्रुवेण) निश्चलेन (धर्मणा) धर्मेण (ब्रह्मवनि) यथा ब्रह्मविद्यासम्भाजितारं तथा। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् [अष्टा७.१.३९] इति विभक्तेर्लुक्। (त्वा) त्वाम् (क्षत्रवनि) क्षत्रस्य राज्यस्य संसेवयितारं तथा (रायस्पोषवनि) यथा रायो धनसमूहस्य पोषं पुष्टिं वनन्ति सेवन्ते यस्मात् तथा (परि) सर्वतः (ऊहामि) वितर्कयामि (ब्रह्म) विद्या विद्वांसं वा (दृंह) वर्धय वर्धयति वा (क्षत्रम्) राज्यं क्षण्यते हिंस्यते नश्यते पदार्थो येन सः क्षत् घातादिस्ततस्त्रायते रक्षतीति क्षत्रः क्षत्रियादिवीरस्तम् (दृंह) वर्धय (आयुः) जीवनम् (दृंह) वर्धय (प्रजाम्) उत्पादनीयाम् (दृंह) वर्धय। अयं मन्त्रः (शत३। ६। १। १५-१८) व्याख्यातः॥२७॥

अन्वयः—हे परमविद्वन्! यथा त्वा त्वां मारुतो ध्रुवेण धर्मणा मिनोति मित्रावरुणौ मिनुतस्तथा त्वं कृपयाऽस्मदर्थं दिवमुत्तभानान्तरिक्षं पृण, पृथिव्यां द्युतानः सन् सुखानि दृंह, ब्रह्म दृंह, क्षत्रं दृंहायुर्दृंह, प्रजां दृंह, ब्रह्मवनिं क्षत्रवनिं रायस्पोषवनिं त्वामहं पर्यूहामि, तथा त्वां सर्वे मनुष्याः पर्यूहन्तु॥२७॥

भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या! यूयं यथा जगदीश्वरः सत्यभावेन प्रार्थितः सद्विद्वाँश्च सेवितः सर्वान् सुखयति, तथैवायं यज्ञो विद्यादीन् संवृध्य सर्वान् मनुष्यादीन् प्राणिनः सुखयतीति विजानीत॥२७॥

पदार्थः—हे परम विद्वन्! जैसे (त्वा) आपको (मारुतः) वायु (ध्रुवेण) निश्चल (धर्मणा) धर्म से (मिनोतु) प्रयुक्त करे (मित्रावरुणौ) प्राण और अपान भी धर्म से प्रयुक्त करते हैं, वैसे आप कृपा करके हम लोगों के लिये (दिवम्) विद्या गुणों के प्रकाश को (उत्तभान) अज्ञान से उधाड़ देओ तथा (अन्तरिक्षम्) सब पदार्थों के अवकाश को (पृण) परिपूर्ण कीजिये (पृथिव्याम्) भूमि पर (द्युतानः) सद्विद्या के गुणों का विस्तार करते हुए आप सुखों को (दृंहस्व) बढ़ाइये (ब्रह्म) वेदविद्या को (दृंह) बढ़ाइये (क्षत्रम्) राज्य को बढ़ाइये (आयुः) अवस्था को (दृंह) बढ़ाइये और (प्रजाम्) उत्पन्न हुई प्रजा को (दृंह) वृद्धियुक्त कीजिये। इसलिये मैं (ब्रह्मवनि) ब्रह्मविद्या को सेवन करने वा कराने (क्षत्रवनि) राज्य को सेवन करने-कराने (रायस्पोषवनि) और धनसमूह की पुष्टि को सेवने वा सेवन कराने वाले आप को (पर्यूहामि) सब प्रकार के तर्कों से निश्चय करता हूं, वैसे आप मुझ को सर्वथा सुखदायक हूजिये और आप को सब मनुष्य तर्कों से जानें॥२७॥

भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग जैसे जगदीश्वर सत्य भाव से प्रार्थित और सेवन किया हुआ अत्युत्तम विद्वान् सब को सुख देता है, वैसे यह यज्ञ भी विद्या गुण को बढ़ाकर सब जीवों को सुख देता है, यह जानो॥२७॥