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अध्यायः २
दयानन्दसरस्वती
मन्त्रः १७ →
सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, वैबसंस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः २


वसुभ्यस्त्वेति सर्वस्य ऋषिः स एव। पूर्वार्द्धे द्यावापृथिवी मित्रावरुणौ च देवताः। निचृदार्ची पङ्क्तिश्छन्दः। पञ्चमः स्वरः। व्यन्तुवय इत्यारभ्यान्तपर्य्यन्तस्याग्निर्देवता। भुरिक् त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥

तस्मात् किं भवतीत्युपदिश्यते॥

उक्त यज्ञ से क्या होता है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥

 

वसु॑भ्यस्त्वा रु॒द्रेभ्य॑स्त्वादि॒त्येभ्य॑स्त्वा॒ संजा॑नाथां द्यावापृथिवी मि॒त्रावरु॑णौ त्वा॒ वृष्ट्या॑वताम्। व्यन्तु॒ वयो॒क्तꣳ रिहा॑णा म॒रुतां॒ पृष॑तीर्गच्छ व॒शा पृश्नि॑र्भू॒त्वा दिवं॑ गच्छ॒ ततो॑ नो॒ वृष्टि॒माव॑ह। च॒क्षु॒ष्पाऽअ॑ग्नेऽसि॒ चक्षु॑र्मे पाहि॥१६॥

पदपाठः— वसु॑भ्य॒ इति॒ वसु॑ऽभ्यः। त्वा॒। रु॒द्रेभ्यः॑। त्वा॒। आ॒दि॒त्येभ्यः॑। त्वा॒। सम्। जा॒ना॒था॒म्। द्या॒वा॒पृथि॒वी॒ऽ इति॑ द्यावाऽपृथिवी। मि॒त्रावरु॑णौ। त्वा॒। वृष्ट्या॑। अ॒व॒ता॒म्। व्यन्तु॑। वयः॑। अ॒क्तम्। रिहा॑णाः। म॒रुता॑म्। पृष॑तीः। ग॒च्छ॒। व॒शा। पृश्निः॑। भू॒त्वा। दिव॑म्। ग॒च्छ॒। ततः॑। नः। वृष्टि॑म्। आ॑। व॒ह॒। च॒क्षु॒ष्पाः। अ॒ग्ने॒। अ॒सि॒। चक्षुः॑। मे॒। पा॒हि॒॥१६॥

पदार्थः— (वसुभ्यः) अग्न्यादिभ्योऽष्टभ्यः (त्वा) तं पूर्वोक्तं यज्ञम् (रुद्रेभ्यः) पूर्वोक्तेभ्य एकादशभ्यः (त्वा) तम् (आदित्येभ्यः) द्वादशभ्यो मासेभ्यः (त्वा) तं क्रियासमूहम् (सम्) सम्यगर्थे (जानाथाम्) जानीतः, प्रादुर्भूतविद्यासाधिके भवतः। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च (द्यावापृथिवी) सूर्य्यप्रकाशो भूमिश्च। अत्र दिवो द्यावा [अष्टा॰६.३.२९] इति द्यावादेशः (मित्रावरुणौ) यः सर्वप्राणो बहिःस्थो वायुर्वरुणोऽन्तस्थ उदानो वायुश्च तौ (त्वा)  तमिमं संसारम् (वृष्ट्या) शुद्धजलवर्षणेन (अवताम्) रक्षतः (व्यन्तु) व्यन्ति प्राप्नुवन्ति। अत्र सर्वत्र लडर्थे लोट्। (वयः) पक्षिण इव गायत्र्यादीनि छन्दांसि (अक्तम्) प्रकटं वस्तु सुखं वा (रिहाणाः) अर्चकाः। रिहतीत्यर्चतिकर्मसु पठितम् (निघं॰३.१४) (मरुताम्) वायूनाम् (पृषतीः) पृषन्ति सिञ्चन्ति याभिर्नाडीभिर्नदीभिर्यास्ताः (गच्छ) गच्छति (वशा) कामिताहुतिः (पृश्निः) अन्तरिक्षस्थाः। पृश्निरिति साधारण नामसु पठितम् (निघं॰१.४) (भूत्वा) भावयित्वा। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः (दिवम्) सूर्य्यप्रकाशम् (गच्छ) गच्छति (ततः) तस्मात् (नः) अस्माकम् (वृष्टिम्) जलसमूहम् (आ) समन्तात् क्रियायोगे (वह) वहति प्रापयति (चक्षुष्पाः) चक्षुर्दर्शनं रक्षतीति सः (अग्ने) अग्निर्भौतिकः (असि) भवति। अत्र सर्वत्र पुरुषव्यत्ययः (चक्षुः) बाह्यमाभ्यन्तरं विज्ञानं, तत्साधनं वा (मे) मम (पाहि) पाति रक्षति॥ अयं मन्त्रः (शत॰१.८.३.७-१९) व्याख्यातः॥१६॥

अन्वयः— वयं वसुभ्यस्त्वा तं रुद्रेभ्यस्त्वा तमादित्येभ्यस्त्वा तं नित्यं प्रोहामः। यज्ञेनेमे द्यावापृथिवी संजानाथाम्। मित्रावरुणौ वृष्ट्या त्वा तमिमं संसारं द्यावापृथिवीस्थमवतामवतः। यथा वयः पक्षिणोऽक्तं व्यक्तं स्थानं व्यन्तु व्यन्ति गच्छन्ति, तथा रिहाणा वयं छन्दोभिस्तं यज्ञं नित्यमनुतिष्ठामः। यज्ञे कृताहुतिर्वशा पृश्निरन्तरिक्षे भूत्वा मरुतां संगेन दिवं गच्छ गच्छति सा ततो नोऽस्माकं वृष्टिमावह समन्ताद्वर्षयति, तज्जलं पृषतीर्नाडीर्नदीर्वा गच्छति यतोऽयमग्निश्चक्षुष्पा अस्यस्त्यतो मे मम चक्षुः पाहि पाति॥१६॥

भावार्थः— अत्र लुप्तोपमालङ्कारः प्रोहामि। अपोहामीति पदद्वयानुवृत्तिश्च। मनुष्यैरग्नौ याऽहुतिः क्रियते सा वायोः संगेन मेघमण्डलं गत्वा सूर्य्याकर्षितजलं शुद्धं भावयित्वा, पुनस्तस्मात् पृथिवीमागत्यौषधीः पुष्णाति। सा वेदमन्त्रैरेव कर्त्तव्या, यतस्तस्याः फलज्ञाने नित्यं श्रद्धोत्पद्येत। अयमग्निः सूर्यरूपो भूत्वा सर्वं प्रकाशयत्यतो दृष्टिव्यवहारस्य पालनं जायते। एतेभ्यो वस्वादिभ्यो विद्योपकारेण दुष्टानां गुणानां प्राणिनां चापोहनं निवारणं नित्यं कर्त्तव्यम्। इदमेव सर्वेषां पूजनं सत्करणं चेति।

यत्पूर्वेण मन्त्रेणोक्तं तदनेन विशिष्टतया प्रकाशितमिति॥१६॥

पदार्थः— हम लोग (वसुभ्यः) अग्नि आदि आठ वसुओं से (त्वा) उस यज्ञ को तथा (रुद्रेभ्यः) पूर्वोक्त एकादश रुद्रों से (त्वा) पूर्वोक्त यज्ञ को और (आदित्येभ्यः) बारह महीनों से (त्वा) उस क्रियासमूह को नित्य उत्तम तर्कों से जानें और यज्ञ से ये (द्यावापृथिवी) सूर्य्य का प्रकाश और भूमि (संजानाथाम्) जो उन से शिल्पविद्या उत्पन्न हो सके, उनके सिद्ध करने वाले हों और (मित्रावरुणौ) जो सब जीवों का बाहिर का प्राण और जीवों के शरीर में रहने वाला उदानवायु है, वे (वृष्ट्या) शुद्ध जल की वर्षा से (त्वा) जो संसार सूर्य्य के प्रकाश और भूमि में स्थित है, उसकी (अवताम्) रक्षा करते हैं। जैसे (वयः) पक्षी अपने-अपने ठिकानों को रचते और (व्यन्तु) प्राप्त होते हैं, वैसे उन छन्दों से (रिहाणाः) पूजन करने वाले हम लोग (त्वा) उस यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं और जो यज्ञ में हवन की आहुति (पृश्निः) अन्तरिक्ष में स्थिर और (वशा) शोभित (भूत्वा) होकर (मरुताम्) पवनों के संग से (दिवम्) सूर्य्य के प्रकाश को (गच्छ) प्राप्त होती है, वह (ततः) वहाँ से (नः) हम लोगों के सुख के लिये (वृष्टिम्) वर्षा को (आवह) अच्छे प्रकार वर्षाती है, उस वर्षा का जल (पृषतीः) नाड़ी और नदियों को प्राप्त होता है। जिस कारण यह अग्नि (चक्षुष्पाः) नेत्रों की रक्षा करने वाला (असि) है, इससे (मे) हमारे (चक्षुः) नेत्रों के बाहिरले भीतरले विज्ञान की (पाहि) रक्षा करता है॥१६॥

भावार्थः— इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य लोग यज्ञ में जो आहुति देते हैं, वह वायु के साथ मेघमण्डल में जाकर सूर्य्य से खिंचे हुए जल को शुद्ध करती है, फिर वहाँ से वह जल पृथिवी में आकर ओषधियों को पुष्ट करता है। वह उक्त आहुति वेदमन्त्रों से ही करनी चाहिये, क्योंकि उसके फल को जानने में नित्य श्रद्धा उत्पन्न होवे। जो यह अग्नि सूर्य्यरूप होकर सब को प्रकाशित करता है, इसी से सब दृष्टिव्यवहार की पालना होती है। ये जो वसु आदि देव कहाते हैं, इनसे विद्या के उपकारपूर्वक दुष्ट गुण और दुष्ट प्राणियों को नित्य निवारण करना चाहिये, यही सब का पूजन अर्थात् सत्कार है।

जो पूर्व मन्त्र में कहा था, उसका इससे विशेषता करके प्रकाश किया है॥१६॥