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अध्यायः २
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, वैबसंस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः २


वेदोऽसीत्यस्य वामदेव ऋषिः। प्रजापतिर्देवता। भुरिग्ब्राह्मी बृहती छन्दः। मध्यमः स्वरः॥

स जगदीश्वरः कीदृशोऽस्तीत्युपदिश्यते॥

सो जगदीश्वर कैसा है। सो इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

वे॒दो᳖ऽसि॒ येन॒ त्वं दे॑व वेद दे॒वेभ्यो॑ वे॒दोऽभ॑व॒स्तेन॒ मह्यं॑ वे॒दो भूयाः॑।

देवा॑ गातुविदो गा॒तुं वि॒त्त्वा गा॒तुमि॑त। मन॑सस्पतऽइ॒मं दे॑व य॒ज्ञꣳ स्वाहा॒ वाते॑ धाः॥२१॥

पदपाठः— वे॒दः। अ॒सि॒। येन॑। त्वम्। दे॒व॒। वे॒द॒। दे॒वेभ्यः॑। वे॒दः। अभ॑वः। तेन॑। मह्य॑म्। वे॒दः॒। भू॒याः॒। देवाः॑। गा॒तु॒वि॒द॒ इति॑ गातुऽविदः। गा॒तुम्। वि॒त्त्वा। गा॒तुम्। इ॒त॒। मन॑सः। प॒ते॒। इ॒मम्। दे॒व॒। य॒ज्ञम्। स्वाहा॑। वाते॑। धाः॒॥२१॥

पदार्थः— (वेदः) वेत्ति चराचरं जगत् स जगदीश्वरः। विदन्ति येन स ऋग्वेदादिर्वा (असि) भवसि वा (येन) विज्ञानेन वेदेन वा (त्वम्) (देव) शुभगुणदातः (वेदः) जानासि वेत्ति वा (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (वेदः) वेदयिता (अभवः) भवसि (तेन) विज्ञानप्रकाशनेन (मह्यम्) विज्ञानं जिज्ञासवे (वेदः) ज्ञापकः (भूयाः) (देवाः) विद्वांसः (गातुविदः) गीयते स्तूयतेऽनया सा गातुः स्तुतिस्तस्या विदो वक्तारः। कमिमनिजनि॰ (उणा॰१.७३) अनेन गास्तुताविस्यस्मात् तुः प्रत्ययः (गातुम्) गीयते ज्ञायते येन स गातुर्वेदस्तम्। गातुरिति पदनामसु पठितम् (निघं॰४.१) अनेन ज्ञानार्थो गृह्यते (वित्त्वा) लब्ध्वा (गातुम्) गीयते शब्द्यते यस्तं यज्ञम् (इत) प्राप्नुत (मनसः) विज्ञानस्य (पते) पालक (इमम्) प्रत्यक्षमनुष्ठितमनुष्ठातव्यं वा (देव) सर्वजगत्प्रकाशक (यज्ञम्) क्रियाकाण्डजन्यं संसारम् (स्वाहा) सुष्ठु आहुतं हविः करोत्यनया सा (वाते) वायौ (धाः) धापय धापयति वा। अत्र सर्वत्र पक्षान्तरे व्यत्ययेन प्रथमः। बहुलं छन्दस्यामाङ्योगेऽपि [अष्टा॰६.४.७५] इत्य[भावः॥ अयं मन्त्रः (शत॰१.९.२.२१-२८) व्याख्यातः॥२१॥

अन्वयः— हे देव जगदीश्वर! येन त्वं वेदोऽसि सर्वं च वेद, येन च त्वं देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन त्वं मह्यमपि वेदो भूयाः। हे गातुविदो देवा भवन्तो येन वेदेन सर्वा विद्या विदन्ति, येन यूयं गातुं वित्त्वा गातुमित। हे मनसस्पते देव! त्वमिमं यज्ञं वाते धाः स्वाहा हे देवास्तमिमं मनसस्पतिं परमेश्वरमेव देवं नित्यमुपासीध्वम्॥२१॥

भावार्थः— हे विद्वांसो मनुष्या! यूयं येन सर्ववेत्रा वेदविद्या प्रकाशिता तमेवोपास्यं विदित्वा क्रियाकाण्डमनुष्ठाय सर्वहितं सम्पादयत। नैव वेदविज्ञानेन तत्रोक्तविधानानुकूलस्यानुष्ठानेन च विना मनुष्याणां कदाचित् सुखं सम्भवति, वेदविद्यया सर्वसाक्षिणमीश्वरं देवं सर्वतो व्यापकं मत्वैव नित्यं धर्मस्यानुष्ठातारो भवतेति॥२१॥

पदार्थः— हे (देव) शुभ गुणों के देनेहारे जगदीश्वर! (त्वम्) आप (वेदः) चराचर जगत् के जानने वाले (असि) हैं, सब जगत् को (वेद) जानते हैं तथा (येन) जिस विज्ञान वा वेद से (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (वेदः) पदार्थों के जानने वाले (अभवः) होते हैं, (तेन) उस विज्ञान के प्रकाश से आप (मह्यम्) मेरे लिये, जो कि मैं विशेष ज्ञान की इच्छा कर रहा हूँ, (वेदः) विज्ञान देने वाले (भूयाः) हूजिये। हे (गातुविदः) स्तुति के जानने वाले (देवाः) विद्वानो! जिस वेद से मनुष्य सब विद्याओं को जानते हैं, उससे तुम लोग (गातुम्) विशेष ज्ञान को (वित्त्वा) प्राप्त होकर (गातुम्) प्रशंसा करने योग्य वेद को (इत) प्राप्त हो। हे (मनसस्पते) विज्ञान से पालन करने हारे (देव) सर्वजगत् प्रकाशक परमेश्वर आप (इमम्) प्रत्यक्ष अनुष्ठान करने योग्य (यज्ञम्) क्रियाकाण्ड से सिद्ध होने वाले यज्ञरूप संसार को (स्वाहा) क्रिया के अनुकूल (वाते) पवन के बीच (धाः) स्थित कीजिये। हे विद्वानो! उस विज्ञान से विशेष ज्ञान देने वाले परमेश्वर ही की नित्य उपासना करो॥२१॥

भावार्थः— हे विद्वान् मनुष्यो! तुम लोगों को जिस वेद जानने वाले परमेश्वर ने वेदविद्या प्रकाशित की है, उसकी उपासना करके उसी वेदविद्या को जान कर और क्रियाकाण्ड का अनुष्ठान करके सब का हित सम्पादन करना चाहिये, क्योंकि वेदों के विज्ञान के विना तथा उसमें जो-जो कहे हुए काम हैं, उनके किये विना मनुष्यों को कभी सुख नहीं हो सकता। तुम लोग वेदविद्या से जो सब का साक्षी ईश्वर देव है, उस को सब जगह व्यापक मानके नित्य धर्म में रहो॥२१॥