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अध्यायः २
दयानन्दसरस्वती
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सम्पादकः — डॉ॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री, वैबसंस्करण-सम्पादकः — डॉ॰ नरेश कुमार धीमान्
यजुर्वेदभाष्यम्/अध्यायः २


दिवीत्यस्य ऋषिः स एव। सत्रस्य विष्णुर्देवता। दिवीत्यारभ्य द्विष्म इत्यन्तस्य निचृदार्ची। तथाऽन्तरिक्षमित्यारभ्य द्विष्मः पर्य्यन्तस्यार्ची पङ्क्तिश्छन्दः। पञ्चमः स्वरः। पृथिव्यामित्यारभ्यान्तपर्य्यन्तस्य जगती छन्दो निषादः स्वरश्च॥

स यज्ञस्त्रिषु लोकेषु विस्तृतः सन् किं किं सुखं साधयतीत्युपदिश्यते॥

वह यज्ञ तीनों लोक में विस्तृत होकर कौन-कौन सुख का साधन होता है, सो अगले मन्त्र में प्रकाशित किया है॥

 

दि॒वि विष्णु॒र्व्य᳖क्रꣳस्त॒ जाग॑तेन॒ च्छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो॒ यो᳕ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो᳕ऽन्तरि॑क्षे॒ विष्णु॒र्व्य᳖क्रꣳस्त॒ त्रैष्टु॑भेन॒ च्छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो॒ यो᳕ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः। पृ॑थि॒व्यां विष्णु॒र्व्य᳖क्रꣳस्त गाय॒त्रेण॒ च्छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो॒ यो᳕ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो᳕ऽस्मादन्ना॑द॒स्यै प्र॑ति॒ष्ठाया॒ऽअग॑न्म॒ स्वः᳕ सं ज्योति॑षाभूम॥२५॥

पदपाठः— दि॒वि। विष्णुः॑। वि। अ॒क्र॒ꣳस्त॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। ततः॑। निर्भ॑क्त॒ इति॒ निःऽभ॑क्तः। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। अ॒न्तरि॑क्षे। विष्णुः॑। वि। अ॒क्र॒ꣳस्त॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैस्तु॑भेन। छन्द॑सा। ततः॑। निर्भ॑क्त॒ इति निःऽभ॑क्तः। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। पृ॒थि॒व्याम्। विष्णुः॑। वि। अ॒क्र॒ꣳस्त॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। ततः॑। निर्भ॑क्त॒ इति॒ निःऽभ॑क्तः। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। अ॒स्मात्। अन्ना॑त्। अ॒स्यै। प्र॒ति॒ष्ठायै॑। प्र॒ति॒स्थाया॒ इति॑ प्रति॒ऽस्थायै॑। अग॑न्म। स्व॒रिति॒ स्वः᳕। सम्। ज्योति॑षा। अ॒भू॒म॒॥२५॥

पदार्थः— (दिवि) सूर्य्यप्रकाशे (विष्णुः) यो वेवेष्टि व्याप्नोत्यन्तरिक्षस्थलवाय्वादिपदार्थान् स यज्ञः। यज्ञो वै विष्णुः (शत॰१.१.२.१३) (वि) विविधार्थे क्रियायोगे (अक्रꣳस्त) क्रमते। अत्र सर्वत्र लडर्थे लङ् (जागतेन) जगत्येव जागतं सर्वलोकसुखकारकं तेन (छन्दसा) आह्लादकारकेण (ततः) तस्मात् द्युलोकात् (निर्भक्तः) विभागं प्राप्तः (यः) विरोधी (अस्मान्) यज्ञानुष्ठातॄन् (द्वेष्टि) विरुणद्धि (यम्) शासितुं योग्यं दुष्टं प्राणिनम् (च) पुनरर्थे (वयम्) यज्ञक्रियानुष्ठातारः (द्विष्मः) विरुन्ध्मः (अन्तरिक्षे) अवकाशे (विष्णुः) यज्ञः (वि) विविधगमने क्रियार्थे (अक्रꣳस्त) गच्छति (त्रैष्टुभेन) त्रिष्टुबेव त्रैष्टुभं त्रिविधसुखहेतुस्तेन (छन्दसा) स्वच्छन्दताप्रदेन (ततः) तस्मादन्तरिक्षात् (निर्भक्तः) पृथग्भूतः (यः) दुःखप्रदः प्राणी (अस्मान्) सर्वोपकारकान् (द्वेष्टि) दुःखयति (यम्) सर्वाहितकरम् (च) समुच्चये (वयम्) सर्वहितकारिणः (द्विष्मः) पीडयामः (पृथिव्याम्) विस्तृतायां भूमौ (विष्णुः)  यज्ञः (वि) विविधसुखसाधने (अक्रꣳस्त) विविधसुखप्राप्तिहेतुना क्रमते (गायत्रेण) गायत्र्यमेव गायत्रं तेन रक्षणसाधनेन (छन्दसा) आनन्दप्रदेन (ततः) तस्मात् पृथिवीस्थानात् (निर्भक्तः) पृथग्भूत्वाऽन्तरिक्षं गतः (यः) अस्मद्राज्यविरोधी (अस्मान्) न्यायाधीशान् (द्वेष्टि) वैरायते (यम्) शत्रुम् (च) समुच्चये (वयम्) राज्याधीशाः (द्विष्मः) वैरायामहे (अस्मात्) प्रत्यक्षाद् यज्ञशोभितात् (अन्नात्) अत्तुं योग्यात् (अस्यै) प्रत्यक्षं प्राप्तायै (प्रतिष्ठायै) प्रतितिष्ठन्ति सत्कारं प्राप्नुवन्ति यस्यां तस्यै (अगन्म) प्राप्नुयाम (स्वः) सुखम्। स्वरिति साधारणनामसु पठितम् (निघं॰१.४) (सम्) सम्यगर्थे (ज्योतिषा) विद्याधर्मप्रकाशकारकेण संयुक्ताः (अभूम) संगता भवेम॥ अयं मन्त्रः (शत॰१.९.३.८-१४) व्याख्यातः॥२५॥

अन्वयः— अस्माभिर्जागतेन छन्दसाऽनुष्ठितोऽयं विष्णुर्यज्ञो दिवि व्यक्रंस्त स पुनस्ततो निर्भक्तः सन् छन्दसा सर्वं जगत् प्रीणाति, योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमनेन निराकुर्मः। अस्माभिर्योऽयं यज्ञस्त्रैष्टुभेन छन्दसाऽग्नौ प्रयोजितेऽन्तरिक्षे व्यक्रꣳस्त स पुनस्ततः स्थानान्निर्भक्तः सन् वायुवृष्टिजलशुद्धिद्वारा सर्वं जगत् सुखयति, योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमनेन निवारयामः। अस्माभिर्योऽयं विष्णुर्यज्ञो गायत्रेण छन्दसा पृथिव्यामनुष्ठीयते, स पृथिव्यां व्यक्रंस्त स ततो निर्भक्तः सन् पृथिवीस्थान् पदार्थान् पोषयति। योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमनेन निषिध्यामः। वयमस्मादन्नात् स्वरगन्म। वयमनेन यज्ञेनास्यै प्रतिष्ठायै ज्योतिषा संयुक्ताः समभूम भवेम॥२५॥

भावार्थः— मनुष्यैर्यावन्ति सुगन्ध्यादिगुणयुक्तानि द्रव्याण्यग्नौ प्रक्षिप्यन्ते, तानि पृथक्-पृथक् भूत्वा सूर्य्यप्रकाशे आकाशे भूमौ च विहृत्य सर्वाणि सुखानि साधयन्ति। तथा च वाय्वग्निजलपृथिव्यादीनि शिल्पविद्यासिद्धैः कलायन्त्रैर्विमानादियानेषु प्रयोज्यन्ते, तानि सूर्य्यप्रकाशेऽन्तरिक्षे च सर्वान् प्राणिनः सुखेन विहारयन्ति। यद् द्रव्यं सूर्य्यकिरणाग्निद्वारा विच्छिद्यान्तरिक्षं [गच्छति] पुनस्तदेव भुवमागत्य पुनर्भूमेः सकाशादुपरि गत्वा, पुनस्तत आगच्छत्येवमेव पुनः पुनर्मनुष्यैरित्थं पुरुषार्थेन दोषदुःखशत्रून् सम्यक् निवार्य्य सुखं भोक्तव्यं भोजयितव्यं च। यज्ञशोधितैर्वायुजलौषध्यन्नैरारोग्यबुद्धिशरीरबलवर्धनान्महत्सुखं प्राप्य विद्याप्रकाशेन नित्यं प्रतिष्ठीयताम्॥२५॥

पदार्थः— (जागतेन) सब लोकों के लिये सुख देने वाले (छन्दसा) आह्लादकारक जगती छन्द से हमारा अनुष्ठान किया हुआ यह (विष्णुः) अन्तरिक्ष में ठहरने वाले पदार्थों में व्यापक यज्ञ (दिवि) सूर्य्य के प्रकाश में (व्यक्रंस्त) जाता है, वह फिर (ततः) वहाँ से (निर्भक्तः) विभाग अर्थात् परमाणुरूप होके सब जगत् को तृप्त करता है। (यः) जो विरोधी शत्रु (अस्मान्) यज्ञ के अनुष्ठान करने वाले हम लोगों से (द्वेष्टि) विरोध करता है (च) तथा (यम्) दण्ड देकर शिक्षा करने योग्य जिस दुष्ट प्राणी से (वयम्) हम लोग यज्ञ के अनुष्ठान करने वाले (द्विष्मः) अप्रीति करते हैं, उसको उसी यज्ञ से दूर करते हैं। हम लोगों ने जो यह (विष्णुः) यज्ञ (त्रैष्टुभेन) तीन प्रकार के सुख करने और (छन्दसा) स्वतन्त्रता देने वाले त्रिष्टुप् छन्द से अग्नि में अच्छी प्रकार संयुक्त किया है, वह (अन्तरिक्षे) आकाश में (व्यक्रंस्त) पहुँचता है, वह फिर (ततः) उस अन्तरिक्ष से (निर्भक्तः) अलग हो के वायु और वर्षा जल की शुद्धि से सब संसार को सुख पहुँचाता है (यः) जो दुःख देने वाला प्राणी (अस्मान्) सब के उपकार करने वाले हम लोगों को (द्वेष्टि) दुःख देता है (च) तथा (यम्) सब के अहित करने वाले दुष्ट को (वयम्) हम लोग सब के हित करने वाले (द्विष्मः) पीड़ा देते हैं, उसे उक्त यज्ञ से निवारण करते हैं। हम लोगों से जो (विष्णुः) यज्ञ (गायत्रेण) संसार की रक्षा सिद्ध करने और (छन्दसा) अति आनन्द करने वाले गायत्री छन्द  से निरन्तर किया जाता है, वह (पृथिव्याम्) विस्तारयुक्त इस पृथिवी में (व्यक्रंस्त) विविध सुखों की प्राप्ति के हेतु से विस्तृत होता है, (ततः) उस पृथिवी से (निर्भक्तः) अलग होकर अन्तरिक्ष में जाकर पृथिवी के पदार्थों की पुष्टि करता है। (यः) जो पुरुष हमारे राज्य का विरोधी (अस्मान्) हम लोग जो कि न्याय करने वाले हैं, उन से (द्वेष्टि) वैर करता है (च) तथा (यम्) जिस शत्रु जन से (वयम्) हम लोग न्यायाधीश (द्विष्मः) वैर करते हैं, उसका इस उक्त यज्ञ से नित्य निषेध करते हैं। हम लोग (अस्मात्) यज्ञ से शोधा हुआ प्रत्यक्ष (अन्नात्) जो भोजन करने योग्य अन्न है, उस से (स्वः) सुखरूपी स्वर्ग को (अगन्म) प्राप्त हों तथा (अस्यै) इस प्रत्यक्ष प्राप्त होने वाली (प्रतिष्ठायै) प्रतिष्ठा अर्थात् जिसमें सत्कार को प्राप्त होते हैं, उसके लिये (ज्योतिषा) विद्या और धर्म के प्रकाश से संयुक्त (समभूम) अच्छी प्रकार हों॥२५॥

भावार्थः— जो-जो मनुष्य लोग सुगन्धि आदि पदार्थ अग्नि में छोड़ते हैं, वे अलग-अलग होकर सूर्य्य के प्रकाश तथा भूमि में फैलकर सब सुखों को सिद्ध करते हैं तथा जो वायु, अग्नि, जल और पृथिवी आदि पदार्थ शिल्पविद्यासिद्ध कलायन्त्रों से विमान आदि यानों में युक्त किये जाते हैं, वे सब सूर्य्यप्रकाश वा अन्तरिक्ष में सुख से विहार करते हैं। जो पदार्थ सूर्य्य की किरण वा अग्नि के द्वारा परमाणुरूप होके अन्तरिक्ष में जाकर फिर पृथिवी पर आते हैं, फिर भूमि से अन्तरिक्ष वा वहाँ से भूमि को आते-जाते हैं, वे भी संसार को सुख देते हैं। मनुष्यों को उचित है कि इसी प्रकार बार-बार पुरुषार्थ से दोष, दुःख और शत्रुओं को अच्छी प्रकार निवारण करके सुख भोगना भुगवाना चाहिये तथा यज्ञ से शुद्ध वायु, जल, ओषधि और अन्न की शुद्धि के द्वारा आरोग्य, बुद्धि और शरीर के बल की वृद्धि से अत्यन्त सुख को प्राप्त होके विद्या के प्रकाश से नित्य प्रतिष्ठा को प्राप्त होना चाहिये॥२५॥