लक्ष्मीतन्त्रम्/अध्यायः ३८

← अध्यायः ३७ लक्ष्मीतन्त्रम्
अध्यायः ३८
[[लेखकः :|]]
अध्यायः ३९ →
लक्ष्मीतन्त्रस्य अध्यायाः

अष्टत्रिंशोऽध्यायः - 38
श्रीः---
एको नारायणो देवः पूर्णषाड्‌गुण्यविग्रहः।
तस्याहं परमा शक्तिरेकाहंता सनातनी ।। 1 ।।
1. - - - - - - - - - - - -
साधकानुग्रहार्थाय साहं साकारतां गता।
अङ्कस्था देवदेवस्य यथा पूज्ये{1} तथा शृणु ।। 2 ।।
2. - - - - - - - - - - - - - - -
{1. पूज्या F. }
प्राप्यानुज्ञां गणेशादेर्हृत्स्थामावाहयेत्ततः।
भावयेत् परमात्मानमन्तर्यागाभिपूजितम्{2} ।। 3 ।।
3. - - - - - - - - - - - - -
{2. यागादिपूजितम् B. C. }
पूर्णस्तिमितषाड्‌गुण्यं मया {3}शक्त्याभिपूरितम्।
तारकं {4}तत् त्रिरुच्चार्य तारिकां तु त्रिरुच्चरेत् ।। 4 ।।
4. - - - - - - - - - - - - - - - -
{3. शक्त्यादिपूजितम् B. C. }
{4. तु F. }
आवाहयेत् ततो मन्त्रं पुंलिङ्गं समुदीरयन्।
पुरुषं पुण्डरीकाक्षं पीनोदारचतुर्भुजम् ।। 5 ।।
5. पुंलिङ्गं मन्त्रमिति। प्रणवमित्यर्थः।
{5}उच्चरन् परमं मन्त्रं रेचकेन शनैः शनैः।
अग्नीषोमद्वयान्तः स्थवर्त्मना नासिकोदरात् ।। 6 ।।
6. - - - - - - - - - - - - -
{5. उच्चरेत् A. B. G. }
दिव्यशक्तिसमावासं लक्ष्मीशमवतारयेत्।
अनाहतात् पदाद्यद्वा सर्वतः समतां गतम् ।। 7 ।।
7. अनाहतं हृदयस्थं द्वादशदलं पद्मम्।
निर्गतं तु स्मरेद्देवं विद्युत्पुञ्चमिवाम्बुदात्।
सपुष्पाञ्जलिमध्यस्थं भावासनगतं न्यसेत् ।। 8 ।।
8. - - - - - - - - - - - -
संनिधिं संनिरोधं च संस्तम्भं स्थापनं तथा।
कुर्वन् मुद्राचतुष्कं तु मनसा सम्यगाचरेत् ।। 9 ।।
9. संनिध्यादीनां मुद्रा अनन्तरमेव वक्ष्यन्ते।
उत्तानौ संहतौ पाणी कृत्वाङ्गुष्ठद्वयेन तु।
स्वां स्वां कनिष्ठिकां मृज्यात् संनिधीकरणं तु तत् ।। 10 ।।
10. - - - - - - - - - - - - - - - -
अनामयोर्मध्यमयोः कुर्यादुन्मार्जनं तथा{6}।
संस्तम्भसंनिरोधौ च द्वौ कृतौ भवतस्तदा ।। 11 ।।
11. - - - - - - - - - - - - -
{6. तदा C.; ततः F. }
कृत्वा चतसृभिर्मुष्टिमङ्‌गुलीभिः करद्वये।
तिर्यक् च संमुखीकृत्य न्यसेन्मुष्टिद्वयोपरि ।। 12 ।।
12. - - - - - - - - - - - - -
अङ्‌गुष्ठद्वितयं शक्र संस्थापनमिदं भवेत्।
एवंभूतो भवत्येवं तारादिं मन्त्रमुच्चरन् ।। 13 ।।
13. - - - - - - - - - - - -
कालं पाद्यार्घ्यदानान्तमुत्थितं भावयेद्धरिम्।
स्नानाभरणवस्रस्रग्दानेऽलंकरणे तथा ।। 14 ।।
14. कालमिति। काले इत्यर्थः। अत्यन्तसंयोगे द्वितीया।
अन्यत्र भोगयागेषु तत्तद्भोगानुकूलतः।
स्मरेच्छास्रीयसंस्थानं सानुकम्पं सुसंमुखम् ।। 15 ।।
15. सानुकम्पं सुसंमुखमिति च हरिविशेषणम्।
क्लृप्ते तु विग्रहे पूर्वं तथारूपोऽवतिष्ठते।
भोगेषु दीयमानेषु शक्तिर्या मन्मयी परा ।। 16 ।।
16. - - - - - - - - - - - -
तत्रस्थां तां स्मरेत् साक्षादाददानो हरिर्यथा।
{7}आहूतस्य ततः सार्घ्यं पुष्पाणां पूर्णमञ्जलिम् ।। 17 ।।
17. आहूतस्येति। सांनिध्यं प्रापितस्येत्यर्थः।
{7. अभूतस्य F. }
विक्षिप्याधोमुखैनैव पाणियुग्मेन मूर्धनि।
तारेण तारया द्वाभ्यां {8}नमसा चार्चयेत् क्रमात् ।। 18 ।।
18. - - - - - - - - - - - - - - -
{8. मनसा B. }
पुष्पार्घ्यधूपलेपैस्तु{9} मूलमन्त्रादिभिः क्रमात्।
संक्षेपं विस्तरं चापि यथाकालं समाचरेत् ।। 19 ।।
19. लेपः चन्दनाद्यनुलेपः।
{9. लेपधूपैस्तु B. C. }
शक्तिं तदङ्गसंपूर्णां निराकारामनूपमाम्।
तारया पूजयेत् पस्चात्तत्तदङ्गेषु देवताः ।। 20 ।।
20. अनूपमाम्; अनुपमामित्यर्थः।
अस्रभूषणशक्त्याद्याः स्वैः स्वैर्मन्त्रैः समर्चयेत्।
अयं यागो लयो नाम महान् सर्वार्थसिद्धिदः ।। 21 ।।
21. - - - - - - - - - - - - -
ततो भगवतो विष्णोः शक्तिसंपूर्णविग्रहात्।
सर्वशक्तिमयीं दिव्यामेकां परमभास्वराम् ।। 22 ।।
22. - - - - - - - - - - - -
षाड्‌गुण्यविग्रहां देवीमनिर्देश्यामनूपमाम्।
सर्वत्र सर्वदा विष्णोः सर्वथैवानपायिनीम् ।। 23 ।।
23. - - - - - - - - - - - -
कृपया साधकार्थाय स्वयं साकारतां गताम्।
अविहायैव{10} तं देवमाकारं पृथगेयुषीम् ।। 24 ।।
24. - - - - - - - - - - - -
{10. अविभान्त्येव C. }
उक्तक्रमेण मां पूर्वं मन्त्रेणावाहयेत् सुधीः।
आवाहनविधौ प्रोक्तं क्रमं सर्वं समाचरेत् ।। 25 ।।
25. - - - - - - - - - - - -
वामोत्सङ्गे निषण्णां च विष्णोर्मां भावयेत् प्रियाम्।
भावनीयं च मद्रूपं पूर्वमेव निदर्शितम् ।। 26 ।।
26. - - - - - - - - - - - -
{11}तस्यां लयप्रकारेण मयि सर्वं यजेत् क्रमात्।
ततो विनिःसृतं मत्तः स्मरेच्छक्त्यादिकं क्रमात् ।। 27 ।।
27. - - - - - - - - - - - - - -
{11. अस्यां B. }
ज्वालायाः सुप्रदीप्तायाः स्फुलिङ्गनिचयं यथा।
भोगस्थाने यथैकैकं विन्यसेत्तत्तथा शृणु ।। 28 ।।
28. - - - - - - - - - - - -
मध्याब्जकर्णिकामध्ये भावासनगतौ स्मरेत्।
पुरुषं पुण्डरीकाक्षं तदङ्कस्थां च पङ्कजाम् ।। 29 ।।
29. - - - - - - - - - - - - - -
प्राच्याब्जकर्णिकामध्ये लक्ष्मीदेहाद्विनिर्गताम्।
द्विभुजां भावयेल्लक्ष्मीं द्विनेत्रां चारुकुण्डलाम् ।। 30 ।।
30. - - - - - - - - - - - - -
श्वेतमाल्याम्बरधरां हारकेयूरभूषिताम्।
सर्वलक्षणसंपन्नां पीनोन्नतपयोधराम् ।। 31 ।।
31. - - - - - - - - - -
प्रबुद्धोत्पलविस्तीर्णलोचनां सुस्मिताननाम्।
चलद्विरेफपटलरमणीयालकावलिम्{12} ।। 32 ।।
32. - - - - - - - - - - - -
{12. वलीम् B. }
लसल्ललाटतिलकामारक्ताधरपल्लवाम्।
कृष्णकुञ्चितकेशां च वंशमुक्ताफलद्विजाम् ।। 33 ।।
33. - - - - - - - - - - - -
पद्मासनोपविष्टां च पाशाह्कुशकरद्वयीम्।
पद्मगर्भोपमाकारां संमुखीमावयोः स्मरेत् ।। 34 ।।
34. - - - - - - - - - - - -
स्मरेद्दक्षिणभागाब्जकर्णिकोदरमध्यगाम्।
वेषभूषादिभिस्तुल्यां लक्ष्म्याः कुन्दनिभां तु वा ।। 35 ।।
35. - - - - - - - - - - - - - -
कीर्तिं मद्रूपनिष्क्रान्तां सर्वकीर्तिमयीं पराम्।
आवयोः पश्चिमाब्जस्थकर्णिकासनसंस्थिताम् ।। 36 ।।
36. - - - - - - - - - - - - -
मद्रूपनिःसृतां ध्यायेत्तादृशीमरुणां जयाम्।
स्मरेदुत्तरपद्मस्थकर्णिकोदरमध्यगाम् ।। 37 ।।
37. - - - - - - - - - - - -
मायां मद्रूपनिष्क्रान्तां तादृशीमरुणां तु वा।
आग्नेये हृदयं पद्मे शिरो यातुसरोरुहे ।। 38 ।।
38. - - - - - - - - - - - -
शिखां तु वायवीयाब्जे वर्म चेशानपङ्कजे।
मध्यपद्मपुरःपत्रे नेत्रमस्रं तु कोणके ।। 39 ।।
39. - - - - - - - - - - - -
नेत्रस्य पुरतो देवं वासुदेवं विचिन्तयेत्।
मध्यदक्षिणदिक्पत्रे स्मरेत् संकर्षणं प्रबुम् ।। 40 ।।
40. - - - - - - - - - - - -
स्मरेन्मध्यसरोजस्य प्रद्युम्नं पश्चिमे दले।
अनिरुद्धमुदक्संस्थे कोणपत्रयुगद्वये ।। 41 ।।
41. - - - - - - - - - - -
अस्रस्य पृष्ठतो नागान् स्मरेत् पीयूषवर्ष्मणः{13}।
{14}गुल्गुलुं च गुरुण्यं च मदनं {15}शललं तथा ।। 42 ।।
42. गुल्गुल्वादयः नागानां संज्ञाः।
{13. वर्षिणः A. }
{14. गुग्गुलुं C. }
{15. गललं B. C. F. }
{16}सुधाकुम्भकरान् शङ्खकुन्दगौरांश्चतूरदान्।
लक्ष्मीकमलपत्रेषु सर्वतः सौस्तुभं न्यसेत् ।। 43 ।।
43. - - - - - - - - - - - -
{16. B and C. omit three lines from here. }
हृत्पङ्कजदलेष्वेवं वनमालां निवेशयेत्।
कीर्तिपङ्कजपत्रेषु भूषापद्मं निवेशयेत् ।। 44 ।।
44. - - - - - - - - - - - -
जयापङ्कजपत्रेषु {17}वर्म पद्मदलेषु च।
पद्मेषु विन्यसेदेवं पद्मपत्रचतुष्टये ।। 45 ।।
45. - - - - - - - - - - - -
{17. पत्र B. }
शिरःपङ्कजपत्रेषु {18}न्यसेदङ्‌कुशमुत्तमम्।
न्यसेद् द्वारचतुष्काग्रे गरुडं पततां वरम् ।। 46 ।।
46. - - - - - - - - - - - -
{18. विन्यसेत्पाशमुत्तमम् A. B. C. }
नागान् वा तत आत्मीयद्वाराग्रेषु नियोजयेत्।
पूर्वद्वारभुवि न्यस्येत् पद्महस्तां बलाकिकाम् ।। 47 ।।
47. - - - - - - - - - - - - - -
श्वेतां कमलपत्राक्षीं प्रसन्नां वामनाकृतिम्।
दक्षिणद्वारतस्तद्वन्नीलां तु वनमालिकाम् ।। 48 ।।
48. - - - - - - - - - - - -
पश्चिमद्वारमध्ये तु रक्तवर्णां विभीषिकाम्।
उदीच्यद्वारमद्ये तु शंकरीं मधुदीधितिम् ।। 49 ।।
49. - - - - - - - - - - - - -
प्रागादीशानपर्यन्ते बहिर्द्वारप्रदेशतः{19}।
इन्द्रादीन् संस्मरेदष्टौ लोकपालान् सवाहनान् ।। 50 ।।
50. - - - - - - - - - - - - - -
{19. प्रवेशतः B. }
अत ऊर्ध्वं च नागेशं ब्रह्माणं च विचिन्तयेत्।
तद्बहिश्च तदस्राणि वज्रादीनि विचिन्तयेत् ।। 51 ।।
51. - - - - - - - - - - - -
सोमशंकरदिङ्मध्ये खस्थितं संस्मरेत् प्रबुम्।
विष्वक्सेनमुदाराङ्गमायान्तं गगनान्तरात् ।। 52 ।।
52. - - - - - - - - - - - -
अनुक्तानामिदानीं मे ध्यानं शृणु पुरंदर।
अमृतात्मानमभ्राङ्गं पुण्डरीकायतेक्षणम् ।। 53 ।।
53. - - - - - - - - - - - -
शङ्खचक्रगदापद्मधरं श्रीवत्सवक्षसम्।
पीताम्बरं चतुर्बाहुं वासुदेवं विचिन्तयेत् ।। 54 ।।
54. - - - - - - - - - - - -
तुषारनिचयाकारं नीलवस्रं चतुर्भुजम्।
स्मरेत् संकर्षणं सीरसौनन्दकधरं परम् ।। 55 ।।
55. सौनन्दकः कामपालस्य गदा।
वरदाभयहस्तं च निमग्नोद्धरणक्षमम्।
प्रद्युम्नं संस्मरेद्रक्तं रक्तवाससमीश्वरम् ।। 56 ।।
56. - - - - - - - - - - -
शार्ङ्गं शरांश्च बिब्राणं वरदं चाभयप्रदम्।
संस्मरेदनिरुद्धं च पीतं विशदवाससम् ।। 57 ।।
57. - - - - - - - - - - - -
खड्‌गखेटकहस्तं च वराभयकरं परम्।
आसीनाः सर्व एवैते पुरुषाः पुष्करेक्षणाः ।। 58 ।।
58. - - - - - - - - - - - -
पश्यन्तो दिशमीशानां मां च विष्णुं च शाश्वतम्।
सिञ्चन्तोऽमृतकुम्भैर्नौ हिमशैलनिभा गजाः ।। 59 ।।
59. - - - - - - - - - - - -
सितशोणितवर्णाङ्गं शुक्लवस्रं चतुर्भुजम्।
पद्मासनोपविष्टं च पद्मशङ्खकराङ्कितम् ।। 60 ।।
60. - - - - - - - - - - - - -
हृन्मुद्रालंकृतकरं वामेनाभयदं सदा।
सिताभरणवस्राढ्यं कर्पूरालिप्तविग्रहम् ।। 61 ।।
61. - - - - - - - - - - - -
आवयोः संमुखासीनं हृन्मन्त्रं संस्मरेद् बुधः।
वन्धुजीवोपमं रक्तं पद्मचक्रधरं परम् ।। 62 ।।
62. - - - - - - - - - - - -
काकालिकज्जलश्यामं पद्मकौमोदकीधरम्।
दक्षिणेनात्ममुद्राढ्यं परेणाभयदायिनम् ।। 63 ।।
63. काक इव, अलिरिव, कज्जलमिव च श्यामः ; तमित्यर्थः। अथवा काकालिः अत्यन्तकृष्णवर्णः काकविशेषः।
लिप्तं मृगमदेनैव पुष्पाद्यैरसितैर्युतम्।
आवयोः संमुखासीनं कवचं संस्मरेत् प्रभुम् ।। 64 ।।
64. - - - - - - - - - - - - -
हरिद्रारुणसंकाशं गदापद्मधरं क्रमात्।
स्वमुद्राकरणव्यग्रपूर्वभागकरद्वयम् ।। 65 ।।
65. - - - - - - - - - -
{20}सौवर्णाम्बरभूषाढ्यं प्रलयानलविक्रमम्।
आवयोः संमुखासीनं स्मरेदस्रं महोद्यमम् ।। 66 ।।
66. - - - - - - - - - - - -
{20. सुवर्णा A. B. F. }
नारीर्वा संस्मरेदेतान् हृदादीन् साधकोत्तमः।
उक्तभूषणवेषाढ्याः स्वानुरूपानुलेपनाः ।। 67 ।।
67. - - - - - - - - - - - -
इत्युक्तं ध्यानमङ्गानां सर्वपापहरं शुभम्।
कौस्तुभं द्विभुजं ध्यायेत् सहस्रार्कसमप्रभम् ।। 68 ।।
68. - - - - - - - - - - - - -
प्रदीप्तवेषभूषाढ्यं स्वमुद्रां दधतं हृदि।
पञ्चवर्णकृतां कान्तां वनमालां शुभेक्षणाम् ।। 69 ।।
69. वनमालामिति। ध्यायेदिति शेषः।
प्रौढस्रीसदृशीं मुद्रां दधतीं हस्तयोर्द्वयोः।
पद्मं पद्ममुखं ध्यायेत् प्रसन्नं चन्द्रसंनिभम् ।। 70 ।।
70. - - - - - - - - - - - - -
द्विभुजं चारुसर्वाङ्गं कराभ्यां मुद्रिकां दधत्।
नवदूर्वाङ्कुरश्यामं पाशेशं पन्नगाननम्{21} ।। 71 ।।
71. - - - - - - - - - - - - -
{21. पन्नगाशनम् A. G. }
द्विभुजं याम्यहस्तेन स्वां मुद्रां दधतं परम्।
तथा वरदहस्तं च भीमरूपं भयावहम्{22} ।। 72 ।।
72. याम्यहस्तेन। दक्षिणहस्तेनेत्यर्थः।
{22. भयानकम् A. }
संस्मरेदङ्कुशं तीक्ष्णं दीर्घनासं भयानकम्।
याम्येन दधतं मुद्रां पाणिना सव्यतो वरम् ।। 73 ।।
73. - - - - - - - - - - - -
प्रसिद्धा लोकपालास्ते वेषाकृतिविभूषणैः।
नराकृतीनि शस्राणि चिह्नयुक्तानि मूर्धनि ।। 74 ।।
74. द्वारपालिकाः बलाकिकादयः पूर्वं 47,48,49 श्लोकेषूक्ताः।
शङ्खचक्रधरो ध्येयो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः।
साक्षाद्विष्णुसमो मुद्राव्यापृतोऽन्यकरद्वये ।। 75 ।।
75. - - - - - - - - - - - -
द्वाराग्रस्थं ततो ध्यायेद्गरुडं बीमलोचनम्।
रक्ततुण्डं महाघोणं तप्तचामीकरप्रभम् ।। 76 ।।
76. - - - - - - - - - - - -
पृथुदंष्ट्रं गृध्रवक्त्रं पक्षमण्डलमण्डितम्।
इति ते परिवाराणां ध्यानमुक्तं समासतः ।। 77 ।।
77. - - - - - - - - - - - -
आवयोः स्थूलयोरूर्ध्वे स्मरेत् सूक्ष्मां तु तारिकाम्।
दांपत्यं बिभ्रतीं सूक्ष्मां लक्ष्यालक्ष्यामिवानघाम् ।। 78 ।।
78. - - - - - - - - - - - - - -
तदूर्ध्वे तु परां तारां पूर्णषाड्‌गुण्यचिन्मयीम्।
दांपत्यमावयोर्दिव्यं तत्परं पारमेश्वरम् ।। 79 ।।
79. - - - - - - - - - - - -
सर्वतःपाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
शब्दार्थौ भासयत् स्वेन तेजसा नित्यमुद्यता ।। 80 ।।
80. - - - - - - - - - - - - -
प्रतिबिम्बमिवैतस्मिन् मन्त्रचक्रमशेषतः।
एवं क्रमोत्क्रमाकारैस्तारिकां विततां पराम् ।। 81 ।।
81. - - - - - - - - - - - - -
भावेन तत्त्वतो बुद्ध्वा यथान्यासं {23}समर्चयेत्।
आदितः सकलावासावर्चयेन्नौ धियानघौ ।। 82 ।।
82. - - - - - - - - - - - -
{23. समाचरेत् B. C. }
अर्घ्यादिप्रापणान्तेन भोगजालेन मन्त्रवित्।
शक्त्यादिविष्वक्सेनान्तं परिवारं ततोऽर्चयेत् ।। 83 ।।
83. - - - - - - - - - - - - -
सर्वादौ गरुडं देवीश्चतस्रो द्वारपालिकाः।
भोगयागक्रमेणायं{24} न्यासस्ते शक्र दर्शितः।
यावन्तो यादृशा ये च भोगास्तांस्त्वं निबोध मे ।। 84 ।।
84. - - - - - - - - - - - - - -
{24. क्रमः सोऽयं B. F. }
इति {25}श्रीपाञ्चरात्रसारे लक्ष्मीतन्त्रे बहिर्यागप्रकाशो नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः
{25. श्रीपञ्चरात्र A; श्रीपाञ्चरात्रे B. }
********इत्यष्टत्रिंशोऽध्यायः********