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अग्निपुराणम्/अध्यायः २४

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अग्निपुराणम्
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  360. अध्यायः ३६०
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  363. अध्यायः ३६३
  364. अध्यायः ३६४
  365. अध्यायः ३६५
  366. अध्यायः ३६६
  367. अध्यायः ३६७
  368. अध्यायः ३६८
  369. अध्यायः ३६९
  370. अध्यायः ३७०
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  374. अध्यायः ३७४
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  377. अध्यायः ३७७
  378. अध्यायः ३७८
  379. अध्यायः ३७९
  380. अध्यायः ३८०
  381. अध्यायः ३८१
  382. अध्यायः ३८२
  383. अध्यायः ३८३

कुण्डनिर्माणादिविधिःसम्पाद्यताम्

नारद उवाच
अग्निकार्य्यं प्रवक्ष्यामि येन स्यात्सर्वकामभाक्।
चतुरभ्यधिकं विंशमङ्गुलं चतुरस्त्रकम् ।। १ ।।

सूत्रेण सूत्रयित्वा तु क्षेत्रं तावत् खनेत्समम्।
खातस्य मेखला कार्य्या त्यक्त्वा चैवाङ्गुलद्वयम् ।। २ ।।

सत्त्वादिसञ्ज्ञा पूर्वाशा द्वाददशाङ्गुल्मुच्छ्रिता।
अष्टाङ्घुला द्व्यङ्गुलाथ चतुरङ्गुलविस्तृता ।। ३ ।।

योनिर्द्दशाङ्गला रम्या षट्चतुद्वर्यङ्गुलाग्रगा।
क्रमान्निम्ना तु कर्त्तव्या पश्चिमाशाव्यवश्थिता ।। ४ ।।

अश्वत्थपत्रस्दृशी किञ्चित् कुण्डे निवेशिता।
तुर्य्याङ्गुलायता नालं पञ्चदशाङ्गुलायत् ।। ५ ।।

मूल्न्तु त्र्यङ्गुलं योन्या अग्रं तस्याः षडङ्गुलम्।
लक्षणञ्चैकहस्तस्य द्दिगुणं द्विकरादिष् ।। ६ ।।

एकत्रिमेखलं कुण्डं वर्तुलादि वदाम्यहम्।
कुण्डर्द्धे तु स्थियतं सूत्रं कोणे यदतिरिच्यते ।। ७ ।।

तदर्द्धं दिशि संस्थाप्य भ्रामितं वर्त्तुलं भवेत्।
कुण्डार्द्धं दिशाश्चोत्तरतो वहिः ।। ८ ।।

पूर्वपश्चिमतो यत्नाल्लाञ्लयित्वा तु मध्यतः।
संस्थाप्य भ्रामितं कुण्डमर्द्धचन्द्रं भवेत् शुभम् ।। ९ ।।

पद्माकारे दलानि स्युर्मेखलानान्तु वर्त्तु ले।
बाहुदण्डप्रमाणन्तु होमार्थं कारयेत् स्त्रुचम् ।। १० ।।

सप्तपञ्चाङ्गुलं वापि चतुरस्त्रन्तु कारयेत्।
त्रिभागेन भवेद्‌गर्त्तं मध्यं वृत्तं सुशोभनम् ।। ११ ।।

तिर्य्यगूद्‌र्ध्वं समं खाताद्वहिरर्द्धन्तु शोधयेत्।
अङ्गुलस्य चतुर्थाशं शेषार्द्धार्द्ध तथान्ततः ।। १२ ।।

खातस्य मेखलां रम्यां शेषार्द्धेन तु कारयेत्।
कण्ठं त्रिभागविस्तारं अङ्गुष्ठकसमायतम् ।। १३ ।।

सार्द्धमङ्गुष्ठकं वा स्यात्तदग्रे तु मुखं भवेत्।
चतुरङ्गुलविस्तारं पञ्चाङ्गुलमथापि वा ।। १४ ।।

त्रिकं द्व्यङ्गुलकं तत् स्यान्मध्यन्तस्य सुशोभनम्।
आयामस्तत्समस्तस्य मध्यनिम्नः सुशोभनः ।। १५ ।।

शुषिरं कण्ठदेशे स्याद्विशेद् यावत् कनीयसी।
शेषकुण्डन्तु कर्त्तव्यं यथारुचि विचित्रितम् ।। १६ ।।

स्त्रुवन्तु हस्तमात्रं स्याद्दण्डकेन समन्वितम् ।
वटुकं द्व्यङ्गुलं वृत्तं कर्त्तव्यन्तु सुशोभनम् ।। १७ ।।

गोपदन्तु यथा मग्नमल्पपङ्केतथा भवेत्।
उपलिप्य लिखेद्रेखामङ्गुलां वज्रनासिकाम् ।। १८ ।।

सौम्याग्रा प्रथमा तस्यां रेखे पूर्वमुखे तयो।
मध्ये तिस्त्रस्तथा कुर्य्याद्दक्षिणादिक्रमेण तु ।। १९ ।।

एवमुल्लिख्य चाभ्युक्ष्य प्रणवेन तु मन्त्रवित्।
विष्टरं कल्पयेत्तेन तस्मिन् शक्तिन्तु वैष्णवीम् ।। २० ।।

अलं कृत्वा मूर्तिमतीं क्षिपेदग्निं हरिं स्मरन्।
प्रादेशमात्राः समिधो दत्त्वा परिसमुह्य तम् ।। २१ ।।

दर्ब्भैस्त्रिधा परिस्तीर्य पूर्वादौ तत्र पात्रकम्।
आसादयेदिध्मवह्नी भूमौ च श्रुक्‌श्रुवद्वयम् ।। २२ ।।

आज्यस्थाली चरुस्थाली कुशाज्यञ्च प्रणीतया।
प्रोक्षयित्वा प्रोक्षणीञ्च गृहीत्वापूर्य्य वारिणा ।। २३ ।।

पवित्रान्तर्हिते हस्ते परिश्राव्य च तज्जलम्।
प्राङ्नीत्वा प्रोक्षणीपात्रं ज्योतिरग्रे निधाय च ।। २४ ।।

तदद्भिस्त्रिश्च सम्प्रोक्ष्य इध्मं विन्यस्य चाग्रतः।
प्रणीतायां सपुष्पायां विष्णुं ध्यात्वोत्तरेण च ।। २५ ।।

आज्यस्थालीमथाज्येन सम्पूर्याग्रे निधाय च।
सम्प्लवोत्पवनाभ्यान्तु कुर्य्यादाज्यस्य संस्कृतिम् ।। २६ ।।

अखण्डिताग्रौ निर्गर्भौ कुशौ प्रादेशमात्रकौ।
ताभ्यामुत्तानपाणिभ्यामह्गुष्ठानामिकेन तु ।। २७ ।।

आज्यं तयोस्तु सङ्‌गृह्य द्विर्नीत्वा त्रिरवाङ्‌क्षिपेत् ।
स्त्रुक्‌स्त्रुवौ चापि सङ्‌गृह्य ताभ्यां प्रक्षिप्य वारिणा ।। २८ ।।

प्रतप्य दर्भैः स्म्मृज्य पुनः प्रक्ष्याल्य चैव हि।
निष्टप्य स्थापयित्वा तु प्रणवेनैव साधकः ।। २९ ।।

प्रणवादिनमोन्तेन पश्चाद्धोमं समाचरेत्।
गर्भाधानादिकर्म्माणि यावदंशव्यवस्थया। ।। ३० ।।

नामान्तं व्रतबन्धान्तं समावर्त्तावसानकम्।
अधिकारावसानं वा कुर्य्यादङ्गानुसारतः ।। ३१ ।।

प्रणवेनोपचारन्तु कुर्यात्सर्वत्र साधकः।
अङ्गैर्होमस्तु कर्त्तव्यो यथावित्तानुसारतः ।। ३२ ।।

गर्भाधानन्तु प्रथमं ततः पुसवनं स्मृतम्।
सीमन्तोन्नयनं जातकर्म्म नामान्नप्राशनम् ।। ३३ ।।

चूडाकृतिं व्रतबन्धं वेदव्रतान्यशेषतः ।
समावर्त्तनं पत्न्या च योगश्चाथाविकारकः ।। ३४ ।।

हृदादिक्रमलो ध्यात्वा एकैकं कर्म्म पूज्य च।
अष्टवष्टौ तु जचुहुयात् प्रतिकर्म्माहुतीः पुनः ।। ३५ ।।

पूर्णाहुतिं ततो दद्यात् श्रुचा मूलेन साधकः।
वौषडन्तेन मन्त्रेण प्लुतं सुस्वरमुच्चरन् ।। ३६ ।।

विष्णोर्वह्निन्तु संस्कृत्य श्रपयेद्वैष्णवञ्चरुम्।
आराद्य स्थणिडले विष्णुं विष्णु मन्त्रान् संस्मृत्य संश्रपेत् ।। ३७ ।।

आसनादिक्रमेणैव साङ्गावरणमुत्तमम्।
गन्धपुष्पैः समब्यर्च्य ध्यात्वा देवं सुरोत्तमम् ।। ३८ ।।

आधायेध्ममथाघारावाज्यावग्नीशसंस्थितौ।
वायव्यनैर्ऋताशादिप्रवृत्तौ तु यथाक्रमम् ।। ३९ ।।

आज्यभागौ ततो हुत्वा चक्षुषी दक्षिणोत्तरे।
मध्येथ जुहुयात्सर्वंमन्त्रानर्च्याक्रमेण तु ।। ४० ।।

आज्येन तर्पयेन्मूर्त्तेर्द्दशांशेनाह्गहोभकम्।
शतं सहस्त्रं वाज्याद्यैः समिद्भिर्वा तिलैः सह ।। ४१ ।।

समाप्यार्च्चान्तु होमान्तां शुचीन् शिष्यानुपोषितान्।
आहूयाग्रे निवेश्याथ ह्यस्त्रेण प्रोक्षयेत् पशून् ।। ४२ ।।

शिष्यानात्मनि संयोज्य अविद्याकर्म्मबन्धनैः।
लिङ्गानुवृत्तञ्चैतन्यं सह लिङ्गेन पाशितम् ।। ४३ ।।

ध्यानमार्गेण सम्प्रोक्ष्य वायुवीजेन शोधयेत्।
ततो दहनवीजेन सृष्टिं ब्रह्माण्डसञ्‌ज्ञिकाम् ।। ४४ ।।

निर्द्दग्धां सकलां ध्यायेद्भस्मकूटनिभस्थिताम्।
प्लावयेद्वारिणा भस्म संसारं वार्म्मयं स्मरेत् ।। ४५

तत्र शक्तिं न्यसेत् पञ्चात् पार्थिवीं वीजसञ्‌ज्ञिकाम्।
तन्मात्राभिः समस्ताभिः संवृतं पार्थिवं शुभम् ।। ४६ ।।

अण्डन्तदुद्भवन्ध्यायेत्तदाधारन्तदात्मकम्।
तन्मध्ये चिन्तयेन्मूर्तिं पौरुषीं प्रणवात्मिकाम् ।। ४७ ।।

लिङ्गंसङ्‌क्रामयेत् पश्चादात्मस्थं पूर्वसंस्कृतम् ।
विभक्तेन्द्रियसंस्थानं क्रमाद्‌ वृद्धं विचिन्तयेत् ।। ४८ ।।

ततोण्डमब्दमेकं तु स्थित्वा द्विशकलीकृतम्।
द्यावापृथिव्यौ शकले तयोर्म्मध्ये प्रजापतिम् ।। ४९ ।।

जातं ध्यात्वा पुनः प्रोक्ष्य प्रणवेन तु संश्रितम्।
मन्त्रात्मकतनुं कृत्वा यथान्यासं पुरोदितम् ।। ५० ।।

विष्णुर्हस्तं ततो मूद्‌र्ध्नि दत्त्वा ध्यात्वा तु वैष्णवम्।
एवमेकं बहून्‌वापि जनित्वा ध्यानयोगतः ।। ५१ ।।

करौ सङ्‌गृह्य मूलेन नेत्रे बद्‌ध्वा तु वाससा।
नेत्रमन्त्रेण मन्त्री तान् सदनेनाहतेन तु ।। ५२ ।।

कृतपूजो गुरुः सम्यग देवदेवस्य तत्त्ववान्।
शिष्यान् पुष्पाञ्जलिभृतः प्राङ्‌मुखानुपवेशयेत् ।। ५३ ।।

अर्च्चयेयुश्च तेप्येवम्प्रसूता गुरुणा हरिम्।
क्षिप्त्वा पुष्पाञ्जलिभृतः प्राङ्‌सुखानुपवेशयेत् ।। ५४ ।।

अमन्त्रमर्च्चनं कृत्वा गुरोः पादार्च्चनन्ततः।
विधाय दक्षिणां दद्यात् सर्वस्वं चार्द्धमेव वा ।। ५५ ।।

गुरुः संशिक्षयेच्छिष्यान् तैः पूज्यो नामभिर्हरिः।
विष्वक्‌सेनं यजेदीशं शङ्खचक्रगदाधरम् ।। ५६ ।।

तज्जपन्तञ्च तर्ज्जन्या मण्डलस्थं विसर्जयेत् ।। ५७ ।।

विष्णुनिर्म्माल्यमखिलं विष्वक्‌सेनाय चार्पयेत्।
प्रणीताभिस्तथात्मानमभिषिच्य च कुण्डगम् ।। ५८ ।।

वह्निमात्मनि संयोज्य विष्वक्‌सेनं विसर्जयेत्।
बुभुक्षुः सर्वमाप्नोति ममुक्षुर्ल्लीयते हरौ ।। ५९ ।।

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये अग्निकार्य्यादिकथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः।।